Friday, July 1, 2011

देशान्तर



नीलाभ के लम्बे संस्मरण की
पचासवीं और अन्तिम क़िस्त

पिछले 50 बरसों की साहित्यिक हलचलों का एक जायज़ा
और एक लम्बी मैत्री की दास्तान

ज्ञानरंजन के बहाने - ५०



मित्रता की सदानीरा - २९


फिर इसके साल भर बाद मैं परियोजना की रिपोर्ट को अन्तिम रूप देने के लिए दिल्ली टिका हुआ था, जब अचानक श्रीराम सेंटर की कैंटीन में ज्ञान से मुलाकात हो गयी।


उन दिनों मैं श्रीराम भारतीय कला केन्द्र के होस्टल में शिक्षकों के एक क्वार्टर में रहता था। यह केन्द्र मण्डी हाउस के इलाके में था और शाम को अक्सर मैं टहलता हुआ श्रीराम सेंटर में किताबों की दुकान तक नयी पत्र-पत्रिकाएं देखने चला जाता था। वहीं एक दिन जब मैं कैंटीन के बाहर उस छोटे-से घिरे हुए इलाके में दाख़िल हुआ जहां मेज़-कुर्सियां खुले में रखी रहती थीं तो अचानक मुझे ज्ञान वहां बैठा दिखायी दिया। मैं उसके पास बैठ गया। वह कुछ रोज के लिए दिल्ली आया हुआ था, करोल बाग में कहीं ठहरा था और लीलाधर मंडलोई और अरविन्द जैन का इन्तज़ार कर रहा था, जिनके साथ उसे विष्णु नागर के यहाँ जाना था। विष्णु नागर का नया संग्रह आया था और वहाँ उसके जश्न में कुछ पीने-पिलाने का कार्यक्रम था। और भी लोग आ रहे थे। ज्ञान ने बड़ी फक्कड़ई से मुझे भी चलने के लिए कहा। मैंने जब कहा कि मुझे तो न्यौता नहीं गया है, तब ज्ञान ने इस आपत्ति को पुराने दिनों की तरह हवा में उड़ा दिया और मुझ पर जोर दिया कि मैं भी चलूं। तभी लीलाधर मंडलोई अरविन्द जैन के साथ आ गया और उन्होंने भी मुझ पर ज़ोर देते हुए यह तय किया कि ज्ञान और मैं साथ-साथ जायें, वे पीछे से आते हैं। जाने उनके पास कार थी या दुपहिया गाड़ी।

बहरहाल, ज्ञान और मैं वहीं मण्डी हाउस से बस पर सवार हुए और नागर के यहाँ जा पहुंचे। पता चला कि वहाँ मजे की तादाद में लोग आने वाले हैं। रब्बी, मंगलेश, ज्ञान, विष्णु नागर, मंडलोई और अरविन्द जैन तो थे ही, पंकज सिंह और सविता भी आ रहे थे। सविता का पहला संग्रह भी कुछ ही दिन पहले आया था और यह एक तरीक़े से डबल जश्न हो गया था। यह बात पहले ही साफ कर दी गयी थी कि खाना नहीं होगा। हां, दारू के साथ चिखना भांति-भांति का था। तभी मुझे खयाल आया कि ठीक सामने के फ्लैट में विष्णु खरे रहता है, उसे भी बुला लेते हैं। मुझे यह नहीं पता था कि दोनों विष्णुओं के बीच सम्बन्ध ऐसे हैं कि वे अपने-अपने फ्लैट का दरवाजा यह सावधानी बरतते हुए खोलते हैं कि भूल से भी आमना-सामना न हो जाये। इसलिए मुझे विष्णु और एकाध अन्य मित्र के चेहरे पर विष्णु खरे के नाम से घिर आये बादल पर हैरत हुई थी।

वैसे विष्णु खरे ‘बुल इन ए चाइना टी शौप’ किस्म का बन्दा है, कब अपने नथुनों से धुंआ उगलता हुआ वह आपको दौड़ा लेगा और अगल-बग़ल के पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं पर भी टूट पड़ेगा, कहा नहीं जा सकता। दूसरे को चुभती हुई बात कहने में उसने पी.एच.डी. कर रखी है और डी.लिट. इस पर कि कैसे हर चीज को गरियाया जा सके। उससे मिलने के पौने दो मिनट के भीतर अगर आपके मन में उसके प्रति चिढ़, खीझ, क्रोध और नफरत का भाव पैदा नहीं होता तो इसे वह अपनी नाकामी और पराजय मानता है और उसे हैरत होती है। यही वजह है कि ऐसे मौके बहुत कम आये है जब उसे हैरतज़दा होने के इत्तफाक से दो-चार होना पड़ा है। मुझे लेकिन विष्णु की अदाएं शुरू से पसन्द हैं, कारण यह कि मैं जानता हूं वह बेहद पढ़ा-लिखा, बाहुनर, पूर्वाग्रहग्रस्त आदमी है, अच्छा कवि है और ऊपर से ‘बुली’ है। अगर आप पलट कर उसी के सिक्कों में उसका भुगतान कर दें तो वह आपसे दोस्ती कर लेगा और सन्तुष्ट बिल्ले की तरह खुर्र-खुर्र करने लगेगा। कुछ साल पहले उसने अश्क निधि के कार्यक्रम में "मैं और मेरा समय" व्याख्यान-माला में अपना व्याख्यान देते हुए नामवरजी, राजेन्द्र यादव, अशोक वाजपेयी, नारंग साहब और विद्यानिवास मिश्र के बारे में अपने लेखे भड़काऊ और अभद्रतापूर्ण टिप्पणियां करके समूचे त्रिवेणी सभागार को हिला कर रख दिया था और बहुत-से लोगों का कोप मुझे बहैसियत सचिव और प्रबन्ध न्यासी झेलना पड़ा था।

अभद्रता करने में अगर विष्णु खरे का कोई सानी है तो इसका सेहरा हिन्दी के दो साहित्य अकादमी प्राप्त कवियों के सिर बांधा जा सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि विष्णु बिना पिये भी अभद्रता करता है, पीने से अभद्रता करने की उसकी फितरत पर कोई असर नहीं पड़ता, जबकि वे दोनों साहित्य अकादमी प्राप्त सरस्वती-पुत्र दारू के हर पैग के साथ बढ़ती हुई अभद्रता के नायाब नमूने पेश करते चले जाते हैं और अन्त झगड़े और रुदन में होता है।

बहरहाल, वहाँ उपस्थित सब लोगों के लिहाज में विष्णु नागर ने विष्णु खरे को बुलाने के लिए रज़ामन्दी दे दी। मैंने फोन लगाया तो विष्णु खरे ने बताया कि वह उसी रोज छिंदवाड़ा से आया है, तो भी थोड़ी देर में आता है। थोड़ी देर में खरे आ गया और पीने-पिलाने के दौर ने सहज रफ्तार पकड़ ली। चूंकि यह पहले ही साफ कर दिया गया था कि खाने-वाने का चक्कर नहीं है, इसलिए रब्बी और मंगलेश जैसे रिन्द लोगों को छोड़ कर और उन्हें छोड़ कर जो पास ही में रहते थे, बाकी लोग धीरे-धीरे चले गये। विष्णु नागर अपने ही घर में बैठा हुआ था, सो उसे कोई चिन्ता थी नहीं। मंडलोई, अरविन्द जैन, पंकज और सविता जा चुके थे। अब पीने का असली दौर शुरू हुआ।

चूंकि शाम की बाजी विष्णु खरे के हाथ में थी, इसलिए उसने ज्ञान को बुरा-भला कहना शुरू किया। उसका कुल आशय यह था कि ज्ञान को सम्पादन की समझ नहीं है। काफी देर तक तो मैं चुप हो कर सुनता रहा, फिर मैंने विष्णु से कहा कि ज्ञान ने जैसी शानदार कहानियां लिखी हैं अगर वे न होतीं तो तुम्हारे मध्य प्रदेश के वे महारथी विनोद कुमार शुक्ल, नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे और दीवार में एक खिड़की रहती थी, जैसे उपन्यास न लिख पाते, न अपनी विशिष्ट शैली विकसित कर पाते। रही बात सम्पादन की तो तुम तो तीन अंकों के बाद "वयम" नहीं निकाल पाये थे, जबकि तुम ने प्रवेशांक पर बड़े तमतराक से यह घोषणा कर रखी थी कि अगर "वयम" बन्द हुआ तो उसके पीछे आर्थिक कारण नहीं होंगे; ज्ञान ने तो तीस बरस से "पहल" को हिन्दी की एक महत्वपूर्ण पत्रिका का दर्जा दिलाया हुआ है। इसके बाद विष्णु खरे ने ज्ञान का पीछा छोड़ दिया और वातावरण सामान्य हो गया।

गपशप में किसी को समय का ध्यान नहीं रहा और जब ज्ञान और मैं, रब्बी और मंगलेश के साथ नीचे उतरे तो हमारे सामने दो सवाल थे। खाने का सवाल पहला नहीं था, क्योंकि विष्णु नागर ने इतना चिखना चिखा दिया था कि खाना न भी मिलता तो कोई मुजायका न था। असली सवाल वापस जाने का था। मेरा खयाल था कि ज्ञान करोलबाग लौटेगा तो मैं उसी के साथ चला चलूंगा और रास्ते में मण्डी हाउस पर उतर जाऊंगा। पर ज्ञान ने इसकी कोई चर्चा नहीं की। विष्णु नागर के फ्लैट से उतर कर सब एक दिशा में बढ़ लिये। मैंने एकाध बार खाने और लौटने की बात उठायी भी, पर किसी ने कान न दिया। न किसी ने यह कहा कि छोड़ो जाने की बात, रात हमारे यहाँ रुक जाओ पुराने दिनों की तरह, और सुबह चले जाना।

वे सब ज्ञान को लिये-लिये मयूर विहार में अन्दर की तरफ बढ़ने लगे। मेरे दिमाग में भांय-भांय हो रही थी, बिन बुलाये मुझे किसी के घर जाना और रात काटना मंजूर न था, रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे, मयूर विहार में सन्नाटा था और बढ़ता ही जा रहा था और मेरे मन में यह आशंका गहराती जा रही थी कि और रात हो गयी तो क्या होगा। यह सब सोच कर मैं एक जगह थिर खड़ा हो गया और मैंने कहा कि मैं तो जाऊंगा। तब रब्बी और मंगलेश ने कहा कि कैसे जाओगे। उनके लहजे में हमदर्दी नहीं थी, बल्कि कुछ ऐसा भाव था कि बहुत बनता है यह नीलाभ, देखें यह क्या करता है। तब मैंने कहा कि अगर मुझे जाना होगा तो किसी भी कीमत पर जाऊंगा। यह कह कर मैं नवभारत टाइम्स अपार्टमेण्ट के सामने वाली छोटी सड़क पार करके उस मुख्य मार्ग की तरफ बढ़ा, जो मयूर विहार से नोएडा को और दूसरी तरफ़ जाता था। हिन्दी के ख्यातिलब्ध कवियों में से किसी ने कुछ नहीं कहा। मानो हम कुछ देर पहले मित्रों की तरह साथ-साथ पी-पिला न रहे थे, अजनबी थे।

अभी मैं कुछ ही कदम बढ़ा हूंगा कि एक आटो रिक्शा आता दिखायी दिया। मैंने उससे पूछा कि क्या वह मण्डी हाउस चलेगा। वह राजी हो गया और मैं उस पर सवार हो कर मण्डी हाउस चला गया।

रास्ते भर ही नहीं, बल्कि आगे भी कई-कई दिनों तक यह घटना मेरे मन में उमड़ती-घुमड़ती रही। कारण यह कि हमारी पीढ़ी के लेखकों-कवियों ने बहुत फक्कड़ाना दिन गुज़ारे थे। अमूमन दिल्ली आने पर हम किसी दोस्त के यहां टिक जाते; छोटा-सा घर होता, उसी में ठंस-ठंसा कर रहते; ख़ूब बहसें होतीं; ज़ाहिर है कि उन दिनों सभी के साधन सीमित थे, लेकिन मिल-बांट कर काम चला लिया जाता। मज़े की बात थी कि बाज़ारवाद और भूमण्डलीकरण का सबसे ज़ियादा सियापा करने वाले सबसे ज़ियादा उस के शिकार हुए। जैसे-जैसे ये सारे लोग अपने-अपने कैरियर की सीढ़ीयां चढ़ते चले गये, दूरियां भी बढ़ती चली गयीं। मकान बड़े हुए, किराये की बजाय अपने हुए, घर कुशादा हुए, मगर उसी अनुपात में दिल छोटे होते चले गये।

लोग इसे महानगर फ़िनौमेना कहते हैं, लेकिन मुफ़स्सिल की तुलना में दिल्ली महानगर तो 60,70 और 80 के दशकों में भी था; तब दिल्ली के साहित्य जगत के समाजशास्त्र का यह बदलाव कैसे-समझा-समझाया जाये? मेरे ख़याल में इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि लेखकों ने दावा भले ही कर रखा हो कि वे आम लोगों के साथ हैं, मगर उनके अन्दर मध्यवर्गीय प्रवृत्तियों से लड़ने का जो संकल्प साठ के दशक में था वह धीरे-धीरे क्षरित हो गया। उस मदमत्त कएर देने वाले समय में लगता था कि क्रान्ति अगले मोड़ पर या कहा जाये कि "आउटर" पर खड़ी है, बस उसे थाम कर ले आने की देर है।

आपातकाल ने पहला झटका दिया। उसके बाद तो रफ़्तार तेज़-से-तेज़तर होती चली गयी। सोवियत संघ के पतन और डेंग ज़िआओ पेंग के पूंजीवादी रुझान ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। थके-हारे संकल्प ने सोचा क्यों न "उस तरफ़" के फ़ायदे उठा कर देखे जायें। लीजिये साहब क्रान्तिकारी कवियों को सत्ता पुरस्कृत करने लगी और वे भी बड़ी मिस्कीनी और खुलूस से इनाम-अकराम स्वीकार करने लगे। ैसके बाद कवियों-कहानीकारों के राजपत्रित आतंकवादी पुलिस अफ़सरों और साम्प्रदायिक हत्यारों की संगत करने में बस एक क़दम की दूरी थी , सो इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के ख़त्म होते-न होते वह भी पूर दी गयी।

बहरहाल, यह ज्ञान से मेरी आखिरी मुलाकात थी और यह भी बहुत दिनों तक दिमाग में एक कांटे की तरह बिंधी रही। तब से नौ बरस हो गये हैं, मेरी जि़न्दगी में बेशुमार तब्दीलियां हुईं, लेकिन ज्ञान से भेंट-मुलाकात नहीं हुई। वही दिल्ली है, वही इलाहाबाद, ज्ञान जरूर आता होगा, पर उसने कभी मिलने की इच्छा जाहिर नहीं की। मैंने अपने मन में वह मिसरा दुहरा लिया -- "उसने भी वाह-वाह न की हम भी चुप रहे" -- और अपनी राह चलता रहा।

फिर 2006 में ज्ञान का एक पत्र आया कि मैं पहल सम्मान के अवसर पर बनारस आऊं। लेकिन मैं पुरस्कारों-सम्मानों से दूर-ही-दूर रहा हूं, इसलिए ज्ञान से मिलने की तमन्ना होने पर मैं नहीं गया। लेकिन इस पत्र ने कुछ ‘ट्रिगर’ किया होगा, क्योंकि मैं 2006 के नवम्बर-दिसम्बर में लगातार ज्ञान के साथ बिताये दिनों को याद करता रहा। पहल सम्मान का कार्यक्रम फरवरी 2007 में होना था, बहुत-से लोग बनारस जा रहे थे, हवा में हलचल थी, ज्ञान की याद न आये यह स्वाभाविक नहीं था।

मैं बनारस तो नहीं गया, लेकिन ज्ञान के साथ बिताये दिनों को अंकित करने की कोशिश में मैंने एक संस्मरण-नुमा चीज़ लिखनी शुरू की। उन्हीं दिनों विनोद तिवारी जो मेरे मित्र सत्यप्रकाश के दामाद थे, महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्व विद्यालय, वर्धा से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय आ गये थे, जहां मेरे पुराने मित्र कुमार पंकज ने हिन्दी विभागाध्यक्ष बनते ही कुछ प्रतिभाशाली युवकों को विभाग में शामिल कर लिया था और वहाँ अचानक गहमा-गहमी बढ़ गयी थी। विनोद तिवारी ने फैसला किया कि वे फिर से ‘पक्षधर’ का प्रकाशन करेंगे, जिसका एक अंक आपातकाल के दिनों में दूधनाथ ने निकाला था। उन्हें जब ज्ञानरंजन वाले संस्मरण का पता चला तो वे इसका पहला हिस्सा बड़ी ललक के साथ ले गये और "पक्षधर" में उसे छापते हुए उन्होंने घोषणा की कि यह संस्मरण "पक्षधर" के अगले अंकों में जारी रहेगा। उनका उत्साह देख कर मैं भी इसे बढ़ाने लगा। लेकिन अगली किस्त जब विनोद तिवारी के पास गयी तो उनके हाथ-पांव फूल गये। हवा में सुनगुन थी कि नयी नियुक्तियों को स्थायी करने के लिए नामवर जी आनेवाले हैं और मेरे संस्मरण में नामवर जी पर कुछ तीखी टिप्पणियां थीं। विनोद तिवारी ने जरूर दूधनाथ से भी पूछा होगा और वह ठहरा जमाने का रणछोड़दास श्यामलदास चांचड़, उसने भी मना कर दिया होगा। तब एक गोल-मोल छायवादी-सा पत्र लिख कर विनोद तिवारी ने वह संस्मरण वापस कर दिया था। यह तब जब मैं उसे पहले ही सब कुछ बता चुका था कि मैं क्या लिखने जा रहा हूं। लेकिन वीर बालकों का वीर बालकवाद ऐसा ही होता है।

खैर, वह संस्मरण ‘वचन’ पत्रिका में छपा और काफी पढ़ा गया। इरादा था जल्दी ही उसे पूरा कर दूंगा मगर जि़न्दगी कुछ ऐसी बदली कि संगम तटवासी को उखड़ कर यमुना के तट पर बसे बुराड़ी गांव का बाशिन्दा बनना पड़ा। दो साल से ज़्यादा बीत गये। तब मैंने इसे पूरा करने की सोची, क्योंकि इसे पूरा किये बिना मुझे चैन न पड़ता।

इस बीच ज्ञान से यदा-कदा फोन पर बात होती रही, हालांकि बहुत कुछ अभी हमारे बीच सुलटना-सुलटाना बाकी है, जिसमें ‘पहल’ वाली उस पुरानी घटना के अलावा सुलक्षणा से मेरे सम्बन्ध विच्छेद की घटना भी शामिल है।

मैं वैसे तो शकुन-अपशकुन और दैवी शक्तियों का कायल नहीं, इसलिए इसे संयोग ही कहूंगा कि इस संस्मरण को लिखने के दौरान धीरे-धीरे ज्ञानरंजन से फ़ोने पर सम्पर्क फिर से होने लगा और बढ़ता ही चला गया। फिर हाल ही में उसका फ़ोने आया कि वह 7-8-9 मार्च को दिल्ली रहेगा और हम कुछ समय साथ-साथ बिता सकते हैं। यह भी हुआ और बहुत कुछ जो इकट्ठा हो गया था कफ़ी हद तक कम हो गया, गो अभी जम कर एक मुलाक़ात होनी बाक़ी है।

उम्मीद तो यही है कि हम कभी-न-कभी रू-ब-रू बैठेंगे और यह अधूरा काम भी पूरा कर लिया जायेगा।

(तमामशुद)

फ़रवरी-जुलाई 2011



Thursday, June 30, 2011

देशान्तर

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नीलाभ के लम्बे संस्मरण की उनचासवीं क़िस्त

पिछले 50 बरसों की साहित्यिक हलचलों का एक जायज़ा
और एक लम्बी मैत्री की दास्तान

ज्ञानरंजन के बहाने - ४९



मित्रता की सदानीरा - २८


खैर, अब जबकि मैंने पहल की छपाई वगैरा से खुद को अलग करने का फैसला कर लिया था तो रकम का देर से आना भी कोई मानी नहीं रखता था। जब मित्रता ही में बाल आ गया तो रकम की क्या हैसियत। उसके बाद ज्ञान ने फिर शायद शिव कुमार सहाय से कोई बन्दोबस्त कर लिया था, क्योंकि पहल 30 और 31 के अंक सहाय जी के परिचित प्रेस से छपे थे और पहल 31 में तो प्रकाशन सहयोग के तौर पर बालकृष्ण पाण्डे, शिवकुमार सहाय और अशोक त्रिपाठी के नाम गये थे।
मन उन दिनों इतना खट्टा हो गया था कि अगले दो साल तक ज्ञान से पत्र-व्यवहार बिलकुल बन्द रहा। अलबत्ता ज्ञान का दूसरा पत्र आने के बाद मैंने वास्तविक स्थिति जानने के लिए एक दिन अपने दफ्तर में अशोक भौमिक और विनोद कुमार शुक्ल को एक-दूसरे के सामने करा दिया था। गरमा-गरमी इतनी बढ़ गयी थी कि लगा हाथापाई न हो जाये। इससे मुझे एक बात पता चल गयी थी कि इयागो की भूमिका विनोद कुमार शुक्ल ही ने निभायी थी। अशोक बस इतने भर के गुनहगार थे कि जब वे विवेचना वाले कार्यक्रम में जबलपुर या जाने कहां गये थे और मैंने उनसे यह ताकीद की थी कि वे ज्ञान से दो टूक बात करके आयें तो वे महज लीपा-पोती करके चले आये थे, जो उनकी फ़ितरत थी और आज भी है।

चूंकि मन उचट गया था इसलिए मैंने उसे दूसरी तरफ लगाना शुरू किया। बहुत देर अवसाद में ऊभ-चूभ करते रहना मेरी फितरत में वैसे ही नहीं था। सितम्बर अन्त 1986 में जसम का पहला राज्य सम्मेलन इलाहाबाद में होने वाला था और उसकी तैयारी का काम शुरू हो चुका था। मैंने ज्ञान वाले प्रसंग को पीछे धकेल कर आगे की तरफ देखना शुरू किया।

इसके बाद लिखने को बहुत नहीं है। अगले दो वर्ष तक ज्ञान से सम्पर्क लगभग टूटा रहा। बीच-बीच में उसके पत्र आते, जिनमें कवियों द्वारा एक-दूसरे के संग्रहों पर लिखने और साथ में कवियों की दो-दो कविताओं को प्रकाशित करने की बातें होतीं। लेकिन यही वह दौर था जब हिन्दी प्रयोजनमूलक युग में प्रवेश कर रही थी, कविगण आत्म-विभोर, यश लोलुप और उच्चाकांक्षी हो रहे थे। उस विद्वेष के बीज बोये जा रहे थे, जो आज हिन्दी के साहित्यिक क्षेत्र में जगह-जगह व्याप्त है। ज्ञान की इन योजनाओं का कुछ बना हो, इसका मुझे कोई इल्म नहीं है। मुझे इतना मालूम है कि ‘पहल’ के समूचे दौर में जो 1973 से लेकर 2009-10 तक फैला हुआ है, मेरे किसी संग्रह की चर्चा नहीं हुई। कविताएं भी मेरी शायद कविता विशेषांकों ही में छपीं।

फिर पहले कवितांक के दस वर्ष बाद ‘पहल’ के दूसरे कवितांक की योजना बनी। अब तक ‘पहल’ के चार संयुक्त प्रकाशन सहयोगी हो चुके थे। बालकृष्ण उपाध्याय, सहायजी, अशोक त्रिपाठी के साथ राधारमण अग्रवाल का नाम भी जुड़ गया था। जब ज्ञान का पत्र कविताओं के लिए आया तो पहले मेरा मन ही नहीं हुआ कविता भेजने के लिए। लेकिन फिर यह सोच कर कि व्यर्थ के विवाद से क्या फायदा, मैंने कविताएं भेज दी थीं। दिलचस्प बात यह है कि मुझसे छपाई और प्रूफ की अशुद्धियों की शिकायत करने वाले ज्ञानरंजन की नजर इस कवितांक की छपाई और प्रूफ की भयंकर अशुद्धियों पर नहीं पड़ी थी। खैर, इसके बाद पत्र-व्यवहार का क्रम बहुत विरल हो गया था। सन् 1989 से 2006 के बीच ज्ञान के सिर्फ पांच-छह पत्र हैं और शायद इतनी ही मुलाकातें। याद रहने लायक सिर्फ तीन हैं। पहली तो जब अचानक 1996 के पुस्तक मेले में ज्ञान से भेंट हो गयी। यह अकेले-अकेले वाली मुलाकात नहीं थी। बहुत-से लोग थे। मुझे हरजीत की याद है और घास के मैदान में सबके साथ गोला बना कर बैठना भी। उस मुलाकात में भी कुछ पर्देदारी रही होगी, क्योंकि उसके बाद ज्ञान का एक बहुत अच्छा पत्र आया था, जिसमें पहले का-सा खुलूस था।

दूसरी मुलाकात गालिबन 2001 में हुई थी जब मैं अपने सहयोगी इरफान के साथ महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की एक परियोजना के सिलसिले में लेखकों के इण्टरव्यू रिकार्ड करता हुआ उत्तर भारत के अन्य शहरों के साथ-साथ जबलपुर भी गया था। काम-काजी दौरा था और मुलाकात मुख्तसर थी।

लेकिन तीसरी मुलाकात दिलचस्प ही नहीं थी, बल्कि उसमें हास्य से ले कर विद्रूप तक नाना प्रकार के रस और भाव थे.
(अगली किस्त में समाप्य)

Wednesday, June 29, 2011

देशान्तर



नीलाभ के लम्बे संस्मरण की अड़तालीसवीं क़िस्त

पिछले 50 बरसों की साहित्यिक हलचलों का एक जायज़ा
और एक लम्बी मैत्री की दास्तान

ज्ञानरंजन के बहाने - ४८


मित्रता की सदानीरा - २७

बात यह थी कि उसी दोरान विनोद कुमार शुक्ल नाम के एक रेलवे कर्मचारी प्रकाशन की दुनिया में दाखिल हुए। वे विभूति नारायण राय के मुसाहिबों में से थे और उन्होंने अनामिका प्रकाशन के नाम से विभूति नारायण राय की कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित की थीं। विभूति के जरिये पुलिस के महकमे में उनकी अच्छी रसाई हो गयी थी। यों समझिये कि वे एक छोटे-मोटे ठेकेदार थे, जो साइड-बिजनेस के तौर पर प्रकाशन करते-करते बड़े प्रकाशक बनना चाहते थे। उन दिनों के विभूति नारायण राय के यहाँ लगभग निजी सचिव की तरह आते-जाते और शायद ‘वर्तमान साहित्य’ का भी काम-धाम देखते थे। उन्हें ज्ञान के साथ मेरे बन्दोबस्त का इल्म तो था नहीं, वे गालिबन यही सोचते थे कि मुझे ‘पहल’ की छपाई से कुछ फायदा होता है और उनकी इच्छा थी कि उन्हें ‘पहल’ और ‘पहल पुस्तिका’ की छपाई आदि का काम मिल जाये जिसके सहारे वे अपने सम्पर्क-सूत्रों का विस्तार कर सकें और घेलुए में कुछ कमाई कर लें। दिलचस्प बात यह थी कि ‘किशोर प्रिंटर्स’ उनके साले या बहनोई का ही था, वे भी अगर छपाई का काम पा जाते तो ‘किशोर प्रिंटर्स’ ही से छपाते। अलबत्ता, बाकी खर्चे-पानी से वे जरूर कुछ बचा लेते। उनकी और ‘किशोर प्रिंटर्स’ वालों की बातों से मुझे उनके मंसूबों की सुन-गुन थी, लेकिन मैं मन की बात जाहिर किये बिना अन्दर-ही-अन्दर मजा लेता था।

इसमें कोई शक नहीं है कि ‘पहल’ के कहानी विशेषांक के छपने में विलम्ब हुआ था। इसका एक कारण तो यह था कि उसकी पाण्डुलिपि हमें टुकड़ों-टुकड़ों में मिलती रही थी, जिसकी वजह से क्रम लगातार बदलता रहता था। आज तो लेजर कम्पोजिंग में कम्पोज की हुई सामग्री बेहद आसानी से आगे-पीछे की जा सकती है, पंक्तियां काटी या जोड़ी जा सकती हैं, मगर हैण्ड कम्पोजिंग के युग में ऐसा सम्भव न था। फिर ‘किशोर प्रिंटर्स’ ‘पहल’ के पुराने मुद्रक "स्टार प्रिंटर्स" के अमीन साहब जितने साधन-सम्पन्न और अनुभवी नहीं थे। चूंकि छपाई के लिए दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता था, इसलिए भी विलम्ब हुआ था। तीसरा कारण विनोद कुमार शुक्ल की खुड़-पेंचिया फितरत का कोई कारनामा हो सकता था, क्योंकि वे तुले बैठे थे कि मुझे अपदस्थ करके ‘पहल’ का काम अपने हाथ में ले लें। ज्ञान से उन्होंने सम्पर्क साध लिया था और ज्ञान ने उन्हें धीरे-धीरे छोटे-मोटे काम सौंपने शुरू कर दिये थे, मसलन, इलाहाबाद के लेखकों को ‘पहल’ की प्रतियां पहुंचाना, वगैरा, वगैरा।

इस सबका नतीजा यह हुआ कि ‘पहल’ का कहानी विशेषांक देर से ही नहीं छपा, बल्कि इसी अंक के साथ जारी पुस्तिका जितना सुन्दर छपा भी नहीं लगा।

कहानी विशेषांक में हुई देर की भरपाई करने के लिए यह तय किया गया कि पहल-29 जल्दी से छाप दी जाय। लेकिन तय करना एक बात है, उसे अंजाम देना दूसरी। थोड़ी देर इस बार भी हुई, लेकिन आखिरकार मार्च 86 के तीसरे हफ्ते तक पहल-29 छाप कर जबलपुर भेज दी गयी और 25 मार्च को ज्ञान का पत्र आया कि अंक मिल गया है, छपाई बहुत अच्छी है, लेकिन बकाया पैसों का इंतजाम वह 15 अप्रैल तक ही कर सकेगा। मैं तब तक पुस्तिका की छपाई को छोड़ कर सारा हिसाब चुकता कर चुका था, इसलिए मुझे पैसों की सख्त जरूरत थी। पर मैंने सोचा पन्द्रह-बीस दिन की बात है, पैसे आ ही जायेंगे।

तभी जब मैं ज्ञान से बकाया पैसों की उम्मीद लगाये हुए था, उसका 13 अप्रैल का पत्र आया। पत्र क्या था, पत्र-बम था। उसमें ज्ञान ने एक के बाद एक मुझ पर तीन आरोप ठोंक दिये थे और तीनों का ताल्लुक मेरी ईमानदारी से था। पहली बात जो ज्ञान ने लिखी वह अशोक भौमिक के बारे में थी - ‘अभी मुझे यह जानकारी मिली है कि अशोक भौमिक को शायद पारिश्रमिक की राशि नहीं मिली है। जबकि हम लगातार दे रहे हैं। यह बात सही है या गलत मैं नहीं जानता।’

दूसरी बात पहल के कहानी अंक की बिक्री के बारे में थी - ‘पहल के कहानी अंक को तुमने कितने में बेचा है। पुस्तक मेले में यह लोगों को 17 में मिला है।’

तीसरी बात यूं लिखी गयी थी मानो चलते-चलाते याद आने पर लिख दी गयी हो - ‘हां पहल-29 में लगा न्यूज प्रिंट काफी महंगा लग रहा है।’

पत्र पढ़ने के बाद कुछ देर के लिए मैं स्तब्ध रह गया था। आज का जमाना होता तो तत्काल मोबाइल पर तय-तस्फिया कर लेता। पर तब फोन से ट्रंककाल बुक कराके सम्पर्क में भी घण्टों लग जाते थे और छह मिनट से ज़्यादा बात नहीं हो पाती थी। लिहाजा मैं अन्दर-ही-अन्दर खौलता रह गया था।

मुझे सबसे ज़्यादा आपत्ति ज्ञान के लहजे और सुनी-सुनायी बात पर मुझसे कैफियत तलब करने को ले कर थी। मैं जानता था कि यह आग किसने लगायी थी। लेकिन ज्ञान कान का इतना कच्चा निकलेगा, मैंने कभी कल्पना भी न की थी। अव्वल तो उसे पहले अशोक भौमिक से पूछना चाहिए था कि उन्हें पैसे मिले या नहीं मिले और तब मुझे लिखना चाहिए था। दूसरे ‘अभी मुझे जानकारी मिली है’ से अविश्वास की जो सड़ांध उठ रही थी, उसने ज्ञान और पहल के साथ मेरे लम्बे सम्बन्ध को विषाक्त करके रख दिया था। चूंकि ज्ञान ने अपने कान के कच्चेपन में अशोक भौमिक वाली बात मान ली थी, इसलिए ‘पहल’ की बिक्री और न्यूजप्रिंट की कीमत भी शक के घेरे में आ गयी थी। वरना तय यह हुआ था कि पहल का अंक दस रुपये में और पुस्तिका सात रुपये में बेची जायेगी, फिर यह पूछना कि ‘पुस्तक मेले में लोगों को यह 17 में मिला है’, बेमानी था। न्यूज प्रिंट के सिलसिले में ज्ञान को मैंने बता दिया था कि वह आधिकारिक तौर पर रसीद पर्चे के साथ नहीं मिलता है, जब जैसी खेप आती है, वैसी कीमत देनी पड़ती है, क्योंकि इसे अख़बार चोरी-छिपे बेच देते हैं।

मुझे हैरत इस बात पर भी हुई कि ज्ञान ने इस बात का भी ध्यान नहीं रखा था कि ‘पहल’ की छपाई के सिलसिले में लगातार मैं अपने पास से पैसे लगाया करता था और ज्ञान अपनी सुविधा से उन्हें चुकाता था और मैंने कभी शिकायत नहीं की थी। 1980 में भी जब मैं लन्दन गया था तो पहल की तरफ 1500 से ऊपर की राशि निकलती थी, जिसमें से ज्ञान ने सिर्फ 500/- दिये थे। चार साल बाद जब मैं लौट कर आया था तब भी यह रकम वैसी-की-वैसी पड़ी हुई थी, जबकि मेरे बड़े भाई ने ज्ञान को बार-बार याद कराया था। ज्ञान ने तब भी यह हिसाब चुकता नहीं किया था, जब मेरे पीछे मेरे बड़े भाई बहुत बीमार हो गये थे। 1980 में 1100/- की राशि कुछ मानी रखती थी। लेकिन मैंने ज्ञान को कोई उलाहना दिये बगैर फिर से ‘पहल’ की छपाई को हाथ में ले लिया था।

जाहिर है, मन की जो हालत थी, उसमें मुझे ज्ञान के इस अविश्वास-भरे रवैये से सख्त चोट पहुंची थी। मैंने तत्काल उसे एक तीखा पत्र लिखा था। ज्ञान ने पलट कर जवाब दिया था और चूंकि विनोद कुमार शुक्ल वाली मेरी बात सही थी, इसलिए उसने उसे और अशोक भौमिक वाली बात को किनारे करके कुछ और नये आरोप मुझ पर लगा दिये थे। 26 अप्रैल के इस पत्र का जवाब मैंने दिया या नहीं, या दिया तो क्या दिया मुझे मालूम नहीं। बहुत-से पत्रों की प्रतिलिपियों मैं रखता नहीं था। वैसे भी मन इतना खिन्न और मुँह का स्वाद इतना बदमजा हो गया था कि मैंने फैसला कर लिया था अब ज्ञान के साथ ज़्यादा सम्बन्ध नहीं रखना है और ‘पहल’ के सिलसिले को यहीं तोड़ देना है। 26 अप्रैल के पत्र के बाद मेरे पास ज्ञान का सिर्फ 1/7 का एक कार्ड इस प्रसंग से सम्बन्धित मौजूद है, जिसमें उसने अपने पत्र के उत्तर न मिलने की बात लिखी है और जल्द-से-जल्द रकम भिजवाने की भी। 15 अप्रैल खिसक कर जुलाई के आगे तक टल गया था।

मैंने ज्ञान के इस 1 जुलाई के पत्र का जवाब दिया या नहीं दिया, यह लगभग चौथाई सदी बीत जाने पर मुझे याद नहीं । बस इतना याद है कि मैं उस पूरे अर्से में बार-बार मैत्री नाम की शै के बारे में सोचता. ज्ञान को जो पहला तीखा पत्र मैंने लिखा था वह मैंने अशोक भौमिक को दिखा दिया था। उन्होंने पूछा भी था कि मैं इतने विश्वास के साथ कैसे कह सकता था कि इस पूरे प्रसंग के पीछे अनामिका प्रकाशन वाले विनोद कुमार शुक्ल ही का हाथ था। तब मैंने उन्हें विनोद कुमार शुक्ल के सम्बन्धी "लिशोर प्रिंटर्स" से मिली सुन-गुन के बारे में बताया था, पर उन्हें तब भी यक़ीन नहीं हो रहा था। वह तो जब ज्ञान का जवाब आया तब जा कर उन्हें यक़ीन हुआ। लेकिन मेरी दिमाग़ी हालत का इल्म होते हुए भी अशोक भौमिक ने अपनी तरफ़ से इस ग़लतफ़हमी को दूर करने-करवाने में कोई क़दम नहीं उठाया था, जबकि वे कहा जाये इस पूरे झगड़े में एक पार्टी थे। लेकिन जो नहीं है जैसे कि वफ़ादारी उसका ग़म क्या, वह नहीं है।
(जारी)

Tuesday, June 28, 2011

देशान्तर



नीलाभ के लम्बे संस्मरण की सैंतालीसवीं क़िस्त

पिछले 50 बरसों की साहित्यिक हलचलों का एक जायज़ा
और एक लम्बी मैत्री की दास्तान

ज्ञानरंजन के बहाने - ४७



मित्रता की सदानीरा - २६


उन दिनों जनसत्ता और नवभारत टाइम्स के दफ्तर, आईटीओ के पास बहादुर शाह जफर मार्ग पर थे। मंगलेश जनसत्ता में था और रब्बी और विष्णु नागर वगैरा नभाटा में। दिन भर वहाँ लोगों जमघट लगा रहता और अशोक वाजपेयी के खिलाफ बयान की तैयारियां चलतीं। रघुवीर सहाय भी इन तैयारियों में शामिल थे। जाहिर है, अनेक कवि अतीत में अशोक वाजपेयी द्वारा उपकृत हो चुके थे, कला परिषद और भारत भवन जा चुके थे, बहुत-से कवि मिजाजन मरंजामरंज थे, इसलिए सारी कोशिश बयान की धार को गोठिल होने से बचाने की थी। अन्तिम प्रारूप को रघुवीर सहाय ने काफी डाइल्यूट करके पास कर दिया और अब इन्तजार सिर्फ नामवर सिंह और केदारनाथ सिंह के हस्ताक्षरों का था। ये दोनों तब जे.एन.यू. में थे और लगातार टालमटोल कर रहे थे। अन्त में उन्होंने बयान पर हस्ताक्षर नहीं ही किये थे और वह उनके नामों के बिना जारी हुआ था।

इस बीच इस सारी ढीलापोली से खीझ कर मैंने एक टिप्पणी ‘उत्सव या तेरही’ के शीर्षक से जनसत्ता में प्रकाशित करा दी। अगले दिन जब रघुवीर सहाय मिले तो उन्होंने शिकायत के-से अन्दाज़ में कहा था कि आपने तो टिप्पणी में सब कुछ लिख ही दिया है। मानो मैंने कोई सेंध लगा दी थी। मैंने उनसे कहा था कि अव्वल तो मेरी टिप्पणी आपके बयान से कहीं अधिक तुर्श है, दूसरे वह इस मामले में कुछ ऐसे पक्षों पर भी चर्चा करती है जो आपके बयान के दायरे के बाहर छूट गये है। और तीसरे यह कि आप लोगों के ढुलमुल रवैये से मेरा मन उकता चुका था। जहां इतने सारे लेखक हस्ताक्षर कर रहे थे, वहाँ नाहक नामवर सिंह और केदारनाथ सिंह के हस्ताक्षर करने की बाट जोहते रहना उन सारे लेखकों के अपमान-सरीखा है, जिन्होंने बिला चूं-चरा के बयान पर हस्ताक्षर कर दिये थे। सहाय जी दुखी हो कर चले गये थे और वह बयान बाद में वैसे ही जारी हुआ था। इस बीच मेरी टिप्पणी को ‘शव पर बैठ कर बहूभात खाना’ का शीर्षक दे कर नव भारत टाइम्ज़ और अमर उजाला ने उद्धृत किया था।

दिल्ली से मैं वापस इलाहाबाद चला गया था और बाकी काम-काज के साथ पहल के अंक और उनके साथ जाने वाली पुस्तिकाएं छपवाने में जुट गया था। ज्ञान उन दिनों मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ में बहुत सक्रिय था, कमला प्रसाद पाण्डे भी उसके साथ थे और संघ के सम्मेलन और बैठकें जगह-जगह हो रही थीं। मैं खुद 25, 26, 27 अक्तूटर 1985 को होने वाले जन संस्कृति मंच के स्थापना सम्मेलन की तैयारियों में व्यस्त था। ऐसी हालत में ज्ञान से भेंट-मुलाकात कम और खतो-किताबत ज़्यादा होती चली गयी थी और वह भी बड़ी कारोबारी क़िस्म की।

उस जमाने में किताबों और पत्र-पत्रिकाओं को छपाने के लिए आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं। दिल्ली जैसी कुछ जगहों में फोटो-कम्पोजिंग की तकनीक आ गयी थी, लेकिन उसका भी इस्तेमाल इक्का-दुक्का साधन-सम्पन्न लोग ही कर पाते थे। हाथ से कम्पोजिंग होती थी और चूंकि बड़े-से-बड़े प्रेस में भी असीमित टाइप नहीं होता था, इसलिए अमूमन दो-चार फर्मे ही एक बार में कम्पोज हो पाते। इनके भी दो-दो बार प्रूफ पढ़ कर गलतियां सुधारने और फिर उन्हें छाप कर आगे की सामग्री को कम्पोज करने के लिए टाइप खाली करने में समय लगता था। इसलिए देर-सबेर होती ही रहती और ज्ञान की सारी शिकायतें ‘पहल’ या ‘पहल पुस्तिका’ के छपने में हुए विलम्ब से सम्बन्धित होतीं और दूसरे खतों में दीगर किस्म के व्यावहारिक ब्यौरे होते। पुराने दिनों में ज्ञान के पत्रों में जो मस्ती, बेफिक्री और ताजगी होती थी, वह कहीं बहुत नीचे दब गयी थी।

तभी ज्ञान ने ‘पहल’ के एक महत्वाकांक्षी अंक की योजना बनायी। 1978-79 में ‘पहल’ का एक कवितांक मंगलेश, वीरेन और मेरे सहयोग से वह प्रकाशित कर चुका था। फिर उसने ‘पहल’ का ‘मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र विशेषांक’ निकाला था। 1985 के अन्त में उसने ‘पहल’ का कहानी विशेषांक प्रकाशित करने का फैसला किया। सामग्री इकट्ठा होने लगी।

इसी बीच हुआ यह कि हमारे पुराने प्रेस वाले अमीन साहब ने, जिनकी टाइप फाउण्डरी भी थी और जो अपने ‘स्टार प्रिंटर्स’ नाम के प्रेस में ‘पहल’ छापते थे, अचानक अपना प्रेस बन्द कर दिया। अमीन साहब के यहाँ ‘पहल’ ही नहीं, हमारे प्रकाशन का भी बहुत काम होता था। वे बहुत भले और लिहाजदार आदमी थे, उधार वगैरा में मुख्वत से काम लेते, जिसकी वजह से ज्ञान को भी राहत रहती। खैर, जब उन्होंने ऐसे वक्त, जब हमें पहले से सधे हुए प्रेस की सबसे ज़्यादा जरूरत थी, अपना प्रेस बन्द करने का फैसला किया तो मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल नया प्रेस खोजने का था।

मैंने ढूंढ-ढांढ कर ‘किशोर प्रिंटर्स’ के नाम से एक प्रेस तय कर लिया, जिनके यहाँ महज कम्पोजिंग की सुविधा थी, छपाई वे बाहर के किसी प्रेस में कराते थे। मैंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रेस में छपाई की व्यवस्था करा दी। चूंकि अंक धीरे-धीरे बड़ा होता जा रहा था और मैं ज्ञान के फैसलों पर निर्भर था, इसलिए मैंने छपाई का आम कागज लगाने की बजाय अच्छे न्यूज प्रिंट पर अंक को छापने का फैसला किया। उन दिनों विदेश से चिकना न्यूज प्रिंट आता था और उस पर छपाई बहुत अच्छी होती थी। लेकिन वह पुस्तकों के प्रकाशकों में लोकप्रिय नहीं था, अख़बारों के अलावा वह पत्र-पत्रिकाओं में इस्तेमाल होता था। प्रूफ वगैरा चूंकि ज़्यादातर मैं खुद ही पढ़ता था और आवरण अशोक भौमिक बनाने थे।

आज तो अशोक भौमिक ख़ासे बड़े चित्रकार हो गये हैं, उनमें चित्रकला की सूझ-बूझ के साथ उन गुणों की भी कोई कमी नहीं है जिनसे प्रसिद्ध हुआ जाता है, वे एक ही वक्त पर शेर और बकरी से दोस्ती निभाने में माहिर हैं, लेकिन जब की बात मैं कर रहा हूं उन दिनों वे दो-तीन साल पहले ही आज़मगढ़ से इलाहाबाद आये थे, ईस्ट इन्डिया फार्मास्यूटिकल्स में विक्रय प्रतिनिधि थे और कला और साहित्य को एक साथ साधने की कोशिश कर रहे थे। उनके अनुरोध पर मैंने ज्ञान से कह कर आवरण के खाते में एक मानदेय की व्यवस्था करा दी थी। यों मैंने अशोक जी से कहा था कि मित्र, मैं तो ज्ञान से इस सारी भाग-दौड़ वगैरा के खाते कुछ लेता नहीं, मोटर साइकिल का पेट्रोल भी अपने पास से डलाता हूं, जो प्रूफ खुद पढ़ता हूं, उनके पैसे नहीं लेता, यहाँ तक कि अगर ‘पहल’ में नीलाभ प्रकाशन का विज्ञापन छपता है तो उसके भी पैसे देता हूं, लेकिन आपकी मांग उचित है, उसूलन तो हमें ‘पहल’ के लेखकों को भी पारिश्रमिक देना चाहिए जो हम नहीं दे पाते, तो भी आपके लिए मैं प्रबंध कर दूंगा।

तब मुझे क्या मालूम था कि आगे चल कर इस सबका सिला मुझे किस सूरत में मिलने वाला है।
(जारी)

Monday, June 27, 2011

देशान्तर



नीलाभ के लम्बे संस्मरण की छियालीसवीं क़िस्त

पिछले 50 बरसों की साहित्यिक हलचलों का एक जायज़ा
और एक लम्बी मैत्री की दास्तान

ज्ञानरंजन के बहाने - ४६



मित्रता की सदानीरा - २५


आज सोचता हूं तो लगता है कि 1980 के दशक ही से साहित्यिक जगत में वह तब्दीली आनी शुरू हो गयी थी, जो आज अपने उरूज पर है - या तो परस्पर पीठ-खुजाऊ, अहो-अहो मार्का गिरोह हैं या फिर भयंकर वैमनस्य और हर स्तर पर उन साथी रचनाकारों को नीचा दिखाने की कोशिश, जिनसे हमारे कारूरे नहीं मिलते। छोटे-छोटे क्षत्रपों की तरह के दरबार हैं। पुरस्कारों के लिए जोड़-तोड़ और समझौते हैं। लेखन जनता की आकांक्षाएं व्यक्त करके उनके संघर्षों में हाथ बटाने का उपक्रम नहीं, बल्कि सत्ता के और निकट जाने यहाँ तक कि बज़ाते-खुद सत्ता बन जाने का साधन है। कब कौन कहां टूट कर चला जायेगा कोई हिसाब ही नहीं है। ढेरों लोग अब जिस्म नहीं सिर्फ़ दाहिना हाथ बनने की फ़िक्र में ग़लतान रहते हैं, ताकि आराम से बदलते हुए लोगों में फ़िट हो जायें। एक बन्दा जाये तो ख़दशा न रहे कि बाबू अब अपना क्या होगा। दाहिने हाथ की तलाश दूसरी तरफ़ को भी होती है। ऐसी अजीबोगरीब हमबिस्तरियां हैं कि दिमाग चकरा जाता है। पूरा प्रयोजन मूलक हिन्दी का युग है - प्रयोजन है तो मित्रता और संग-साथ है, अन्यथा जै राम जी की।

बहरहाल, उस यात्रा की दूसरी बात जो मुझे याद रह गयी है वह ज्ञानरंजन के साथ राजेश जोशी का तीखा पत्र-व्यवहार था जो हाल ही में हुआ था। राजेश का कहना था कि भोपाल गैस काण्ड और सिखों के नरसंहार के बाद प्रगतिशील लेखक संघ को -- जिसका वह सदस्य था और ज्ञानरंजन महासचिव और परसाई जी अध्यक्ष -- कुछ बयान देने चाहिएं थे, जनता के साथ खड़ा होना चाहिए था। बकौल राजेश, उसने आवाहन किया था कि प्रलेस के जितने लोग उच्चस्तरीय समितियों में थे, उन्हें विरोध में बाहर आ जाना चाहिए। जबकि प्रगतिशील लेखक संघ इससे कतरा रहा था। यह देख कर राजेश ने इस्तीफा दे दिया था। दिलचस्प बात यह थी कि प्रलेस भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़ी हुई थी (जैसे जलेस मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी से और जसम सीपीआई माले लिबरेशन से) और सभी कम्यूनिस्ट पार्टियों की तरह विरोध में किसी का इस्तीफा नहीं स्वीकारा करती थी। राजेश के इस्तीफे के दो महीने बाद उसे प्रलेस से निकाल बाहर किया गया और इसकी सूचना सबको दे दी गयी। राजेश पुराना यूनियनबाज़ था जबकि न तो ज्ञान को, न परसाई जी को यूनियनबाजी हथकण्डों का इल्म था। राजेश ने जवाबी सर्कुलर जारी करके यह सवाल उठाया था कि जब वह पहले ही इस्तीफा दे चुका था तब उसे दो महीने बाद निकालने का सर्कुलर जारी करने का क्या तुक था। और इस जवाबी सर्कुलर में राजेश ने संगठन पर और भी आरोप लगाते हुए रायता फैला दिया था।

उधर ज्ञानरंजन के एक आरोपों में से यह था कि राजेश पहले से संगठन विरोधी कार्रवाइयां कर रहा था। इस आरोप में कुछ सच्चाई भी थी, क्योंकि माकपा और जलेस से भी राजेश का कुछ टांका भिड़ा हुआ था। यह बात इसलिए कह रहा हूं कि उसी समय राजेश ने मुझे रमेश उपाध्याय का वह अन्तर्देशीय भी दिखाया था, जिसमें रमेश ने और बातों के अलावा अन्त में राजेश के सर्कुलर का हवाला देते हुए बड़े मानीखेज़ ढंग से पूछा था कि अब उसका क्या करने का इरादा है। शब्द मुझे इतने वर्षों बाद याद नहीं रह गये हैं, पर उनमें निहित न्योता पंक्तियों के बीच साफ पढ़ा जा सकता था।

राजेश के रवैये के बारे में ज्ञान को जो एतराज़ थे, वे इतने बेबुनियाद नहीं थे; इसका कुछ-कुछ मुझे भी अन्दाज़ा रहा था। कारण यह कि जब मैं 1975 में राजेश से मिला था तब उसने अशोक वाजपेयी और उनकी पत्रिका "पूर्वग्रह" के खि़लाफ़ जो सैद्धान्तिक लड़ाई छेड़ रखी थी, वह उसने बहुत जल्दी ताक पर धर दी थी, इसलिए नहीं कि अशोक वाजपेयी का अपना रुख़ बदल गया था, बल्कि इसलिए कि राजेश को अपने भर्तृहरि के अनुवाद "पूर्वग्रह पुस्तिका" के तौर पर छपवाने थे। "पहल" की ओर से प्रकाशित की जा रही पुस्तिकाओं में पहली पुस्तिका -- माच्चू पिच्चू के शिखर -- के मेरे अनुवाद बाद दूसरी पुस्तिका राजेश की लम्बी कविता "समर गाथा" थी। इधर का मोर्चा सर कर लेने के बाद राजेश ने प्रकट ही "उधर" के मोर्चे को भी सर करने की ठानी होगी।

वैसे भी राजेश के लिए प्रतिबद्धता महज़ अपने प्रति जुड़ाव का नाम है, उसका सिद्धान्तों से कुछ लेना-देना नहीं है। कभी श्रीकान्त वर्मा के ख़िलाफ़ हो गये कभी श्रीकान्त वर्मा पुरस्कार ले लिया; कभी महाश्वेता देवी के लिए आवाज़ बुलन्द की और फिर दूसरे ही दिन गोपीचन्द नारंग से पुरस्कार ले लिया, जो घोषित तो हो ही चुका था और घर भी भेजा जा सकता था। दर असल, यही वह बीज था जो आज अपने सब से ज़हरीले रूप में प्रकट हुआ है जब हमारे साथी, जो जनता की पक्षधरता का दावा करते नहीं थकते, कुख्यात पुलिस अफ़सरों की पुस्तकों के लोकार्पण में बेशर्मी से मुस्कराते हुए उनके साथ फ़ोटो खिंचवाते हैं और नाना प्रकार से उपकृत होते हैं।

आज तो प्रलेस और जलेस से जुड़े लेखक जसम से जुड़े लेखकों और संस्कृतिकर्मियों के साथ मिल-जुलकर कार्यक्रम करने से नहीं हिचकते और यही हाल भाकपा, माकपा और भाकपा माले लिबरेशन का है, जिन्होंने अपनी-अपनी गलत राहों पर चलते हुए हाल ही में बिहार के प्रान्तीप चुनावों में मुँह की खायी है और कहा जाय मैदान भगवा भेडि़यों के लिए खुला छोड़ दिया है, लेकिन उन दिनों भाकपा और प्रलेस के लोग जिन्होंने आपातकाल में इन्दिरा निरंकुशता का समर्थन किया था और भाकपा तथा जलेस के लोग जिन्होंने आगे चल कर वी.पी. सिंह की सरकार की बैसाखी बनने में भाजपा का साथ दिया था और बंगाल में पार्टी की तानाशाही कायम कर दी थी, भाकपा माले लिबरेशन से वैसे ही कन्नी काटते थे जैसे भद्रजन मुहल्ले के गुण्डे से और इस पार्टी पर सी.आई.ए. के एजेण्ट होने का और विदेशी पैसे से चलने का आरोप लगाते थे। ये वही लोग थे, जिन्होंने अपने समय में सोवियत संघ से अकूत पैसे इस या उस तरीके से हासिल किये थे।

चूंकि मैं तब तक जसम के स्थापना सम्मेलन की तैयारियों में जुटा हुआ था। इसलिए राजेश ने थोड़ी-बहुत छींटाकशी मुझ पर की थी, लेकिन एक तो वह मुझे बहुत पहले से जानता था, दूसरे मेरे अलावा वेणु भी तीसरी धारा का समर्थक था और वह भी राजेश के मित्रों में था इसलिए यह छींटाकशी हंसी-मजाक के दायरे से बाहर नहीं हुई थी।

पाला बदलने को लेकर मेरे मन में हमेशा एक शंका रही है, इसलिए राजेश के सर्कुलर से मुझे अफसोस हुआ था। ज्ञान रंजन और परसाई जी में कमियां रही होंगी, इससे मुझे एतराज नहीं। परसाई जी तो अर्से से भाजपा का विरोध और इन्दिरा गान्धी और उनकी कांग्रेस पार्टी का समर्थन करते रहे थे, लेकिन ज्ञान ने "पहल" में सभी धाराओं के वामपन्थियों को प्रकाशित किया था। राजेश का इस्तीफा देना तो मेरी समझ में आता था, पर आनन-फानन जलेस में जा जुड़ना नहीं। शायद मैं थोड़ा पुराने ढंग से चीजों को देख रहा था, जहां संस्कृति और राजनीति में आपसी सम्बन्ध होता था और विचारधारा इस सम्बन्ध को सुनिश्चित और परिभाषित करने का काम करती थी। चूंकि विचारधारा के स्तर पर हमारा यानी नक्सलवादी धारा की वामपन्थी पार्टियों और नवजनवादी सांस्कृतिक मोर्चों का मतभेद भाकपा और माकपा और उनके लेखक संगठनों से था इसलिए हम जसम बनाने की ओर बढ़ रहे थे। राजेश का मतभेद विचारधारा के स्तर पर नहीं, बल्कि कार्यशैली के स्तर पर था। बाद में भाकपा और जलेस भी कांग्रेस समर्थन के थान पर जा खड़े हुए और एक लम्बे समय तक कांग्रेस और भाजपा दोनों का विरोध करने वाली पार्टी भाकपा माले लिबरेशन अन्ततः चुनावी समझौतों की जिन दलदल में जा फंसी वह अब शीशे की तरह साफ हो चुका है।

लेकिन तब इस नौबत को आने में देर थी और मेरा ध्यान ज्ञानरंजन-राजेश जोशी-परसाई-प्रलेस विवाद से कहीं ज़्यादा जसम की तैयारियों में लगा हुआ था। तो भी चूंकि भोपाल गैस त्रासदी के बावजूद अशोक वाजपेयी भोपाल में विश्व कविता उत्सव करने पर आमादा थे, इसलिए मैं इस सम्वेदनहीनता के खिलाफ राजेश के साथ था। बीच की कथा यह थी कि उस समय श्रीकान्त वर्मा संस्कृति सचिव नाज़रेथ की मदद से विश्व कविता उत्सव दिल्ली में करना चाहते थे। उधर अशोक वाजपेयी इसे भोपाल में करने के लिए इतने व्यग्र थे कि उन्होंने विश्व कविता उत्सव को भोपाल में पहले से तयशुदा तिथियों में करने के औचित्य को ‘मुर्दों के साथ कोई मर नहीं जाता’ जैसा हृदयहीन वक्तव्य दे कर साबित करने की चेष्टा की थी। उनके इस बयान की तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और जब मैं भोपाल से दिल्ली पहुंचा तो वहाँ कविगण -- खास तौर पर जो अशोक वाजपेयी के खेमे में नहीं थे -- नाराज़ मधुमक्खियों की तरह भनभना रहे थे।
(जारी)

Saturday, June 25, 2011

देशान्तर



नीलाभ के लम्बे संस्मरण की पैंतालीसवीं क़िस्त

पिछले 50 बरसों की साहित्यिक हलचलों का एक जायज़ा
और एक लम्बी मैत्री की दास्तान

ज्ञानरंजन के बहाने - ४५



मित्रता की सदानीरा - २४

इटारसी से भोपाल तक का रास्ता उन दिनों कार से भी लगभग डेढ़ेक घण्टे का था, लेकिन हमें कोई जल्दी तो थी नहीं, सो डा. जेकब औसत रफ़्तार से ही आयी थीं। कर के अन्दर भी माहौल चूंकि बहुत बोझिल हो गया था इसलिए मुझे रास्ते में देखी गयी दृश्यावली की कुछ याद नहीं है, गो उस इलाके का एक अपना ही सौन्दर्य है। मेरा सारा ध्यान भोपाल पहुंचने की तरफ़ लगा हुआ था।

1984 तक राजेश जोशी शादी कर चुका था और मारवाड़ी रोड पर ताज स्टूडियो के ऊपर वाला मकान छोड़ कर जवाहर चौक पर बनी एक बहुमंजि़ला इमारत के फ्लैट में आ गया था। उन दिनों हालांकि टी.टी. नगर और जवाहर चौक में बसावट घनी होनी शुरू हो गयी थी, पर उसकी रफ्तार आज की-सी या नब्बे के भी दशक की-सी हरारत-जदा नहीं थी। राजेश का फ्लैट जिस इमारत में था, वह मुख्य सड़क भदभदा रोड से थोड़ा पीछे हट कर थी, सामने दुकानों की कतार अभी नहीं बनी थी और घूम कर जाने की बजाय सड़क पर उतर कर सामने की खाली जगह पार करते हुए सीधे राजेश के फ्लैट तक पहुंचा जा सकता था।

डा. जेकब ने अपनी फिएट सड़क पर ही रोक दी थी और फीकी-सी मुस्कान के साथ, जो देर तक मेरा पीछा करती रही, मुझे विदा दी थी। सामान के नाम पर मेरे पास एक अटैचीनुमा बैग था। मैं उसे उठा कर राजेश के फ्लैट की तरफ बढ़ गया था।

अर्से बाद राजेश से मुलाकात ने पुराने दिनों की यादें ताजा कर दी थीं, जब वह मारवाड़ी रोड पर रहता था और मैं आ कर उसके पास ठहरा करता था। नरेन्द्र का तबादला चूंकि होशंगाबाद हो गया था, इसलिए उस बार राजेश के अलावा शायद राजेन्द्र शर्मा से ही भेंट-मुलाकात हुई थी या फिर रामप्रकाश त्रिपाठी से। भोपाल का नक्शा भी पहले की बनिस्बत बदला हुआ नज़र आ रहा था। 1977-78 का सुस्तरौ, मस्त-मलंग भोपाल धीरे-धीरे उस तब्दीली की राह पर कदम बढ़ा चुका था जो 1980 और 90 के दशकों में उसकी काया पलट देने वाली थी। चूंकि यह पहला सफर सिर्फ पुराने सम्बन्धों को ताजा करने की खातिर किया गया था, इसलिए पुराने दोस्तों से मिलता-मिलाता मैं दिल्ली चला आया और फिर इलाहाबाद।

इलाहाबाद पहुंच कर मैं कुछ ही दिन बाद पटना चला गया था और पटना से मुजफ्फरपुर के रास्ते पर था, जब हमें श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या का समाचार मिला।

हालांकि मुजफ्फरपुर में सिखों के खिलाफ वैसे दंगे नहीं भड़के थे, जैसे दिल्ली और दूसरे कुछ शहरों में, तो भी हो-हल्ले और उपद्रव की आशंका को देखते हुए प्रशासन ने आंशिक रूप से कफ्र्यू लगा दिया था। जितने दिन हम मुजफ्फरपुर रहे, मेरा समय विजयकान्त, राजेन्द्र प्रसाद सिंह और पद्माशा के साथ बीता। तीन-चार दिन बाद हालात कुछ सामान्य होने पर मैं इलाहाबाद आ गया था, जहां ज्ञान का पत्र मेरा इन्तज़ार कर रहा था।

‘पहल’ की छपाई हाथ में लेने के साथ ही चूंकि मैं ज्ञान से अपनी लम्बी कविता ‘उत्तराधिकार’ को ‘पहल पुस्तिका’ के रूप में छापने का आश्वासन ले आया था, जैसे कि पहले भी नेरूदा की कविता ‘माच्चू पिच्चू के शिखर’ का मेरा अनुवाद छपा था या राजेश की लम्बी कविता ‘समर गाथा’ या फिर मयाकोवस्की की कविता ‘लेनिन’ का अजय कुमार द्वारा किया गया अनुवाद, इसलिए मेरी व्यस्तता बढ़ गयी थी। अलावा इसके मैं ‘जनसत्ता’ के लिए नियमित रूप से लेख-टिप्पणियां और समीक्षाएं लिखने लगा था।

इस बीच गालिबन ज्ञान एकाध बार आया था, लेकिन इलाहाबाद में उसके साथ ‘पहल’ के काम को समझने-समझाने के अलावा पहले की तरह घूमने-फिरने और अड्डेबाजी करने के अवसरों की स्मृति नहीं है। वह कालिया के ‘इलाहाबाद प्रेस’ जरूर जाता और चूंकि कालिया के यहाँ मैंने न जाने की ठानी हुई थी, इसलिए यह एक अजीब-सी विभाजित दोस्ती थी। मंगलेश, वीरेन और बड़ोला साहब इलाहाबाद से विदा हो चुके थे। उनके साथ ज्ञान की दोस्ती को साझा करना तो मुझे गवारा था, पर कालिया के साथ नहीं, क्योंकि कालिया की जैसी आदत है, वह कोई टुच्ची बात करने से खुद को रोक न पाता था और मेरी प्रकृति ऐसे व्यवहार को तरह दे जाने की नहीं थी और मैं ज्ञान को किसी अस्वस्तिकारक स्थिति में नहीं डालना चाहता था।

मेरे पिता कहते भी थे कि दोस्तियां और प्रेम-सम्बन्ध जरूरी नहीं कि दुतरफा हों; अक्सर वे इकतरफा होते हैं। लिहाजा, चूंकि मैं ज्ञान को बहुत पसन्द करता था, इसलिए उससे ठेस पहुंचने के बाद भी मैंने दिल को समझा लिया था कि दोस्ती नामक इस नदी से जितना जल तुम्हें मिलता है, ले लो; वह दूसरों को भी सींचती है, कई बार तुम्हारे तट को सूखा रख कर उनके किनारों को हरा-भरा बनाये रखती है तो इस पर कुढ़ो मत।

वैसे भी उन वर्षों में मेरा समय और ध्यान बहुत सारी दूसरी बातों में लगा हुआ था। लन्दन से आने के बाद सीपीआई माले लिबरेशन के मेरे पुराने साथियों ने मुझे प्रस्तावित सांस्कृतिक संगठन "जन संस्कृति मंच" की तैयारियों में शामिल कर लिया था। गोरख पाण्डे उन दिनों शहर-दर-शहर इस सिलसिले में दौरा कर रहे थे और अक्सर इलाहाबाद आते।

मेरा इरादा दिसम्बर 1984 में फिर भोपाल की तरफ जाने का था और सोचा था कि जबलपुर भी जाऊंगा, लेकिन चूंकि दिसम्बर में भोपाल गैस काण्ड हो गया, इसलिए वहाँ जाने का इरादा मुल्तवी हो गया था और मैंने इस बीच लखनऊ का एक चक्कर लगाया था। वहाँ अजय सिंह और अनिल सिन्हा से मुलाकात हुई थी और शायद अजय के घर पर ही मैंने "उत्तराधिकार" का पाठ किया था। वहाँ अजय और अनिल के अलावा एक नये साथी सुप्रिय लखनपाल भी मौजूद थे, जिन्होंने कुछ अच्छे सुझाव दिये थे।

चूंकि मार्च 1984 में मेरे लन्दन आने के बाद से अक्तूबर 1984 में ‘जन-संस्कृति मंच’ के स्थापना सम्मेलन तक वक्त इस कदर हलचल और सरगर्मियों से भरा था कि भोपाल, दिल्ली, लखनऊ, पटना और जबलपुर की यात्राओं को एकदम बाकायदगी से सिलसिलेवार सजाना मुमकिन नहीं है। थोड़ी-बहुत मदद पत्रों से या ‘जनसत्ता’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में छपी रचनाओं की कतरनों से मिल सकती है और मैंने उन्हीं के आधार पर घटनाओं को बयान करने की कोशिश की है। ऐन मुमकिन है कोई वाकया -- खास तौर पर बोलना-बतियाना -- एक यात्रा से हट कर दूसरी यात्रा में नत्थी हो गया हो पर इससे ज़्यादा उसमें फेर-फार नहीं हुआ है।

चूंकि ज्ञान के 28 अक्तूबर, 1984 के पत्र में साडि़यों के पसन्द आने के बारे में दरियाफ्त की गयी है, इसलिए मेरी पहली जबलपुर और भोपाल यात्रा उससे पहले ही हुई होगी। अक्तूबर अन्त से 4-5 नवंबर, 1984 में मैं पटना-मुजफ्फरपुर में था। उसके बाद भोपाल मैं गालिबन फरवरी में गया था। बीच में लखनऊ और दिल्ली के चक्कर लगे थे, क्योंकि ‘उत्तराधिकार’ के छपने से पहले उसे लखनऊ में सुप्रिय लखनपाल तथा अन्य मित्रों को सुनाने की मुझे याद है और दिसम्बर में असगर वजाहत की फिल्म ‘गजल की कहानी’ को देख कर नवभारत टाइम्स में उसकी समीक्षा करने की भी। चूंकि उदय प्रकाश के दूसरे कविता संग्रह ‘अबूतर कबूतर’ की समीक्षा ‘जनसत्ता’ में 3 फरवरी, 1984 को छपी और इसी के बाद भोपाल जाने पर वहाँ मित्रों ने टीका-टिप्पणी की थी (जिसका ब्योरा आगे आयेगा) और भोपाल से दिल्ली आने पर मार्च में मैंने भोपाल गैस त्रासदी की पृष्ठभूमि में ‘विश्व कविता उत्सव’ मनाने पर तीखी टिप्पणी जनसत्ता के लिए लिखी थी, इसलिए मेरी भोपाल यात्रा मध्य फरवरी में ही किसी समय हुई होगी। ये ब्यौरे मैं इसलिए दे रहा हूं क्योंकि अक्सर स्मृतिलेखाकारों पर झूठी-सच्ची और मनघड़न्त बातें लिखने के आरोप लगाये जाते रहे हैं।

फरवरी 1985 में जब मैं भोपाल गया तो हस्बमामूल राजेश के यहाँ ही ठहरा। शशांक उन दिनों वहीं था, जबकि नरेन्द्र तबादले के बाद गालिबन होशंगाबाद से विदिशा चला गया था और विजयबहादुर सिंह के साथ संगत कर रहा था। सबसे पहले तो मुझे राजेश ने आड़े हाथों लिया कि मैंने उदय प्रकाश के कविता-संग्रह ‘अबूतर कबूतर’ की समीक्षा क्यों की और अगर की तो तारीफ क्यों की। मुझे आज तक राजेश के शब्द याद हैं। उसने कहा था, ‘साल भर से वह संग्रह इग्नोर्ड पड़ा हुआ था, तुम्हीं रह गये थे उस पर लिखने के लिए।’ शशांक ने इस ताईद में टिप्पणी की थी और उदय को नवगीतकार बताया था। शशांक को तो खैर मैंने डपट दिया था, लेकिन राजेश को समझाया था कि अव्वल तो हमें अपनी साथी रचनाकारों के प्रति विद्वेष से काम नहीं लेना चाहिए, उनसे मतभेद हों, झगड़ा हो, मनमुटाव हो, पर लड़ाई को रचना के स्तर पर नहीं ले जाना चाहिए। ठीक है, अगर किसी का लिखा हमें पसन्द नहीं आता तो इसका यह मतलब नहीं कि हम उसके चुप हो जाने की कामना करें या इसके लिए प्रयत्नशील हों। दूसरे यह कि मुझे वह संग्रह पढ़ कर जैसा लगा वैसा मैंने लिखा, राजेश को मेरी निष्ठा पर शक करने का कोई हक नहीं है। मैं नामवर जी नहीं हूं कि वक्त के मुताबिक अपनी राय जाहिर करूं या बयान बदलूं।

राजेश ने आगे कुछ नहीं कहा था और बात वहीं ख़त्म हो गयी थी, लेकिन मुझे बड़ा अजीब लगा था। कारण यह कि इस समीक्षा के प्रकाशित होने के बाद दिल्ली में पंकज सिंह मुझसे कह चुका था - क्या तुम आशीर्वादीलाल हो गये हो।

यह भी उस बड़ी तब्दीली के छोटे-छोटे संकेत थे जो अस्सी के दशक में साहित्य और साहित्यकारों के जगत में आती जा रही थी, पुरानी क़दरों, सम्बन्धों, मूल्यों को तहस-नहस करती।
(जारी)

Friday, June 24, 2011

देशान्तर



नीलाभ के लम्बे संस्मरण की चवालीसवीं क़िस्त

पिछले 50 बरसों की साहित्यिक हलचलों का एक जायज़ा
और एक लम्बी मैत्री की दास्तान

ज्ञानरंजन के बहाने - ४४



मित्रता की सदानीरा - २३


दिल्ली को अगर न गिनूं तो लन्दन से लौटने के बाद पहला सफर भोपाल बरास्ता जबलपुर और इटारसी था और यहीं से ज्ञानरंजन के साथ सम्पर्क का तार फिर से जुड़ गया था। यूं मेरे लन्दन प्रवास के दौरान ज्ञान के दो-एक पत्र आये थे और मैंने भी उसे लिखे थे, लेकिन इतनी दूर से खतो-किताबत कायम रखना थोड़ा मुश्किल था। वापस आ कर जब मुझे पता चला था कि मेरे इलाहाबाद पहुंचने की तारीख़ों में ज्ञान इलाहाबाद ही में था तो मुझे थोड़ा अजीब लगा था और मैंने उसे पत्र लिख कर शिकायत भी की थी। यह गालिबन इलाहाबाद की फौरी मुसीबतों से निपटने की योजना बनाने और सिविल लाइन्ज़ वाला दफ्तर खोलने के बाद मई-जून की बात है।

ज्ञान ने चिट्ठी का फौरन जवाब दिया था और जबलपुर आने का न्योता भी। उस तरफ जाने का इरादा मैंने पहले से बना रखा था, क्योंकि लन्दन से रवाना होने से कुछ महीने पहले मुझे इटारसी से एक महिला का व्यक्तिगत पत्र मिला था जो उन्होंने मेरे प्रसारण सुन कर लिखा था। डा. ज्योत्सना जेकब - कि यही उनका नाम था - पेशे से डाक्टर थीं और जैसा कि नाम से ज़ाहिर होता था, धर्मान्तरित ईसाई थीं। उनके पत्र से जहानत और सुरुचि झलकती थी और यह भी अन्दाजा होता था कि वे साहित्य में अच्छी पैठ रखती होंगी। मैंने उस पत्र का जवाब दे दिया था और हमारे बीच चिट्ठी-पत्री का एक सिलसिला शुरू हो गया था। चूंकि उस समय तक सीधी भोपाल जाने वाली रेलगाडि़यां अभी शुरू नहीं हुई थीं, इसलिए इलाहाबाद से भोपाल का रास्ता इटारसी हो कर ही जाता था। लिहाज़ा मैंने सोचा कि ज्ञान से मिल कर इटारसी होता हुआ भोपाल जाऊंगा, रास्ते में डा. ज्योत्सना जेकब से भी मिल लूंगा।

अब इतने बरस बाद मुझे महीना तो याद नहीं, पर ज्ञान के 28 अक्तूबर के पत्र से यह अनुमान होता है कि सितम्बर या अक्तूबर 1984 का महीना रहा होगा। जबलपुर पहुंच कर ज्ञान से मिलने पर यह एहसास बिलकुल नहीं हुआ कि मैं उससे चार-पांच साल के वक्फे के बाद मिल रहा था। उसकी वही पुरानी स्वभाविक गर्मजोशी थी और मुहब्बत जो अक्सर दोस्तियों में सिमेंट का काम करती है। बातें भी तकरीबन वैसी ही हुईं जो काफी दिनों बाद मिल रहे मित्रों में होती हैं। अलबत्ता, इस बार ज्ञान ने मुझसे कहा कि अब जब मैं आ गया हूं तो पहले की तरह ‘पहल’ की छपाई वगैरा का काम मैं संभाल लूं। उन दिनों शिवकुमार सहाय उसकी व्यवस्था करते थे और अकेले होने की वजह से खुद अपने प्रकाशन के काम से उन्हें मुनासिब वक्त और मोहलत नहीं मिलती थी।

ठीक-ठीक यह तो याद नहीं कि किस अंक से मैंने दूसरी बार पहल की छपाई का काम संभाला था, लेकिन फाइल में रखे ‘पहल-25’ के आवरण चित्र की डमी से अन्दाजा होता है कि गालिबन इसी अंक से सिलसिला दोबारा शुरू हुआ था। इस यात्रा की एक याद रखने वाली बात ज्ञान के साथ सदर जा कर कोसा की साडि़यां खरीदना था। मैंने एक दिन सुनयना को कोसा की साड़ी पहने देखा था और उसकी तारीफ की थी, तब ज्ञान ने मुझसे कहा था कि वहाँ कोसा की बहुत अच्छी साडि़यां मिलती हैं और मैं सुलक्षणा के लिए ले जाऊं। एक शाम हम सदर गये थे और चूंकि मैं सफर में था इसलिए साडि़यों के पैसे ज्ञान ही ने दिये थे और कहा था कि हिसाब बाद में हो जायेगा।

ज्ञान से मिलने के बाद मैं जबलपुर से इटारसी के लिए रवाना हुआ। पांच-छै घण्टे का सफ़र था, रात ढल चुकी थी जब रिक्शा मुझे स्टेशन से ले कर मालवीय नगर में डा. ज्योत्सना जेकब के बंगले ’आनन्द भवन’ पर पहुंचा। शायद साढ़े सात-आठ का वक्त था। आनन्द भवन इलाहाबाद के हमारे बंगले जैसा ही बंगला था। चौड़े बरामदे, बड़े-बड़े कमरे और खपरैल की छत वाला -- औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों के बनवाये बंगलों का-सा स्थापत्य था उसका और चारों तरफ बड़ा-सा खुला अहाता। मैंने सामान उतरवा कर दस्तक दी तो अन्दर से एक बूढ़ी महिला ने दरवाजा खोला और बताया कि डा. जेकब टहलने गयी हैं, मैं चाहूं तो बरामदे में इन्तज़ार करूं।

उन दिनों सेलफोन वगैरा नहीं थे। ज्ञान के यहाँ टेलिफोन था और डा. जेकब के यहाँ भी, पर उसके माध्यम से सम्पर्क अनिश्चित था और समय लेने वाला। सो मैंने एकाध दिन पहले पोस्टकार्ड डाल दिया था। वैसे भी, मुझे डा. ज्योत्सना जेकब के बारे में नहीं के बराबर जानकारी थी। न मेरे पास उनका कोई फोटो था। ऊपर से या तो इटारसी की बिजली सप्लाई कम्पनी ढीली-ढाली थी या डा. जेकब की घरेलू व्यवस्था ही ऐसी थी, सारा बंगला अजीब तरीके से अन्धकार में डूबा लगता था। एक अजीब रहस्यमयता-सी पूरी फिजा पर तारी थी।

अब मुझे यह याद नहीं है कि डा. जेकब के आने से पहले या बाद में -- मेरे खयाल में पहले ही, क्योंकि बाद में तो मुझे सोने से पहले अकेला नहीं छोड़ा गया था -- एक सज्जन बरामदे में नमूदार हुए और मेरे पास आ कर बैठ गये थे और इस परिचय के साथ कि वे डा. जेकब के भाई हैं, मुझसे तरह-तरह के सवाल पूछते हुए जिरह-सी करते रहे -- मैं कौन था? कहां से आया था? दा. जेकब को कैसे जानता था ? उनसे मुझे क्या काम था ? डा. जेकब के संरक्षक-नुमा बड़े (या छोटे) भाई से अधिक वे मुझे एक सनकी किस्म के आदमी लगे।

मैंने इलाहाबाद के पुराने ऐंग्लो इण्डियन और इण्डियन क्रिश्चियन परिवारों में इसी तरह के कुछ लोग देखे थे जो 1947 के बाद खुद को चारों तरफ के बदलते माहौल में मिसफिट पा कर सनकी-से हो गये थे। उनकी जड़ें देसी धरती में थीं, जो एक बार फिर फिरंगी प्लावन से मुक्त हो कर खुली हवा में दिखायी देने लगी थी और वह निजाम जिसमें उनका प्रत्यारोपण हुआ था, सूख गया था। वे अधर में थे। कुछ अंग्रेजों के साथ इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया निकल भागे थे, बहुतों ने खुद को नयी परिस्थितियों में ढाल लिया था। कुछ ऐसे थे जो खोये-खोये, न तो पूरी तरह हिन्दुस्तानी थे, न पूरी तरह अंग्रेज। उनकी मरण थी।

बहरहाल, अपनी ‘जिज्ञासाएं’ शान्त करके वे तो चले गये, मैं लगातार एक अस्वस्ति का अनुभव करता हुआ बरामदे में बैठा रहा। मुझे एकाध बार यह भी लगा कि यह मैं किस चक्कर में पड़ गया हूं, क्योंकि ज्योत्सना जेकब के पत्रों से किसी किस्म की रहस्यमयता, या असामान्यता नहीं झलकती थी। दिन का वक़्त होता तो सम्भव है मैं ने अपना सामान उठाया होता और वहां से भग खड़ा होता। पर अब आठ से ऊपर हो चले थे और न तो मुझे रास्तों का कुछ अता-पता था, न गाड़ियों का। डा. जेकब के भाई ने एक पत्र-मित्र से सम्भावित मुलाकात को जान के वबाल में तब्दील कर दिया था। बहरहाल।

थोड़ी देर बाद किसी के आने की पदचाप सुनायी दी। बरामदे के बाहर घिरे अंधेरे से सूती साड़ी में मलबूस, सांवले रंग और देसी नख-शिख की एक नारी आकृति धीरे-धीरे रोशनी में नमूदार हुई। बरामदे की सीढि़यां चढ़ कर वह महिला, जो ग़ालिबन 35-36 बरस की रही होगी, मेरे पास आ पहुंची। मैं तब तक उठ कर खड़ा हो गया था। मैंने अपना परिचय दिया तो उस महिला ने कहा कि डा. जेकब तो बाहर गयी हैं, वे उनकी बहन हैं। उनके चेहरे पर कुछ ऐसा भाव था कि मुझे लगा कि वे मेरे साथ खिलवाड़ कर रही हैं। मैंने क्या जवाब दिया, मुझे याद नहीं, पर इतना तय है कि उस सारी रहस्यमयता, जिरह और चुहलबाजी से मेरे चेहरे पर खीझ जरूर झलकी होगी, क्योंकि जल्दी ही उन्होंने मुझे आश्वस्त करते हुए यह जाहिर कर दिया कि वे ही डा. जेकब हैं। फिर वे मुझे अन्दर के कमरे में ले गयीं, जहां उन्होंने मेरे ठहरने का इन्तज़ाम कर रखा था।

मैं थोड़ा सहज जरूर हो गया था, लेकिन भीतर मुझे वह निश्चिन्तता और सुकून नहीं था, जिसकी मैं उम्मीद करता था। यह तो मुझे अन्दाजा था कि डा. जेकब अविवाहित हैं और पास ही के शायद ईसाई मिशनरियों के ‘निर्मला हस्पताल’ में डाक्टर हैं; उनका बंगला भी उनके पुरखों के ईसाई सम्पर्कों की देन था। पर उनके घर में कुछ अजीब-सा अघरेलूपन था। एक भुतहापन-सा। मुक्तिबोधियन।

बहरहाल, उन्होंने बाथरूम दिखाया जो बंगले के दूसरे खण्ड में पीछे को था, हाथ-मुँह धोने की व्यवस्था की और फिर मेज़ पर खाना लगवाने से पहले मुझे बियर भी पेश की। लेकिन बातें उखड़ी-उखड़ी-सी ही होती रहीं, उनके पत्रों में जो गर्मजोशी झलकती थी, वह कहीं नहीं थी। इसके उलट वह एक पीडि़त, अकेली, उन्मन नारी का वार्तालाप था। बाद की किसी मुलाकात में शायद इतना अजीब और तबियत को उचटाने वाला न लगता, पर पहली ही भेंट में मुझे बेचैन और बेकल कर गया था। अगर साधन और सुविधा होती तो मैं खाना खाने के बाद ही भाग निकलता। ज्योत्सना ने अपने भाई के बारे में भी शिकायत की थी। ऐसा मुझे आभास हुआ था कि वह कुछ करता-धरता नहीं था और घर ज्योत्सना ही चलाती थी। तिस पर भी उस घर में घर जैसी कोई बात नहीं थी। कुछ द्वीप थे जो अपने अकेलेपन में उस बड़े-से बंगले की नीम-अंधेरी रहस्यमयता में खोये हुए थे। पूरा अंधेरा होता तो भी कुछ बचत थी, इस नीम-अंधेरे ने तो उस अमंगल-से, सिनिस्टर तिलिस्म को और गहरा कर दिया था।

खैर, खाना-वाना निपटा और आखिरकार मैं सोने चला गया। सोते वक्त ही मैंने तय कर लिया था कि सुबह होते ही मैं वहाँ से चल दूंगा। सुबह हुई तो मैं सामान बांध कर तैयार हो गया। जाहिर है डा. जेकब को यह उम्मीद नहीं थी कि मैं इस तरह तत्काल वहाँ से रवाना होने पर आमादा हो जाऊंगा। उन्होंने बहुत इसरार किया कि मैं दो-एक दिन ठहर कर जाऊं, वे मुझे आस-पास के इलाके में घुमाने ले चलेंगी, कि उनके पास कार है कोई दिक्कत नहीं होगी, लेकिन मैं हठ बांधे था। तब एक और अचरज प्रकट हुआ। डा. जेकब ने दो-तीन कमीजों और दो-तीन पतलूनों के कपड़े मुझे ला कर दिये कि उन्हें वे मेरे लिए लायी थीं। मैंने उनसे कहा कि अभी तो मैं तुरन्त भोपाल जाना चाहूंगा, इन कपड़ों को वे रखें, अगली बार मैं आऊंगा तो ले लूंगा।
हारे हुए स्वर में उन्होंने कहा कि ठीक है, मैं हड़बड़ी न करूं, वे मुझे कार पर भोपाल छोड़ आयेंगी, लेकिन वे कपड़े वे बड़े प्रेम से भेंट-स्वरूप लायी थीं, उन्हें मैं रख लूं। तब इसे समझौते का एक रास्ता बूझ कर मैंने कपड़े अपने बक्से में रख लिये।

नाश्ता करके तकरीबन दस बजे डा. जेकब ने कार निकाली और मुझे बिठा कर भोपाल की लिए चलीं। सफर एक-डेढ़ घण्टे का था और सारा रास्ता वे मुझे उलाहने देती आयीं कि उन्होंने क्या कुछ सोच रखा था, मैंने उनके सारे कार्यक्रम को उलट-पलट दियाजाहिर है डा. जेकब को यह उम्मीद नहीं थी कि मैं इस तरह तत्काल वहाँ से रवाना होने पर आमादा हो जाऊंगा। उन्होंने बहुत इसरार किया कि मैं दो-एक दिन ठहर कर जाऊं, वे मुझे आस-पास के इलाके में घुमाने ले चलेंगी, कि उनके पास कार है कोई दिक्कत नहीं होगी, लेकिन मैं हठ बांधे था। बीच-बीच में वे रोती भी रहीं।

आज सोचता हूं कि अगर मैं दिन के वक्त इटारसी पहुंचा होता और मैंने कुछ और समय डा. जेकब के साथ बिताया होता तो शायद ऐसी अप्रिय स्थिति न पैदा हुई होती। लेकिन तब ऐसी विचित्र परिस्थितियों से निपटने की सलाहियत मुझमें नहीं थी। बाद में एक बार जब वे इलाहाबाद आयीं और मुझसे मिलने मेरे घर आयीं तो हम बेहतर ढंग से मिले थे। तब परिवार संयुक्त था, मेरे माता-पिता जीवित थे, सुलक्षणा भी वहीं थी और सबने उनका स्वागत किया था। इसी तरह एक बार मेरे हैदराबाद जाते समय वे मुझसे स्टेशन पर मिलने आयी थीं और साथ में सैंडविच और काफी लायी थीं। गाड़ी कुछ देर इटारसी पर रूकती थी और हमने वहीं बेंच पर बैठ कर बातें की थीं। लेकिन उनसे पहली मुलाकात की स्मृति इतनी गहरी थी कि बाद की सहजता भी उसे धूमिल नहीं कर पायी थी। धीरे-धीरे पत्रों का आना-जाना बन्द हो गया था और बाद में ख़ुद मेरी ज़िन्दगी जिस तरह के तूफ़ानों में घिर गयी थी और मुझे किसी तरह अपने औसान क़ायम करने के लिए जो तगो-दौ करनी पड़ी थी, उसमें ज्योत्सना की खोज-खबर लेना सम्भव ही नहीं रहा था। वे भी यक़ीनन मुझ जैसे अनगढ़ मित्र से निराश ही हुई होंगी, इस में मुझे कोई शक नहीं है। किसी बहिया में बहे जा रहे दो तिनकों की तरह हम अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि लहरों के निर्णय से एक-दूसरे के करीब आये थे और लहरों के ही चलते अलग-अलग हो कर जाने कहां से कहां जा निकले थे।
(जारी)