Sunday, September 14, 2014

हिचकी

किस्त : 18-19

अट्ठारह

ऊपर नन्दू जी के यहाँ हाल वैसा ही था। 
आख़िर, इन ढाई तीन घण्टों में - बिन्दु के फ़ोन करके आने के बाद से चन्दू गुरु के आने तक - ऐसा क्या फ़र्क़ पड़ने वाला था। चन्दू गुरु के घण्टी बजाने पर बिन्दु ने दरवाज़ा खोला था और हालाँकि नन्दू जी के प्रभाव में पुरानी सड़ी-गली परम्पराओं का विरोध करने के नाम पर उसने बहुत-से रिवाज छोड़ दिये थे, जैसे सिर ढँकना, पैर छूना, बिछुआ पहनना, लेकिन इस अजीब स्थिति में जब उसने ख़ुद फ़ोन करके ‘बड़के भैया’ को बुलाया था, वह कुछ अचकचा-सी गयी थी। उसने सिर तो नहीं ढँका था लेकिन झुक कर चन्दू गुरु के पैर ज़रूर छू लिये थे।
‘जीती रहो, जीती रहो,’ चन्दू गुरु ने उसे आशीर्वाद दिया था, ‘सुहाग अचल रहे।’ फिर वे चप्पल उतार कर अन्दर गये थे। 
नन्दू जी दीवान पर निढाल पड़े थे। हिचकियों का वेग तो कम हो गया था, पर उनका सिलसिला बराबर जारी था। हर दो-तीन मिनट पर नन्दू जी को झटके के साथ हिचकी आती। उन्होंने एक ऐसी कातर दृष्टि से अपने भाई को देखा जिसमें तकलीफ़, फ़रियाद, लाचारी और राहत का एक मिला-जुला भाव था।
‘धरम-करम छोड़ने से एही होता है,’ चन्दू गुरु ने आत्म-विश्वास से लबरेज़ अपने ख़ास पँडिताई वाले अन्दाज़ में कहा, ‘तुम नयी चाल के लोग तो कुछ मानते ही नहीं।’ 
उन्होंने अपना झोला बेंत की एक कुर्सी पर टिका दिया था और धाराप्रवाह बोलते-बुदबुदाते हुए जा कर पैर-हाथ धोये थे और फिर अन्दर आ कर नीचे चटाई पर बैठ गये थे। 
‘अरे, सब कुछ जो पुराना है, वह बुरा नहीं है, और सब कुछ जो नया है, वह अच्छा नहीं है। बाबू जी बताते थे कालीदास भी एही कहे हैं। जइसे दुनिया में अच्छा-बुरा आदमी होता है, वइसे अच्छी-बुरी आत्मा होती है। एही लिये लोग देवी-देवता की तस्वीर टाँगते हैं, गनेस जी की मूर्ति रखते हैं, सिउलिंग और सालिग्राम पूजते हैं। तुलसी बाबा भी कह गये हैं - भूत परेत निकट नहीं आवे, हनूमान जब नाम सुनावे। हम दिल्ली के बड़े-बड़े घर में गये हैं, ढेर पढ़े-लिखे लोगन के हियाँ भी हम गनेस जी की मूरती देखा है। तुम लोग जाने कौन-कौन बिदेसी बाबा लोग की फ़ोटू सजाये हो।’ 
उन्होंने दीवार पर लगे मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन के चित्रों की तरफ़ विरक्त भाव से देखा।
नन्दू जी थोड़ा कसमसाये। उनका जी हो रहा था कि अभी उठ कर बैठ जायें और अपने इस बड़े भाई से, जो एक छोटे-मोटे धार्मिक उठाईगीरे से बढ़ कर धार्मिक माफ़िया बनने की तरफ़ क़दम बढ़ा रहा था, दो-दो हाथ करें। लेकिन एक तो उनकी तबियत ख़ासी शिकस्ता थी; दूसरे, दो-तीन महीने पहले ही हरीश अग्रवाल ने दिल्ली के जाने-माने मनोविज्ञान-वेत्ता डॉ0 मुनीश ग्रोवर की किताब ‘सन्त-सियाने, झाड़-फूंक और ओझा’ का अनुवाद छापा था जिसमें डॉ0 मुनीश ग्रोवर ने फ़्रायड, जुंग, हैवलॉक एलिस और दूसरे विदेशी मनोवैज्ञानिकों के साथ-साथ प्राचीन ग्रन्थों और गाँव-देहात के झाड़-फूंक करने वालों के हवाले से यह बताया था कि भूत-प्रेत, आसेब, देवी आने और टोने-टोटके से जुड़े हुए बहुत-से ख़याल जिन्हें आम-तौर पर अन्ध-विश्वास कह कर ख़ारिज कर दिया जाता है, दरअसल देसी वैज्ञानिक समझ के सबूत हैं और अब पश्चिमी जगत में भी मानसिक रोगियों के इलाज में इस सबका इस्तेमाल हो रहा है। 
डॉ0 मुनीश ग्रोवर रातों-रात चर्चा का विषय बन गये थे, क्योंकि हाल के हर हिन्दुस्तानी विशेषज्ञ की तरह उन्होंने अपनी पुस्तक और अपनी स्थापनाएँ सब से पहले अंग्रेज़ी में प्रस्तुत की थीं और अच्छी-ख़ासी रायल्टी वसूलने के साथ-साथ टेलिविजन पर आधे-घण्टे का एक साप्ताहिक ‘शो’ भी शुरू कर दिया था। और अब मुनीश ग्रोवर ने अंग्रेज़ी पढ़ी-लिखी पश्चिम-परस्त जनता के लिए कामसूत्र वाले वात्स्यायन पर एक उपन्यास भी लिखना शुरू कर दिया था। 
अपने भाई की बातें सुन कर नन्दू जी को डॉ0 मुनीश ग्रोवर का ख़याल आ गया था और इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुके हर गंगातट वासी संशयात्मा की तरह उन्होंने ‘क्या पता इसमें कुछ सच्चाई हो’ के सम्भ्रम में अपना मुंह बन्द रखने में ही भलाई समझी थी।
इस बीच होंटों-ही-होंटों में बुदबुदाते हुए चन्दू गुरु ने बिन्दु को झोला पकड़ाने के लिए इशारा किया था और उसमें से एक मैगी-सॉस की छोटी बोतल निकाली भी जिसमें मटमैला-सा पानी भरा था। 
‘गंगाजल है,’ चन्दू गुरु ने बिन्दु की सवालिया निगाहों को लक्ष्य करके कहा था, ‘हम हमेसा अपने साथ रखते हैं, सुद्ध करने के वास्ते।’ 
यह सूचना देने के बाद उन्होंने बिन्दु से एक लोटा पानी मँगवाया और उसमें दो ढक्कन उस कथित गंगाजल के डाल दिये और गर्व से कहा, ‘एही तो गंगाजल की महिमा है, दुई बूंद भी आदमी को तार देती है।’ 
इसके बाद उन्होंने बोतल पर एहतियात से ढक्कन लगा कर उसे वापस झोले के हवाले किया और उठ कर लोटे से अँजुरी में पानी ले कर चारों तरफ़ छिड़कते हुए, अस्पष्ट स्वर में मन्त्रों का ऐसा पाठ करना शुरू किया जो किसी भौंरे के गुंजार सरीखा लग रहा था।
‘चलो, बाताबरन सुद्ध हो गया,’ गुंजार ख़्त्म करके वे बोले।
फिर चन्दू गुरु ने अन्दर के कमरे, रसोई, बाथरूम और बाहर की परछत्ती में भी उस लोटे से पानी ले कर छिड़कते हुए वही मन्त्रोच्चार दोहराया था जो वे बैठक में कर रहे थे और फिर वापस चटाई पर आसन जमाते हुए बोले थे, ‘हमको तो शनि का प्रकोप जान पड़ता है।’
नन्दू जी हिचकियाँ लेते हुए एक अजीब-सी श्लथ विरक्ति और उदासीनता से यह सारा व्यापार देख रहे थे। अगर चन्दू गुरु वाक़ई उनके बड़े भाई न होते तो यह सारा दृश्य चाँई ओझा और भोला यजमान के-से शीर्षक वाला कोई प्रहसन जान पड़ता।
इस बीच चन्दू गुरु अपने झोले से धूप निकाल कर जला चुके थे और उसके दूधिया बादलों को मोरपंखी से पूरे कमरे में फैला रहे थे। ‘बाताबरन’ को दोबारा ‘सुद्ध’ करने के बाद चन्दू गुरु ने मोरपंखी झोले में रखी और एक पीतल की तश्तरी निकाली, उसमें एक डिबिया से लाल सिन्दूर डाला, झोले ही से काली की एक छोटी-सी फ़्रेम-मढ़ी तस्वीर निकाल कर उस पर लाल सिन्दूर से टीका लगाया और अन्त में ताँबे का एक तावीज़ निकाल कर काली की तस्वीर के सामने रख दिया। इसके बाद उन्होंने नाक से तेज़-तेज़ साँस लेते और छोड़ते हुए, कुछ ऐसे मन्त्र पढ़ने शुरू किये जिनमें ‘ह्रीं क्लीं और फट’ जैसा कुछ सुनाई देता था।
जब आख़िरकार यह मन्त्रोच्चार ख़त्म हुआ तो चन्दू गुरु ने बिन्दु से कहा, ‘एक कटोरी में थोड़ा-सा कड़ू तेल तो ले आओ।’
जब बिन्दु तेल ले आयी तो चन्दू गुरु ने तावीज़ और सिन्दूर की तश्तरी उठायी और उसी व्यावसायिक तत्परता और कुशलता से जिससे वे अब तक की सारी क्रियाएँ सम्पन्न कर रहे थे, नन्दू जी को टीका लगाया, उनका कुर्ता उतरवा कर उनकी बाँह से वह तावीज़ बाँधा, उनके हाथ से छुआ कर एक रुपये का सिक्का तेल की कटोरी में डाल दिया और फिर सारा सामान उसी मुस्तैदी से झोले में रख कर वहीं चटाई पर पालथी मार कर बैठ गये। 
‘ई रुपिया कौनो भिखारी को दे देना,’ उन्होंने बिन्दु से कहा, ‘प्रकोप सान्त हो जायेगा।’
टीका लगाने पर तो नहीं, पर जब चन्दू गुरु ने उनकी बाँह से तावीज़ बाँधा था तो नन्दू जी कसमसाये थे और अब भी कुर्ते के ऊपर से उसे टटोल रहे थे।
‘हम जानते हैं, तुम लोग अब बिदेसी शिक्षा के असर में ई सब पूजा-पाठ और गण्डा-ताबीज नहीं मानते हो,’ चन्दू गुरु उस चाय की चुस्की लेते हुए बोले थे जो इस बीच दो मठरियों के साथ बिन्दु उनके सामने रख गयी थी, ‘मगर इन सब में बड़ी सक्ती होती है। आखिर हमारे सब बूढ़-पुरनिये नासमझ तो नहीं थे जो ई सब बिधि-बिधान बनाये रहे। और फिर, चलो मान लिया कि एमें कुछ नहीं होता, मगर एक गण्डा पहिरने से अगर आदमी का मन सान्त हो जाये तो समझो आधा कस्ट तो दूर हो गया। असली चीज तो मन की सक्ती है। हम लोग दवा खाते हैं तो डाक्टर के बिस्वासै पर तो खाते हैं न ? क्या हमको मालूम रहता है दवा में का है और कैसे असर करेगा?’ और जैसे इस तर्क से नन्दू जी को पूरी तरह आश्वस्त करके चन्दू गुरु ने चाय की एक लम्बी चुस्की ली।  

उन्नीस

तभी दरवाज़े के ऊपर लगी घण्टी बजी और किसी ने दरवाज़े को ठेलते हुए आवाज़ दी, ‘अरे भाई, नन्दू जी हैं?’
बिन्दु ने लपक कर दरवाज़ा खोला तो तेज़ी से गंजे होते सिर वाले एक गोरे, सुदर्शन, मझोले क़द के आदमी ने अन्दर क़दम रखा। उनके पीछे-पीछे फ़ैज़ाबाद और बिहार के वे तीनों साथी थे जो पिछली शाम नन्दू जी से प्रकाशन के बाहर मिले थे।
ये गोरे, सुदर्शन व्यक्ति हिन्दी के चर्चित युवा कहानीकार आदित्य प्रकाश थे जिन्होंने अपनी हाल की दो कहानियों से तहलका मचा दिया था। पहली कहानी में हिन्दी के एक प्रतिभाशाली, लेकिन भोले स्वभाव के क्रान्तिकारी कवि सौरभ मिश्रा को व्यंग्य और उपहास का निशाना बनाया गया था।
कहानी शुरू होती थी नयी दिल्ली के एक ऐसे शिक्षा संस्थान की पोल खोलते हुए जो सत्तर के दशक में बड़े ताम-झाम के साथ खोला गया था ताकि विदेशों के उच्च शिक्षा संस्थानों का मुक़ाबला कर सके। ज़ाहिर है इस शिक्षा संस्थान के ज़्यादातर छात्र उच्च वर्ग के थे। अलबत्ता, चूंकि तब तक हिन्दुस्तान में कल्याणकारी राज्य के उद्देश्य को बिलकुल ख़ारिज नहीं किया था, इसलिए सरकारी और सरकार समर्थित संस्थानों में मध्य और निम्न वर्गों के भी कुछ छात्र दाख़िल कर लिये जाते थे, बशर्ते कि वे पढ़ाई-लिखाई में अच्छे हों। सौरभ मिश्रा ऐसे ही छात्रों में थे जिन्हें आदित्य प्रकाश ने, जो उनसे तीन वर्ष बाद उस संस्थान में आये थे, पहले-पहल श्रद्धा-मिले विस्मय से देखा था। 
इस श्रद्धा में लगाव की एक भावना थी, क्योंकि सौरभ मिश्रा अगर पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँव से आये थे तो आदित्य प्रकाश शहडोल से जो सतपुड़ा के जंगलों में एक सोया-खोया गाँव नुमा क़स्बा था। लेकिन उस समय आदित्य प्रकाश यह नहीं जानते थे कि एक ओर जहाँ गँवई-गाँव का होना और जमींदारों की पृष्ठभूमि उनमें और सौरभ में एक-सी थी, वहीं निजी परिस्थितियों के हिसाब से दोनों दो ध्रुवों पर खड़े थे। 
सौरभ की माँ बचपन में गुज़र गयी थीं, उन्हें उनकी बुआ ने पाला था, और उनका बचपन, किशोरावस्था और जवानी का शुरुआती हिस्सा अपने सामन्ती पिता की ‘परजा’ के दुख-दर्द से विचलित होने और पिता के अत्याचारी स्वभाव के ख़िलाफ़ तीखी नफ़रत और विद्रोह में गुज़रा था। उनकी शादी बहुत कम उमर में ही कर दी गयी थी, लेकिन पत्नी के अचानक गुज़र जाने के बाद घर से उनके रहे-सहे रिश्ते भी टूट गये। 
वे भाग कर बनारस चले आये, पिता ने उन्हें संस्कृत विद्यालय में शिक्षा दिलवायी थी, बनारस में सौरभ ने वह पुरानी केंचुल उतार दी और विश्वविद्यालय में अपनी आचार्य की उपाधि के बल पर बी0 ए0 और फिर राजनीति शास्त्र में एम0 ए0 किया, सक्रिय राजनीति में हिस्सा लिया, कविताएँ लिखीं, भोजपुरी के गीतों में क्रान्ति की उमंग और आग भरी और फिर दिल्ली के उस उच्च शिक्षा संस्थान में रिसर्च करने आये।
आदित्य प्रकाश का परिवार भी घोर सामन्ती था, लेकिन चूंकि उनके पिता उनके बचपन ही में नहीं रहे थे, इसलिए वे उस वैभवपूर्ण साम्राज्य में एक युवराज की तरह अपने ‘ठाकुर’ पिता की प्रशस्तियाँ सुनते बड़े हुए। उन्हें लगातार अच्छे स्कूलों में पढ़ाया गया था और उन्हें उस तरह की दीवारों से सिर नहीं टकराना पड़ा था जिन्हें तोड़ कर सौरभ दिल्ली आये थे। इसीलिए जैसे ही आदित्य प्रकाश उस उच्च शिक्षा संस्थान, उसकी अंग्रेज़ियत, उसके उच्चवर्गीय वातावरण में रमते गये, उन्हें सौरभ मिश्रा का भोला, सादालौह स्वभाव, उनका देसीपन, उनकी हिन्दी में भोजपुरी की महक, अपने सिद्धान्तों पर अडिग रहने का उनका हठ खटकने लगा। 
कविताएँ और कहानियाँ आदित्य प्रकाश भी लिखते थे। उन्हीं दिनों वे एक वरिष्ठ कवि के सम्पर्क में आये जो ऊँचे सरकारी अफ़सर भी थे और संस्कृति को समाज से अलग एक स्वायत्त इलाक़ा मान कर, किसानों की आत्महत्या, पुलिस के फ़र्ज़ी एनकाउण्टरों, लगातार बढ़ती बेरोज़गारी, विषमता और माफ़ियागीरी के निपट निचाट भारतीय उजाड़ में कला और संस्कृति के छोटे-छोटे शाद्वल बनाने के संकल्प में जुटे रहते थे।
आदित्य प्रकाश के सामने एक ऐसा लुभावना संसार खुल गया जिसमें सौरभ मिश्रा अगर किसी संयोग से पहुंच भी जाते तो जहाँगीर के दरबार में कबीर सरीखे जान पड़ते। इसी बीच सौरभ मिश्रा राजस्थानी हैण्डीक्राफ़्टस के एक बड़े निर्यातक की बेटी मालविका सिंघानिया को, जो उसी शिक्षा संस्थान में लातीनी अमरीका पर शोध कर रही थी, दिल दे बैठे। मालविका को भी इस युवक में, जो कौटिल्य और मैकियावेली के राजनैतिक सिद्धान्तों पर शोध कर रहा था, एक ही साथ कवि भी था और क्रान्तिकारी भी, अपने खाँटी भोजपुरी अन्दाज़ में मार्क्स पर बहस करता था, ज़रूर कुछ अनोखा लगा होगा, क्योंकि कुछ दिन तक दोनों विश्वविद्यालय के परिसर में, और बाहर भी, घूमते-फिरते पाये गये। 
विश्वविद्यालय दक्षिणी दिल्ली की पहाडि़यों पर ऐसी जगह बना था जहाँ दिल्ली की आबादी अपनी पगलायी रफ़्तार के बावजूद पहुंची न थी। विश्वविद्यालय को आने वाली सड़क इन पहाडि़यों में घूमती-घुमाती ऊपर हॉस्टलों, अध्यापक निवासों और विभागों तक पहुंचती थी। विश्वविद्यालय का प्रशासनिक और दफ़्तरी काम पहाडि़यों की तली में बनी इमारतों में होता था। इस तरह विश्वविद्यालय में छात्रों के पढ़ने के लिए (और प्रेम करने, गाँजा-चरस-दारू पीने और सशस्त्र क्रान्ति की योजनाएँ बनाने के लिए भी, क्योंकि अलग-अलग दौरों में ये सारी गतिविधियाँ एक-एक करके या एक साथ भी विश्वविद्यालय के सुरम्य परिवेश में होती रही थीं) भरपूर एकान्त था। 
ऐसी स्थिति में वैसे तो सौरभ-मालविका प्रसंग पर कोई हंगामा न मचता, मगर यह प्रसंग अगर देखते-देखते चर्चा-कुचर्चा का विषय बन गया तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यही था कि सौरभ मिश्रा और मालविका सिंघानिया के प्रेम की तो क्या, उनके सहज सम्पर्क की भी कल्पना कोई नहीं कर सकता था। फिर, मालविका की तरफ़ बहुत-से लोग सतृष्ण निगाहों से देखते थे, जिनमें आदित्य प्रकाश भी थे, और उसने किसी को कहावती घास भी नहीं डाली थी।
ज़ाहिर है, उस चर्चा-कुचर्चा के पीछे वास्तविक विस्मय के साथ-साथ ‘हम न हुए’ की हाय-हाय भी थी। सबसे तीखी प्रतिक्रिया आदित्य प्रकाश की थी। सौरभ के सामने तो वे उन्हें प्रोत्साहित करते और मालविका के साथ उनकी जो बातें हुई होतीं, उन्हें बड़ी गम्भीरता से सुनते, मगर पीठ-पीछे वे सौरभ का मज़ाक़ उड़ाते। लेकिन इससे पहले कि यह प्रसंग कोई ऐसा रूप लेता कि उन्हें सार्वजनिक रूपसे सौरभ मिश्रा की किरकिरी को देखने या उनसे प्रत्यक्ष सहानुभूति प्रकट करते हुए उनकी खिल्ली उड़ाने का मौक़ा मिलता, मालविका सिंघानिया अपनी शोध पूरी करने के लिए हवाना विश्वविद्यालय की स्कॉलरशिप पर क्यूबा चली गयी। सौरभ मिश्रा कुछ दिन उदास रहे, फिर अपने ढर्रे पर लौट आये। आदित्य प्रकाश ने अपनी ताज़ा कहानी इसी प्रसंग पर लिखी थी।

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