Saturday, September 13, 2014

हिचकी

किस्त : 16-17

सोलह

शुरू-शुरू में तो ऐसा लगा मानो तूफ़ान से पहले हवा के निस्बतन तेज़ होते झँकोरे हों जिनके बीच में निर्वात के द्वीप हों या जैसे नल में पानी के आने से पहले गड़गड़ाहट और सों-सों की आवाज़ होती है और झटके से पानी आता है। फिर बन्द हो जाता है। फिर शुरू होता है। फिर बन्द हो जाता है। और फिर धड़धड़ा कर जब शुरू होता है तो रुकने का नाम नहीं लेता। कुछ ऐसी ही कैफ़ियत नन्दू जी की हिचकियों की थी।
पहले तो नन्दू जी ने हिचकियों पर बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। उनका ख़याल था कि देर से चाय पीने और वह भी एक साथ दो प्याले, पेट अफरा गया है और कुछ मिनट बाद अपने आप ठीक हो जायेगा। लेकिन जब पन्द्रह मिनट गुज़र गये और हिचकियों ने एक सधी हुई रफ़्तार पकड़ ली तो नन्दू जी को लगा कि इन हिचकियों का कुछ करना पड़ेगा। उन्होंने उठ कर एक गिलास में पानी ले कर उसके कुछ घूँट भरे थे और लम्बी-लम्बी साँसें ली थीं, लेकिन हिचकियाँ पहले ही की तरह जारी रहीं।
इस बीच बिन्दु रोटियाँ बना कर, दाल को बघार, हाथ पोंछती आ गयी थी। उसे भी चिन्ता की कोई बात नहीं लगी थी।
‘तुमने पानी पिया?’ उसने पूछा था।
नन्दू जी ने सिर हिला कर बताया था कि वे पानी पी चुके हैं।
‘ठहरो, मैं हाज़मोला की गोली देती हूँ। अभी आराम आ जायेगा।’
लेकिन जब हाज़मोला की गोली भी बेकार साबित हुई और हिचकियाँ बराबर आती रहीं और समय भी दस से ऊपर का होने लगा तो पहली बार बिन्दु  को चिन्ता हुई थी। नन्दू जी इस बीच बेहाल हो चले थे। तब बिन्दु भाग कर नीचे गयी थी और उसने बंसल साहब के घर की घण्टी बजायी थी। 
बंसल जी तब तक अपनी दुकान से लौट कर, सन्ध्या-वन्दन करके भोजन आदि से निपट कर सास-बहू वाला कोई घटिया-सा धारावाहिक देखने के बाद सोने की तैयारी कर रहे थे। बिन्दु को बाहर बदहवास खड़े देख कर वे उसके साथ ही ऊपर चले आये थे और उन्होंने नन्दू जी से हिचकियों के बारे में कुछ इस तरह तफ़सील तलब की थी मानो वे फ़ौजदारी के मुक़दमे में किसी गवाह से जिरह कर रहे हों।
बहरहाल, सारा हाल-चाल लेने के बाद बंसल जी ने अपने ख़ास उपदेशक वाले अन्दाज़ में कहा था, ‘बदहज़मी है जी, बदहज़मी,’ और उन्होंने यूं सिर हिलाया था जैसे नालायक़ बच्चों के बाप निराशा में सिर हिलाया करते हैं। 
‘बात ये है जी,’ बंसल साहब ने अपने मख़सूस अन्दाज़ में प्रवचन शुरू कर दिया था, ‘कि आजकल के नौजवान खान-पान का ध्यान तो बरतते नहीं हैं। बाहर का खाना कभी शरीर को माफ़क आया है भला ? हम तो बाहर का इसीलिए कभी न ख़ुद खात्ते हैं जी, न घर वालों को खाने देत्ते हैं। ख़ैर, मेरे पास एक बड़ा अच्छा चूरन है; हमारे बैद जी ने ख़ास हमारे लिए बनवाया है। मैं थोड़ा-सा देता हूं। चौथाई चम्मच कुनकुने पानी से लीजिए। परभू ने चाहा तो फ़ौरन आराम आ जायेगा। ना आये तो सोते बखत चौथाई चम्मच और ले लेना जी। सुबह तक तन चंगा हो जायेगा और हाँ, रात को उपवास ही कर लेना अच्छा होगा।’
नन्दू जी अगर इतने बेहाल न होते तो यक़ीनन बिन्दु पर बरस पड़ते कि वह इस सर्वज्ञ क़िस्म के मालिक मकान को क्यों बुला लायी है। 
इस हालत में कोई खा कैसे सकता है?--वे बंसल साहब से पूछना चाहते थे लेकिन बंसल साहब तो अपना प्रवचन दे कर चलते बने थे। थोड़ी देर में बिन्दु नीचे से एक पुडि़या में लगभग डेढ़ चम्मच चूरन ले कर आयी थी जो चूरन कम और पिसी हुई चूहे की लेंड़ी ज़्यादा लगता था। नन्दू जी को लगा था कि अर्से से रखे हुए इस चूरन में कुछ भी अला-बला मिल गयी हो तो हैरत की बात नहीं। उनके मन में एक तल्ख़ ख़याल आया था कि अगर बंसल साहब खान-पान में इतना परहेज़ रखते हैं तो फिर उन्हें वैद से ख़ास तौर पर अपने लिए चूरन बनवाने की ज़रूरत क्यों पड़ी भला? 
इन्हीं ख़यालों के साथ नन्दू जी को एक अदद फ़ोन की भी कमी बुरी तरह महसूस हुई थी। फ़ोन होता तो वे किसी-न-किसी मित्र-परिचित को फ़ोन करके सलाह कर सकते थे या फिर अपने भाई को पूछ सकते थे कि ऐसी हालत में वे क्या करें। अब सुबह तक इन्तज़ार करने के सिवा कोई चारा नहीं था। लेकिन सवाल यही था कि इस बीच वे बंसल साहब का चूरन आज़मायें या नहीं। 
हालाँकि नन्दू जी ने पहले यही फ़ैसला किया था कि वे बंसल साहब का यह ज़लील चूरन नहीं खायेंगे, लेकिन बारह बजते-न-बजते उनकी तबियत इतनी झल्ला गयी थी कि उन्होंने उसके चौथाई चम्मच की फंकी लगायी थी और कुनकुना पानी पी लिया था। 
चूंकि शादी-शुदा ज़िन्दगी में यह पहली बार था कि बिन्दु को इस तरह की स्थिति से दो-चार होना पड़ा था जब सलाह-मशविरे या हौसला बँधाने और सहायता देने के लिए कोई न हो, इसलिए वह अन्दर से काफ़ी घबरा गयी थी, गो बाहर से उसने अपनी घबराहट ज़ाहिर नहीं होने दी थी। यहाँ तक कि उसने नन्दूजी के एक ही बार कहने पर जा कर खाना भी खा लिया था। लेकिन उसने फ़ैसला कर लिया था कि सुबह-सबेरे ही जा कर वह नन्दू जी के भाई को फ़ोन करके बुला लेगी। 
इसके बाद बंसल साहब के चूरन का कमाल था या दिन भर की भाग-दौड़ और तनाव का असर, नन्दू जी को बारह बजे के क़रीब झपकी आ गयी थी। लेकिन जब सुबह के पाँच बजे अचानक नन्दू जी की नींद खुली थी तो हिचकी बदस्तूर जारी थी। कुछ घण्टे सो लेने की वजह से उन्हें अपनी तबियत उतनी गिरी हुई नहीं लग रही थी जितनी रात को। 
सिवा शारीरिक बेआरामी के, हिचकी से उन्हें कोई दर्द या तकलीफ़ भी महसूस नहीं हो रही थी। उन्होंने पाया था कि चाय पीने में भी उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं हुई थी। लेकिन तीसरी धारा की वामपन्थी पार्टी के अनुभवों ने नन्दू जी को ऐसी किसी आकस्मिक स्थिति के लिए तैयार नहीं किया था। वे अगर बिहार के जलते खेत-खलिहानों में रोग-शोक-शोषण-अभाव से ग्रस्त लोगों के बीच गये भी थे तो एक बाहरी मध्यवर्गीय कार्यकर्ता की हैसियत से ‘अन्दर के आदमी’ की तरह नहीं । 
उन सारे युवकों में जो अस्सी के दशक में अलग-अलग कारणों से तीसरी धारा की जुझारू राजनीति में शामिल हुए थे, एक बात समान रूप से दिखती भी। ज़मीनी स्तर पर शोषण और उत्पीड़न, अभाव और विषमता के ख़िलाफ़ एक बेहतर ज़िन्दगी के लिए जद्दो-जेहद कर रहे लोगों के बीच जा कर काम करते हुए भी कहीं-न-कहीं उनके अन्दर यह भाव अचेतन रूप से रहता ही था कि उनके लिए ‘बाहर का’ एक रास्ता हमेशा खुला है। जब उन्हें लगेगा कि आगे बात नहीं बन रही है तो वे फिर अपनी उसी मध्यवर्गीय ज़िन्दगी में लौट जायेंगे। और यही लगभग नब्बे फ़ीसदी मामलों में होता भी था। 
ये सभी युवक जहाँ के थे, वहीं रहते हुए लड़ने की बजाय किसी रूमानी ज़ज्बे के तहत सुदूर अंचलों के किसान-मज़दूरों के बीच जाते थे और फिर उस जीवन की अँधेरी सच्चाइयों से रू-ब-रू होने के बाद लौट आते थे और उसके बाद पुराने आदर्शों को एक किनारे करते हुए हालात से समझौता कर लेते थे। चूंकि जो युवक यह रास्ता अख़्तियार करते थे, वे औसत से अधिक मेधावी होते थे, इसलिए लौटने के बाद अक्सर उन्हें सफल होते भी देखा गया था। बाद में वे एक रूमानी अन्दाज़ में इस पुरानी ज़िन्दगी को कुछ उस तरह से याद करते जैसे लोग पहले-पहले प्यार को याद किया करते हैं। 
नन्दू जी हालाँकि पत्रकारिता से जुड़े रहने की वजह से अभी न तो अपनी पुरानी ज़िन्दगी से इस हद तक कट पाये थे, न पुराने साथियों से, मगर वे उस दिशा में धीरे-धीरे क़दम ज़रूर बढ़ा रहे थे। इसीलिए उन्हें अफ़सोस हो रहा था कि उन्होंने इलाज-उपचार जैसी बुनियादी ज़रूरत को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करके किसी ढब के डॉक्टर से सम्पर्क क्यों नहीं साधा जो उनके घर के क़रीब और सुलभ होता। 
दिल्ली आने के बाद एकाध बार जब ज़रूरत पड़ी भी तो वे पार्टी के एक पुराने हमदर्द डॉ0 सुशील वर्मा के पास चले गये थे जो गुरु तेग़ बहादुर हस्पताल में तैनात थे और हस्पताल के परिसर में ही डॉक्टरों के आवास में रहते थे। लेकिन हस्पताल लक्ष्मी नगर से दूर था और डॉ0 सुशील वर्मा के फ़ोन का नम्बर बदल गया था। नन्दू जी को अपनी ग़फ़लत पर भी खीझ हुई कि उन्होंने डॉक्टर वर्मा का नया नम्बर पार्टी ऑफ़िस से ले कर अपनी डायरी में क्यों नहीं दर्ज कर लिया था। उन्हें ख़याल आया कि वक़्त रहते उन्हें किसी ऐसे डॉक्टर का इन्तज़ाम कर रखना चाहिए था जिसे अचानक ज़रूरत पड़ने पर दिखाया जा सकता।
इस बीच बिन्दु ने उठ कर सुबह के सारे ज़रूरी काम निपटा लिये थे। वैसे तो उसे उम्मीद नहीं थी कि उस इतवार को उसे आकाशवाणी से बुलावा आयेगा, लेकिन वह चाहती थी कि जा कर प्रोग्राम एग्ज़ेक्यूटिव को फ़ोन कर दे और नन्दू जी की बीमारी के बारे में बता कर उससे कह दे कि वह उस रोज़ उसकी डयूटी न लगाये। ऐसा करके वह बुलाये जाने पर ना करके शिकायत का मौक़ा देने से भी बच जाती। साथ ही वह नन्दू जी के भाई को जल्द-से-जल्द आने के लिए कह देना चाहती थी।
जब वह फ़ोन करने के लिए पास के पी.सी.ओ. तक जाने के लिए तैयार हुई थी तो नन्दू जी ने उसे दो नम्बर और दिये थे। एक पार्टी के दफ़्तर का था और दूसरा, के0 विक्रम स्वामी के मकान मालिक का जो बंसल जी से बिलकुल विपरीत स्वभाव वाला भला आदमी था और बिना किसी रगड़े-झगड़े के स्वामी को बुलवा दिया करता था।
‘पार्टी ऑफ़िस में फ़ोन करके साथी रामजी यादव को बता देना और सुशील वर्मा का फ़ोन नम्बर ले लेना। फिर उन्हें फ़ोन करके पूछना क्या करें। स्वामी से कहना दोपहर को चला आये।’ यह हिदायत दे कर नन्दू जी निढाल हो कर दीवान पर पीछे को अधलेटे हो गये थे। 
उन्हें अन्दर से एक विराट झल्लाहट और विवशता का एहसास हो रहा था। थोड़ी-थोड़ी आत्मदया भी उनके अन्दर सुगबुगा रही थी। लेकिन हिचकी को न तो नन्दू जी के पिछले जीवन की जद्दो-जेहद का कुछ ख़याल था, न मौजूदा ज़िन्दगी की कशमकश से कोई वास्ता। वह बदस्तूर जारी थी। बीच-बीच में अगर उसके थोड़ा हलके पड़ने से नन्दूजी की उम्मीदें पलकें खोलतीं तो थोड़ी देर बाद वह फिर तेज़ी से एक झटका दे कर इन उम्मीदों को सुला देती। 
नन्दू जी के कानों में पिछले दिन अनिल वज्रपात की कही हुई बात गूंज रही थी--‘हमका तो ई जना रहा कॉमरेड कि ई बड़ा सहर में होता है कि जबर-से-जबर आदमी पिल्लू बन जाता है।’--और वे ख़ुद को ऐसी ही विकट परिस्थिति में फँसे आदमी जैसा पा रहे थे।
तभी बिन्दु लौट आयी थी। उसके चेहरे पर आश्वस्ति का ऐसा भाव था मानो वह नन्दू जी की हिचकियों का कोई सटीक उपाय खोज लायी हो, जबकि इस भाव के पीछे सबसे बड़ी वजह यही थी कि वह जिस काम से गयी थी उसे कर आयी थी और उसे नन्दू जी की शिकायतों से ले कर प्रवचनों तक का कोई डर नहीं था।
‘चिन्ता की कोई बात नहीं है,’ बिन्दु ने नन्दू जी को ढाढ़स बधाया था, ‘सुशील जी कहते हैं, ऐसा कभी-कभी हो जाता है। बहुत बेचैनी हो तो डाइजीन की एक गोली ले ली जाये। खाना हलका ही खाना है। उन्हें मौक़ा मिलेगा तो वे आयेंगे। अभी तो वे ग़ाज़ियाबाद जा रहे थे ज़रूरी काम से।’
‘भैया से बात हुई?’ नन्दू जी ने पूछा।
‘बता रही हूं,’ बिन्दु ने अपने बटुए से डाइजीन का पत्ता निकालते हुए कहा। ‘भैया ग्यारह बजे तक आयेंगे। अभी तो उन्हें सेठ बद्री प्रसाद के यहाँ जाना था।’

सत्रह

नन्दू जी के बड़े भाई चन्द्र किशोर तिवारी, जिन्हें जसरा ब्लॉक का हर आदमी चन्दू गुरु के नाम से जानता था और हाल के वर्षों में पैर छू कर प्रणाम करता था, उमर में नन्दू जी से केवल पाँच साल बड़े थे, लेकिन जो समय नन्दू जी ने बिहार के जलते खेत-खलिहानों में बिताया था, वही समय उनके भाई ने ‘चन्दू गुरु’ से ‘तिवारी जी’ और ‘तिवारी जी’ से ‘पण्डित जी’ बनने में। 
इण्टर पास करते ही वे दिल्ली चले आये थे और ओखला की एक फ़ैक्टरी में स्टोर कीपर की नौकरी करने लगे थे जिसमें स्टोर कीपरी का काम कम और चौकीदारी का पहलू ज़्यादा था। अच्छे, सुदर्शन आदमी थे और जब उन्होंने पहले ही महीने में घटतौली के दो मामले पकड़ लिये थे तो सेठ बद्री प्रसाद के पिता ने, जो उन दिनों फ़ैक्टरी का सारा काम-काज देखा करते थे, चन्दू गुरु को फ़ैक्टरी के अहाते में ही एक क्वार्टर दे दिया था। 
नन्दू जी भले ही वैज्ञानिक समाजवाद के चक्कर में ‘प्रबुद्ध’ हो गये थे, चन्दू जी ने पुश्तैनी धन्धे को उतनी ही वैज्ञानिक निष्ठा से अपनाये रखा था। फ़ैक्टरी में क्वार्टर पाते ही जो पहला काम उन्होंने किया था, वह था फ़ैक्टरी के गेट के भीतर घुसते ही दायीं तरफ़ एक मन्दिर की स्थापना। सेठ हरि प्रसाद को भला क्या एतराज़ होता। उन्हें तो स्टोर कीपर के साथ मुफ़्त में एक ‘पंडत’ भी मिल रहा था। 
चन्दू ने सबसे पहले अपनी धज सँवारी थी। चुटिया वे रखते ही थे, अब उन्होंने उसे और बढ़ा लिया था। पतलून-बुशशर्ट छोड़ कर वे धोती-कुर्ता पहनने लगे और माथे पर हर रोज़ वार के हिसाब से त्रिपुण्ड और चन्दन लगाने लगे। धीरे-धीरे वे बाबू चन्द्र किशोर और चन्दू गुरु की जगह ‘पण्डित जी’ के रूप में मशहूर हो गये। 
ज्ञान भले ही उनका सीमित था, लेकिन कण्ठ बहुत मधुर और उच्चारण शुद्ध था, ख़ास तौर पर जब वे अपने खाँटी सुल्तानपुरी लबों-लहजे को प्रयत्न पूर्वक क़ाबू में रखते हुए संस्कृत के श्लोकों का पाठ करते थे। चार-छै अवसरानुकूल भजन और इतने ही मन्त्र उन्होंने घर जा कर अपने पुरोहित पिता की मदद से कण्ठस्थ कर लिये थे। मन्दिर में आरती से लेकर छोटे-मोटे कर्मकाण्ड कराते हुए वे अब कथा बाँचने और अनुष्ठान बगैरा भी कराने लगे थे। धीरे-धीरे जब उनकी शोहरत बढ़ी तो उन्होंने लोगों के घर जा कर पूजा-पाठ करना भी शुरू कर दिया।
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दिल्ली में ऐसे लोगों की कमी नहीं थी जो अपने ज़्यादातर सामाजिक काम-काज के लिए दूसरों पर आश्रित थे। दक्षिण में भले ही आपको हर घर में एक न एक सदस्य संगीत या नृत्य या कला के और किसी रूप में कमोबेश संलग्न मिल जाय, उत्तर भारत में यह सब दूसरों के हवाले था। सो, जिस तरह ऐसे लोग, जिन्होंने कभी सितार के दर्शन भी नहीं किये थे, उस्ताद विलायत ख़ाँ के कैसेट और सी0 डी0 ला कर घर में बजाते हुए संगीत-प्रेमी बने रहते थे, उसी तरह ख़ुद एक भी श्लोक न जानते हुए किसी पण्डित को हर रोज़ बुला कर घर के किसी छोटे या बड़े कमरे में बने मन्दिर में पूजा पाठ करा लिया करते थे। 
चन्द्र किशोर ने इस प्रवृत्ति को भाँप लिया था और उन्होंने धीरे-धीरे अपनी यजमानी बनानी शुरू कर दी थी। साथ-साथ वे थोड़ा-बहुत झाड़-फूंक और तन्त्र-तावीज़ का काम भी करने लगे थे। वे जानते थे कि छोटे शहर का भी कुशल कम्पाउण्डर यह जानता है कि गले में आला लटकाना और मरीज़ देखना ही डॉक्टर कहाने के लिए काफ़ी होता है। बाक़ी डिग्री-फिग्री तो बकवास है। क्योंकि अगर मरीज़ ठीक हो रहे हों तो फिर कोई डॉक्टर की डिग्री नहीं देखता। और अस्सी फीसदी मरीज़ों को ठीक करने के लिए कुशल कम्पाउण्डर होना ही काफ़ी है। बाक़ी के लिए विशेषज्ञ तो हैं ही, जिनके पास कठिन मरीज़ों को भेजा जा सकता है। इसी तरह ‘पण्डित’ बनने के लिए वेद-उपनिषद पढ़ने की ज़रूरत नहीं। निन्यानबे फ़ीसदी लोगों की ज़रूरत ज्ञान नहीं, सान्त्वना है। वह अन्तःकरण की हो या मन की। 
यही मूल-मन्त्र अपने पल्ले बाँध कर चन्दू गुरु ने पँडिताई का काम शुरू किया था और धीरे-धीरे अब वे इस स्थिति में आ गये थे कि फ़ैक्टरी के क्वार्टर की बजाय अपना निजी मकान ले लें। ईस्ट ऑफ़ कैलाश के पास गढ़ी में एक बुढि़या का बड़ा-सा पुराना मकान उन्होंने देख भी रखा था जहाँ वे साल में तीन-चार बार कथा बाँचने या ऐसा ही और कोई खटकरम करने जाते थे। लेकिन यह सब करते हुए उन्होंने दो-तीन बातों का पूरा ख़याल रखा था। 
पहली तो यह कि अपनी स्टोर कीपरी पर वे बदस्तूर बने रहे थे। हालाँकि कारख़ाने का काम बढ़ने के साथ, अब इस काम का ज़्यादातर हिस्सा सँभालने के लिए सेठ हरिप्रसाद की ओर से उन्हें एक सहायक मिला हुआ था तो भी वे अपनी ‘ड्यूटी’ मुस्तैदी से निभाते। सेठ हरिप्रसाद और उनके बेटे सेठ बद्रीप्रसाद के बारे में उन्हें कोई मुग़ालता नहीं था। वे जानते थे कि सेठ ने नौकरी उन्हें पँडिताई करने के लिए नहीं, बल्कि स्टोर कीपरी करने के लिए दी थी और उसमें कोताही करने पर उनका सारा धरम-करम और पूजा-पाठ उनके सहायक को उनकी गद्दी पर जा बैठने से रोक नहीं पायेगा। 
दूसरी सावधानी उन्होंने यह बरती थी कि ‘बामन का छोरा, देस बेगाना नींवे चलना’ की मसल पर अमल करते हुए उन्होंने अपना रहन-सहन पहले की तरह सादा रखा हुआ था; साथ ही उन्होंने फैक्टरी के क्वार्टर पर अपना क़ब्ज़ा बनाये रखने का फ़ैसला कर रखा था; और तुरुप की चाल यह कि फ़ैक्टरी में मन्दिर बनाते ही उन्होंने हर इतवार को नियमित रूप से ग्रेटर कैलाश में सेठ जी की कोठी पर जाना, वहाँ पूजा-पाठ करना और ‘बहू जी’ यानी सेठ हरिप्रसाद के बेटे सेठ बद्रीप्रसाद की पत्नी, को भजन सुनाते हुए प्रसाद देना (जिसमें ‘देने’ से अधिक ‘लेना’ ही शामिल था क्योंकि आधा किलो देसी घी के लड्डुओं का अधिकांश तो वे सीधे के नाम पर अपने साथ बाँध लाते) शुरू कर दिया था। 
हाल के दिनों में, जब से टी.वी. के, एक चैनल पर कोई-न-कोई ‘महात्मा’ नज़र आने लगा था, पण्डित चन्द्र किशोर तिवारी के मन में कई सुषुप्त आकांक्षाएं कुलबुलाने लगी थीं।
ऐसी हालत में, पण्डित चन्द्र किशोर तिवारी को जब पता चला था कि उनके छोटे भाई को हिचकियाँ आ रही हैं और उन्हें तलब किया जा रहा है तो उन्हें थोड़ी उलझन हुई थी। अपनी सधी-सधायी ज़िन्दगी में इस तरह के प्रसंग उन्हें स्पीड-ब्रेकरों जैसे लगते थे जो -- हिन्दुस्तान में कम-से-कम -- रफ़्तार कम करने से ज़्यादा गाडि़यों के अंजर-पंजर ढीले करने के काम आते थे। 
इसके अलावा उन्हें अपने छोटे भाई के रंग-ढंग पर कई ऐतराज़ भी थे। पुश्तैनी काम-काज छोड़ना तो किसी हद तक ज़माने के साथ चलने की शर्त का हिस्सा था, लेकिन यह क्या कि आदमी धरम-करम से एकदम किनारा कर ले, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों और शिवलिंग-शालिग्राम की जगह जाने कौन-कौन से विदेशी विधर्मियों की तस्वीरें टाँगे रहे और सारा आचार-विचार भुला कर, जिसमें ब्राह्मण के लिए जनेऊ और शिखा-त्रिपुण्ड अनिवार्य थे, कुमार्ग पर चलने लगे। लेकिन कुछ भी हो, नन्दू उनका छोटा भाई था, इसलिए बिन्दु का घबराया हुआ फ़ोन आने के बाद उन्होंने गहरी साँस लेते हुए पिता से सुनी पुरानी उक्ति दोहरायी थी -- स्वधर्मे निधनं श्रेयः पराधर्मो भयावहः -- और तय किया था कि उस रोज़ वे सेठ बद्री प्रसाद के यहाँ थोड़ा जल्दी चले जायेंगे और वहाँ की साप्ताहिक पूजा थोड़ी संक्षिप्त कर देंगे।
संयोग से उस दिन सेठ बद्रीप्रसाद के यहाँ उनके साले का लड़का आया हुआ था जो साल डेढ़ साल पहले ही अमरीका के किसी विश्वविद्यालय से एम.बी.ए. करके लौटा था और मोटी तनख़्वाह पर एक विदेशी कम्पनी में मार्केटिंग एक्ज़ेक्टिव लगा हुआ था। सेठ बद्रीप्रसाद के साले फ़ाइबर की चादरों के सबसे बड़े व्यापारी थे और उन्होंने विकी को - कि यही उनके बेटे का नाम था - अमरीका भेजते समय यह साध पाल ली थी कि जब वह लौट कर आयेगा तो वे ख़ुद फ़ाइबर की चादरों का एक कारख़ाना खोलेंगे। लेकिन विकी ने लौटने के बाद इस ‘मल्टीनैशनल कम्पनी’ की चाकरी करके उनके मंसूबों पर मानो पानी फेरने की ठान ली थी। 
यों विकी दिल्ली के उन हज़ारों उच्चवर्गीय युवकों में से था जो आधुनिक खुलेपन और पुरानी संकीर्णता की खिचड़ी थे। वह डिस्को जाता, पूल और स्नूकर खेलता, देर रात की पार्टियों में बियर भी पी लेता और मांस-अण्डे से भी अब उसे कोई हिचक भी नहीं रह गयी थी, लेकिन वह अपनी कलाई पर हरदम उस मौली को बाँधे रहता जो पिछले किसी तीज-त्योहार पर हुई पूजा के दौरान पिछले धागे की जगह बाँधी गयी थी और अगले त्योहार पर बदले जाने तक बँधी रहने वाली थी; नियमपूर्वक हर मंगल और शनि को हनुमान मन्दिर जा कर मत्था टेकता, नवरात्र में नौ के नौ दिन व्रत रखता और साल में दो बार वैश्नो देवी की यात्रा पर जाता। सेठ बद्रीप्रसाद की पत्नी को उनके भाई ने विकी को ‘समझाने’ का काम सौंपा हुआ था और इसीलिए बहाने से विकी को बुलवाया गया था।
जब चन्दू गुरु ने पूजा समाप्त करने के बाद ‘बहू जी’ को उदास स्वर में अपने छोटे भाई की तबियत के बारे में बताया था तो उन्होंने कहा था, ‘पण्डित जी, आपको फ़ौरन जा कर उसे देखना चाहिए। ऐसे मामलों में ढील ठीक नहीं होती। मेरी मानिये तो बस-वस का चक्कर छोडि़ये, ऑटो ले कर चले जाइए।’ 
यह कह कर सेठ बद्रीप्रसाद की पत्नी ने सौ रुपये का नोट तिवारी जी को भेंट किया था। वे नोट जेब में रखने ही जा रहे थे कि विकी ने कहा था, ‘बुआ, मुझे तो उधर ही जाना है। मैं पण्डित जी को ड्रॉप कर दूंगा।’ 
तिवारी जी का हाथ वहीं-का-वहीं थम गया था; लेकिन ‘बहू जी’ ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा था, ‘कोई बात नहीं पण्डित जी, पैसे रख लीजिए। जाने वहाँ कैसी जरूरत पड़ जाये। फिर आपको लौटना भी तो होगा।’
तिवारी जी का हाथ, जो ठिठक कर उनकी जेब पर जमा हुआ था, फिर हरकत में आ गया था, मानो कोई फ़िल्म अचानक रुकने के बाद झटके से दोबारा चल पड़े। उन्होंने अपना सामान इकट्ठा किया था और विकी के साथ उसकी नयी ओपल गाड़ी में जा बैठे थे। 
सारा रास्ता विकी उनसे बड़े दिलचस्प सवाल पूछता आया था; मसलन, जनेऊ क्यों पहना जाता है, चुटिया रखना क्यों ज़रूरी है, आदि-आदि और तिवारी जी बड़ी गम्भीरता से उसे इस सारे पुराने धार्मिक कर्म-काण्ड की आधुनिक व्याख्याएँ करके चमत्कृत करते रहे थे। नतीजा यह हुआ था कि जब वे बंसल साहब के मकान के सामने विकी की कार से उतरे थे तो उन्होंने अगले इतवार को ‘बिस्तार से’ ये सारी बातें समझाने का वादा करते हुए उसे सेठ बद्री प्रसाद के घर आने के लिए कह दिया था। 

Friday, September 12, 2014

हिचकी

किस्त : 14-15

चौदह

शाहिद अन्सारी और अन्य साथियों को विदा करके नन्दू जी मुड़े थे तो उन्हें लगा था कि जैसे वे महाभारत की कथा के उसी कुएँ से निकल कर आये हैं जिसमें एक बरगद की जड़ उतरी हुई थी जिससे बाल खिल्य ऋषि टँगे हुए थे। उन्होंने दोनों हाथों की उँगलियाँ एक-दूसरी में फंसा कर एक दुर्दम अँगड़ाई ली थी और ऐसी साँस छोड़ी थी जिससे गली के कोने पर रमज़ान डेण्टर एण्ड पेण्टर की दुकान पर टँगा समाजवादी पार्टी का काग़ज़ का झण्डा फड़फड़ाने लगा था। फिर वे धीरे-धीरे प्रकाशन संस्थान की सीढि़याँ चढ़ गये थे।
     इरादा तो उनका यही था कि आज जल्दी ही चल देंगे, ख़ास तौर पर जब उन्हें रमा जी के यहां से लौट कर पता चला था कि हरीश अग्रवाल लंच के बाद नहीं आने वाला। लेकिन जब उन्होंने टिफ़िन निकालने के लिए अपना दराज़ खोला था तो उनकी नज़र उस ब्रोशर के रफ़ डिज़ाइन और ले आउट पर पड़ी थी जो राजनैतिक महारथियों वाली श्रृंखला के प्रचार-प्रसार के लिए तैयार किया जा रहा था और पिछले एक-डेढ़ हफ़्ते से इस बात के इन्तज़ार में रुका हुआ था कि रमा बड़थ्वाल पन्त अपने ‘पूज्य पिताजी’ पर केन्द्रित पुस्तक के डिज़ाइन को हरी झण्डी दिखायें तो ब्रोशर को अन्तिम रूप दिया जाये। उन्होंने डिज़ाइन को वैसे-का-वैसा छोड़ दिया था और खाना खाने चले गये थे।
     उधर, जैसे टेलिपैथी का करिश्मा हो, जब वे लौटे तो रागिनी शर्मा ने उन्हें बताया कि पीछे हरीश अग्रवाल का फ़ोन आया था कि वे बड़थ्वाल जी वाली किताब का डिज़ाइन कम्प्यूटर-कक्ष में दे दें और वहीं बैठ कर ब्रोशर के रफ़ डिज़ाइन को भी दुरुस्त करा दें। 
     इस ‘दुरुस्त करा दें’ का मतलब नन्दू जी बख़ूबी जानते थे। वे जानते थे कि अब उन्हें अगले सेट में आने वाली तीन पुस्तकों का एक परिचय लिखना पड़ेगा जो ब्रोशर में उन पुस्तकों के आवरण चित्रों की छोटी-छोटी प्रतिकृतियों के नीचे छपेगा। ब्रोशर का डिज़ाइन तो श्रृंखला की पहली तीन पुस्तकों के आने के बाद ही बन गया था। हर नये सेट के साथ सिर्फ़ रंग योजना और पुस्तकें और उनके परिचय बदलते रहते।
नन्दू जी को सबसे ज़्यादा चिढ़ इस प्रचार सामग्री को तैयार करने में होती थी, क्योंकि कई बार उन्हें प्रचार के नाम पर झूठ का ऐसा जाल रचना पड़ता था जिसमें पाठक फंस जाय। हरीश अग्रवाल बार-बार इस बात को ज़ोर दे कर कहता था कि सम्पादकीय और प्रोडक्शन विभाग का सारा उद्देश्य किताबों की बिक्री बढ़ाना था। उसका आप्त-वाक्य था कि कोई हलवाई अपने दही को खट्टा नहीं कहता। 
     एक बार जब नन्दू जी कुछ ज़्यादा ही खदबदाये थे तो स्वामी ने उन्हें यह कह कर चुप करा दिया था कि हरीश अग्रवाल ने उन्हें अख़बार से डेढ़ गुनी तन्ख़ाह पर प्रकाशन संस्था के सम्पादकीय विभाग में नियुक्त किया था तो इसलिए कि उसकी किताबों की बिक्री बढ़े, इसलिए नहीं कि उसे कला या साहित्य की कोई सेवा करनी थी। वह हर रोज़ सुबह नियमित रूप से एक घण्टा पूजा करता था, लेकिन आख़िरी किताब उसने तब पढ़ी थी जब वह बी.ए. कर रहा था। वे दो-चार बार तो उसके घर गये होंगे, क्या उन्होंने भूले से भी उसके ड्रॉइंग-रूम में कोई किताब देखी थी ? 
     इसके बाद नन्दू जी ने शिकायत करना बन्द कर दिया था। इसलिए जब रागिनी शर्मा ने उन्हें हरीश अग्रवाल का सन्देश दिया था तो वे जल्दी घर जाने का ख़याल छोड़ कर अपनी मेज़ पर आ बैठे थे। उन्होंने आधे घण्टे में तीनों नयी किताबों के परिचय लिखे थे और फिर कम्प्यूटर कक्ष में सुनील विरमानी के साथ बैठ कर ब्रोशर में सेट करवाये थे। 
छै बजने को थे जब सुनील विरमानी ने तब तक डिज़ाइन किये गये ब्रोशर को कम्प्यूटर की मेमरी में सेव करते हुए कहा था, ‘कॉमरेड, हुन बस। बाक़ी सोम नूँ पूरा कराँगे।’ 
     सुनील, जो उनके पुरानी साथी शमशाद की देखा-देखी उन्हें कॉमरेड कहने लगा था, बहुत होशियार कम्प्यूटर ऑपरेटर था और तकनीकी रूप से कुशल लोगों की तरह मनमौजी भी। वह जानता था कि हरीश अग्रवाल को उस जैसा ऑपरेटर जल्दी किये नहीं मिल सकता और इसलिए वह थोड़ी-बहुत छूट लेने में कभी कोताही नहीं करता था।
आख़िरकार, जब सब-कुछ समेट कर नन्दू जी प्रकाशन संस्थान की सीढि़याँ उतरे थे तो साढ़े छै बजने को थे। आफ़िस में सन्नाटा था। सभी कर्मचारी जा चुके थे। सिर्फ़ चपरासी नन्द लाल दफ़्तर बन्द करने के इन्तज़ार में रुका हुआ था। उसे हरीश अग्रवाल ने सीताराम बाज़ार में ही एक कोठरी ले दी थी और सुबह चाभी ले कर आना और दफ़्तर खुलवाना, और फिर शाम को दफ़्तर बन्द कराके चाभी हरीश के घर देना उसकी ड्यूटी में शामिल था। 
     बाहर गली में शोर-शराबा कुछ कम हो गया था। चूँकि कारों-स्कूटरों की रँगाई दिन ही के समय हो पाती थी, इसलिए बाक़ी काम - जैसे मँजाई, धुलाई, अस्तर-पुटीन, वग़ैरा, - बिजली की रोशनी में कर लिये जाते थे। बाहर दो-तीन गाडि़यों पर मिस्त्रियों के यहाँ काम करने वाले छोकरे जुटे हुए थे। थोड़ा आगे चल कर कम्प्यूटरों की मरम्मत का काम चल रहा था। मिस्त्री और छोकरे आपस में हँसी-मज़ाक करते हुए मँजाई-धुलाई कर रहे थे। 
     नन्दू जी ने अपना स्कूटर स्टार्ट किया था और दरियागंज की मुख्य सड़क से आई¤ टी¤ ओ¤  हो कर लक्ष्मी नगर जाने की बजाय पीछे अन्सारी रोड की ओर मुड़ गये थे ताकि रिंग रोड ले कर जल्दी से आई¤ टी¤ ओ¤ पुल पर पहुँच जायें। मगर शाम का वक़्त था और पुल पर जाम लगा हुआ था। उन्हें पुल पार करने में आध घण्टा लग गया था। जैसे ही वे पुल पार करके ढलान उतरते ही बायीं ओर लक्ष्मी नगर की तरफ़ घूमे थे, उन्हें एक हल्केपन का एहसास हुआ था। सोमवार ही से उन्हें जो एक बादल अपने ऊपर घिर आया महसूस हो रहा था, वह जैसे एकबारगी साफ़ हो गया था। गली के मुहाने पर पहुँचते ही उन्होंने अपनी स्वभावगत सतर्कता को ताक पर रखते हुए हेल्मेट सिर से उतार कर बाँह से लटका लिया था - इसलिए भी कि अब उन्हें ट्रैफ़िक पुलिस के चालान का कोई डर नहीं रह गया था - और मुक्त मन से घर पहुँचे थे।

पन्द्रह

चाय का दूसरा प्याला पीते-पीते नन्दू जी ने बिन्दु को रमा बड़थ्वाल पन्त के यहाँ जाने और परेशान होने की पूरी कथा सुनायी थी। तभी उन्हें ख़याल आया था कि पार्टी के पुराने कॉमरेड कल आने की बात कह रहे थे और अपने अनुभव से वे जानते थे कि अनिल वज्रपात और उदय प्रकाशपुंज भले ही संस्कृतिकर्मी होने के नाते कभी-कभार थोड़ी लापरवाही और ग़ैर जिम्मेदारी से काम ले लें, लेकिन रामअँजोर और रामजी यादव जैसे खाँटी कार्यकर्ता कभी हलकी-फुलकी बात नहीं करते थे और अगर उन्होंने कल सुबह आने के बारे में कहा था तो यह वादा ‘चन्द्र टरै सूरज टरै’ वाली कहावत के अनुसार न-टलने-वाले वचनों की कोटि में आता था। चुनांचे एहतियात के तौर पर उन्होंने बिन्दु को आगाह कर देना उचित समझा।
‘अरे, मैं बताना भूल गया, रमा जी के यहाँ से दफ़्तर वापस आने पर साथी वज्रपात और प्रकाशपुंज आ गये थे। साथ में नालन्दा और पटना के साथी रामअँजोर और रामजी यादव भी थे।’
     ‘अच्छा! लगता है रैली के बाद रुक गये होंगे। क्या कह रहे थे?’
     ‘कह रहे थे कि पता होता तो सीधे यहीं चले आते,’ नन्दू जी की आवाज़ में हलकी-सी तल्ख़ी घुल गयी - कुछ तो रमा जी वाले प्रसंग का असर अभी बाक़ी था और कुछ ‘साथी लोगों’ के कटाक्षों का। ‘उन्हें दिल्ली की हालत का तो अन्दाज़ा है नहीं। समझते हैं कि जैसे नालन्दा और आरा में होता है, वैसा ही दिल्ली में भी हो सकता है। बहरहाल, कल सुबह आने की बोले हैं।’
‘अरे, तो आयेंगे, मिलेंगे, चले जायेंगे। वैसे भी कल इतवार है। पुराने साथियों से पीछा तो छुड़ाया नहीं जा सकता न?’ बिन्दु के स्वर में नरमी थी। वह जानती थी कि नन्दू जी इस बात से डर रहे हैं कि पुराने साथी कहीं उनसे जवाब तलब न करने लगें।
     ‘पीछा छुड़ाने की बात नहीं है। समझा करो। साथी लोग बदलती हुई स्थितियों को तो देखते नहीं, पुराने ढर्रे पर चलने की रट लगाये रहते हैं। दिल्ली में रहना और टिकना इतना आसान है क्या! पटना-इलाहाबाद में बात दूसरी थी।’ नन्दू जी ने झल्ला कर कहा।
बिन्दु चुप हो गयी और चाय के बर्तन उठाने लगी। तभी नन्दू जी को डॉ. दिनेश कुमार की उस चिट्ठी का ख़याल आया जो कॉमरेड रामजी यादव ने उन्हें दी थी और जिसे उन्होंने अभी तक पढ़ा नहीं था। कॉमरेड रामजी यादव ने कहा भी था कि इस सम्बन्ध में बात करनी है। सो नन्दू जी ने उठ कर बुशशर्ट की जेब से लिफ़ाफ़ा  निकाला था और उसे खोल कर चिट्ठी की तहें सीधी की थीं। 
     चिट्ठी लाईनदार काग़ज़ पर लिखी हुई थी, डॉ. दिनेश कुमार के मोती जैसे अक्षरों में, मगर लिखावट कुछ काँपती हुई-सी थी मानो किसी वृद्ध या बीमार आदमी ने लिखी हो। काग़ज़ भी किसी बच्चे की कापी से फाड़ा हुआ जान पड़ता था। लेकिन काग़ज़ और इबारत जैसी भी रही हो, मज़मून की पहली चार-छै पंक्तियाँ पढ़ते ही नन्दू जी को पसीना आ गया था और उन्हें लगा था जैसे कोई अदृश्य हाथ उनके दिल को मुट्ठी में ले कर मसल रहा है।

प्रिय नन्दू,
लाल सलाम। उम्मीद है तुम और बिन्दु दिल्ली में ठीक-ठाक होगे और बड़े शहर की नयी चुनौतियों का सामना साहस और समझदारी के साथ कर रहे होगे। यह पत्र मैं एक मुसीबत में फंस कर लिख रहा हूँ जिसमें तुम्हारी मदद की ज़रूरत आ पड़ी है।
कुछ महीने पहले जब साथी रामजी यादव नालन्दा आये थे तो उन्होंने बताया था कि तुमने अख़बार से इस्तीफ़ा दे दिया है। उसके बाद तुम्हारी कोई ख़बर नहीं मिली। मैंने एक पत्र महीना भर पहले तुम्हारे कुसुम विहार वाले पते पर लिखा था लेकिन वह लौट आया। नया पता मेरे पास था नहीं, इसलिए जब मुझे पता चला कि साथी राम अँजोर रैली में जायेंगे। तो मैंने उनके हाथ यह पत्र कॉमरेड रामजी यादव को भेजने का फ़ैसला किया कि वे तुम्हें दे दें। मैं भी रैली में आना चाहता था लेकिन मौजूदा हालात में यह सम्भव नहीं है।
तुम्हें यह पता नहीं होगा कि चार-पाँच महीने पहले यहाँ नालन्दा में एक प्रदर्शन के दौरान पुलिस के लाठी चार्ज में मेरी दायीं टाँग घुटने के पास से टूट गयी थी। 
उस समय तो पलास्टर लगा दिया गया था, लेकिन बाद में पता चला कि जोड़ ठीक नहीं बैठा है। एक बार फिर आपरेशन करके बैठाने की कोशिश की गयी, लेकिन शायद बात बनी नहीं। अन्दर शायद कोई किरच रह गयी है  जिसकी वजह से घाव भरता नहीं और लगातार दर्द रहता है। चलना-फिरना भी बैसाखी के सहारे ही हो पाता है और उसमें भी बहुत कष्ट होता है। 
मैंने पटना भी जा कर दिखाया था। डॉक्टरों का कहना है कि क़ायदे से ऑपरेशन होना ज़रूरी है, तभी पूरी तरह आराम आ पायेगा। सभी ने दिल्ली जा कर एम्स या सफ़दरजंग में दिखाने की सलाह दी है।
इसी कठिनाई में तुम्हें यह चिट्ठी भेज रहा हूँ। तुम्हें मालूम है, दिल्ली मेरे लिए अपरिचित शहर है। वैसे तो वहाँ पार्टी ऑफ़िस भी है, लेकिन उन्हें तो यों भी जगह की तंगी रहती है। फिर उनकी पहुँच भी सीमित है। तुम चूँकि अख़बार में काम करते रहे हो, इसलिए कह-सुन कर मेरे इलाज का प्रबन्ध करा सकते हो। जब तक किसी हस्पताल में ठौर-ठिकाना नहीं होता, कुछ दिन मैं तुम्हें तकलीफ़ दूँगा। 
जैसे ही साथी रामजी यादव रैली से लौट कर तुम्हारी कुशल-क्षेम देंगे, मैं सौरभ को साथ ले कर दिल्ली आ जाऊँगा। तुम्हें तकलीफ़ तो होगी, पर ऐसी हालत में आशा है उसे तुम बरदाश्त करोगे। 
तुम्हारी भाभी और सीमा ठीक-ठाक हैं। सभी तुम्हें बहुत याद करते हैं।

क्रान्तिकारी अभिवादन के साथ
तुम्हारा
  दिनेश

डॉ. दिनेश कुमार पार्टी के बहुत पुराने और सम्मानित कॉमरेड थे और तभी से पार्टी के साथ थे जब सत्तर के दशक में पार्टी का पुनर्गठन हुआ था। वे सुल्तानपुर में नन्दू जी के गाँव के नज़दीक के गाँव मौजपुर के रहने वाले थे। खाते-पीते ज़मींदार परिवार के। लेकिन उन्होंने इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान पार्टी के क़रीब आने के बाद ही से अपने पिता से किनारा कर लिया था, एक लम्बे समय तक वे भूमिगत रहते हुए बिहार में पार्टी का काम करते रहे थे और फिर जब पार्टी ने भूमिगत आन्दोलन की लाइन छोड़ कर बाहर आने का फ़ैसला किया था तो डॉ. दिनेश कुमार नालन्दा में एक छोटा-सा स्कूल चलाते हुए पार्टी की किसान-सभा का काम-काज देखने लगे थे। 
     डॉ. दिनेश कुमार की पत्नी नालन्दा ही की रहने वाली थीं और एक स्कूल में पढ़ाती थीं। दोनों पति-पत्नी पार्टी के सदस्य थे, डॉ. दिनेश कुमार तो केन्द्रीय समिति में भी थे और उन्हें पार्टी के पुराने सम्मानित सदस्यों में शुमार किया जाता था। हाल के वर्षों में जब से पार्टी ने संसदीय चुनावों में हिस्सा लेने का फ़ैसला किया था, पार्टी में कुछ ऐसे लोगों का वर्चस्व बढ़ने लगा था जो नये परिवर्तनों से ताल-मेल बैठाने के पक्ष में थे। जिन्हें लगता था कि पुराने आदर्शवादी ढंग से क्रान्तिकारी परिवर्तन अव्वल तो सम्भव नहीं था, या फिर अगर था भी तो उसमें बहुत समय लगने की गुंजाइश थी। 
प्रकट ही, पार्टी के भीतर नये और पुराने विचारों की कशमकश शुरू हो गयी थी और इसके चलते पार्टी की धार में कमी भी आयी थी, क्योंकि संसदीय रास्ता अपनाने के बाद पार्टी को कुछ समझौते भी करने पड़े थे। यही नहीं, बल्कि अपनी पुरानी जुझारू छवि के बल पर पार्टी ने जिन आठ विधायकों को प्रान्तीय चुनावों में जिताया था, उनमें से चार विधायक जातीय समीकरणों के प्रभाव में सत्ताधारी राजनैतिक  दल से जा मिले थे। इसका भी असर पार्टी पर पड़ा था। 
     चुनावी समझौतों के अलावा ज़मीनी स्तर पर भी पार्टी को कई बार अपने वरिष्ठ सदस्यों की मनमानी को अनदेखा  करना पड़ता था। नतीजे के तौर पर एक बार जहानाबाद के एक सामान्य साथी ने पार्टी समर्थित साप्ताहिक में एक लम्बा पत्र छपा कर ‘मालिक कॉमरेड’ और ‘नौकर कॉमरेड’ जैसी बहस भी उठा दी थी। 
पुराने कॉमरेड होने के नाते डॉ. दिनेश कुमार  इन परिवर्तनों को बड़ी चिन्ता से परखते रहे थे। नन्दू जी जब ख़ुद पार्टी से पूरी तरह जुड़ कर बिहार के गाँवों में काम करने की ख़ातिर आये थे तो उन्हें सबसे पहले डॉ. दिनेश कुमार ही की देख-रेख में रखा गया था। दिनेश कुमार ने नन्दू जी को छोटे भाई की तरह अपने परिवार का सदस्य बना लिया था और हर तरह से उनकी देख-रेख की। घर-परिवार की तरफ़ से पड़ने वाले दबावों का मुक़ाबला करने की तरकीब बतायी थी, हताशा के क्षणों में साहस बँधाया था और आर्थिक मदद तो की ही थी। 
     आगे चल कर जब नन्दू जी पटना में पार्टी समर्थित साप्ताहिक में काम करने लगे और उसी दौरान बिन्दु से मिले थे जो पार्टी की महिला शाखा में सक्रिय थी तो डॉ. दिनेश कुमार ने इसका स्वागत किया था। 
     यही नहीं, बल्कि जब इस नियमित मिलने-जुलने की वजह से पार्टी के ऊपरी हलक़ों में एक क्रुद्ध भनभनाहट होने लगी थी तो डॉ. दिनेश कुमार ने ही मामले को सँभाला था। वे जानते थे कि बिन्दु से नन्दू जी का मेल-जोल इसलिए भी नहीं पसन्द किया जा रहा था, क्योंकि दोनों अलग जाति के थे। ऊपर से बिन्दु पार्टी के एक पुराने हमदर्द की भतीजी थी जिसके पिता इंश्योरेंस कम्पनी में अच्छे पद पर थे और बिन्दु की शादी ऐसे युवक के साथ करने के क़तई इच्छुक नहीं थे जिसकी जेब में पैसों से ज़्यादा पार्टी समर्थित साप्ताहिक के लिए लिखे गये लेख होते थे, भले ही उनसे कितनी चिनगारियाँ क्यों न फूटती रहें। 
     पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों के मन में असली भय यह था कि इससे एक ऐसे समर्थक के विमुख हो जाने का ख़तरा था जिससे पार्टी को लगातार पैसों के अलावा भी अनेक प्रकार की सहायता मिलती रहती थी। डॉ. दिनेश कुमार ने पार्टी के साथियों को समझाया था कि नन्दू जी का इरादा बहुत साफ़ था, वे बिन्दु से शादी करना चाहते थे और बिन्दु को भी इसमें कोई एतराज़ नहीं था। बाक़ी, रहा सवाल नन्दू जी की आर्थिक स्थिति का तो जब वे या बिन्दु इस लायक़ हो जायेंगे कि अपने बल पर गृहस्थी चला सकें, तभी शादी करेंगे। 
     बहरहाल, डॉ. दिनेश कुमार ने हर मोड़ पर और हर तरह से नन्दू जी की सहायता फ्रेण्ड-फ़िलॉसोफ़र ऐण्ड गाइड की तरह की थी। जब नन्दू जी का सब्र चुकने लगा था और पार्टी का साप्ताहिक भी आर्थिक संकट में जा फंसा था तो डॉ. दिनेश कुमार ने ही उन्हें सलाह दी थी कि कुण्ठित हो कर पार्टी से बिलकुल किनाराकशी करने की बजाय कहीं बेहतर था कि आदमी अपना कोई छोटा-मोटा जुगाड़ कर ले और फ़ुलवक़्ती नहीं तो ख़ाली समय में पार्टी का काम करता रहे। 
ज़ाहिर है, नन्दू जी पार्टी के रिश्ते ही से डॉ. दिनेश कुमार के क़रीब नहीं थे, निजी तौर पर भी उनसे उपकृत थे  और अब दिनेश जी की चिट्ठी पाने के बाद उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि इस नयी गुत्थी को कैसे सुलझायें।
नन्दू जी ने उठ कर गमछे से अच्छी तरह सिर-मुँह पोंछा था और लौट कर फिर से तख़्त पर बैठ गये थे। बिन्दु रसोई में रात के खाने का इन्तज़ाम कर रही थी। शायद रोटियाँ बना रही थी, क्योंकि थोड़ी-थोड़ी देर बाद बेली हुई रोटी को तवे पर डालने से पहले थपकने की आवाज़ आती। नन्दू जी को दिमाग़ में एक आँधी-सी चलती महसूस हो रही थी। उन्हें मानो एक ही साथ दो फ़िल्मों की रीलें चलती नज़र आ रही थीं। एक तरफ़ इलाहाबाद से पटना और नालन्दा जा कर डॉ. दिनेश कुमार और उनके घर-परिवार के साथ बिताये गये समय की तस्वीरें कौंध रही थीं, दूसरी ओर दिल्ली के पिछले तीन-चार वर्षों की जद्दो-जेहद के दृश्य बाइस्कोप की फिरकी से उभरते और विलीन होते चित्रों की तरह आँखों के सामने आ रहे थे। 
     उन्होंने एक बार फिर पत्र को उठा कर पढ़ा था। मशीन की तरह वे चिट्ठी में दर्ज इबारत को बाँच गये थे। उनकी आँखें पत्र के आख़िरी हिस्से पर पहुँच कर वहीं अटक गयी थीं: ‘जब तक किसी हस्पताल में ठौर-ठिकाना नहीं होता, कुछ दिन मैं तुम्हें तकलीफ़ दूँगा। जैसे ही साथी रामजी यादव रैली से लौट कर तुम्हारी कुशल-क्षेम देंगे, मैं सौरभ को साथ ले कर दिल्ली आ जाऊँगा।’
कुशल-क्षेम! नन्दूजी ने तल्ख़ी से सोचा, यही तो वह चीज़ थी जिसकी असलियत आये-दिन बदलती रहती थी और जो दिल्ली की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के मुलम्मे से ढँकी रहती थी। साथी लोग मुलम्मे ही को असलियत समझ बैठते थे। वे कल यहाँ आयेंगे तो दुनिया जहान के सवाल उनकी आँखों में होंगे। वे फ़्लैट देखेंगे। फ़्रिज, टीवी और वॉशिंग मशीन देखेंगे और फ़ौरन सोच लेंगे कि अब नन्दू जी के यहाँ बड़े आराम से ठहरा जा सकता है। बंसल साहब और उनकी तिरछी नज़र को तो वे देखेंगे नहीं, न उन टीका-टिप्पणियों को सुनेंगे जो बंसल साहब हर वाजिब-ग़ैर वाजिब मौक़े पर करते रहते थे। उन्हें याद आया कि हफ़्ता-दस दिन पहले ही बंसल साहब ने सब-मीटर के फुंक जाने पर कितना हो-हल्ला मचाया था:
     ‘इत्ते किरायेदार आये जी पिछले पाँच साल में,’ उन्होंने अजीब-से अवसाद-भरे अचरज से सिर हिलाते हुए कहा था, ‘कभी तो मीटर फुंका नहीं। आप अपनी अप्लायन्सेज़ चेक कराओ नन्द किशोर जी। किस कम्पनी का है फ़्रिज और टीवी? आजकल असेम्बल्ड माल आ रहा है ढेरों, और सारे-का-सारा सब-स्टैण्डर्ड।’ 
     बंसल साहब बिजली के मिस्त्री के आने तक सन्देह-भरी नज़रों से नन्दू जी के टीवी को देखते रहे थे और तभी शान्त हुए थे जब मिस्त्री ने आ कर कहा था कि गड़बड़ी नन्दू जी के फ्रिज और टीवी में नहीं, बल्कि मीटर ही में थी। 
     मिस्त्री ने मीटर ठीक करने के दो सौ रुपये माँगे थे और बंसल जी ने घर के अन्दर से ला कर पैसे देते हुए ऐसा बुरा मुँह बनाया था कि नन्दू जी का सारा दिन ख़राब हो गया था। 
     अब यह नयी मुसीबत आ खड़ी हुई थी। अगर डॉ. दिनेश कुमार अपने बेटे के साथ चले आये और बंसल साहब ने कहा कि उन्होंने मकान रहने के लिए दिया है, होटल चलाने के लिए नहीं, तो ?.... 
     और इसी ‘तो’ पर आ कर अचानक नन्दू जी को पहली हिचकी आयी थी।

Thursday, September 11, 2014

हिचकी

किस्त : 12-13


बारह

पाँच साल पहले जब शाहिद अन्सारी बुलन्दशहर से दिल्ली पहुँचा था तो उसकी जेब में फ़क़त डेढ़ सौ रुपये और सूटकेस में बी.ए. की डिग्री थी। मगर राहत की बात यह थी कि नयी ज़िन्दगी की तलाश में हर साल उत्तर प्रदेश और बिहार के मुफ़स्सलात से हज़ारों की तादाद में दिल्ली की शम्मा की तरफ़ खिंच कर आने वाले परवानों के विपरीत उसके पास, मुहावरे की ज़बान में कहें तो सिर छिपाने को एक छत और पैर टिकाने को एक ठौर थी, भले ही वह उसके सपनों के हिसाब से कितनी अस्थायी और असुविधाजनक क्यों न रही हो।
उसके पिता, वाजिद अन्सारी, नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास पहाड़गंज की एक लॉज के मैनेजर थे। यह लॉज दरअसल सस्ती दरों वाला एक सुथरा-सा होटल था, जिसका मालिक चौधरी भान सिंह बुलन्दशहर का एक सम्पन्न किसान था और शाहिद अन्सारी के पिता को बहुत मानता था, जो ख़ुद भी बुलन्दशहर के रहने वाले थे।
     भान सिंह को यह होटल अपने नाना से मिला था और अगर भानसिंह को दिल्ली में ज़मीन-जायदाद की बढ़ती हुई क़ीमतों का पता न होता तो वह कभी का उसे बेच चुका होता, क्योंकि वह ‘उत्तम खेती मध्यम बान’ वाले आप्त कथन में अक़ीदा रखता था और हालाँकि बदले हुए ज़माने में यह कहावत उलट कर ‘मध्यम खेती उत्तम बान’ को चरितार्थ करने लगी थी और भान सिंह को आये दिन खेती को ले कर किसी-न-किसी परेशानी का सामना करना पड़ता था, तो भी वह अपने ही शब्दों में ‘होटलगीरी’ करने को क़तई तैयार न था। 
बेटी की शादी कर चुका था। दो बेटे थे - ख़ासे आवारा और हथछुट क़िस्म के - जिनकी करतूतों ने जब अति कर दी तो भान सिंह ने दोनों को दो-दो टेम्पो ख़रिदवा दिये थे जिन्हें वे शहर से पास के क़स्बों तक सवारियाँ ढोने के काम में लाते और अपने-अपने रूटों पर चलने वाले दूसरे टेम्पो वालों से आये दिन सिर-फुटव्वल करते रहते। भान सिंह को इससे कोई एतराज़ न था, चुनांचे उसने अपने खेती के शौक़ को पूरा करने की ख़ातिर शाहिद अन्सारी के वालिद वाजिद अन्सारी को लॉज की तीसरी मंज़िल पर अटैच्ड बाथरूम वाला एक बड़ा-सा कमरा दे कर उन्हें होटल का सर्वे-सर्वा बना दिया था। होटल की आमदनी नियमित रूप से उसके बैंक से होती हुई बारिश के पानी की तरह खेती को सींचती रहती। 
     वैसे तो भान सिंह ने वाजिद अन्सारी से भी कहा था कि शाहिद चाहे तो होटल ही में लग जाये। ‘आखर, बी.ए. पास लौंडे को लाट साहबी तो मिलने से रही।’ और भान सिंह ने अपनी बड़ी-बड़ी मूँछों पर हाथ फेरते हुए अपनी पसन्दीदा कहावत का दूसरा मिसरा भी सुनाया था - ‘अधम चाकरी भीख निदान। चाकरी करने से तो अच्छा है होटल का काम सीक्खे। आग्गे चल कर वह अपना भी होटल खोल सकता है।’ 
     लेकिन शाहिद अन्सारी बुलन्दशहर से निकल कर दिल्ली इसलिए नहीं आया था कि वह पहाड़गंज की छोटी-सी, नीम-अँधेरी गली में दफ़्न हो जाय। अपने पिता की इज़्ज़त करते हुए भी मन के किसी कोने में वह उन्हें एक विफल व्यक्ति ही मानता था, जो अपनी सीधी-सादी ज़िन्दगी से सन्तुष्ट थे, जिन्हें बस इतना ख़याल था कि ईमानदारी से ज़िन्दगी बसर करते हुए, बच्चों को पढ़ा-लिखा कर बड़ा कर दें और जिनके मन में इससे ज़्यादा कोई महत्वाकांक्षा न थी। 
शाहिद अन्सारी ने बुलन्दशहर के अपने ही मुहल्ले में ऐसे कितने युवकों के किस्से सुने थे जो किराये पर ऑटो चलाने दिल्ली आये थे और जाने कहाँ-से-कहाँ जा पहुँचे थे। दिल्ली उसे एक ऐसी जगह लगती थी जिसका आकाश अनन्त था, जहाँ उड़ान की अनगिनत सम्भावनाएँ थीं, बशर्ते कि आपके डैने मज़बूत हों और दिल में हौसला हो। 
     शाहिद अन्सारी को अपनी सेकेण्ड क्लास बी.ए. की डिग्री से भी ज़्यादा भरोसा इस आख़िरी बात में था। इसीलिए वह उस जाली अंग्रेज़ी मीडियम ‘सनबीम स्कूल’ की चार सौ रुपये की मास्टरी छोड़ कर चला आया था जो अस्सी के दशक के शुरू में कुकुरमुत्तों की तरह हर शहर में खुलने वाले स्कूलों जैसा ही एक स्कूल था और जहाँ शाहिद अन्सारी बी.ए. करते ही पढ़ाने लगा था। 
     महीने भर ही में शाहिद अन्सारी ने शहर के मिज़ाज को समझ लिया था। पहाड़गंज का वह इलाक़ा, जहाँ भान सिंह का ‘चौधरी गेस्ट हाउस’ था, मझोले दर्जे के होटलों से अटा पड़ा था जिनमें अक्सर ट्रैवेल एजेण्ट, छोटे व्यापारी, आस-पास से तीस हज़ारी की अदालत में किसी मुक़दमे की पेशी भुगतने आये वादी-प्रतिवादी और इसी क़िस्म के लोग ठहरते थे। इन्हीं में वे विदेशी सैलानी भी शामिल थे जो अमरीका, इंग्लैण्ड या यूरोप की आपा-धापी, और अफ़रा-तफ़री से भाग कर कथित शान्ति की तलाश में हिन्दुस्तान आते थे या फिर जो कम पैसे ही में हिन्दुस्तान ‘देखने’ के इच्छुक थे। 
     शाहिद ने इन विदेशी सैलानियों को बतौर गाइड दिल्ली घुमाना शुरू कर दिया। फ़िरंगी गोरों के पास ख़र्च करने के लिए डॉलर थे, शाहिद अन्सारी के पास वक़्त। होशियारी उसने यह बरती कि इस काम की तैयारी के लिए अंग्रेज़ी की दो-एक किताबों के साथ-साथ दिल्ली पर महेश्वर दयाल की किताब भी पढ़ डाली जिससे अक्सर कुछ नायाब क़िस्म के तथ्य उद्धृत करके वह इन सैलानियों को चकित कर देता।
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एक साल के अन्दर-अन्दर शाहिद अन्सारी का नक़्शा बदल गया। ढीली पतलून और बुश्शर्ट की जगह चुस्त जीन्स, बदन पर कॉलरदार टी-शर्ट और आँखों पर धूप का सुनहरा चश्मा। 
     तभी उसने पहली बार एक अमरीकी सैलानी जॉन ऐण्डरसन के पास विडियो कैमरा देखा। जॉन ऐण्डरसन अमरीका के एक टुटहे-से विश्वविद्यालय में पूर्वी सभ्यताओं, विशेष रूप से भारतीय सभ्यता और संस्कृति, पर शोध कर रहा था। अभी क्लिंटन और बुश के आने में देर थी, उदारीकरण का डंका हिन्दुस्तान में बजना शुरू नहीं हुआ था, लिहाज़ा अमरीकियों ने भी मुट्ठियाँ कसी हुई थीं। जॉन ऐण्डरसन की छात्र-वृत्ति बहुत कम थी और अगर डॉलर और रुपये के विनिमय मूल्य में इतना अन्तर न होता तो ऐण्डरसन पहाड़गंज तो क्या, फ़तहपुरी या मजनूँ का टीला में भी ठहरने की सोच न पाता। 
     बहरहाल, उसने शाहिद अन्सारी को कैमरा इस्तेमाल करना सिखा दिया, ताकि वह दिल्ली के स्मारकों के साथ-साथ गली-कूचों में भी जॉन ऐण्डरसन की चलती-फिरती तस्वीरें खींच सके। पहले दिन की शाम को ही जॉन ऐण्डरसन ने पाया था कि शाहिद अन्सारी में कैमरे को ख़ूबी के साथ इस्तेमाल करने का कुदरती सलीक़ा है और शाहिद  को तो जैसे पहली बार अपनी ज़िन्दगी का मक़सद मिल गया था। सारा हफ़्ता वह जॉन ऐण्डरसन के साथ चिपका रहा था और उसने कैमरा इस्तेमाल करने की एवज़ में तयशुदा फ़ीस से आधी रक़म ही ली थी। 
जॉन ऐण्डरसन की रही-सही कसर पैटी श्नाइडर ने पूरी कर दी थी। पैटी पश्चिम जर्मनी से छै महीने की छुट्टी पर हिन्दुस्तान घूमने आयी थी। अस्सी के दशक में पश्चिम जर्मनी की मुद्रा मार्क चढ़ती पर थी और पैटी के पास वक़्त और वसीला दोनों अच्छी-ख़ासी मिकदार में था। वह पहाड़गंज की बजाय जंगपुरा में ‘कपूर गेस्ट हाउस’ में ठहरी थी और शाहिद से उसे उसके ट्रैवल एजेण्ट ने यह कह कर मिलवाया था कि इससे बेहतर गाइड उसके देखने में नहीं आया। 
     पैटी ने तीन-चार दिन बाद ही शाहिद को अपनी सरपरस्ती में ले लिया था, उसे डिफ़ेंस कालोनी और साउथ एक्स के कुछ चुनिन्दा रेस्तराओं के दर्शन कराये थे और खादी भण्डार की बजाय विभिन्न प्रान्तों के एम्पोरियमों में लिये-लिये फिरी थी। कैमरा पैटी के पास भी था और ऐण्डरसन वाले मॉडल से आगे का था जिसमें वह ‘हिन्दुस्तान की यादें अपने साथ वापस ले जाना’ चाहती थी। 
     पैटी की सोहबत में शाहिद अन्सारी ने पहली बार वह सुख भी प्राप्त किया था, जिसके लिए विदेशियों के इर्द-गिर्द मँडराने वाले दिल्ली के सैकड़ों नौजवान तरसते रहते हैं और कुछ तो ग़ालिब-ओ-मीर की इस नगरी को अपनी दुस्साहसी करतूतों से वैसा ही अपराध-बहुल शहर बना चुके हैं जैसा आम तौर पर न्यू यॉर्क ख़याल किया जाता है।
     इस एक महीने के संग-साथ ने शाहिद अन्सारी की ज़िन्दगी बदल कर रख दी थी। पैटी ने एकबारगी शाहिद को एक ही साथ औरत की देह की रहस्यमयता और उसके विलक्षण खुलेपन से परिचित कराया था। इतना ही नहीं, बल्कि उसने शाहिद अन्सारी को भेज कर पता लगवाया था कि दिल्ली में ऐसी कौन-सी जगहें हैं, जहाँ वह अपनी बी.ए. की डिग्री के बल पर दाख़िल हो सकता था और अपने शौक़ को पेशे में तब्दील कर सकता था। 
अस्सी के दशक के आरम्भ में हालाँकि टेलिविज़न क्रान्ति अभी कोसों दूर थी और नॉएडा में फ़िल्म सिटी के बनने का किसी को ख़्वाबो-ख़याल भी नहीं था, लेकिन दिल्ली में एशियाई खेलों के बाद दूरदर्शन पर रंगीन कार्यक्रम प्रसारित होने लगे थे, इन्दिरा गाँधी हफ़्ते में दो-तीन की संख्या में नये टीवी केन्द्र खोल रही थीं और आगे की सम्भावनाओं को भाँपते हुए एक अदद इंस्टीट्यूट ऑफ़ मास कम्यूनिकेशंज़ खुल गया था; साथ ही जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय ने अपनी तरक़्क़ीपसन्द रवायत पर चलते हुए बाक़ायदा एक जन संचार विभाग खोल दिया था। 
     पाँच महीने बाद जब पैटी श्नाइडर कश्मीर, काठमाण्डू, कलकत्ता और कन्याकुमारी का चक्कर लगा कर वीसबाडन के लिए जहाज़ में सवार होने के लिए दिल्ली आयी थी तो उसने पाया था कि शाहिद अन्सारी ने, बकौल भान सिंह, ‘गाइडगीरी’ से बचाये पैसों के बल पर जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी के जन संचार विभाग में दो साल के डिप्लोमा कोर्स में दाख़िला ले लिया है। वह उसे विदा करने के लिए पालम आया था तो उसके साथ एक गोरी, गोल चेहरे वाली सुन्दर-सी लड़की भी थी जिसका नाम उसने सबीना चोपड़ा बताया था और जो जामिया में उसी के साथ दाख़िल हुई थी।
सबीना चोपड़ा दक्षिण दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाक़े में रहने वाली एक तेज़-तर्रार लड़की थी, जैसी लड़कियाँ जीसस एण्ड मेरी कॉन्वेंट और लेडी श्रीराम कॉलेज की दहलीज़ों लाँघने के बाद सैकड़ों की तादाद में दिल्ली में नज़र आती हैं। उसका परिवार बँटवारे के समय स्यालकोट से उखड़ कर लाजपत नगर में आ बसा था और अब सूखे मेवों के बड़े व्यापारियों में गिना जाता था। 
     शाहिद अन्सारी के प्रशिक्षण में जो कमी रह गयी थी वह सबीना चोपड़ा ने पूरी कर दी थी। वह स्त्री-शक्ति और महिला अधिकारों के कई संगठनों के साथ जुड़ी हुई थी, छात्र राजनीति में भी दिलचस्पी रखती थी और एक ही साथ कॉन्वेंटी लबो-लहजे और ‘एथनिक’ यानी देसी रहन-सहन का ऐसा मेल थी जो दिल्ली के ही बहुत-से लड़कों की सिट्टी-पिट्टी गुम कर देता था, फिर बुलन्दशहर से आये शाहिद अन्सारी बेचारे की तो हस्ती ही क्या थी। 
     यों, दोनों एक लिहाज़ से एक-दूसरे के पूरक भी थे। शाहिद मुलायम-तबियत, व्यवहार-कुशल और लचकीले सुभाव का था, जबकि सबीना चोपड़ा को उसके कुछ सहपाठी पीठ-पीछे ‘झाँसी की रानी’ कहा करते थे। वह दरअसल उन बिरली लड़कियों में से थी, जिन्हें पंजाबी बड़े लुत्फ़ से ‘माही-मुण्डा’ कह कर नवाज़ते हैं।
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शाहिद को कैमरे पर महारत हासिल थी तो सबीना को ऐसे विषयों पर जो उन दिनों ग़ैर सरकारी संगठनों के बीच बहुत लोकप्रिय थे। महिला सशक्तीकरण का दौर शुरू हो रहा था और जल्द ही इसके साथ परिवार नियोजन, बँधुआ मज़दूरी, दलित जागृति, एड्स और आदिवासियों तथा विस्थापन आदि के मुद्दे भी जुड़ जाने वाले थे। डिप्लोमा ले कर जामिया से निकलने के बाद शाहिद अन्सारी और सबीना चोपड़ा ने शादी कर ली थी, लेकिन वह जानी इसके बाद भी सबीना चोपड़ा के नाम से ही जाती थी। 
     आश्चर्यजनक रूप से सबीना के परिवार का झुकाव भाजपा की ओर होते हुए भी इस शादी ने बहुत हलचल नहीं पैदा की थी। कुछ ही दिन बाद शाहिद और सबीना गोल डाकख़ाने के पास एक सरकारी फ़्लैट में चले आये थे। फ़्लैट मानव संसाधन मन्त्रालय के अन्तर्गत संस्कृति विभाग में काम करने वाले एक सेक्शन ऑफ़िसर को दिया गया था जो दिल्ली के हज़ारों दूसरे बाबुओं की तरह अपने निजी मकान में रहता था और अपने नाम आबण्टित फ़्लैट को किराये पर चढ़ा कर कुछ अतिरिक्त आमदनी की डौल बैठाये हुए था। 
     धीरे-धीरे फ़्लैट में आराम-आसाइश की चीज़ें जुटना शुरू हो गयी थीं। शाहिद ने जामिया की पढ़ाई के दौरान ही तीसरी धारा की कम्यूनिस्ट पार्टी से कुछ रब्त-ज़ब्त क़ायम कर ली थी और अब जब उस धारा के संस्कृतिकर्मी उसके यहाँ आते तो वह उनकी सवालिया नज़रों को लक्ष्य कर, बड़े सहज अन्दाज़ में नये ख़रीदे टेलिविज़न या वी.सी.आर. या म्यूज़िक सिस्टम का ज़िक्र करते हुए उसकी ज़रूरत और ख़ूबियाँ बताता और फिर मानो सरे-राहे उसकी क़ीमत की भी जानकारी देना न भूलता। 
     डेढ़ साल बाद ही शाहिद के घर एक बेटा आ गया था और उसी दौरान सबीना की बनायी एक डॉक्यूमेण्टरी फ़िल्म को कैलिफ़ोर्निया के किसी फ़िल्म फ़ेस्टिवल का पुरस्कार मिला था। पुरस्कार की राशि से शाहिद ने एक सेकेण्ड हैण्ड फ़िएट गाड़ी ख़रीद ली थी और अब वह अपनी फ़िल्मों की कम और सबीना की फ़िल्मों की चर्चा ज़्यादा करता था। भौतिक उन्नति के बावजूद वह गाहे-बगाहे पार्टी ऑफ़िस जा धमकता, उनकी गतिविधियों के लिए वक़्तन-फ़वक़्तन चन्दा भी देता और ख़ास-ख़ास मौक़ों पर पाँच-दस मिनट के लिए चेहरा दिखाना न भूलता; भले ही पहले से तयशुदा किसी कार्यक्रम का बहाना बना कर जल्दी ही फूट लेता। यों भी कविता-कहानी, नुक्कड़ नाटक और क्रान्तिकारी गीत गाने वाले संस्कृतिकर्मियों के लिए फ़िल्मी दुनिया - चाहे वह दिल्ली की और डॉक्यूमेण्टरी फ़िल्मों की क्यों न हो - एक अचरज-भरी दुनिया थी। सो शाहिद अन्सारी बिना कुछ ज़्यादा किये-धरे ही पार्टी हलक़ों में हरदिल अज़ीज़ बना हुआ था।
     इस समय भी शाहिद अन्सारी पटना, नालन्दा और आरा से आये पार्टी और पार्टी के सांस्कृतिक संगठन के कुछ कार्यकर्ताओं के साथ था। ये सभी ‘साथी लोग’ रैली में पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ताओं की हैसियत में शामिल होने आये थे और उन्हें बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और अन्य छिट-पुट जगहों से आये सामान्य किसान-मज़दूरों की तरह तड़-फड़ लौटने की जल्दी नहीं थी।

तेरह

‘देखिए नन्दू जी, आपसे मिलाने के लिए हम किन-किन को ले आये हैं,’ शाहिद अन्सारी ने कुछ दूर ही से ऊँची आवाज़ में कहा था, फिर नज़दीक आ कर बात पूरी की, ‘दरअसल मुझे कल की रैली का विडियो टेप पार्टी ऑफ़िस में देना था। इन सब से वहीं भेंट हो गयी, सो हम लोगों ने सोचा आपसे भी मिल लिया जाय। बहुत ही अच्छी फ़ुटेज तैयार हुई है रैली की।’
     नन्दू जी उन चारों साथियों से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे, जो शाहिद अन्सारी के अगल-बग़ल आ कर ढाबे के बाहर खड़े हो गये थे। उन्होंने सबसे हाथ मिलाया। 
     ‘चाय नहीं पिलायेंगे नन्दू जी ?’ शाहिद अन्सारी ने कुछ ऐसे अन्दाज़ में कहा कि वह सवाल और अनुरोध से आगे बढ़ कर आग्रह-सा जान पड़ा।
     नन्दू जी ने फ़ौरन कहा, ‘क्यों नहीं।’ और फिर वे ढाबे के बाहर लगी बेंचों पर ही बैठ गये।
     ‘कॉमरेड, कल आप रैली में दिखायी नहीं दिये,’ आरा के पुराने संस्कृतिकर्मी अनिल वज्रपात ने नन्दू जी की ओर मुख़ातिब होते हुए कहा, ‘आपका बहुत इन्तजारी होता रहा।’
     ‘असल में...’ नन्दू जी ने सफ़ाई देने के लिए मुँह खोला ही था कि नालन्दा के किसान सभा के कार्यकर्ता राम अँजोर ने टप से उनकी बात काट दी।
     ‘हमको तो आज तक समकालीन लोकमत में आपका वोह रपट याद है,’ उसने कहा, ‘जेमे आप जहानाबाद का बिबरन छपाये रहे कि कइसे कोन तो बिदेसी लेखक का पात्र आदमी से पिल्लू बन जाता है, लेकिन बिहार के जलते खेत-खलिहान में पिल्लू का माफिक रेंगने वाला सब लोग संघर्स का गर्भ में पिल्लू से इन्सान बनता जा रहा है।’
     ‘बहुत अच्छी रिपोर्ट थी वह,’ शाहिद अन्सारी ने टीप जड़ी, ‘मैंने तो उसकी कतरन सँभाल कर रखी हुई है। सबीना एक फ़िल्म फ़ेस्टिवल में मेक्सिको गयी है। वहाँ से आ जाय तो हम उस रिपोर्ट के आधार पर एक फ़िल्म बनायेंगे। मैंने तो उसका शीर्षक भी सोच लिया है - कायाकल्प।’
     ‘ऊ रपट पर फ़िलम जरूर बनना चाहिए,’ पटना की पार्टी इकाई के सचिव रामजी यादव ने कहा, ‘हम लोग तो ऊ रपट की फ़ोटोकॉपी कराके बँटवाये भी थे।’
     इस बीच चाय आ गयी थी और सबने अपने-अपने गिलास थाम लिये थे। अगर नन्दू जी ख़याल था कि उनकी रपट की चर्चा से यह सवाल दब जायेगा कि वे कल की रैली में क्यों शामिल नहीं हुए तो वे भूल कर रहे थे, क्योंकि तभी फ़ैज़ाबाद के युवा रंगकर्मी उदय प्रकाशपुंज ने उनकी ओर मुड़ कर कहा, ‘हम तो कल आखिर तक आपकी राह देखते रहे कॉमरेड। दरअसल, और भी साथी आपसे मिलना चाहते थे।’
     ‘क्या बतायें साथी, कल स्कूटर ने ऐसा धोखा दिया कि पूछो मत,’ नन्दू जी बोले। ‘मुझे नॉएडा में प्रेस जा कर आधे घण्टे का काम निपटाना था। सोचा था, वहीं से रैली में चला जाऊँगा, लेकिन स्कूटर ख़राब हो गया। आस-पास कोई मिस्त्री नहीं था। बनवाते-बनवाते साढ़े चार बज गये।’ 
‘वहीं छोड़ कर बस से ही चले आये होते। लौटते में उठा लेते,’ अनिल वज्रपात ने कहा, ‘रोज-रोज रैली कहाँ होता है।’
‘अरे कॉमरेड, यह इलाहाबाद या फ़ैज़ाबाद नहीं है,’ शाहिद अन्सारी ने समझाते हुए कहा, ‘यहाँ पहले तो कोई स्कूटर रखने को तैयार ही न होता। हो भी जाता तो नॉएडा के इंटीरियर से आना और फिर स्कूटर उठाने के लिए लौटना कोई आसान काम है।’
     नन्दू जी ने कृतज्ञता-भरी नज़रों से शाहिद अन्सारी की तरफ़ देखा। उन्हें कई बार अपने पुराने साथियों से उलझन होने लगती थी जो अपनी उसी छोटे शहर की मानसिकता से दिल्ली की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को नापने लगते थे। लेकिन उनका आश्वस्ति का यह भाव ज़्यादा देर तक क़ायम नहीं रह पाया, क्योंकि अनिल वज्रपात की अगली ही बात ने उसे एकबारगी चकनाचूर कर दिया।
     ‘हम तो कल्हे सुबह आपके हियाँ आने की सोचे रहे। काहे से कि गाड़ी से उतर कर पार्टी आफिस पहुँचे तो बड़ी भीड़ रही,’ उसने इतमीनान से बीड़ी सुलगाते हुए कहा, ‘लेकिन आपका नया डेरा का पता नहीं मालूम रहा।’
     ‘हम लोगों ने सोचा था कि अब दिल्ली आये हैं तो दू-चार रोज रुक कर सबसे मिल-मिला लिया जाये,’ प्रकाशपुंज ने कहा।
नन्दू जी को अचानक अपनी साँस रुकती-सी लगी। कुसुम विहार वाले फ़्लैट में तो एकाध बार उन्होंने बाहर से आने वाले साथियों को टिकाया भी था, मगर बंसल साहब के इस मकान में ऐसा करने की वे सोच भी नहीं सकते थे, क्योंकि ऐसा करने में कई तरह के ख़तरे थे। जिस क़िस्म की पाबन्दियाँ बंसल साहब ने लगा रखी थीं, उनमें नन्दू जी ओखला में रहने वाले अपने बड़े भाई को ही बड़ी मुश्किल से कभी-कभार टिका पाते थे जब वह इधर का चक्कर लगाता था, पार्टी कॉमरेड की तो कौन कहे। उन्होंने कल्पना की कि लुंगी बाँधे बीड़ी फूंकते अनिल वज्रपात को देख कर बंसल साहब की क्या प्रतिक्रिया होगी।
     ‘सोच में काहे पड़ गये साथी,’ कॉमरेड रामअँजोर ने कहा।
     ‘नहीं, नहीं, सोच की बात नहीं,’ नन्दू जी बोले, ‘आप लोग कल सुबह आइए न। कल मेरी छुट्टी है। बिन्दु को रेडियो स्टेशन जाना होगा तो भी कोई बात नहीं। जम कर चर्चा होगी। मैं तो कहता उधर ही टिकिए पर बात यह है कि मकान-मालिक नीचे ही रहता है और...’
     ‘किराया-भाड़ा तो लेता होगा न,’ प्रकाशपुंज ने कहा, ‘फिर आपके यहाँ कौन ठहरता है, इसमें कौन एतराज का बात है।’
     ‘साथी, आप दिल्ली के मकान-मालिकों को नहीं जानते,’ शाहिद अन्सारी ने हँसते हुए कहा, ‘ऐसी-ऐसी शर्तें रखते हैं मकान देते समय कि बस। मैंने तो इसीलिए सरकारी क्वार्टर लिया। और अब तो पटपड़गंज की एक सोसाइटी का फ़ार्म भर दिया है जो रंगकर्मियों और फ़िल्मकारों के लिए फ़्लैट बना रही है। प्राइवेट मकानों में तो यही चख-चख रहती है।’
     ‘हमको तो ई जना रहा कॉमरेड,’ अनिल वज्रपात ने बीड़ी का आख़िरी कश खींच कर टोटे को बेंच के पाये से रगड़ कर बुझाते हुए कहा, ‘कि ई बड़ा सहर में होता है कि जबर-से-जबर लोग आदमी से पिल्लू बन जाता है। आप सब को ई पेटी बुर्जुआ मानसिकता से संघर्ष करना...’
     ‘साथी,’ शाहिद अन्सारी ने अनिल वज्रपात की बाँह पर हाथ रखते हुए कहा, ‘यह बहस आप कल नन्दू जी के घर पर जारी रखिएगा। मुझे अभी रैली की फ़ुटेज एडिट करनी है। चलिए, आपको आई.टी.ओ. पर छोड़ दूँ, वहाँ से पार्टी ऑफ़िस के लिए सीधी बस मिल जायेगी।’
नन्दू जी ने ढाबे वाले को चाय के पैसे हिसाब में लिख लेने के लिए कहा था और सब लोग नन्दू जी के दफ़्तर की तरफ़ बढ़े थे। अभी दफ़्तर कुछ दूर ही था कि शाहिद अन्सारी एक नीले रंग की फ़िएट गाड़ी के पास रुक गया और उसने जेब से चाभियों का छल्ला निकाल कर दरवाज़ा खोला। फिर, इससे पहले कि नन्दू जी कुछ कहते, वह बोला, ‘हाल ही में ली है। सेकेण्ड हैण्ड है पर बहुत अच्छी मेनटेन की हुई थी। सबीना के पापा के दोस्त, एक कर्नल साहब की थी। बहुत सस्ते में दे दी। चालीस हज़ार में। शूटिंग के काम भी आती है और सबीना को भी आराम हो गया है। कैसी लगी ?’
     नन्दू जी ने कार की प्रशंसा की थी तो शाहिद अन्सारी ने सरे राहे यह जानकारी भी दे डाली थी कि ’एज़्योर ब्लू’ रंग की फ़िएट गाडि़याँ कम्पनी ने बहुत सीमित संख्या में बनायी थीं और दिल्ली में गिने-चुने लोगों के पास ही थीं। चलते-चलते अनिल वज्रपात ने नन्दू जी से उनके मकान का पता लिया था और पहुँचने का रास्ता समझा था। तभी, कॉमरेड रामजी यादव ने जेब से एक लिफ़ाफ़ा निकाल कर नन्दू जी की ओर बढ़ाया था।
     ‘डॉ. दिनेश कुमार ई चिट्ठी आपको देने खातिर कहे थे,’ उन्होंने कहा, ‘चाहते रहे कि रैली में आयें। लेकिन इधर उनका तबियत ठीक नहीं चल रहा है। सो बड़ा दुख से ई चिट्ठी भेजे हैं। आप फुरसत से पढ़ लीजिएगा। कल जब मुलाकात होगा तब इस पर भी चर्चा हो जायेगा।’
     ‘ठीक है,’ नन्दू जी ने चिट्ठी ले कर जेब में रखते हुए कहा था, ‘मैं घर जा कर इसे देख लूँगा।’

Wednesday, September 10, 2014

हिचकी

किस्त : 10-11


दस

अगले दिन नन्दू जी ठीक साढ़े दस बजे अपने परिचित दुकानदार के शो-रूम पहुँच गये थे। दुकानदार ने सारे काग़ज़ात तैयार किये हुए थे। नन्दू जी ने पहली किस्त का चेक दिया था और शेष किस्तों के पोस्ट-डेटेड चेक सोमवार को देने का वादा कर उन्होंने दुकानदार के साथ माल ढोने वाला टेम्पो मँगवा देने को कहा था। 
     बिन्दु को भी उस रोज़ रिकॉर्डिंग के लिए रेडियो स्टेशन जाना था और वे चाहते थे कि उसके घर से निकलने के पहले वे कम-से-कम वॉशिंग मशीन पहुँचा तो दें। लेकिन टेम्पो वाले आम तौर पर बारह बजे के बाद ही आते थे और दुकानदार से चालान ले कर सामान पहुँचा आते थे। दुकानदार ने कहा भी कि नन्दू जी चिन्ता न करें, वह वॉशिंग मशीन भिजवाने का प्रबन्ध कर देगा।
     लेकिन नन्दू जी अब और किसी सम्भावित विलम्ब का ख़तरा उठाने को तैयार न थे। वे बाज़ार से ढूँढ-ढाँढ कर एक तिनपहिया ट्रॉली ले आये थे। ट्रॉली वाला बड़ी मुश्किल से तैयार हुआ था, क्योंकि नन्दू जी लक्ष्मी नगर के जिस ब्लॉक में रहते थे, वह थोड़ी ऊँचाई पर था और ट्रॉली वाले वहाँ जाने के कुछ ज़्यादा पैसे माँगते थे।
अन्ततः, जब नन्दू जी ने वॉशिंग मशीन को ट्रॉली पर एहतियात से लदवा दिया था तो सुख की लम्बी साँस ली थी और ख़रामा-ख़रामा स्कूटर चलाते हुए ट्रॉली वाले के साथ हो लिये थे। चढ़ाई पर उन्होंने स्कूटर ट्रॉली के क़रीब करके बायें पैर से ट्रॉली को सहारा देते हुए चढ़ाई पार करायी थी और विजय की लूट के साथ लौटते शूरवीर की तरह घर पहुँचे थे।
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बिन्दु तैयार हो रही थी। नन्दू जी ने सावधानी से वॉशिंग मशीन का डिब्बा सामने वाले कमरे में रखवाया था, ट्रॉली  वाले को पैसे दिये थे और वॉशिंग मशीन के काग़ज़ बिन्दु को थमाते हुए कहा था कि वह उन्हें सँभाल कर रख ले, वे शाम को आ कर उसका ट्रायल लेंगे। फिर वे सरपट सीढि़याँ उतरे थे और अपने तय किये गये कार्यक्रम के अनुसार बारह बजे नॉएडा पहुँच गये।
लेकिन रैली में भाग लेना नन्दू जी के नसीब में नहीं था। ढाई बजे जब वे प्रेस का सारा काम निपटा कर निकले थे तो सड़क पर आते ही उनके स्कूटर के एक्सेलेरेटर का तार टूट गया था। यह प्रेस नॉएडा में सेक्टर छै के काफ़ी अन्दर ऐसे इलाके में था, जहाँ चारों तरफ़ कारख़ाने-ही-कारख़ाने थे। दुकानों के नाम पर कुछ चाय और पान-सिगरेट के ठेले थे या फिर सड़क किनारे तसला लगा कर पंचर बनाने या साइकिल की मरम्मत करने वाले मिस्त्रियों के खोखे। 
     झख मार कर नन्दू जी एक-डेढ़ किलोमीटर तक स्कूटर घसीटते हुए बाज़ार तक आये थे और फिर तब तक स्कूटर मिस्त्री की दुकान के बाहर बेंच पर बैठे रहे थे, जब तक कि उसका चेला साइकिल पर जा कर एक्सेलेरेटर की तार नहीं ले आया था। मिस्त्री को तो किसी रैली में जाना नहीं था और फिर महज़ एक तार बदलने के मेहनताने में उसे दस-पाँच रुपये से ज़्यादा मिलने न थे, इसलिए उसने दूसरे काम करते हुए परम निश्चिन्त भाव से नन्दू जी का स्कूटर ठीक किया था।
     यह सब होते-हवाते चार बज गये थे और नन्दू जी का रैली में जाने का सारा उत्साह मर चुका था। ऐसा नहीं था कि वे रैली में जाने के लिए विशेष रूप से इच्छुक थे। इधर के दिनों में उन्हें बराबर यह महसूस होता था कि खुले तौर पर बाहर आने के बाद भी पार्टी को भूमिगत संघर्ष की लीक थामे रखनी चाहिए थी और इतनी जल्दी संसदीय चुनाव के रास्ते पर चलने का फ़ैसला नहीं करना चाहिए था। इसकी बजाय अगर पार्टी ने अपने साप्ताहिक पत्र को नियमित ढंग से प्रकाशित करने और अपने मुख पत्र को आम लोगों के और क़रीब ले जाने पर ज़ोर दिया होता तो आन्दोलन को व्यापक बनाने की ज़्यादा गुंजाइश होती। 
रैलियों के बारे में भी नन्दू जी के विचार बदल गये थे। उन्हें लगता था कि दिल्ली जैसी राजधानी में झण्डे-बैनर-पताका थामे या फिर हँसिये-बल्लम-लाठियाँ उठाये, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान मर्द-औरतें एक कौतुक-भरा दृश्य बन कर रह जाते हैं, वैसा ही जैसा एक भिन्न स्तर पर 26 जनवरी की परेड में आयी लोक-कलाकारों की टोलियाँ प्रस्तुत करती हैं। 
     इन रैलियों से सरकार के कान पर जूँ भी नहीं रेंगती और रैलियों में आये लोग भी पहला मौक़ा पाते ही लाल क़िले के सामने वाले फ़ुटपाथिया बाज़ार में जाकिट, जूते, सफ़री बैग, ट्रांसिस्टर रेडियो और ऐसा ही सस्ता और डुप्लीकेट सामान ख़रीदने निकल जाते हैं। मलगजे पाजामों-कुर्तों पर ऐक्रिलिक या नायलॉन के विंड चीटर या जर्किनें पहने कॉमरेड एक अजीब-सा दृश्य उपस्थित करते। 
     नन्दू जी को लगता था कि गाँव-देहात से आये इन साथियों के मन में दरअसल वह सब हासिल करने की ललक है, जिसे वे टी.वी. या अख़बारों के विज्ञापनों में शोषक वर्ग के लोगों को पहनते-ओढ़ते या इस्तेमाल करते देखते हैं। उनके ख़याल में पार्टी को एक सांस्कृतिक अभियान भी चलाना चाहिए ताकि संघर्ष के गर्भ से जन्म लेने वाला नया इन्सान सचमुच नये इन्सान जैसा लगे, पुराने शोषक वर्गों की भौंडी नक़ल नहीं। एक बार जब उन्होंने ऐसी ही कुछ बातें पार्टी ऑफ़िस में कही थीं तो कुछ नये साथियों ने उनकी अच्छी ख़बर ली थी।
‘कॉमरेड, हमें शोषक वर्गों के पहनावे-ओढ़ावे से नहीं, उनके उत्पीड़न और दमन से नफ़रत है,’ शहनवाज़ नामक एक युवा साथी ने कहा था, जो साल भर से नेहरू प्लेस की झुग्गी-झोंपड़ी कॉलोनी में रहते हुए वहीं पार्टी का काम कर रहा था। ‘किसान-मज़दूरों के हक़ छीनने वाला चाहे कुर्ता-धोती पहने या जीन्स-जैकेट, हमारे लिए बराबर है। हमारे लिए मोटर साइकिल एक वाहन है, टी.वी. एक यन्त्र और उनके लिए पद-प्रतिष्ठा का साधन। ट्रांसिस्टर हो या घड़ी या मोटर साइकिल, ये सब अगर हमारी ज़रूरतों में शामिल हैं तो इन्हें हासिल करने में कोई बुराई नहीं। बुराई कर्महीन उपभोग में है।’
     ‘यह भी देखिए कॉमरेड,’ देवाशीष ने कहा था, ‘कि हमारी तो लड़ाई ही इस बात के लिए है कि जीवन की सारी अच्छी चीज़ें सबको मिलें। हमारे किसान-मज़दूर भाई अगर मँहगी घड़ी, रेडियो और कपड़ा नहीं ख़रीद पाते तो सस्ता सामान ही ख़रीद लेते हैं। आख़िर मार्क्स और एंगेल्स भी सूट पहनते और टाई लगाते थे। यह ठीक है कि वे उतने उम्दा नहीं होते थे, जितने विलायत के बड़े पूँजीपतियों और सामन्तों के। आरा का ठाकुर सूबेदार सिंह भी कुर्ता-धोती पहनता है और उसका हलवाहा जगदीश महतो भी। तो क्या इस हिसाब से दोनों बराबर हैं ? आप भी जानते हैं कि अगर सूबेदार सिंह के गुज़रते समय जगदीश महतो खटिया से उठ कर जुहार न करे तो उसका कुर्ता-धोती भी उसकी खाल नहीं बचा पायेगा। लड़ाई वाजिब मज़दूरी की भी है, साथी,  और वाजिब सम्मान की भी। इसे समझिए।’
     ‘दिल्ली आ कर आपका नजरिया कुछ बदली हो गया लगता है, कॉमरेड,’ नालन्दा के पुराने साथी रामेश्वर राम ने कहा था, ‘पटना में तो आप कुछ औरे बिचार रखते थे।’
     नन्दू जी को कोई जवाब नहीं सूझा था। लेकिन वे पार्टी कॉमरेडों से सहमत नहीं हो पाये थे। उनका ख़याल था कि साथी लोग चीज़ों का अनावश्यक सरलीकरण कर रहे हैं। धीरे-धीरे उनका पार्टी ऑफ़िस जाना कम हो गया था। तो भी, पुराने सम्बन्धों की वजह से उन्होंने रैली में भाग लेने का निश्चय किया था। मगर स्कूटर ने ही धोखा दे दिया था और तब तक तो रैली जाने कहाँ-की-कहाँ पहुँच चुकी होगी। इसी उधेड़-बुन में नन्दू जी घर पहुँचे थे और बाहर के कमरे में दीवान पर ढेर हो गये थे। उनकी नींद तब खुली थी, जब बिन्दु ने रेडियो स्टेशन से लौट कर साढ़े छै बजे उन्हें जगाया था।

ग्यारह

तुम रैली में गये थे ?’
     जितनी देर में नन्दू जी मुँह-हाथ धो कर चैतन्य हुए थे, बिन्दु चाय बना लायी थी और उसने चाय का मग उन्हें देते हुए पूछा था।
     ‘कहाँ जा पाया ? प्रेस से निकलते ही स्कूटर धोखा दे गया। आस-पास कोई मिस्त्री नहीं था। बाज़ार तक घसीट कर लाना पड़ा। बनवाते-बनवाते चार-सवा चार बज गये थे,’ उन्होंने बिन्दु को बताया था। फिर सिर झटक कर मानो उस प्रसंग को किनारे करते हुए वे उठे थे। ‘ड्रम में पानी तो भरा ही है,’ उन्होंने कहा था, ‘तुम कपड़े निकालो, मैं पैकिंग खोल कर वॉशिंग मशीन लगाता हूँ, इसे चला कर तो देखें।’
नन्दू जी ने पतलून उतार कर लुंगी पहनी थी, वॉशिंग मशीन की पैकिंग खोल कर उसे नीचे लगे पहियों पर लुढ़का कर बाथरूम के बाहर रखा था और ड्रम से बाल्टी भर-भर कर वॉशिंग मशीन में पानी डाला था। बिन्दु इस बीच मैले कपड़े इकट्ठा कर लायी थी। नन्दू जी ने वॉशिंग मशीन के साथ मिली हिदायतों की पुस्तिका पढ़-पढ़ कर कपड़े धोये थे। 
     कपड़े धोने के साथ-साथ वे बिन्दु को हर चीज़ बड़े विस्तार से समझाते रहे थे ताकि आगे से वह भी वॉशिंग मशीन चला सके। उन्हें अफ़सोस हुआ था कि वॉशिंग मशीन लाते समय वे तीन-चार मीटर रबर की पाइप भी क्यों नहीं ख़रीद लाये। बार-बार बाल्टी से वॉशिंग मशीन भरने में कष्ट तो न होता। वैसे भी उन्होंने तय कर रखा था कि वे वॉशिंग मशीन तभी इस्तेमाल किया करेंगे जब मकान मालिक बंसल जी मोटर चालू करते थे। 
आध घण्टे बाद, जब कपड़े धुल गये थे और बिन्दु उन्हें अलगनी पर डाल रही थी, नन्दू जी ने वॉशिंग मशीन को सूखे कपड़े से पोंछ कर प्लास्टिक के कवर से ढँक दिया था। उन्हें उपलब्धि का कुछ वैसा ही एहसास हुआ था जैसा समकालीन लोकमत में बिहार के किसी गाँव से भेजी गयी टिप्पणी को लिख कर होता था। प्रसन्न वदन वे दीवान पर जा बैठे थे और उन्होंने टीवी चालू कर दिया था। 
     प्रसन्नता का यह भाव सुबह उठ कर दफ़्तर के लिए रवाना होने तक बना रहा था।
लेकिन अगले दिन की घटनाओं ने प्रसन्नता के इस भाव को एकदम तिरोहित कर दिया था। दफ़्तर पहुँचते ही उन्हें पता चला था कि रमा जी पिछले दिन आयी ही नहीं थीं। उनके घर फ़ोन करने पर मालूम हुआ था कि वे कांग्रेस के महिला संगठन की मंगोलपुरी शाखा के कार्यक्रम में गयी हुई हैं और कब आयेंगी, यह बता कर नहीं गयीं। यह ख़बर पाते ही नन्दू जी का माथा ठनका था। उन्हें लगा था कि अभी रमा जी से उनका पीछा नहीं छूटने वाला। और उनका यह अनुमान सही निकला था।
     अभी उन्होंने व्यवस्थित हो कर मुश्किल से एक नयी पाण्डुलिपि के पहले अध्याय की प्रेस कॉपी तैयार की थी कि रागिनी ने इंटरकॉम पर उन्हें कहा था कि हरीश अग्रवाल अभी-अभी दफ़्तर आया है और उसने उन्हें अपने कैबिन में बुलाया है। 
     नन्दू जी थोड़ा झल्लाये थे, क्योंकि शुरू के दिनों के विपरीत, जब हरीश अग्रवाल अक्सर उनकी मेज़ पर चला आता, हाल के दिनों में उसने नन्दू जी को अपने कैबिन में बुलाना शुरू कर दिया था और उनकी मेज़ पर तभी आता था, जब उसे टोह लेनी होती कि वे काम कर रहे हैं या नहीं। 
     एक दिन जब वह ऐसे ही अचानक चला आया था, वे फ़ोन पर फ़रहान अख़्तर से बात कर रहे थे। साल-डेढ़ साल के बाद भी उन्हें अपने अख़बार की तरफ़ अपनी बक़ाया रकम का भुगतान नहीं मिला था और वे फ़रहान से उस सिलसिले में कुछ करने के लिए ज़ोर दे रहे थे। 
     उस समय तो हरीश अग्रवाल ने कुछ नहीं कहा था, लेकिन दो दिन बाद उसने रागिनी शर्मा को अपने कैबिन में बुला कर एक रजिस्टर देते हुए कहा था कि वह इस रजिस्टर में दफ़्तर से किये जा रहे सभी फ़ोन नम्बर लिख लिया करे। नन्दू जी उस समय हरीश अग्रवाल के कैबिन ही में बैठे हुए थे।
     ‘दरअसल, दफ़्तर से बहुत सारे प्राइवेट फ़ोन भी किये जाते हैं,’ हरीश अग्रवाल ने नन्दू जी की सवालिया नज़रों के जवाब में सफ़ाई देने के अन्दाज़ में कहा था, ‘पिछले महीने टेलिफ़ोन का बहुत ज़्यादा बिल आ गया था। इस तरह हिसाब रहेगा कि टेलिफ़ोन वालों ने सही बिल दिया है या नहीं।’
     नन्दू जी इशारा समझ गये थे, लेकिन उन्हें हरीश अग्रवाल के छोटेपन पर बड़ा क्रोध आया था, क्योंकि जिन कर्मचारियों से हरीश अग्रवाल को काम रहता था, मसलन सेल्स मैनेजर सतीश कुमार, वे चाहे जितनी बार निजी काम से फ़ोन करते, वह कुछ न कहता।
नन्दू जी ने पाण्डुलिपि एक किनारे की थी और हरीश अग्रवाल के कैबिन की ओर चल दिये थे। हरीश अग्रवाल फ़ोन पर काग़ज़ वाले से बात कर रहा था। नन्दू जी को देख कर उसने फ़ोन पर ‘एक मिनट’ कहा, फिर नन्दू जी की ओर मुड़ कर बोला, ‘कुछ देर पहले रमा जी का फ़ोन आया था। वे बहुत बिज़ी हैं और उन्हें आज ही लौटना भी है। उन्होंने कहा है कि डिज़ाइन तैयार हो गया है। पहले उनका इरादा इधर आने का था, मगर अब वे नहीं आ पा रही हैं। किसी को उनके घर भेज दिया जाय, वे डिज़ाइन के बारे में समझा देंगी। आप चले जाइए। ऑटो कर लीजिएगा। उन्होंने कहा है, ऑटो का किराया वे दे देंगी।’
     इतना कह कर हरीश अग्रवाल फिर काग़ज़ वाले से बात करने लगा था। नन्दू जी ने अपनी मेज़ पर आ कर बिखरे हुए सामान को ठीक-ठिकाने रखा था और रमा जी के घर जाने के इरादे से बाहर निकले थे। 
बाहर गली में चहल-पहल बढ़ गयी थी। आम तौर पर मोटर मरम्मत करने वाले मिस्त्री नौ बजे तक आ जाते थे, लेकिन कारों-स्कूटरों की रँगाई और कम्प्यूटरों या फ़ोटोकॉपी की मशीनों के मेकैनिक ग्यारह बजे तक दुकानें खोलते थे और देखते-देखते गली तरह-तरह की आवाज़ों से गूँजने लगती थी, जिनमें मिस्त्रियों के हँसी-मज़ाक और गालियों की ध्वनियाँ अलग सुनायी देतीं। 
     गली से हो कर नन्दू जी दरियागंज की मुख्य सड़क पर आये तो एक और ही क़िस्म का शोर वहाँ बरपा था। रिक्शों-स्कूटरों-कारों-बसों की अनवरत आवा-जाही का कान-फाड़ू शोर। समय बारह से ऊपर हो चुका था और शोर अपने चरम पर था। नन्दू जी ने ऑटो रिक्शा की तलाश शुरू की। 
     मगर दोपहर के वक़्त ख़ाली ऑटो रिक्शा मिलना वैसे भी मुश्किल हुआ करता है। जो दो-एक ऑटो रिक्शा वाले रुके भी, वे मालवीय नगर जाने को तैयार न हुए। आख़िरकार, नन्दू जी ने एक ऑटो वाले को तैयार कर लिया, मगर वह मीटर से जाने को राज़ी न था। अमूमन दरियागंज से मालवीय नगर तक जाने का किराया पच्चीस-तीस रुपये बैठता था, लेकिन ऑटो वाला जाने-आने की बात कहने पर भी अस्सी से नीचे नहीं उतरा था।
     ‘ठीक है,’ नन्दूजी ने कहा था और ऑटो में बैठ गये थे, ‘अब जल्दी से ले चलो।’
     ‘मुझे कौन-सा अपनी जेब से देना है,’ उन्होंने सोचा था।
     ‘वहाँ रुकना तो नहीं पड़ेगा,’ ऑटो वाले ने ऑटो स्टॉर्ट करते हुए पूछा था।
    ‘नहीं-नहीं,’ नन्दू जी ने उसे आश्वस्त किया था, ‘एक ज़रूरी काग़ज़ ले कर फ़ौरन वापस आना है। देर नहीं लगेगी।’
     लेकिन फ़ौरन लौटने की कौन कहे, नन्दू जी को रमाजी के दर्शन करने के लिए ही आध घण्टा उनके फ़्लैट के बाहर बरामदे में इन्तज़ार करना पड़ा था। 
     रमा जी का फ़्लैट मालवीय नगर के उस हिस्से में था, जो कभी काफ़ी शान्त रहा होगा, लेकिन धीरे-धीरे दिल्ली के ऐसे सभी इलाक़ों की तरह, यहाँ भी बाज़ार न केवल रिहाइशी इलाक़ों की तरफ़ बढ़ आया था, बल्कि बाज़ मामलों में तो रिहाइशी इलाक़ों के भीतर छोटे-छोटे द्वीपों सरीखी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका था।
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रमा जी का फ़्लैट नीचे का था, लेकिन उसकी ऊपर की मंज़िल पर इनफ़ोटेक नाम की किसी कम्पनी का बोर्ड लगा था, जो मल्टी-मीडिया और सूचना-संचार की चकाचौंध-भरी दुनिया में हिन्दुस्तान को शामिल करने के विराट उद्योग पर्व में संलग्न थी। यही वजह थी कि फ़्लैट जिस इमारत में था, उसके लोहे के विशालकाय फाटक के बाहर किसिम-किसिम की मोटर साइकिलों के नये मॉडल खड़े थे और अमरीकी पॉप गायकों जैसे कपड़े पहने युवक-युवतियाँ आते-जाते नज़र आ रहे थे। 
     जीन्स और टी-शर्टों के ऊपर अजीबो-ग़रीब जैकेटें, कन्धों पर अनोखे बैग, विचित्र केश-सज्जा, आँखों पर धूप के चश्मे। एक ऐसा जुलूस, जो मल्टी मीडिया और कम्प्यूटरों की दुनिया की बजाय किसी विज्ञापन एजेंसी के मॉडलों का भ्रम देता था। अंग्रेज़ी लहजे में बोली गयी हिन्दी के बीच अमरीकी लहजे में बोली गयी अंग्रेज़ी के फ़िकरे। इन युवक-युवतियों की चाल-ढाल में एक अजीब क़िस्म का आत्म-विश्वास नज़र आता था।
काफ़ी देर तक नन्दू जी वहीं बरामदे में बैठे इन युवक-युवतियों का आना-जाना देखते रहे। उन्होंने जब रमा जी के फ़्लैट की घण्टी बजायी थी, तो अन्दर से कुण्डावासी वही रामसुचित केसरवानी निकला था।
     ‘बैठिए, बैठिए,’ वह खीसें निपोरते हुए बोला था, ‘मैडम ज़रूरी मिटिन कर रही हैं। अबहिन आती हैं।’ इतना कह कर वह फिर अन्दर अन्तर्धान हो गया था।
     बरामदा अच्छा-ख़ासा था। निश्चय ही रमा जी से मिलने को आने वालों के लिए वेटिंग-रूम के काम आता होगा, क्योंकि उसमें बेंत की चार कुर्सियों और बेंत ही की तिपाई के अलावा पाँच-सात अलग-अलग प्रकार की कुर्सियाँ रखी हुई थीं, जो लगता था कि पुराना फ़र्निचर बेचने वाले के यहाँ से जुटायी गयी हैं। बरामदे की तीन सीढि़याँ उतर कर एक घिरा हुआ लॉन और छोटा-सा बाग़ीचा था। 
जब नन्दू जी को इन्तज़ार करते हुए दस मिनट हो गये थे तो ऑटो वाला आ कर बड़ी रुखाई से बोला था कि वे तो फ़ौरन लौटने की बात कह कर आये थे। नन्दू जी ने किसी तरह उसे समझाया था कि वह धीरज रखे, वे जल्दी ही चलेंगे। लेकिन जब बीस मिनट बीतने पर भी रमा जी बाहर नहीं आयीं तो ऑटो वाले ने नन्दू जी से आ कर कहा कि उन्हें वेटिंग चार्ज देना होगा। 
     नन्दू जी की दिक़्क़त यह थी कि उनकी जेब में ज़्यादा पैसे नहीं थे। उन्हें अफ़सोस हुआ था कि चलते वक़्त उन्होंने प्रकाशन संस्था के एकाउण्टेण्ट से पैसे क्यों नहीं ले लिये; वरना वे ऑटो वाले को चलता कर देते। लेकिन फिर तत्काल ही उन्हें ख़याल आया कि पैसे तो हरीश अग्रवाल ने कहा था कि रमा जी देंगी। उन्होंने ऑटो वाले से कहा था कि वह फ़िकर न करे, उसे रुकने की एवज़ में कुछ अतिरिक्त भाड़ा वे दे देंगे। 
     रमा जी आध घण्टे बाद दो लोगों से बात करते हुए तेज़-तेज़ निकली थीं और उन्होंने डिज़ाइन नन्दू जी को दिया था। डिज़ाइन लगभग वैसा ही था, जैसा शमशाद ने बनाया था, सिर्फ़ बड़थ्वाल जी का चित्र बदल दिया गया था और उसके इर्द-गिर्द की चौड़ी पट्टियों का रंग गहरे नीले की बजाय गहरा हरा कर दिया गया था।
‘हरीश जी नहीं आये ?’ रमा जी ने छूटते ही बड़ी ऊँचाई से पूछा था।
     नन्दू जी ने मिनमिनाते हुए हरीश अग्रवाल की व्यस्तता का एक लचर-सा बहाना बनाया था, जिस पर रमा जी ने, ऐसा लगा था कि, कान भी नहीं दिया था।
     ‘ख़ैर, अब यह डिज़ाइन तैयार है,’ रमा जी ने कहा था, ‘इसे ऐसा ही छापिएगा।’ फिर उन्होंने मुड़ कर रामसुचित को, जो एक आज्ञाकारी भृत्य की तरह उनके पीछे खड़ा था, ड्राइवर को बुलाने के लिए कहा था।
     ‘उससे कहिए,’ उन्होंने आदेश दिया था, ‘जल्दी से गाड़ी लगाये। अभी मुझे कांग्रेस के दफ़्तर जाना है। वहीं से मैं अलीगढ़ चली जाऊँगी, जहाँ शाम को महिला सेल की बैठक है। आप मेरे साथ चलिएगा।’
     फिर वे नन्दू जी से मुख़ातिब हुई थीं, जो ऑटो के किराये के इन्तज़ार में वहीं जमे हुए थे।
    ‘और कुछ ?’ रमा जी ने पूछा था।
    ‘जी,  वो ऑटो,’ नन्दू जी ने कहा था।
    ‘हाँ, हाँ,’ रमा जी ने कहा था, और हाथ में लिया बटुआ खोल कर उन्होंने पचास का नोट नन्दू जी की ओर बढ़ा दिया था।
     ‘जी, ऑटो वाला सौ रुपया माँगता है,’ नन्दू जी ने किसी तरह साहस बटोर कर कहा था और बताया था कि वे आने-जाने का तय करके आये हैं। वे चाहें तो ऑटो वाले से पूछ लें।
     ‘सौ रुपये,’ रमा जी ने तीखे स्वर में आश्चर्य प्रकट किया था और पास खड़े व्यक्ति की ओर नज़रें घुमायी थीं। फिर वे नन्दू जी की ओर मुड़ कर बोली थीं, ‘दरियागंज से यहाँ तक के पच्चीस रुपये होते हैं। बीसियों बार लोग यहाँ से वहाँ गये-आये हैं। कभी फ़रक नहीं पड़ा। आप लोगों ने सोचा होगा, कौन-सा अपनी जेब से देना है। सो, जो ऑटो वाले ने माँगा, आपने दे दिया। आपको आने-जाने का ऑटो नहीं करना चाहिए था। और मीटर से आना चाहिए था। इसी तरह तो देश में भ्रष्टाचार फैलता है।’
     नन्दू जी अपना-सा मुँह ले कर रह गये थे। रमा जी ने और दो-चार बातें देश के चरित्र और उसको सुधारने के बारे में कही थीं, फिर वे साथ खड़े आदमी से कांग्रेस की गिरती हुई साख और उसे उठाने के क़दमों पर बातें करने लगी थीं। तभी रामसुचित ने आ कर बताया था कि गाड़ी लग गयी है। रमा जी तेज़-तेज़ उतरी थीं और कार की ओर चल दी थीं। मगर अभी नन्दू जी को छुट्टी नहीं मिल पायी थी, क्योंकि कार में बैठने से पहले रमा जी ठिठक कर उनकी ओर मुड़ी थीं।
     ‘अरे हाँ,’ उन्होंने हाथ में पकड़े काग़ज़ों में से एक काग़ज़ नन्दू जी की ओर बढ़ाया था, ‘यह डिज़ाइन ठीक करने वाले का बिल है। हरीश जी से कहिएगा कि उसे दे दें।’
नन्दू जी प्रकाशन संस्थान के कार्यालय लौटे तो काफ़ी भन्नाये हुए थे। स्कूटर वाला रास्ते भर भुनभुनाता आया था और सौ रुपये ले कर ही टला था। नन्दू जी का ख़याल था कि अकाउण्टेण्ट उन्हें ऑटो के खाते में ख़र्च किये गये पचास रुपये फ़ौरन दे देगा, लेकिन जब उन्होंने रमा जी के डिज़ाइन का बिल देते हुए अकाउण्टेण्ट से भाड़े की बाबत कहा था तो उसने बिना हरीश अग्रवाल की मंज़ूरी के, पाँच रुपये देने से भी इनकार कर दिया था। लगे हाथ उसने रमा जी के डिज़ाइन के बिल को लौटाते हुए नन्दू जी से यह भी कहा था कि वे इस बिल को हरीश अग्रवाल से दस्तख़त करवा के दें, तभी वह उसे खाते में चढ़ायेगा।
     हरीश अग्रवाल लंच पर घर जा चुका था और रागिनी शर्मा ने नन्दू जी को बताया था कि वह अब सोमवार ही को आयेगा, क्योंकि लंच के बाद उसे जे.एन.यू. जा कर एक सेमिनार में आये आलोचकों, साहित्यकारों और हिन्दी के विभागाध्यक्षों से मिलना था। 
     नन्दू जी ने डिज़ाइन और बिल हरीश अग्रवाल की मेज़ पर रखवा दिया था और अपनी मेज़ पर आ कर घर से लाये टिफ़िन बॉक्स को ले कर पास के ढाबे पर चले गये थे।
     खाना खा कर वे  ढाबे से बाहर आ ही रहे थे कि उन्हें बिहार से आये कुछ पार्टी कार्यकर्ता दिल्ली के युवा फ़िल्मकार शाहिद अन्सारी के साथ आते दिखायी दिये थे।

Tuesday, September 9, 2014

हिचकी

किस्त : 8-9


आठ

नन्दू जी कुछ देर तक डिज़ाइन को हाथ में लिये अकबकाये-से खड़े रहे थे। उनकी नज़र लाल स्केच पेन से बनाये गये उस गहरे निशान पर गयी, जो हरिश्चन्द्र दत्त बड़थ्वाल के नाम में हुई प्रूफ़ की ग़लती के गिर्द परिवार नियोजन के लाल तिकोन की तरह बना हुआ था। 
‘जल्दी-जल्दी में प्रूफ़ की ग़लती रह गयी है,’ उन्होंने माफ़ी माँगने के अन्दाज़ में कहा था।
‘प्रूफ़ की ग़लती तो है ही,’ हरीश अग्रवाल के स्वर में नरमी के बावजूद नश्तर की-सी धार थी, ‘लेकिन यह चित्र भी रमा जी को बिलकुल पसन्द नहीं आया। क्या इससे बेहतर तस्वीर नहीं चुन सकते थे आप?’
‘चित्र तो बदला जा सकता है,’ नन्दू जी ने हरीश अग्रवाल को आश्वस्त किया था।
‘बाक़ी चित्र कहाँ हैं?’ हरीश अग्रवाल ने पूछा था।
‘अभी तो शमशाद के ही पास हैं। उसने कहा था कि वह दे जायेगा, पर लगता है, इधर कोई रिकॉर्डिंग रही होगी। पुस्तक मेले के बाद से नहीं आया।’
‘सारे चित्र उसे देने की क्या ज़रूरत थी ?’ हरीश अग्रवाल के स्वर में खीझ-भरा उलाहना था। ‘अब आप उसे कहिए, फ़ौरन सारे चित्र यहाँ दे जाये। फिर इस डिज़ाइन में प्रूफ़ की भूल ठीक करवा के कम्प्यूटर से इसका एक और प्रिंट निकलवा लीजिए, जिसमें चित्र की जगह ख़ाली हो। यह सारी सामग्री एक लिफ़ाफ़े में रख कर कल शाम तक हर हालत में रमा जी के मालवीय नगर के फ़्लैट में भिजवा दीजिए। वे परसों या नरसों दिल्ली आ रही हैं और यहीं बैठ कर तय करेंगी कि कौन-सा चित्र जाना है। मैं तीन दिन के लिए भोपाल जा रहा हूँ, बृहस्पत की सुबह तक आ जाऊँगा। मेरे आने से पहले रमा जी का फ़ोन आये तो आप जा कर उनसे कवर डिज़ाइन के बारे में समझ लीजिएगा।’
नन्दू जी सिर हिला कर मुड़े ही थे कि हरीश अग्रवाल ने कहा था - ‘बुध को रमा जी के घर फ़ोन करके पता कर लीजिएगा कि वे आयी हैं या नहीं। और जब आप उनसे मिलने जायें तो शमशाद को साथ मत ले जाइएगा। इस किताब में वैसे ही बार-बार अड़ंगे लगते रहे हैं। मैं इसे जल्दी-से-जल्दी छाप कर झंझट ख़त्म करना चाहता हूँ। बाक़ी काम बाद में होते रहेंगे।’
सोमवार का पूरा दिन नन्दू जी जगह-जगह फ़ोन करके शमशाद का पता लगाने की कोशिश करते रहे थे। आख़िरकार, शाम को पाँच बजे शमशाद उस स्टूडियो में उन्हें मिला था, जहाँ वह डिस्कवरी चैनल के लिए अनुवाद की गयी स्क्रिप्ट की रिकॉर्डिंग कराता था। फ़ोन पर आ कर उसने जल्दी-जल्दी नन्दू जी की बात सुनी थी और अगले दिन प्रकाशन संस्थान के कार्यालय में चित्रों के साथ आने का आश्वासन दे कर तत्काल फ़ोन रख दिया था। 
प्रकट ही, मंगलवार को वॉशिंग मशीन लेने की योजना नन्दू जी को मुल्तवी करनी पड़ी थी, लेकिन वे दोपहर बाद तक शमशाद का इन्तज़ार करते रहे थे और वह नहीं आया था। झल्ला कर वे फ़ोन उठा कर फिर से शमशाद के मिलने की सम्भावित जगहों के ठकठकाने ही वाले थे कि वह बड़े इत्मीनान से अपना हेल्मेट झुलाता हुआ सीढि़याँ चढ़ कर कार्यालय में दाख़िल हुआ था। मगर वह सीधे उनकी मेज़ पर नहीं आया था। पहले उसने रिसेप्शेनिस्ट रागिनी शर्मा से गप-शप की थी, फिर स्वामी का हाल-चाल लिया था और जब उनका धैर्य चुकने ही वाला था, वह आ कर उनके पास बैठा था।
‘मैं सुबह से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ,’ नन्दू जी की आवाज़ में झल्लाहट भी थी और अन्ततः शमशाद के आ जाने पर राहत भी।
‘देर हो गयी कॉमरेड,’ शमशाद ने बैग से तस्वीरों का लिफ़ाफ़ा निकालते हुए कहा था, ‘मैं थोड़ी देर को पार्टी ऑफ़िस चला गया था। उन्हें रैली के लिए एक बैनर देना था।’
‘अब चलो, जल्दी से डिज़ाइन ठीक करवा दो तो मैं यह सब मालवीय नगर भेज कर छुट्टी करूँ।’ नन्दू जी उठे थे।
‘सब हो जायेगा कॉमरेड,’ शमशाद ने लगभग खिझाने वाली निश्चिन्तता से कहा था, ‘पहले एक प्याला चाय तो पिलवाइए।’
झख मार कर नन्दू जी को चपरासी रामसेवक से ख़ास तौर पर अनुरोध करके चाय बनवानी पड़ी थी। चाय आने पर शमशाद ने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला था। उसे मालूम था कि हरीश अग्रवाल ने कार्यालय में सिगरेट-बीड़ी न पीने के बारे में कड़ी हिदायतें दे रखी थीं, लेकिन उसका कहना था कि वह तो प्रकाशन संस्थान का मुलाज़िम था नहीं, और इसी तर्क के आधार पर वह नन्दू जी या स्वामी के पास बैठे-बैठे सिगरेट सुलगा लिया करता था। 
एक बार उसने हरीश अग्रवाल के कैबिन में भी ऐसा ही किया था और जब हरीश अग्रवाल ने मुलायमियत के साथ उसे टोका था तो वह यह कह कर सीढि़याँ उतर गया था कि सिगरेट अब सुलगा ही ली है तो उसे ख़त्म करके आता है, और आधे घण्टे के बाद वापस आया था। नन्दू जी और हरीश अग्रवाल मन-मारे बैठे उसका इन्तज़ार करते रहे थे। 
अगर अच्छे कवर डिज़ाइन बनाने वालों का इतना टोटा न होता तो हरीश अग्रवाल शमशाद को दोबारा न बुलाता, पर शमशाद के आवरण चित्र काफ़ी पसन्द किये गये थे; इसीलिए हरीश अग्रवाल चुप लगा गया था और इसके बाद शमशाद को अपने कैबिन में बुलाने की बजाय ख़ुद उठ कर नन्दू जी की मेज़ पर चला जाता।
सिगरेट ख़त्म करने के बाद शमशाद ने कम्प्यूटर कक्ष में जा कर आवरण पर नाम के हिज्जे ठीक करवाये थे और फिर चित्र की जगह ख़ाली छोड़ते हुए कवर डिज़ाइन का ताज़ा प्रिंट निकलवाया था। इस दौरान वह हरिश्चन्द्र दत्त बड़थ्वाल, कांग्रेस पार्टी, रमा जी, हरीश अग्रवाल और हेरम्ब त्रिपाठी को ले कर चुटकियाँ लेता रहा, जिससे नन्दू जी को भले ही अस्वस्ति का बोध होता रहा, लेकिन कम्प्यूटर-कक्ष में बैठे ऑपरेटरों का काफ़ी मनोरंजन हुआ था। 
यह सब करते-कराते साढ़े पाँच बज गये थे। प्रकाशन संस्थान में छै बजे छुट्टी हो जाती थी और जब हरीश अग्रवाल शहर में न होता तो चपरासी साढ़े पाँच-पौने छै बजे ही चल देते थे, इसलिए नन्दू जी के लाख मनुहार करने पर भी कोई चपरासी मालवीय नगर जाने को तैयार न हुआ था। हार कर नन्दू जी को स्कूटर पर बारह-तेरह किलोमीटर का फ़ासला तय करके मालवीय नगर जाना पड़ा था। 
उस दिन वॉशिंग मशीन लेना तो दूर रहा, उन्हें लक्ष्मी नगर लौटते-लौटते ही साढ़े आठ बज गये थे क्योंकि जमुना के पुल पर शाम को लौटने वालों की भीड़ के कारण जाम लगा हुआ था।


नौ

बुधवार को कई बार रमा जी के फ़्लैट पर फ़ोन मिलाने के बाद, लगभग बारह बजे एक महिला ने फ़ोन उठाया था और सूचना दी थी - ‘मैडम, बाई कार, लखनऊ से दिल्ली के लिए मूव कर चुकी हैं और शाम तक पहुँचने वाली हैं।’
लेकिन उस दिन उस मार्केट की साप्ताहिक बन्दी रहती थी जिसमें उनके परिचित दुकानदार का शो रूम था। सो, समय होते हुए भी नन्दू जी वॉशिंग मशीन नहीं ले पाये थे।
अगले दिन नन्दू जी पक्का इरादा करके दफ़्तर पहुँचे थे कि जैसे भी हो, वे उस दिन वॉशिंग मशीन ज़रूर ख़रीदेंगे। कारण यह भी था कि वॉशिंग मशीन के आसरे में बिन्दु ने तीन-चार दिन से कपड़े नहीं धोये थे और नन्दू जी एक बार ना करके दोबारा पुराने धोबी की सेवाएँ लेने के इच्छुक नहीं थे। 
दफ़्तर पहुँचते ही उन्होंने रमा जी के घर फ़ोन किया था। फ़ोन रमा जी ने ही उठाया था और नन्दू जी से कहा था कि रास्ते में कार ख़राब हो जाने की वजह से वे देर रात को दिल्ली पहुँची थीं और उस समय तत्काल अकबर रोड जा रही थीं जहाँ कांग्रेस पार्टी का दफ़्तर था।
‘मुझे एक ज़रूरी बैठक में भाग लेना है,’ उन्होंने कहा था, ‘वहीं से मैं आपके ऑफ़िस आऊँगी। मैंने पूज्य पिता जी के तीन चित्र छाँटे हैं। इन्हें मैं अपने आदमी के हाथ, आवरण के सादे प्रिंट के साथ आपको भिजवा रही हूँ। नाम की ग़लती तो ठीक हो गयी है। आप इन तीनों चित्रों को ख़ाली जगह में सेट करवा के कम्प्यूटर से तीन अलग-अलग प्रिंट निकलवा लीजिए। मैं वहीं आपके दफ़्तर में बैठ कर इनमें से एक फ़ाइनल कर दूँगी। अरे हाँ,’ उन्होंने आगे जोड़ा था, ‘एक बात और। कवर पर तस्वीर तो ब्लैक ऐण्ड वाइट ही जायेगी, क्योंकि फ़ोटो मैंने वैसे ही चुने हैं, मगर हर कवर का प्रिंट आप अलग-अलग रंग में निकलवाइएगा। चुनाव में आसानी रहेगी।’
लगभग एक ही साँस में यह सब कह कर बिना दूसरी तरफ़ से हाँ-ना सुने, श्रीमती रमा बड़थ्वाल पन्त ने फ़ोन रख दिया था। नन्दू जी के पास रमा जी के आदमी का इन्तज़ार करने के सिवा कोई चारा नहीं बचा था। बारह बजे के आस-पास जब हरीश अग्रवाल हवाई अड्डे से सीधा प्रकाशन संस्थान के कार्यालय पहुँचा था तो नन्दू जी ने उसे तब तक की घटनाओं के बारे में सिलसिलेवार ढंग से बताया था।
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हरीश अग्रवाल बहुत अच्छे मूड में था। उसने भोपाल में किताबों की सरकारी ख़रीद का एक अच्छा-ख़ासा ऑर्डर हासिल किया था और उसी सुबह फ़ाइल पर अधिकारी के हस्ताक्षर करवाने के बाद वहाँ से रवाना हुआ था। ख़ुशी के इसी आलम में उसने नन्दू जी को मुस्तैद रहने की अहमियत पर एक संक्षिप्त-सा प्रवचन दिया था और तब तक डटे रहने का आग्रह किया था, जब तक वे रमा जी से कवर डिज़ाइन मंज़ूर नहीं करा लेते। 
यह हिदायत दे कर हरीश अग्रवाल खाना खाने अपने घर चला गया था, जो पास ही में अजमेरी गेट के पीछे बाज़ार सीताराम में व्यवसायियों के पुराने मुहल्ले में था और जहाँ से निकल कर वह पटपड़गंज के एक बड़े फ़्लैट में जाने का इरादा बाँध रहा था। जाते-जाते वह रागिनी शर्मा से कह गया था कि जैसे ही रमा जी आयें, वह उसे घर पर फ़ोन कर दे, वह फ़ौरन आ जायेगा।
नन्दू जी तीन बजे तक इन्तज़ार करते रहे, लेकिन न तो रमा जी की कोई सुन-गुन मिली, न उनके भेजे आदमी की। इसी चक्कर में नन्दू जी खाना भी नहीं खा पाये। आख़िरकार, तीन बजे वे अपना टिफ़िन उठा कर पास के एक ढाबे में चले गये, जहाँ वे रोज़ घर से लाया खाना गरम करवा के खाते थे।  सीढि़याँ  उतरने से पहले वे भी रागिनी को ताक़ीद करना नहीं भूले कि अगर रमा जी उनके लौटने से पहले आ जायें तो चपरासी भेज कर उन्हें ढाबे से बुलवा लिया जाये।
जब वे आध-पौन घण्टे बाद खाना खा कर प्रकाशन संस्थान के दफ़्तर पहुँचे थे तो सूरत-शक्ल से छोटे शहर या क़स्बे का राजनीतिक कार्यकर्ता नज़र आने वाला एक साँवला-सा आदमी उनकी मेज़ के सामने कुर्सी पर एक पाँव चढ़ाये, इतमीनान से बैठा सुर्ती मल रहा था। उसने कुर्ते-पाजामे पर सदरी पहन रखी थी और पाँवों में किरमिच के भूरे जूते। नन्दू जी के पूछने पर उसने बताया था कि उसे रमा जी ने भेजा है।
‘रमा जी भी तो आने वाली थीं,’ नन्दू जी ने सवालिया अन्दाज़ में कहा था।
‘मैडम बहुत थक गयी रहीं, इसलिए मिटिन के बाद घर चली गयीं,’ उस व्यक्ति ने कहा था, ‘संझा को उन्हें पार्टी अध्यक्ष के यहाँ चाय पर जाना है। इसलिए हमसे बोली हैं कि आदरणीय बाबू जी वाली किताब का डिजैन ले जाओ, तीन गो फोटो के साथ और बनवा कर घरवा पर लेते आओ, रात को पसन्न कर लेंगे। मैडम कल हियाँ आने का कही हैं।’
नन्दू जी ने उस व्यक्ति से लिफ़ाफ़ा ले कर डिज़ाइन और चित्र देखे थे। तीनों चित्र उसी प्रकार के थे, जैसे घाघ कांग्रेसी नेता और बाद में उन्हीं के अनुकरण में अन्य दलों के नेता भी अख़बारों, अभिनन्दन ग्रन्थों और स्मारिकाओं में छपाते आये थे। नन्दू जी डिज़ाइन और चित्र ले कर कम्प्यूटर-कक्ष की ओर चलने वाले थे कि उस व्यक्ति ने उन्हें हाथ के इशारे से रोक लिया था।
‘क्यों बाबू साहेब, आपके कार्यालय में चाय की कौनो व्यवस्था नाहीं है क्या ? सुबह से बस में धक्का खाय रहे हैं। पार्टी आफ़िस से मालवी नगर, मालवी नगर से पार्टी आफ़िस। हुआँ से यहाँ। साथ में कुछ मठरी-ओठरी भी मिल जाती तो दम में दम आता।’ उसने फ़रमाइश की थी।
नन्दू जी ने चपरासी को बुला कर कहा था कि वह पास की चाय की दुकान से एक चाय और दो मठरी ला कर उस व्यक्ति को दे दे, पैसे एकाउण्टेण्ट से ले ले। उस व्यक्ति ने ठोंकी गयी सुर्ती को फ़ौरन एक काग़ज़ में पुडि़या बाँध कर अपनी सदरी की जेब में रख लिया और चाय की प्रतीक्षा में आराम से पसर गया था।
साढ़े पाँच बजे जब नन्दू जी उस व्यक्ति को विदा करके मुक्त हुए तो वे बुरी तरह चट चुके थे। जितनी देर में कम्प्यूटर पर डिज़ाइन बनाने वाले ऑपरेटर ने बड़थ्वाल जी वाली पुस्तक के आवरण चित्र के तीन प्रारूप तैयार किये थे, रमा जी द्वारा भेजा गया वह आदमी नन्दू जी को अपने बारे में बताता रहा - कि वह यानी रामसुजित केसरवानी, कुण्डा हरनामगंज में कांग्रेस कमेटी का ‘बिलाक सिकेटरी’ है, रमा जी के कई कार्यक्रम वहाँ आयोजित करा चुका है; माननीय बाबू जी की उस पर ‘बिसेस किरपा’ रही; वे ही उसे राजनीति में लाये थे; उसने भी उनका साथ नहीं छोड़ा; जब वे ‘पावर’ में नहीं रहे, तब भी नहीं; माननीय बाबू जी ने उसे सरकारी गल्ले की दुकान दिलवा दी थी; उसी से घर-परिवार चलता है और वह समाज सेवा कर पाता है, आदि, आदि। 
नन्दू जी मन-ही-मन उस टुटपुँजिये कांग्रेसी कार्यकर्ता की लनतरानियों पर खीझते हुए बेमन से अपने सामने रखे प्रूफ़ पढ़ते रहे थे। वे चाहते थे कि उन्हें बड़थ्वाल जी, उनकी सुयोग्य बेटी रमा और इस रमा-सेवक के जंजाल से छुट्टी मिले तो वे फ़ौरन जा कर वॉशिंग मशीन लदवा कर घर पहुँचें। अगले दिन पार्टी की रैली थी, जिसमें न जा कर वे अपने पुराने साथियों के बीच नक्कू नहीं बनना चाहते थे। और उसके बाद शनिवार था। 
पार्टी साहित्य में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के बारे में प्रकाशित अनगिनत लेख पढ़ने के बावजूद नन्दू जी बचपन ही मन में बिठायी गयी कुछ धारणाओं और विश्वासों से मुक्त नहीं हो पाये थे। वे अब भी शनिवार को बाल कटवाने या शेव करने से बचते थे। और मशीन या लोहे का कोई सामान ख़रीदना अशुभ मानते थे।
लेकिन नन्दू जी न तो उस दिन वॉशिंग मशीन ख़रीद पाये, न अगले दिन रैली में शिरकत कर सके। अभी रमा जी का आदमी रवाना हुआ ही था और नन्दू जी अपना बैग, हेल्मेट और टिफ़िन का डिब्बा सहेज ही रहे थे कि हरीश अग्रवाल दफ़्तर पहुँचा था। उसने उन्हें अपने कैबिन में बुलवा भेजा था और देर तक उनके साथ बैठा भोपाल वाले ऑर्डर की किताबें छपवाने के सिलसिले में हिदायतें देता रहा था। आख़िरकार, सात बजे के क़रीब, नन्दू जी चलने को हुए तो हरीश अग्रवाल ने उनसे कहा था कि अगले दिन वे दफ़्तर न आ कर घर से नॉएडा, चले जायें, जहाँ वह प्रेस था जिसमें इस प्रकाशन संस्थान की किताबें छपती थीं।
‘पुस्तकों के नाम मैंने आपको लिखा ही दिये हैं,’ उसने कहा था, ‘बड़ी किताबें पाँच-पाँच सौ और बाल-साहित्य तीन-तीन हज़ार छपेगा। आप सारी पुस्तकों के निगेटिव निकलवा कर सावधानी से लाइन-अप कर दीजिएगा। कवर की छपाई साथ-साथ होगी। रमा जी आयेंगी तो मैं उनसे समझ लूँगा।’ फिर उसने आगे जोड़ा था कि समय हो तो दफ़्तर आयें, वरना उधर ही से घर चले जायें। बस, प्रेस से चलते समय उसे फ़ोन कर दें।
नन्दू जी जब सीढि़याँ उतर कर बाहर गली में आये तो उनका दिमाग़ भन्नाया हुआ था। ऐसे वक़्तों पर उन्हें बड़ी शिद्दत से अपने अख़बारी दिनों की याद आती थी, जब सारी भाग-दौड़ के बाद भी वे अपने समय को किसी हद तक मन-मर्ज़ी ख़र्च कर सकते थे। 
उन्हें याद आया कि शादी-शुदा ज़िन्दगी के शुरुआती दिनों में एक बार जब बिन्दु ने शाहरुख़ ख़ान की नयी फ़िल्म देखने के लिए हठ बाँध लिया था तो उन्होंने पी.सी.ओ. से फ़ोन करके अख़बार के उप-सम्पादक से बहाना बना दिया था। इसी तरह जिस दिन उन्हें फ़्रिज ख़रीदना था, वे उप-सम्पादक से कह कर ड्यूटी के बीच ही में चले गये थे और साथ में फ़रहान अख़्तर को भी ले गये थे, क्योंकि दुकानदार उसी का परिचित था। 
अब, हालाँकि उन्हें अख़बार की नौकरी की तुलना में दुगना वेतन मिलता था और ज़िन्दगी में भी वैसा उतार-चढ़ाव नहीं रहा था, कई बार उन्हें तीखी घुटन का एहसास होता। मगर नन्दू जी ने पार्टी में और कुछ भले ही सीखा था या नहीं, प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति में भी उम्मीद का दामन थामे रखना ज़रूर सीख लिया था। वे भीषण आशावादी थे और इसीलिए आई.टी.ओ. का पुल पार करते-करते फिर से सहज हो गये थे। 
उन्होंने तय किया था कि अगले दिन वे जल्दी तैयार हो जायेंगे और पहले वॉशिंग मशीन ख़रीद कर घर पहुँचा देंगे, उसके बाद नॉएडा जायेंगे। सम्भव हुआ तो दो घण्टे में प्रेस के काम से मुक्त हो कर कहीं बीच ही से रैली में चेहरा भी दिखा आयेंगे। उन्हें लम्बे तजरुबे से मालूम था कि अगर रैली का समय बारह बजे का दिया गया हो तो वह दो-ढाई से पहले नहीं शुरू होती। 
इस निश्चय पर पहुँच कर उन्होंने रास्ते में एक पी¤ सी¤  ओ पर रुक कर अपने परिचित दुकानदार को फ़ोन किया था कि वे अगले दिन ठीक साढ़े दस बजे उसके शो-रूम पर पहुँचेंगे, वह वॉशिंग मशीन के काग़ज़ तैयार कर रखे।