Tuesday, September 9, 2014

हिचकी

किस्त : 8-9


आठ

नन्दू जी कुछ देर तक डिज़ाइन को हाथ में लिये अकबकाये-से खड़े रहे थे। उनकी नज़र लाल स्केच पेन से बनाये गये उस गहरे निशान पर गयी, जो हरिश्चन्द्र दत्त बड़थ्वाल के नाम में हुई प्रूफ़ की ग़लती के गिर्द परिवार नियोजन के लाल तिकोन की तरह बना हुआ था। 
‘जल्दी-जल्दी में प्रूफ़ की ग़लती रह गयी है,’ उन्होंने माफ़ी माँगने के अन्दाज़ में कहा था।
‘प्रूफ़ की ग़लती तो है ही,’ हरीश अग्रवाल के स्वर में नरमी के बावजूद नश्तर की-सी धार थी, ‘लेकिन यह चित्र भी रमा जी को बिलकुल पसन्द नहीं आया। क्या इससे बेहतर तस्वीर नहीं चुन सकते थे आप?’
‘चित्र तो बदला जा सकता है,’ नन्दू जी ने हरीश अग्रवाल को आश्वस्त किया था।
‘बाक़ी चित्र कहाँ हैं?’ हरीश अग्रवाल ने पूछा था।
‘अभी तो शमशाद के ही पास हैं। उसने कहा था कि वह दे जायेगा, पर लगता है, इधर कोई रिकॉर्डिंग रही होगी। पुस्तक मेले के बाद से नहीं आया।’
‘सारे चित्र उसे देने की क्या ज़रूरत थी ?’ हरीश अग्रवाल के स्वर में खीझ-भरा उलाहना था। ‘अब आप उसे कहिए, फ़ौरन सारे चित्र यहाँ दे जाये। फिर इस डिज़ाइन में प्रूफ़ की भूल ठीक करवा के कम्प्यूटर से इसका एक और प्रिंट निकलवा लीजिए, जिसमें चित्र की जगह ख़ाली हो। यह सारी सामग्री एक लिफ़ाफ़े में रख कर कल शाम तक हर हालत में रमा जी के मालवीय नगर के फ़्लैट में भिजवा दीजिए। वे परसों या नरसों दिल्ली आ रही हैं और यहीं बैठ कर तय करेंगी कि कौन-सा चित्र जाना है। मैं तीन दिन के लिए भोपाल जा रहा हूँ, बृहस्पत की सुबह तक आ जाऊँगा। मेरे आने से पहले रमा जी का फ़ोन आये तो आप जा कर उनसे कवर डिज़ाइन के बारे में समझ लीजिएगा।’
नन्दू जी सिर हिला कर मुड़े ही थे कि हरीश अग्रवाल ने कहा था - ‘बुध को रमा जी के घर फ़ोन करके पता कर लीजिएगा कि वे आयी हैं या नहीं। और जब आप उनसे मिलने जायें तो शमशाद को साथ मत ले जाइएगा। इस किताब में वैसे ही बार-बार अड़ंगे लगते रहे हैं। मैं इसे जल्दी-से-जल्दी छाप कर झंझट ख़त्म करना चाहता हूँ। बाक़ी काम बाद में होते रहेंगे।’
सोमवार का पूरा दिन नन्दू जी जगह-जगह फ़ोन करके शमशाद का पता लगाने की कोशिश करते रहे थे। आख़िरकार, शाम को पाँच बजे शमशाद उस स्टूडियो में उन्हें मिला था, जहाँ वह डिस्कवरी चैनल के लिए अनुवाद की गयी स्क्रिप्ट की रिकॉर्डिंग कराता था। फ़ोन पर आ कर उसने जल्दी-जल्दी नन्दू जी की बात सुनी थी और अगले दिन प्रकाशन संस्थान के कार्यालय में चित्रों के साथ आने का आश्वासन दे कर तत्काल फ़ोन रख दिया था। 
प्रकट ही, मंगलवार को वॉशिंग मशीन लेने की योजना नन्दू जी को मुल्तवी करनी पड़ी थी, लेकिन वे दोपहर बाद तक शमशाद का इन्तज़ार करते रहे थे और वह नहीं आया था। झल्ला कर वे फ़ोन उठा कर फिर से शमशाद के मिलने की सम्भावित जगहों के ठकठकाने ही वाले थे कि वह बड़े इत्मीनान से अपना हेल्मेट झुलाता हुआ सीढि़याँ चढ़ कर कार्यालय में दाख़िल हुआ था। मगर वह सीधे उनकी मेज़ पर नहीं आया था। पहले उसने रिसेप्शेनिस्ट रागिनी शर्मा से गप-शप की थी, फिर स्वामी का हाल-चाल लिया था और जब उनका धैर्य चुकने ही वाला था, वह आ कर उनके पास बैठा था।
‘मैं सुबह से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ,’ नन्दू जी की आवाज़ में झल्लाहट भी थी और अन्ततः शमशाद के आ जाने पर राहत भी।
‘देर हो गयी कॉमरेड,’ शमशाद ने बैग से तस्वीरों का लिफ़ाफ़ा निकालते हुए कहा था, ‘मैं थोड़ी देर को पार्टी ऑफ़िस चला गया था। उन्हें रैली के लिए एक बैनर देना था।’
‘अब चलो, जल्दी से डिज़ाइन ठीक करवा दो तो मैं यह सब मालवीय नगर भेज कर छुट्टी करूँ।’ नन्दू जी उठे थे।
‘सब हो जायेगा कॉमरेड,’ शमशाद ने लगभग खिझाने वाली निश्चिन्तता से कहा था, ‘पहले एक प्याला चाय तो पिलवाइए।’
झख मार कर नन्दू जी को चपरासी रामसेवक से ख़ास तौर पर अनुरोध करके चाय बनवानी पड़ी थी। चाय आने पर शमशाद ने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला था। उसे मालूम था कि हरीश अग्रवाल ने कार्यालय में सिगरेट-बीड़ी न पीने के बारे में कड़ी हिदायतें दे रखी थीं, लेकिन उसका कहना था कि वह तो प्रकाशन संस्थान का मुलाज़िम था नहीं, और इसी तर्क के आधार पर वह नन्दू जी या स्वामी के पास बैठे-बैठे सिगरेट सुलगा लिया करता था। 
एक बार उसने हरीश अग्रवाल के कैबिन में भी ऐसा ही किया था और जब हरीश अग्रवाल ने मुलायमियत के साथ उसे टोका था तो वह यह कह कर सीढि़याँ उतर गया था कि सिगरेट अब सुलगा ही ली है तो उसे ख़त्म करके आता है, और आधे घण्टे के बाद वापस आया था। नन्दू जी और हरीश अग्रवाल मन-मारे बैठे उसका इन्तज़ार करते रहे थे। 
अगर अच्छे कवर डिज़ाइन बनाने वालों का इतना टोटा न होता तो हरीश अग्रवाल शमशाद को दोबारा न बुलाता, पर शमशाद के आवरण चित्र काफ़ी पसन्द किये गये थे; इसीलिए हरीश अग्रवाल चुप लगा गया था और इसके बाद शमशाद को अपने कैबिन में बुलाने की बजाय ख़ुद उठ कर नन्दू जी की मेज़ पर चला जाता।
सिगरेट ख़त्म करने के बाद शमशाद ने कम्प्यूटर कक्ष में जा कर आवरण पर नाम के हिज्जे ठीक करवाये थे और फिर चित्र की जगह ख़ाली छोड़ते हुए कवर डिज़ाइन का ताज़ा प्रिंट निकलवाया था। इस दौरान वह हरिश्चन्द्र दत्त बड़थ्वाल, कांग्रेस पार्टी, रमा जी, हरीश अग्रवाल और हेरम्ब त्रिपाठी को ले कर चुटकियाँ लेता रहा, जिससे नन्दू जी को भले ही अस्वस्ति का बोध होता रहा, लेकिन कम्प्यूटर-कक्ष में बैठे ऑपरेटरों का काफ़ी मनोरंजन हुआ था। 
यह सब करते-कराते साढ़े पाँच बज गये थे। प्रकाशन संस्थान में छै बजे छुट्टी हो जाती थी और जब हरीश अग्रवाल शहर में न होता तो चपरासी साढ़े पाँच-पौने छै बजे ही चल देते थे, इसलिए नन्दू जी के लाख मनुहार करने पर भी कोई चपरासी मालवीय नगर जाने को तैयार न हुआ था। हार कर नन्दू जी को स्कूटर पर बारह-तेरह किलोमीटर का फ़ासला तय करके मालवीय नगर जाना पड़ा था। 
उस दिन वॉशिंग मशीन लेना तो दूर रहा, उन्हें लक्ष्मी नगर लौटते-लौटते ही साढ़े आठ बज गये थे क्योंकि जमुना के पुल पर शाम को लौटने वालों की भीड़ के कारण जाम लगा हुआ था।


नौ

बुधवार को कई बार रमा जी के फ़्लैट पर फ़ोन मिलाने के बाद, लगभग बारह बजे एक महिला ने फ़ोन उठाया था और सूचना दी थी - ‘मैडम, बाई कार, लखनऊ से दिल्ली के लिए मूव कर चुकी हैं और शाम तक पहुँचने वाली हैं।’
लेकिन उस दिन उस मार्केट की साप्ताहिक बन्दी रहती थी जिसमें उनके परिचित दुकानदार का शो रूम था। सो, समय होते हुए भी नन्दू जी वॉशिंग मशीन नहीं ले पाये थे।
अगले दिन नन्दू जी पक्का इरादा करके दफ़्तर पहुँचे थे कि जैसे भी हो, वे उस दिन वॉशिंग मशीन ज़रूर ख़रीदेंगे। कारण यह भी था कि वॉशिंग मशीन के आसरे में बिन्दु ने तीन-चार दिन से कपड़े नहीं धोये थे और नन्दू जी एक बार ना करके दोबारा पुराने धोबी की सेवाएँ लेने के इच्छुक नहीं थे। 
दफ़्तर पहुँचते ही उन्होंने रमा जी के घर फ़ोन किया था। फ़ोन रमा जी ने ही उठाया था और नन्दू जी से कहा था कि रास्ते में कार ख़राब हो जाने की वजह से वे देर रात को दिल्ली पहुँची थीं और उस समय तत्काल अकबर रोड जा रही थीं जहाँ कांग्रेस पार्टी का दफ़्तर था।
‘मुझे एक ज़रूरी बैठक में भाग लेना है,’ उन्होंने कहा था, ‘वहीं से मैं आपके ऑफ़िस आऊँगी। मैंने पूज्य पिता जी के तीन चित्र छाँटे हैं। इन्हें मैं अपने आदमी के हाथ, आवरण के सादे प्रिंट के साथ आपको भिजवा रही हूँ। नाम की ग़लती तो ठीक हो गयी है। आप इन तीनों चित्रों को ख़ाली जगह में सेट करवा के कम्प्यूटर से तीन अलग-अलग प्रिंट निकलवा लीजिए। मैं वहीं आपके दफ़्तर में बैठ कर इनमें से एक फ़ाइनल कर दूँगी। अरे हाँ,’ उन्होंने आगे जोड़ा था, ‘एक बात और। कवर पर तस्वीर तो ब्लैक ऐण्ड वाइट ही जायेगी, क्योंकि फ़ोटो मैंने वैसे ही चुने हैं, मगर हर कवर का प्रिंट आप अलग-अलग रंग में निकलवाइएगा। चुनाव में आसानी रहेगी।’
लगभग एक ही साँस में यह सब कह कर बिना दूसरी तरफ़ से हाँ-ना सुने, श्रीमती रमा बड़थ्वाल पन्त ने फ़ोन रख दिया था। नन्दू जी के पास रमा जी के आदमी का इन्तज़ार करने के सिवा कोई चारा नहीं बचा था। बारह बजे के आस-पास जब हरीश अग्रवाल हवाई अड्डे से सीधा प्रकाशन संस्थान के कार्यालय पहुँचा था तो नन्दू जी ने उसे तब तक की घटनाओं के बारे में सिलसिलेवार ढंग से बताया था।
० 
हरीश अग्रवाल बहुत अच्छे मूड में था। उसने भोपाल में किताबों की सरकारी ख़रीद का एक अच्छा-ख़ासा ऑर्डर हासिल किया था और उसी सुबह फ़ाइल पर अधिकारी के हस्ताक्षर करवाने के बाद वहाँ से रवाना हुआ था। ख़ुशी के इसी आलम में उसने नन्दू जी को मुस्तैद रहने की अहमियत पर एक संक्षिप्त-सा प्रवचन दिया था और तब तक डटे रहने का आग्रह किया था, जब तक वे रमा जी से कवर डिज़ाइन मंज़ूर नहीं करा लेते। 
यह हिदायत दे कर हरीश अग्रवाल खाना खाने अपने घर चला गया था, जो पास ही में अजमेरी गेट के पीछे बाज़ार सीताराम में व्यवसायियों के पुराने मुहल्ले में था और जहाँ से निकल कर वह पटपड़गंज के एक बड़े फ़्लैट में जाने का इरादा बाँध रहा था। जाते-जाते वह रागिनी शर्मा से कह गया था कि जैसे ही रमा जी आयें, वह उसे घर पर फ़ोन कर दे, वह फ़ौरन आ जायेगा।
नन्दू जी तीन बजे तक इन्तज़ार करते रहे, लेकिन न तो रमा जी की कोई सुन-गुन मिली, न उनके भेजे आदमी की। इसी चक्कर में नन्दू जी खाना भी नहीं खा पाये। आख़िरकार, तीन बजे वे अपना टिफ़िन उठा कर पास के एक ढाबे में चले गये, जहाँ वे रोज़ घर से लाया खाना गरम करवा के खाते थे।  सीढि़याँ  उतरने से पहले वे भी रागिनी को ताक़ीद करना नहीं भूले कि अगर रमा जी उनके लौटने से पहले आ जायें तो चपरासी भेज कर उन्हें ढाबे से बुलवा लिया जाये।
जब वे आध-पौन घण्टे बाद खाना खा कर प्रकाशन संस्थान के दफ़्तर पहुँचे थे तो सूरत-शक्ल से छोटे शहर या क़स्बे का राजनीतिक कार्यकर्ता नज़र आने वाला एक साँवला-सा आदमी उनकी मेज़ के सामने कुर्सी पर एक पाँव चढ़ाये, इतमीनान से बैठा सुर्ती मल रहा था। उसने कुर्ते-पाजामे पर सदरी पहन रखी थी और पाँवों में किरमिच के भूरे जूते। नन्दू जी के पूछने पर उसने बताया था कि उसे रमा जी ने भेजा है।
‘रमा जी भी तो आने वाली थीं,’ नन्दू जी ने सवालिया अन्दाज़ में कहा था।
‘मैडम बहुत थक गयी रहीं, इसलिए मिटिन के बाद घर चली गयीं,’ उस व्यक्ति ने कहा था, ‘संझा को उन्हें पार्टी अध्यक्ष के यहाँ चाय पर जाना है। इसलिए हमसे बोली हैं कि आदरणीय बाबू जी वाली किताब का डिजैन ले जाओ, तीन गो फोटो के साथ और बनवा कर घरवा पर लेते आओ, रात को पसन्न कर लेंगे। मैडम कल हियाँ आने का कही हैं।’
नन्दू जी ने उस व्यक्ति से लिफ़ाफ़ा ले कर डिज़ाइन और चित्र देखे थे। तीनों चित्र उसी प्रकार के थे, जैसे घाघ कांग्रेसी नेता और बाद में उन्हीं के अनुकरण में अन्य दलों के नेता भी अख़बारों, अभिनन्दन ग्रन्थों और स्मारिकाओं में छपाते आये थे। नन्दू जी डिज़ाइन और चित्र ले कर कम्प्यूटर-कक्ष की ओर चलने वाले थे कि उस व्यक्ति ने उन्हें हाथ के इशारे से रोक लिया था।
‘क्यों बाबू साहेब, आपके कार्यालय में चाय की कौनो व्यवस्था नाहीं है क्या ? सुबह से बस में धक्का खाय रहे हैं। पार्टी आफ़िस से मालवी नगर, मालवी नगर से पार्टी आफ़िस। हुआँ से यहाँ। साथ में कुछ मठरी-ओठरी भी मिल जाती तो दम में दम आता।’ उसने फ़रमाइश की थी।
नन्दू जी ने चपरासी को बुला कर कहा था कि वह पास की चाय की दुकान से एक चाय और दो मठरी ला कर उस व्यक्ति को दे दे, पैसे एकाउण्टेण्ट से ले ले। उस व्यक्ति ने ठोंकी गयी सुर्ती को फ़ौरन एक काग़ज़ में पुडि़या बाँध कर अपनी सदरी की जेब में रख लिया और चाय की प्रतीक्षा में आराम से पसर गया था।
साढ़े पाँच बजे जब नन्दू जी उस व्यक्ति को विदा करके मुक्त हुए तो वे बुरी तरह चट चुके थे। जितनी देर में कम्प्यूटर पर डिज़ाइन बनाने वाले ऑपरेटर ने बड़थ्वाल जी वाली पुस्तक के आवरण चित्र के तीन प्रारूप तैयार किये थे, रमा जी द्वारा भेजा गया वह आदमी नन्दू जी को अपने बारे में बताता रहा - कि वह यानी रामसुजित केसरवानी, कुण्डा हरनामगंज में कांग्रेस कमेटी का ‘बिलाक सिकेटरी’ है, रमा जी के कई कार्यक्रम वहाँ आयोजित करा चुका है; माननीय बाबू जी की उस पर ‘बिसेस किरपा’ रही; वे ही उसे राजनीति में लाये थे; उसने भी उनका साथ नहीं छोड़ा; जब वे ‘पावर’ में नहीं रहे, तब भी नहीं; माननीय बाबू जी ने उसे सरकारी गल्ले की दुकान दिलवा दी थी; उसी से घर-परिवार चलता है और वह समाज सेवा कर पाता है, आदि, आदि। 
नन्दू जी मन-ही-मन उस टुटपुँजिये कांग्रेसी कार्यकर्ता की लनतरानियों पर खीझते हुए बेमन से अपने सामने रखे प्रूफ़ पढ़ते रहे थे। वे चाहते थे कि उन्हें बड़थ्वाल जी, उनकी सुयोग्य बेटी रमा और इस रमा-सेवक के जंजाल से छुट्टी मिले तो वे फ़ौरन जा कर वॉशिंग मशीन लदवा कर घर पहुँचें। अगले दिन पार्टी की रैली थी, जिसमें न जा कर वे अपने पुराने साथियों के बीच नक्कू नहीं बनना चाहते थे। और उसके बाद शनिवार था। 
पार्टी साहित्य में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के बारे में प्रकाशित अनगिनत लेख पढ़ने के बावजूद नन्दू जी बचपन ही मन में बिठायी गयी कुछ धारणाओं और विश्वासों से मुक्त नहीं हो पाये थे। वे अब भी शनिवार को बाल कटवाने या शेव करने से बचते थे। और मशीन या लोहे का कोई सामान ख़रीदना अशुभ मानते थे।
लेकिन नन्दू जी न तो उस दिन वॉशिंग मशीन ख़रीद पाये, न अगले दिन रैली में शिरकत कर सके। अभी रमा जी का आदमी रवाना हुआ ही था और नन्दू जी अपना बैग, हेल्मेट और टिफ़िन का डिब्बा सहेज ही रहे थे कि हरीश अग्रवाल दफ़्तर पहुँचा था। उसने उन्हें अपने कैबिन में बुलवा भेजा था और देर तक उनके साथ बैठा भोपाल वाले ऑर्डर की किताबें छपवाने के सिलसिले में हिदायतें देता रहा था। आख़िरकार, सात बजे के क़रीब, नन्दू जी चलने को हुए तो हरीश अग्रवाल ने उनसे कहा था कि अगले दिन वे दफ़्तर न आ कर घर से नॉएडा, चले जायें, जहाँ वह प्रेस था जिसमें इस प्रकाशन संस्थान की किताबें छपती थीं।
‘पुस्तकों के नाम मैंने आपको लिखा ही दिये हैं,’ उसने कहा था, ‘बड़ी किताबें पाँच-पाँच सौ और बाल-साहित्य तीन-तीन हज़ार छपेगा। आप सारी पुस्तकों के निगेटिव निकलवा कर सावधानी से लाइन-अप कर दीजिएगा। कवर की छपाई साथ-साथ होगी। रमा जी आयेंगी तो मैं उनसे समझ लूँगा।’ फिर उसने आगे जोड़ा था कि समय हो तो दफ़्तर आयें, वरना उधर ही से घर चले जायें। बस, प्रेस से चलते समय उसे फ़ोन कर दें।
नन्दू जी जब सीढि़याँ उतर कर बाहर गली में आये तो उनका दिमाग़ भन्नाया हुआ था। ऐसे वक़्तों पर उन्हें बड़ी शिद्दत से अपने अख़बारी दिनों की याद आती थी, जब सारी भाग-दौड़ के बाद भी वे अपने समय को किसी हद तक मन-मर्ज़ी ख़र्च कर सकते थे। 
उन्हें याद आया कि शादी-शुदा ज़िन्दगी के शुरुआती दिनों में एक बार जब बिन्दु ने शाहरुख़ ख़ान की नयी फ़िल्म देखने के लिए हठ बाँध लिया था तो उन्होंने पी.सी.ओ. से फ़ोन करके अख़बार के उप-सम्पादक से बहाना बना दिया था। इसी तरह जिस दिन उन्हें फ़्रिज ख़रीदना था, वे उप-सम्पादक से कह कर ड्यूटी के बीच ही में चले गये थे और साथ में फ़रहान अख़्तर को भी ले गये थे, क्योंकि दुकानदार उसी का परिचित था। 
अब, हालाँकि उन्हें अख़बार की नौकरी की तुलना में दुगना वेतन मिलता था और ज़िन्दगी में भी वैसा उतार-चढ़ाव नहीं रहा था, कई बार उन्हें तीखी घुटन का एहसास होता। मगर नन्दू जी ने पार्टी में और कुछ भले ही सीखा था या नहीं, प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति में भी उम्मीद का दामन थामे रखना ज़रूर सीख लिया था। वे भीषण आशावादी थे और इसीलिए आई.टी.ओ. का पुल पार करते-करते फिर से सहज हो गये थे। 
उन्होंने तय किया था कि अगले दिन वे जल्दी तैयार हो जायेंगे और पहले वॉशिंग मशीन ख़रीद कर घर पहुँचा देंगे, उसके बाद नॉएडा जायेंगे। सम्भव हुआ तो दो घण्टे में प्रेस के काम से मुक्त हो कर कहीं बीच ही से रैली में चेहरा भी दिखा आयेंगे। उन्हें लम्बे तजरुबे से मालूम था कि अगर रैली का समय बारह बजे का दिया गया हो तो वह दो-ढाई से पहले नहीं शुरू होती। 
इस निश्चय पर पहुँच कर उन्होंने रास्ते में एक पी¤ सी¤  ओ पर रुक कर अपने परिचित दुकानदार को फ़ोन किया था कि वे अगले दिन ठीक साढ़े दस बजे उसके शो-रूम पर पहुँचेंगे, वह वॉशिंग मशीन के काग़ज़ तैयार कर रखे।


No comments:

Post a Comment