Tuesday, August 25, 2015

मुसन्निफ़ की तलाश में


मुसन्निफ़ की तलाश में

एक किताब का ख़ाका




बया उरीद गर ईं जा बुवद ज़बाँदाने 
ग़रीबे-शहर सुख़नहा-ए-गुफ़्तनी दारद
((ज़बानें जानता हो जो बुला के लाओ उसे
शहर में एक परदेसी बताना चाहे बहुत कुछ))
-- ग़ालिब
दोस्तो, 
जैसे-जैसे हम साठे-तो-पाठे की मसल पर पाठे होने के बाद बाइबल के तीन कोड़ी और दस बरस की तरफ़  बढ़ते गये हैं, हम देख रहे हैं कि दिमाग़ का ख़लल और दिल का जुनून उसी रफ़्तार से बढ़ता गया है. उम्र कम होती देख कर ग़ैब ने भी, हमारे साईं ने जैसे कहा था, ख़यालों में मज़ामीन भेजने की कुछ ज़ियादा ही ठान ली है. मगर ऐसा तो हमारे साईं के साथ भी हुआ था (हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले). बहरहाल, चूंकि आजकल रात बहुत देर हो जाती है, ज़िन्दगी कुछ ठीक नहीं चल रही, चुनांचे सुबह कुछ अजीब-ओ-ग़रीब ख़याल आते हैं. 

आज ग़ैब ही से आया एक नाम उस्ताद अब्दुल करीम ख़ां साहब. हमने यूट्यूब खोला और अपनी पसन्दीदा दो रचनाएं सुनीं -- एक भैरवी और एक मराठी जिसके दो रूप मिले.फिर जाने क्या सूझी साहेबो, हमने विकीपीडिया पर उस्ताद साहब का पेज खोला. पढ़ने से पहले दायीं तरफ़ नज़र डाली देखा जन्म और मौत की तारीख़ों के नीचे औलाद के नाम पर लिखा था सुरेशबाबू माने. हम एकबारगी चकरा गये. ख़ान साहब की ज़िन्दगी के बारे में पढ़ा. पैदाइश सन 1872 में कैराना, मुज़फ़्फ़रनगर, उत्तर प्रदेश एक क़दीमी मूसिकारों के ख़ानदान में. तालीम अपने वालिद उस्ताद काले ख़ां साहब से और चचा अब्दुल्ला ख़ां से और कुछ रहनुमाई एक और चचा नन्हे ख़ां से. पहले सारंगी में शुरुआत, फिर वीणा, तबला और सितार को आज़माने के बाद गायन का फ़ैसला. अपने भाई अब्दुल हक़ के साथ गाने की शुरुआत और जगह-जगह राह-पैमाई. आख़िर पहुंचे बड़ौदा जहां दोनों को दरबारी संगीतकार का दर्जा मिला. 

यहीं से क़िस्मत ने अपना खेल दिखाना शुरू किया. राजमाता के भाई थे मराठा गोमान्तक सरदार मारुति राव माने, जिनकी बेटी तारा बाई को सिखाते-सिखाते कब दोनों इतने क़रीब आ गये कि पता भी न चला और दोनों शादी की ठान बैठे. ख़ूब बावेला मचा. मगर सरदार सरदार थे तो तारा बाई दुख़्तरे-सरदार. देश निकाला मिला उस्ताद को भी, उनकी नयी ब्याही बीवी को भी और भाई को भी. अब्दुल करीम ख़ां साहब बम्बई चले आये और वहां बस गये. 1902-1922 के बीच पांच बच्चे हुए -- अब्दुल रहमान, कृष्ना, चम्पा कली, गुलाब और सक़ीना. 1922 में ताराबाई ने पति से अलग होने का फ़ैसला किया और बच्चों का फिर से नामकरण किया और अब्दुल रहमान, कृष्ना, चम्पा कली, गुलाब और सक़ीना बन गये (रुकिये और दिल थाम कर बैठिये, क्योंकि यहीं से इस क़िस्से का सबसे बड़ा मोड़ आने वाला है) सुरेशबाबू माने, हीरा बाई बड़ोदकर, कृष्ण राव माने, कमला बाई बड़ोदकर और सरस्वती राणे. जी, वही हीरा बाई बड़ोदकर जिन्हें सरोजिनी नायडू ने गान कोकिला कहा था और वही सरस्वती राणे जिन्होंने अपने पार्श्व गायन से धूम मचा दी थी. इसके बाद उस्ताद का गाना भी बदल गया, उसमें ज़्यादा अवसाद आया गहराई आयी. वे और दक्षिण उतरे और संगीतकारों की स्वाभाविक जन्मभूमि कोल्हापुर, धारवाड़ और मैसूर आने-जाने के क्रम में मिरज में बस गये. इससे पहले वे 1913 में पूना में आर्य संगीत विद्यालय खोल चुके थे जहां वे अन्य उस्तादों के उलट सबको तालीम देते थे. यही सिलसिला बाद में भी चलता रहा जब उन्होंने अपने चचेरे भाई उस्ताद वहीद ख़ां के साथ किराना घराना की शाख़ वहां जमायी और करनाटकी शैली के मेल से एक क्रान्ति पैदा कर दी.

आर्य संगीत विद्यालय में उस्ताद साहब से संगीत की तालीम हासिल करने के लिए  1920 में आयी 1905 में गोआ में जन्मी सरस्वतीबाई मिरजकर नाम की शिष्या भी थी. ख़ान साहब और ताराबाई के सम्बन्ध-विच्छेद के बाद उस्ताद साहब ने सरस्वतीबाई से शादी कर ली जिन्होंने अपना नाम बानूबाई लत्कर रख लिया और दोनों मिरज जा कर बस गये और मद्रास और मिरज में समय गुज़ारने लगे. बानूबाई के पहले-पहले रिकार्ड 1937 में रिलीज़ हुए, ख़ान साहब के गुज़रने के बाद. मिरज में ख़ान साहब की दुनियावी विरासत उन्हीं को मिली और वे मिरज ही में रहीं. धीरे-धीरे उन्होंने अपने को संगीत की दुनिया से पीछे खींच लिया और एक नितान्त निजी ज़िन्दगी जीती रहीं. 1970 में मिरज में उनका इन्तेक़ाल हुआ और वहीं उस्ताद साहेब की क़ब्र के बग़ल में उन्हें दफ़्नाया गया. 

लेकिन हज़रात और ख़वातीन, हमारा मक़सद सिर्फ़ उस्ताद साहब की ज़िन्दगी का बयान करना ही नहीं था. यह तो असली तरंग-ए-ग़ैब की भूमिका थी. हमारी दिलचस्पी का सबब यह था कि वो कौन-सी बात थी जिससे ताराबाई लगभग पच्चीस साल की शादी-शुदा ज़िन्दगी को छोड़ कर अलग हो गयीं और उन्होंने बच्चों के दोबारा नामकरण भी कर डाले. ख़याल रहे कि अलहदगी के समय बड़े बेटे की उमर थी बीस और सबसे छोटी की नौ. क्या सरस्वतीबाई मिरजकर का भी कोई दख़ल इसमें था ?

चूंकि इस प्रसंग का हमारी ज़ाती ज़िन्दगी से भी कुछ कांटा भिड़ता है, चुनांचे: हमें इसमें एक बड़े उपन्यास की सम्भावना नज़र आयी. मज़े की बात यह है कि बेटे को तालीम बाप ने दी और बड़ी बेटी को उसके चचा उस्ताद वहीद ख़ां साह्ब ने. उस्ताद अब्दुल करीम ख़ां के सबसे बड़े शिष्य थे सवाई गन्धर्व और शिष्या सुरश्री केसर बाई केरकर. यह वही किराना घराना 

याद रहे यह वो ज़माना था, जब सामने बैठ कर सुनने की सहूलत ही थी, छोटी महफ़िलों से ले कर बड़े-मझोले सम्मेलनों तक. फिर आया गिरामोफ़ोन का युग. पहले-पहले 78 RPM (revolutions per minute) रिकार्ड बने. मीयाद 3-3.30 मिनट. अब सोचिये, पक्के राग जो रात-रात भर गाये जाते थे, 3-3.30 मिनट में पेश करने पड़े. यहीं उस्ताद अब्दुल करीम ख़ान साहब की प्रतिभा के दर्शन होते हैं. यही गुण बहुत बाद में चल कर हमें रवि शंकर और विलायत ख़ां और अमीर ख़ां साहब में नज़र आता है.

इसी मुक़ाम पर पहुंच कर इस कहानी में गौहर जान की कहानी भी जोड़ी जा सकती है जो अब्दुल करीम ख़ान साहब से एक साल बाद 1873 में पैदा हुईं और उस्ताद साहब से सात साल पहले 1930 में गुज़र गयीं. गौहर जान का जन्म पटना में ऐन्जेलीना येओवर्ड के रूप में हुआ था. पिता विलियम राबर्ट येओवर्ड आर्मीनियाई यहूदी थे जो आज़मगढ़ में बर्फ़ फ़ैच्टरी में इन्जीनियर थे जिन्होंने 1870 में एक आर्मीनियाई यहूदी लड़की ऐलन विक्टोरिया हेमिंग से शादी की थी.विक्टोरिया का जन्म और लालन-पालन हिन्दुस्तान में हुआ था और उन्हें संगीत और नृत्य की तालीम मिली थी.  दुर्भाग्य से, 1879 में यह शादी नाकाम साबित हुई और मां-बेटी पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. विक्टोरिया अपनी बेटी को ले कर 1881 में एक मुस्लिम सामन्त ख़ुर्शीद के साथ, जो विक्टोरिया के संगीत को उनके पति की बनिस्बत ज़्यादा सराहते थे, बनारस चली आयीं. आगे चल कर विक्टोरिया ने इस्लाम अपना लिया और अपना नाम मलिका जान और बेटी का नाम गौहर जान रख दिया.

1902 में हिन्दुस्तानी संगीत के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना हुई. इसी साल "ग्रामोफ़ोन कम्पनी" ने गौहर जान को आमन्त्रित किया कि वो कम्पनी के लिए गानों की एक श्रृंखला रिकार्ड कर दें. ये रिकार्ड बरसों तक कम्पनी की शान बने रहे. गौहर जान को हर रिकार्ड के लिए 3000 रु. दिये गये थे जो उस समय के हिसाब से एक बहुत बड़ी रक़म थी. 1902-1920  तक गौहर जान ने दस भाषाओं में  600 से ज़्यादा गाने रिकार्ड कराये. वे हिन्दुस्तान की पहली "रिकार्डिंग सितारा" बनीं, जिन्होंने बहुत जल्द ही रिकार्डों की अहमियत समझ ली थी. इसे भी दर्ज किया जाना चाहिये कि गौहर जान ही ने शास्त्रीय टुकड़ों को 3-3.30 मिनट में पेश करने की हिकमत विकसित की थी, क्योंकि 78 RPM वाले तवों की बन्दिश के चलते "ग्रामोफ़ोन कम्पनी" ने इस पाबन्दी पर ज़ोर दिया था. और यह मान-दण्ड तब तक क़ायम रहा जब तक कि कई दशकों बाद एक्स्टेण्डेड प्ले और लौंग प्ले रिकार्ड नहीं बनने लगे. 

चूंकि अब्दुल करीम ख़ान साहब ख़ुद ग्रामोफ़ोन तवों की अहमियत से वाक़िफ़ थे और 78 RPM के रिकार्डों की बन्दिश के अन्दर-अन्दर शास्त्रीय राग पेश करने का एक मेआर क़ायम कर रहे थे, चुनांचे वे गौहर जान से नावाक़िफ़ तो नहीं ही होंगे. 

कौन लिखेगा यह कहानी जो खां साहब के माध्यम से किराना घराने और जयपुर अतरौली घरानों को जा कर जोड़ती है धारवाड़-कोल्हापुर-मिरज में ? जिससे सवाई गन्धर्व, केसरबाई केरकर और आगे चल कर वसवराज राजगुरु, गंगूबाई हंगल, भीमसेन जोशी, हीराबाई बड़ोदकर, बेगम अख़्तर और मुहम्मद रफ़ी जैसे गायक और रामनारायण जैसे सारंगी वादक निकले. कौन लिखेगा ख़ां साहब की अपनी व्यथा और तारा बाई की और बच्चों की. और गौहर जान और उनके योगदान की. आह ! साहबो, हमें तो उमर ने इस लायक़ नहीं रखा कि बिना अच्छी तरह पड़ताल और जानकारी के ये क़िस्सा लिख सकें. वरना क़सम अपनी देवी सरस्वती की, पच्चीस का सिन होता तो जाते, पांच बरस पता लगाने में लगाते और पांच लिखने में. मगर तब तक क्या हमारी ज़िन्दगी मे वो ज़लज़ला आ चुका होता जो खां साहब की ज़िन्दगी में पचास बरस और हमारी ज़िन्दगी में इक्यावन बरस की उमर में आया जिसने हमें इस क़िस्से की कुछ बारीक़ियां समझने की सलाहियत दी ? है कोई मर्द-ए-मैदां, कोई जीवट वाली ख़ातून जो इस काम को ख़ुश-असलूबी से करे. वैसे, जब हम ये सब लिख चुके थे तो हमें इत्तफ़ाक़ से  जानकी बाखले की किताब Two Men And Music: Nationalism In The Making Of An Indian Classical Tradition का पता चला. जो थोड़ा-बहुत अंश फ़्लिपकार्ट वालों ने बतौर झलक दिखाया उससे अन्दाज़ा हुआ कि इस घराने की काफ़ी कुछ जानकारी वहां से मिल सकती है. उस्ताद अब्दुल करीम ख़ां और ताराबाई वाला प्रसंग भी प्रसंगवश उसमें आया है. मगर बहुत कुछ ऐसा है जिसके लिए कैराना, बड़ोदा, बम्बई, पूना, कोल्हापुर, धारवाड़, मिरज, मैसूर और मद्रास की यात्रा करने, संगीत के प्रति दिलचस्पी होने, संगीत सीखने-सिखाने और रियाज़ करने की  और उस ज़माने की रिकौर्डिंग तकनीक और माहौल की जानकारी हासिल करने और थोड़ा-सा उस ज़माने के इतिहास को जानने की दरकार पड़ेगी. काम मुश्किल ज़रूर है, पर नामुमकिन नहीं. और यह तो हमारा उस महान साझी हिन्दुस्तानी परम्परा के तईं हमारा ख़िराज होगा, बशर्ते कि हम इस महान परम्परा और उसके वुजूद को तस्लीम करें. आज तो हालात ने हमें बहुत मजबूर कर दिया है, पर अगर हमारे पास ज़राए’ होते तो आज के हिसाब से हम दो लाख रुपये इस काम के लिए वक़्फ़ कर देते. कल अगर हालात ने पलटा खाया और हम इस क़ाबिल हुए तो हम ये रक़म देने में उज्र न करेंगे. पैसे का ज़िक्र हमने इसलिए किया कि जज़्बे और मेहनत और लगन का कोई मोल नहीं  दिया जा सकता, वह अनमोल है, पर जो यात्राएं हमने तजवीज़ की हैं, उनमें पैसा लगता है, मय किराये-भाड़े के, अगर सेकेण्ड क्लास भी जाया जाये. कुछ किताबें जुगाड़नी पड़ेंगी. एक सफ़री टेप रिकौर्डर और कैसेट लेने होंगे. और भी कुछ अख़राजात हो सकते हैं. हम महात्मा गान्धी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के लिए कुछ इसी क़िस्म का काम कर चुके हैं, चुनांचे तजरुबे से बोल रहे हैं. एहतियात रहे कि अगर इस पर उपन्यास न भी बन पड़े, तो कम-अज़-कम एक बेहतरीन क़िस्से का मज़ा ज़ुरूर रहे, जिसका मेआर जनाब शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने अपने तवील क़िस्से "कई चांद थे सरे-आस्मां" में क़ायम कर दिया है.  है कोई मर्द-ए-मैदां, कोई जीवट वाली ख़ातून ?
(तमामशुद)

Friday, July 31, 2015

अपने आप से लम्बी बहुत लम्बी बातचीत



#

अपने आप से एक लम्बी 
बहुत लम्बी बातचीत करने के लिए 
तुम ढूँढते रहे हो
इस शहर के सम्पूर्ण विस्तार में
कोई एक निजी और बेहद अकेली जगह
जो कहीं भी तुम्हें अपने आप से अलग नहीं होने देगी
2.
सारे का सारा दिन
एक डूबता हुआ जहाज़ है।
अर्से से डूबता हुआ।
सारी शक्ति से समुद्र के गहरे अँधेरे को
अपना शरीर समर्पित करता हुआ।

जहाज़। धूप में। डूबता हुआ।
अर्से से डूबता हुआ।
असफल। नाकामयाब...
...और रात। रात नहीं,
चारों ओर फैला वहीं अटल और आदिम कारागार है -
अपने अन्धकार के साथ इस धरती की उर्वरता पर छाया हुआ

परती पर उगा कारागार
जिसके पार
अब कोई आवाज़ - कोई आवाज़ नहीं आती
सच्ची बात कह देने के बाद
कोई चीख़ नहीं... कोई पुकार नहीं....
कोई फ़रियाद नहीं... याद नहीं...
तुम्हारा अकेलापन इस कारागार का वह यातना-गृह है,
जहाँ अब बन्दियों के सिवा कोई नहीं।
कोई नहीं, चीख़ता हुआ और फ़रियाद करता हुआ और उदास...
उदास और फ़तहयाब...
सच्ची बात कह देने के बाद
3.
सच्ची बात कह देने के बाद 
चुप हो कर तुम सहते रहोगे इसी तरह
उस सभी ‘ज़िम्मेदार और सही’ लोगों के अपमान।

नफ़रत करते हुए और जलते हुए और कुढ़ते हुए।

क्योंकि तुम्हें लगता है,
चालू और घिसे-पिटे मुहावरों के बिना 
जी नहीं सकता
तुम्हारा यह दिन-दिन परिवर्तित होता हुआ देश।

सच्ची बात कह देने के बाद तुम पाते हो,
तुमने दूसरों को ही नहीं,
अपनों को भी कहीं-न-कहीं
ढा दिया है
और तुम चुपचाप और शान्त
अपने साथियों की शंका-भरी नज़रें देखते हुए टूट जाते हो।

इसी तरह टूटता रहता है हर आदमी निरन्तर
शंका और भय और अपमान से घिरा हुआ -
सच्ची बात कह देने के बाद
लोगों से अपमानित होते रहने की विवशता
नफ़रत करते, जलते और कुढ़ते रहने की आग से
गुज़रते रहने के बावजूद - सहता हुआ।
4.
मैं एक अर्से के बाद अपने शहर वापस आया हूँ
और मुझे नहीं लगता, इस बीच 
कहीं भी कोई अन्तर आया है

कोई अन्तर नहीं:
मोमजामे की तरह सिर पर छाये आकाश में,
जाल की तरह बिछी हुई सड़कों, अँधेरी उदास गलियों 
और मीलों से आती हुई,
गन्दे नालों और अगरबत्ती की मिली-जुली बास में

कोई अन्तर नहीं:
लोगों के निर्विकार भावहीन चेहरों में
उनकी घृणा में, द्वेष में

कोई अन्तर नहीं:
शहर के दमघोंटू, 
नफ़रत और पराजय-भरे परिवेश में
सिर्फ़ शहर में जगह-जगह उग आये हैं
कुकुरमुत्तों की तरह
कुछ खोखले, रहस्यमय और खँडहरों जैसे टूटते हुए मकान

क्या इस अन्तर में उतनी ही सच्चाई है
जितनी नींद से सहसा जागने पर
स्वप्न की सच्चाई होती है ? 
नहीं। यह स्वप्न नहीं है।
एक लम्बे अर्से से टूटता हुआ ताल-मेल है।

जिसके अन्दर ज़हरीली लपटें छोड़ते 
वही सदियों पुराने विषधर हैं
वही दलदल है
अन्दर और बाहर फैलता हुआ लगातार
वही दलदल। वही रेत। वही अँधेरी गलियाँ।
बाँझ विष-भरी बेल
विरासत में मिला हुआ वही घातक खेल
जिसमें हारे जा कर भी लोग
अपना भविष्य
ख़ाली आसमान की तरह ढोते हैं

स्वप्न नहीं है यह। ताल-मेल है।
टूटता हुआ। लम्बे अर्से से।
5.
तुम पूछते हो, मैं क्यों हूँ ?
इस भ्रष्ट और टूटते हुए माहौल में रहने के लिए
घृणा और द्वेष सहने के लिए
मुझे किसने विवश किया है ?
क्यों मैं इस विषधर-हवा में रह कर लगातार
अन्दर और बाहर कटुता सँजोता हूँ ?

किसी भी चीज़ पर इलज़ाम लगाना बहुत आसान है
सहना - बहुत मुश्किल

भाषा पर नाकाफ़ी होने का इलज़ाम
दोस्त पर ग़द्दार होने का इलज़ाम
सबसे आसान है: चीज़ों के, हालात के
अपने ख़िलाफ़ होने का इल्ज़ाम 

जबकि मैं जानता हूँ: एक सही इल्ज़ाम भी होता है
अकर्मण्यता का
जिसका दाग़ तुम्हारे माथे पर हो सकता है

सुन पाते हो तुम अब अपनी ही आवाज़
देख पाते हो अब तुम
सिर्फ़ अपना ही सूखा और उमर-खाया चेहरा 
पढ़ते हो अब सिर्फ़ अपनी शादी पर लिखा गया सेहरा
(जिसमें कुछ भी सच नहीं, सिवाय नामों के)

तुम भूल गये हो बाक़ी नाम
भूल गये हो बाक़ी चेहरे
अपने हमशक्ल गिरोह में खो गये हो
ज़िन्दगी के लम्बे मैदान को बेचैनी से पार करते हुए

नहीं। अब हम एक-दूसरे की चीख़ों में से
नहीं गुज़र सकते - लावे की तरह

अब सह नहीं सकते हम
वह भय और आतंक और घृणा
और शंका और अपमान। सब कुछ।

क्योंकि नफ़रत आख़िर क्या है ?
क्या वह धीरे-धीरे अपने अन्दर
निरन्तर नष्ट  होते रहना नहीं है ?
नष्ट होते रहना। लगातार।
6.
मैं जानता हूँ,
अपने संसार से कलह
तुम्हारा शौक़ नहीं मजबूरी है
तुम्हारी ज़बान पर रखी गयी भाषा
और तुम्हारे मन्तव्य के बीच
 एक अलंघ्य दूरी है
जिससे भाषा अपने अर्थ को खो कर भी
   जीवित रहती है
और रोज़ नये तानाशाहों के कील-जड़े बूट
अपने सीने पर सहती है
और तुम अपनी ओर तनी पाते हो
अपने साथियों की आरोप-भरी उँगलियाँ।

टूटे हुए हाथों में थामे हुए, 
अपना जलता और सुलगता दिमाग़
अब कहो
क्या तुम कोई नया और कारगर झूठ रच सकते हो ?
इस दलदल में डूबने से कैसे बच सकते हो ?
7.
इसीलिए मैंने अपने रंग-बिरंगे वस्त्रों को
अजानी यात्राओं पर निकले हुए
काफ़िलों के हाथ बेच दिया
और इस अन्धे कुएँ में चला आया।

यहाँ इतना सन्नाटा है कि सुनाई देता है
और गहराती साँझ में चमकता हुआ शुक्र
कभी-कभी आँखों में
बर्छी की चमकती हुई नोक-सा धँसता चला जाता है।
तुम मुझे इस अन्धे कुएँ के
बाहर निकालने के लिए हाथ बढ़ाते हो
जब कि मैं जानता हूँ,
इस कुएँ से बाहर निकलना
एक और भी ज़्यादा अँधेरे मैदान में
  ख़ूँख़ार सुनसान में
खो जाना है

जहाँ आदमी नहीं जानता
कि वे राहें कहाँ जाती हैं
जो इस तरह बिछी हुई हैं
उसके अन्दर और बाहर
और आँखें उठाने पर पाता है
पुतलियों के सामने
गहरे रंगों से पुते हुए अन्तहीन अँधियारे क्षितिज।
और किसी भी समय अपने आपको अलग कर सकता है
अपने एहसास से। दरकते विश्वास से।
स्पर्श की माँग को झुठला कर।

इसी तरह मैंने अपने चारों ओर देखा और जाना
मैंने इसी तरह इस संसार को परखा
और इसके घातक सौन्दर्य को पहचाना

यही वह पहचान है। बहुत गहरी पहचान।
आँखों की पथरायी पुतलियों से हो कर
जलते हुए दिमाग़ के स्तब्ध आकाश तक

मैंने तुम्हारे ताल-मेल को बदलना छोड़ दिया है
आख़िरकार।
और अब मुझे अपने गूँगेपन के इस अन्धकार में
बहुत ज़्यादा - बहुत ज़्यादा आराम है।
8.
मुझे नहीं लगता, हमारे बीच
किसी तरह का सम्वाद अब सम्भव है।
मेरे साथ अब तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं रह गया है
जब से मैंने अपने लिए चुन लिया है देश
   दमन और आतंक, घृणा और अपमान और द्वेष
तुम्हें सिर्फ़ एक आशंका है
मैं किसी भी दिन तुम्हारे कुछ भेद खोल सकता हूँ
सरे आम।
और मुझे मालूम है,
इसे रोकने के लिए तुम कुछ भी कर सकते हो।
लेकिन मैं अभी तक निराश नहीं हुआ
मैं अब भी तुम्हारे पास खड़ा रहता हूँ, शायद कभी
जब तुम याद करने की मनःस्थिति में हो या फिर उदास
मैं तुम्हें उस घर की झाँकी दिखा सकूं
जिसे छोड़ कर तुम
अन्धकार में उगे हुए इस कारागार में चले आये थे
और तुमने उसे ढूँढ लिया था आख़िरकार
वह जो तुम्हारे अन्दर बैठा हुआ
लगातार तुम्हें सब कुछ सहने के लिए
विवश करता रहता था
जो अपनी तेज़ और तीख़ी आवाज़ में
तुमसे पूछता रहता था:
”कौन-सा रास्ता इस नरक के बाहर जाता है ?“

निश्चय ही एक बहुत बड़ी आस
मुझे तुम्हारे पास
खड़े रहने पर विवश करती है
और तुम्हारी ख़ामोशी की तराश को चुपचाप सहती है
एक समय था, जब तुमने निरन्तर
मेरा अपमान करने की कोशिश की थी
पर मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया है
आख़िरकार
और मन पर पड़े धब्बों को
आईने की तरह साफ़ कर दिया है।
9.
तुमसे कहने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है
मैंने अपने ऊपर ओढ़ लिया है आकाश
और हरी घास की इस विशाल चरागाह पर
पाप की तरह फैल गया हूँ
मुझे ख़ुद कभी-कभी आश्चर्य होता है। बहुत आश्चर्य 
मैं तुम्हारे साथ क्यों हूँ ?
जबकि तुम्हारे चारों ओर घिरा हुआ
तुम्हारा परिवेश है
दमन है। आतंक है। नफ़रत, अपमान और द्वेष है
क्या तुम्हें कभी इस पर विश्वास होगा
मुझे सचमुच तुमसे कोई आकांक्षा नहीं है
तुम अब भी लौट सकते हो
बड़े आराम से। धूप में पसरी हुई उन्हीं चरागाहों में
जहाँ तुमने एक-एक करके छोड़ दिये थे
अपने सारे आकाश।
नहीं। मुझे यह कभी नहीं महसूस हुआ -
अपने और तुम्हारे सम्बन्धों को स्पष्ट करने के लिए
मुझे किसी व्याख्या की ज़रूरत है।
मैं - जो तुम्हारी उस घातक सक्रियता का आखेट हूँ
आज लौट जाना चाहता हूँ। वापस
यात्रारम्भ के उसी स्थान पर
जहाँ पाँसों के खेल से नियन्त्रित होता है
द्रव्य के एक गाढ़े घोल में
पूरा-का-पूरा वंश-वृक्ष
10.
तुम्हें इसका ज़रा भी आभास नहीं है पिता
कि तुम कभी-कभी मुझे कितना उदास कर जाते हो।

वह जो मुझसे बार-बार उप न कर बहता रहा
वह जिसे सहा मैंने लगातार
वह जिसकी प्रखर धूप मुझे झुलसाती रही
वह जिसकी आभ मुझे निराभ कर जाती रही
वही रस। लपटों के बीच से वही रस
मुझे पुकारता है। जो मेरा शरीर है

रौंदी हुई घास पर पैरों के निशान
सीने पर महसूस करते हुए
मैं आम पर फूटते बौर को देखता
और दहकते पलाश को याद करता
जब एक तेज़ चाकू की तरह काम करता था वसन्त
और रंग हवा के साथ मिल कर एक ऐसी साज़िश रचते
जिससे धूप ख़ून में उबलती हुई महसूस होती।

बहुत-से दिन मैंने इसी तरह बिताये हैं।
बहुत-सी रातें
निरर्थक प्रतीक्षा की तरह लम्बे, बहुत लम्बे दिन
जिनकी सुनहली धूप मेरी याददाश्त पर पसरी हुई है
मेरे चाहने या न चाहने के बावजूद
जबकि दिमाग़ आजकल बिलकुल सुन्न हो गया है
तुम्हें इसका ज़रा भी आभास नहीं है पिता
कि तुम कभी-कभी मुझे कितना उदास कर जाते हो

तुमने मुझे मेरे बचपन की चित्रावलियों के काट कर
वयस्कता के कैसे घृणा-भरे नरक में धकेल दिया है
जहाँ सहसा और अनायास।
मैं अपंग हो गया हूँ - और असहाय

तुम्हें मालूम है, मैं किस तरह चुपचाप नगर में
बिलकुल अकेला चला जाता
और अपनी देह बार-बार खो आता

अगले दिन मेरे मित्रों को आश्चर्य होता
जब वे पाते मेरे चेहरे पर 
अजाने वृक्षों की घनी, गहरी चितकबरी छाया।

मेरे सामने से रात के पिछले पहरों में एक जुलूस गुज़रता
असमर्थ और अशक्त हिलती हुई भुजाओं का। पैरों का।
शराबी क़हक़हे सड़क से चाँदनी पर तैरते हुए आते।
और मुझे सौंप जाते: उनींदी रातें। जलती हुई आँखें।
अपने ही टूटे हुए संसार का अकेलापन।

कभी-कभी चाँदनी मेरे कमरे में घुस आती
निर्विरोध और चुपचाप
और उसे पकड़ने के लिए बढ़ते हुए मेरे हाथ, मेरी बाँहें
लहर लेते विषधरों में बदल जातीं
मैं इसी तरह निःशब्द
अपने कमरे के बाहर फैले कारागार में देखता रहता
और धीरे-धीरे किसी सुनसान प्रहर में
सामने बाग़ में लगे कचनार के पेड़
चाँदनी में ख़ाम¨श
एक-दूसरे में
घुल-मिल जाते

कभी-कभी मैं भोर मैं
किसी लता को अपने चारों ओर लिपटी पाता
और नींद के हलके झँकोरे से अचानक जाग पड़ता

लेकिन वह। मेरी देह। जिसकी मुझे तलाश थी।
कहीं उस चाँदनी में। शराबी क़हक़हों में।
आपस में गुत्थम-गुत्था पेड़ों में।
भुजाओं के जुलूस में। अपने चारों ओर लिपटी लता में।
या अपने मकान के जहाज़-नुमा खँडहर में
खोयी रह जाती।
11.
मैं समझता था -
इस खँडहर के अन्दर से 
एक विशाल इमारत खड़ी हो जायेगी
रात के अन्तिम पहरों में।
चाँदनी में निःशब्द घुलती हुई। अदृश्य

कभी-कभी मैं प्रतीक्षा करता रह जाता।
कुछ होगा। कुछ होगा,
मैं सोचता,
कुछ ऐसा होगा
जो सब कुछ बदल देगा।

जो बदल देगा उनींदी रातें। जलती हुई आँखें।
परती पर उठे हुए अन्तहीन कारागार।
मेरी शाखों को खाते हुए धुँधुआते अन्धकार।

ओर। दोनों शिखरों के बीच एक गहरी घाटी उग आयेगी
जिसकी सुनहरी शान्ति में
अपनी सारी शक्ति के साथ
मैं दौड़ता हुआ निकला जाउँगा
फिर कभी इस धुँधुआते अँधेरे में वापस नहीं आऊँगा।
12.
तभी एक दिन।
एक दिन अचानक,
अनजाने ही। पिता
तुमने मुझे खिलौनों की जगह दे दिये थे - शब्द
जलते हुए और चीख़ते हुए और उदास।

यह तुम्हारी अन्तिम और सबसे कामयाब साज़िश थी।

तुमने मुझे मेरे बचपन से
या मेरे बचपन को मुझसे
काट कर अलग कर दिया था
और अपनी नसों में उबलते हुए लावे को
बरदाश्त करता हुआ
मैं बहुत जल्द ही ज़िन्दगी के प्रति कटु हो गया था।

मैंने तब भी तुमसे कुछ नहीं कहा था।
मैं तो एक ऐसी स्पष्टता चाहता था
जिससे अपने बचपन को अच्छी तरह देख सकूं ।

क्या तुम खड़े रहोगे। इसी तरह। हमेशा-हमेशा के लिए।
घर की एक मात्र खिड़की के सामने। बाहर से आती हुई
सुनहरी रोशनी को झेलते हुए। रोकते हुए।
घर को अपनी विशाल परछाईं में
डूब जाने के लिए विवश करते हुए।

और वह सब जो बाहर है और मोहक है,
उसका एहसास मुझे
तुम्हारी इस चितकबरी परछाईं पर हिलते हुए प्रकाश-धब्बों
या टूट कर विलीन होती आकृतियों ही से होगा।
13.
तभी मैंने तय कर लिया था,
दिन में अपना समय काटने के लिए
मैं रात में दबे पाँव जा कर चुरा लाऊँगा
दूसरों के अन्तहीन दुःस्वप्न। उनींदी रातें।
दुरूह और उलझे हुए विचार। परेशान घातें।

मैं सोचता, मैं चुरा लाऊँगा
दूसरों की खिड़कियों के अन्दर आने वाला
अवरोधहीन प्रकाश

और इस सब में डूब कर
अपनी उस देह की तलाश करूंगा
जिसे मैं बहुत पहले
घर के बाहर लगे कचनार के
उन गुत्थम-गुत्था पेड़ों के पास
कहीं खो आया था।
लेकिन फ़िलहाल। फ़िलहाल तो मैं ही रह गया हूँ
अब असमाप्त। निरुद्देश्य।
बेचैनी के रंग को पहचानने के बाद।
14.
हवा के रुख़ को जानने के बाद
काले आकाश पर छाये हुए बादलों के जहाज़
अकस्मात बह निकलते हैं -
एक अन्तहीन और निरुद्देश्य यात्रा को
जहाँ हमें सभी रास्तों के अन्त में
मिलती है वही एक निर्वासित मूर्ति
और कहीं भी वह पहचान नहीं रह जाती।

मैं पाता हूँ अपनी स्मृति इसी मूर्ति के ख़ून से रँगी हुई -
एक रक्ताभ और अविस्मरणीय यात्रा -
अस्त होते सूर्य से फीके क्षितिज की निराभ छाया में
15
तुम ढूँढते रहे हो निरन्तर
इस शहर के सम्पूर्ण विस्तार में
अन्तर के सुलगते अन्धकार में
अपने आप से एक लम्बी
बातचीत करने के लिए
कोई एक निजी और अकेला स्थान
जो तुम्हें कहीं भी अपने आप से अलग नहीं होने देगा।
16.
तुम्हारी आँखों से होता हुआ
तुम्हारे अन्तर में उग आया है
एक उदास अनमना बियाबान


जिसे कुतरते रहते हैं बारी-बारी से
रात और दिन। निःस्तब्धता और कुहराम
नफ़रत। प्रेम। पाप। प्रतिकार। प्रतिशोध।

एक उदास अनमना बियाबान
तुम्हारे अन्तर में। तुम्हारी आँखों से

सब कुछ उन्हें दे देने के बाद भी
तुम्हारे अन्तर में झरता हुआ
वही एक अछूता संगीत
जिसमें सारे-का-सारा दिन एक डूबता हुआ जहाज़ है
अर्से से डूबता हुआ
जिसकी धूप से रँगे हुए मँडराते विचार
नीली नदियों की तरह
तुम्हारे दिमाग़ के रेतीले कछार में विलीन होते रहते हैं

और रात...
... रात और एक विचित्र संसार
अन्तर्मुखी विचित्र संसार

दबे पाँव तुम्हारे सपनों पर
तुम्हारे मस्तिष्क के तरल फैलाव पर
किसी डरावनी छाया की तरह उतरता हुआ
17.
तुमने क्यों सौंप दिया है अपने आप को
उनींदी रातों के इस ज़हरीले संसार के हाथों
जबकि तुम्हारे अन्तर के गहन अन्धकार में से हो कर
अब भी गुज़रता है
आवाज़ों का वह अन्तहीन जुलूस।

बार-बार वही-वही चेहरे बेनक़ाब 
वही अजीबो-ग़रीब सूरतें
चीख़ती हुईं और फ़रियाद करती हुईं और उदास...
और फ़तहयाब...

आख़िर तुम्हें कब तक
उन्हीं चेहरों का सामना करते रहना पड़ेगा
जो रात में अपने मुखोश उतार कर
तुम्हारी आँखों के सामने नाचने लगते हैं।

उन्होंने मुझे सौंप दिया है
उनींदी रातों का यह अन्तहीन अन्धकार
बंजरता से फूट कर निकलता हुआ
नफ़रत और द्वेष और अपमान की दीवारों से बना
वह अन्तर्मुखी निःस्तब्ध कारागार।
इतने सारे दिवंगत और तुम्हारे चारों ओर - ख़ालीपन
और अधिक - और अधिक घिरता हुआ ।
तुम्हें क्यों महसूस होता है,
तुम्हारे अन्दर और बाहर
क़ब्रों का एक लगातार सिलसिला उग आया है
और तुम्हारे पीछे वही ख़ून-सनी डोलती छाया है
तुमने क्यों अपनी सारी याददाश्त को
अपने जलते हुए दिमाग़ से काट कर
अलग कर दिया है
जबकि तुम सिर्फ़ एक ऐसी स्पष्टता चाहते थे
जिससे अपने बचपन को अच्छी तरह देख सको।

18.
अक्सर तुम इस मकान के बाहर चले आये हो
अक्सर तुम इस जलते धुँधुआते सुनसान के बाहर
चले आये हो
जो तुम्हारा घर है या शहर या देश

अब तुम चुपचाप घूमते रहते हो
शहर की नीम-अँधेरी गलियों में

अब तुम चुपचाप और सतर्क
देखते रहते हो बाज़ारों में उमड़ती हुई
उस जगमगाती भीड़ को
जिसे तुम बहुत पहले, बहुत पहले ही
अस्वीकृत कर चुके हो

शायद तुम कहीं-न-कहीं उन लोगों से शंकित थे
जो तुम्हें इस जलते धुँधुआते अन्धकार से जुड़े हुए देख कर
तुम पर छिड़क देते अपने अन्दर का
वही कलुष-भरा मटमैला रंग।
अपने अन्तर की सारी नफ़रत से, भय से, शंका से
तुमने अपने आप को इस भीड़ से अलग कर दिया है
अलग कर लिया है तुमने आपने आप को
उन सभी दमकते हुए चेहरों से

और अब अगर सचमुच तुम अपनी स्मृति को
किराये पर उठाना चाहो
तो कौन देगा तुम्हें इस यन्त्रणा के बदले में
सुविधाओं से भरा हुआ, शान्त और सुखी,
(और ऊब-भरा) अनुर्वर जीवन

क्या सचमुच तुम उस जलते हुए नरक में लौट जाओगे ?
क्या सचमुच तुम फिर कभी वापस नहीं आओगे ?
19.
तुम समझ गये थे, यह सब तुम्हें गूँगा बनाने की
वही घृणा-भरी साज़िश है
तुम समझ गये थे,
इस सब के बावजूद
उस कोहरे के पार कहीं एक रास्ता निकलता है

लेकिन तुम एक लम्बे अर्से से नफ़रत करते रहे हो
नफ़रत करते रहे हो। और प्यार।
और इसीलिए तुम इतने दिनों तक ख़ामोश रह कर
अपने ही तरीक़े से उन्हें पराजित करते रहे हो

तब तुम्हारे लिए बहुत ज़रूरी था कुछ-न-कुछ करना
बहुत ज़रूरी था अपने आप को लगातार
इसी तरह - इसी तरह छलना

मुझे याद है। तुमने मुझसे कहा था:
‘वक़्त बीत चुका है कहने का
चुपचाप नफ़रत और शंका और अपमान
सहने का वक़्त बीत चुका है।
आओ, हम इस मौन में शामिल हो जायँ
आओ, अब हम इस लगातार और निष्फल मौन में डूब जायँ
यह हमें कहीं-न-कहीं तो ले ही जायेगा -
अन्दर या बाहर - अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।’


और अब तुम्हें कितनी मोहक लगती हैं
वे सारी-की-सारी साज़िशें
जिनसे तुम्हारा कोई भी वास्ता नही रह गया है
20.
उस जलते हुए ज़हर से गुज़र कर
तुम्हें विश्वास हो गया है:
जो तुम जानते हो
उससे कहीं ज़्यादा तुम्हारे लिए उसका महत्व है
जो तुम महसूस करते हो
आग की सुर्ख़ सलाख़ों की तरह
बर्फ़ की सर्द शाख़ों की तरह

तुम्हें मालूम है: जब कभी तुम्हारा सच
उनकी नफ़रत और शंका
और अपमान से टकराता है -
टूट जाता है

इसी तरह टूट जाता है हर आदमी निरन्तर
भय और आतंक, अपमान और द्वेष में रहता हुआ

सच्ची बात कह देने के बाद
अपने ही लोगों से अपमानित होते रहने की विवशता
सहता हुआ।
और अब तुम थके कदमों से
अपने घर की तरफ़ लौटते हो
और जानते हो कि
तुम्हारे जलते हुए और असहाय चेहरे पर कोई पहचान नहीं।
अब तुम लौटते हो। अपने घर की तरफ़। थके कदमों से।
अकेले...और उदास...और नाकामयाब...
21.
लेकिन वह ख़ून से सना हुआ डोलता कबन्ध
तुम कहीं भी जाओ
तुम्हारे साथ-साथ जायेगा

दूर, दूर, दूर
उसे ढूँढने के लिए
तुम्हें कहीं भी दूर नहीं जाना पड़ेगा
वह ख़ून से सना हुआ डोलता कबन्ध
तुम कहीं भी जाओ - तुम्हारे साथ-साथ जायेगा

वही जिसे तुम लगातार-लगातार काट कर
अपने से अलग करते रहते हो
वही जिसे तुम अपने ही अलग-अलग रूप¨ं में
        गढ़ते रहते हो
अपने अन्तर की सारी घृणा से, भय से
शंका और अपमान और पराजय से

वह लेकिन इसी तरह डोलता रहता है। निरन्तर।
ख़ून से सना हुआ। तुम्हारे अन्दर और बाहर।

तुम कहीं से भी शुरू करो: हाथों से। पैरों से।
उसके दीर्घकाय शरीर की गठी हुई माँस-पेशियों से
या उसकी रक्त-रंजित खाल पर गुदे हुए चिन्हों से
तुम्हें उसे पहचानने में ज़रा भी दिक्कत नहीं होगी

दूर, दूर, दूर
तुम कहीं भी जाओ। तुम देखोगे:
तुम्हारे अन्तर की सारी नफ़रत और शंका,
अपमान और द्वेष झेल कर
जो छाया तुमसे पीछे और विमुख
ख़ून-सनी ज़मीन पर पड़ रही है -
उसी कबन्ध की है
उसी रक्त-रंजित डोलते कबन्ध की
अन्दर और बाहर। चुपचाप। निःशब्द। निर्विकार।
22.
मैं एक लम्बे अर्से से तलाश कर रहा हूँ
अपनी जड़ों की। इस यात्रा पर
मैं जानता हूँ: सिर्फ़ मुझे ही जाना है
सभी सम्बन्धों से कट कर
धरती और चट्टान के अँधेरे में
इस बार सिर्फ़ मुझे ही ढूँढना है वह स्रोत
अपने दिमाग़ के सन्तुलन के लिए
हाथों और शब्दों की मुनासिब कार्रवाई के लिए

कौन-सी वह धारा थी
जिस पर तिरती हुई यह नाव
इतनी दूर तक चली आयी
कौन-सी हवा इस पतंग को
यहाँ तक खींच लायी
जब-जब मेरे कदम बढ़े
मेरे अन्दर से आवाज़ आयी
रुक जाओ। रुक जाओ।
पहले अपने चारों ओर फैली इस दुनिया को देखो और जानो

अकसर मैंने ख़ुद से सवाल किया है
कहाँ से ? क्यों ? किस ओर ?
मेरे दिमाग़ में गूँजता रहा है यह शोर। निरन्तर

इसीलिए मैं लौटा हूँ। बार-बार
पत्तियों से टहनियों और शाख़ों से जड़ों की ओर

और मेरा दिमाग़ अपने इस निजी संसार को
बदल डालने की तेज़ और आशा-रहित इच्छा से
लगातार ज़ख़्मी होता रहा है

सोचो, क्या यह बहुत दिनों तक चल सकता है -
सर्द बारिश में खड़े रह कर
इतनी उपेक्षा को सह कर
अपने अन्दर की आग को समिधा देना

जब किसी भी चीज़ की सही पहचान
आँखों के लिए तकलीफ़ बन जाय
जब अन्तर का लहलहाता वन
सुख्र्¤ा लपटों में डूब जाय
जब एक ओर समय
और दूसरी ओर उसका सबक़ रह जाय

कितना मुश्किल है
अन्तर की लहलहाती धूप की जगह
जलते हुए अँधेरे को दाख़िल होते हुए देखना
आँखों के नष्ट हो जाने के बाद।

बहुत-से दिन मैंने इसी तरह बिताये हैं।
बहुत-सी रातें।
निरर्थक प्रतीक्षा की तरह लम्बे बहुत लम्बे दिन
जिनकी सुनहली धूप -
मेरी याददाश्त पर पसरी हुई है।
मेरे चाहने या न चाहने के बावजूद
जब कि दिमाग़ आजकल लपटों में खो गया है
कितना मुश्किल है
इस तरह ख़ामोश रहना और प्रतीक्षा करना
जब कि सारी सम्भावनाएँ
आग और लोहे की
एक अन्तहीन हलचल में खुलती हैं
23.
मैंने अपने शब्दों को ख़ुद अपने निकट -
अपने और अधिक निकट होने के लिए रचा है
सच्ची बात कह देने के बाद

और मुझे महसूस होता है -
कोई भी मेरे शब्दों से हो कर
मेरे पास नहीं आ सकेगा
उस इन्तज़ार और सपने के टूट जाने पर
अपने अन्दर की पहचान को ज़िन्दा रख कर
सारी-की-सारी शंका और घृणा और अपमान झेल कर

क्योंकि ये शब्द आख़िर क्या हैं ?

इस दलाल सभ्यता के ख़िलाफ़ एक चीख़
एक ऐसा शोक-गीत
जिसकी भूमिका शोक की नहीं
ख़ुद अपने क़रीब जाने के उल्लास की है

क्या मैं ये शब्द लिख कर कहीं उस गहरी -
बहुत गहरी और अन्तरंग विवशता की
चिरपरिचित पहचान को झुठला नहीं देता ?
आँखों की पथरायी पुतलियों से हो कर
जलते हुए दिमाग़ के स्तब्ध आकाश तक निरन्तर
उस सारी-की-सारी नफ़रत और शंका
भय और अपमान को सहता हुआ
टूटता हुआ और सिमटता हुआ और बिखरता हुआ 

नहीं। नहीं। अपने हृदय की गहराई से
दोनों हाथ भर-भर कर
मैं उलीचता रहा हूँ एहसास

इसीलिए मैं चाहता हूँ
जो भी मेरे शब्दों को पढ़े और जाने
जैसे आदमी अपनी पत्नी को
निरन्तर उसके साथ रह कर जानता है
सच्ची बात कह देने के बाद लोगों का अविश्वास सह कर
जैसे आदमी कटुता को
पहचानता है
वह लगातार अपने ही लोगों के 
और अधिक निकट हो।
निकट हो। उल्लसित हो। और संगीतमय।
24.
नहीं। मैं अँधेरे में डूबती हुई शाम नहीं हूँ
वह जो कुछ भी मैं हूँ - गुमनाम नहीं हूँ

अब भी कहीं भीतर से आती हुई वह पुकार। वह एक पुकार
मुझे कहीं-न-कहीं आश्वस्त करती रहती है

और मैंने अक्सर सोचा है
एक समय आयेगा, जब मुझे तुमसे पूछना ही पड़ेगा
तुम्हारी इन सभी मुद्राओं का अर्थ
जब। जब एक लम्बे अन्तराल के बाद
आख़िरकार
शुरू होगा - दर्शक-दीर्घा की ओर से
नाटक का वह अन्तिम अंक।

मुझे अब धीरे-धीरे यह एहसास होने लगा है:
तुम तक मेरी बात पहुँच नहीं सकती।
मैंने अकसर अपने भय और आतंक
नफ़रत और अपमान और द्वेष के
उस अँधेरे कारागार से लौट कर
तुम्हें अपने अन्तर की उस गहरी विवशता के बारे में
     बताने की कोशिश की है
और हर बार ग़लत समझा गया हूँ।

अपने अन्दर किसी एक नंगे,
बहुत नंगे सच का सामना करते हुए
मुझे हमेशा यह एहसास हुआ है कि
तुमने मुझे अपने से काट कर
किस क़दर
असहाय और निराश और बन्दी बना दिया है

और जैसा कि तुम मुझसे हमेशा कहते रहे हो:
‘जो हम महसूस करते हैं, वह हमारे लिए
उस सब से कहीं ज़्यादा सच होता है
जिसे हम जानते हैं।’

तभी एक बार। सिर्फ़ एक बार मेरे मन में
तुम्हारे प्रति सन्देह हुआ था।

मुझे लगा था, कहीं कुछ बहुत ज़्यादा -
बहुत ज़्यादा ग़लत हो गया है। प्रारम्भ
या फिर उस कहानी में न अट सकने वाला
पहले से तय कर लिया गया अन्त।

और मैं सोचता: ऐसा ही होगा -
क्या सचमुच ऐसा ही होगा अन्त -
असहाय और बंजर और अशक्त बना कर छोड़ता हुआ ?
क्या मैं इसी तरह अपनी सारी शक्ति के साथ
टूट कर गिरता हुआ बिखर जाऊँगा -
अकेला और उदास और नाकामयाब ?

नहीं। जब भी वह बियाबान
जब भी वह उदास अनमना बियाबान
इसी तरह मृत्यु-सा निःशब्द
मेरे चारों ओर फैल जायेगा

तब मैं जाऊँगा नहीं नगर-पिताओं के पास
अपने सपनों के अर्थ पूछता हुआ
कमींगाह में छिपे क़ातिलों से
हताहत मित्रों के नाम पूछता हुआ

मैं सिर्फ़ अपना जलता हुआ एहसास
आँखों की अथाह गहराई में सँजो कर
सौंप जाऊँगा
अपने हाथों और शब्दों के उत्तराधिकारियों को

फिर मैं लौट जाऊँगा
उसी धुँधुआते अन्धकार में
दमन और आतंक और नफ़रत के
उसी जलते हुए नरक में

जहाँ आग और लोहे की कारगर कोशिश से
टूटते हुए कारागार के खँडहरों पर
फैल रहा होगा
एक नयी भोर का सुर्ख़ उजाला।
1967-70

Saturday, July 4, 2015

सोहबते-ग़ालिब

पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या

आगरे से आ कर दिल्ली को मुस्तकिल तौर पर अपना घर बना लेने वाले हमारे महबूब शायर मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ां ग़ालिब (१७९७-१८६९) का ज़िक्र इतनी मर्तबा हो चुका है कि एक और तज़्किरा करने से पहले ठिठक जाना पड़ता है. मगर फिर ख़याल आता है कि ग़ालिब की प्रिय शै -- इश्क़ -- का ज़िक्र भी तो बेइन्तहा मर्तबा हो चुका है और उसमें कोई ठहराव आता नज़र नहीं आता. फ़ेसबुक की क़सम या फ़ेसबुकियों की, जिसे देखिये इश्क़ की किसी-न-किसी सूरत, किसी-न-किसी सीरत पर फ़िदा हुआ पड़ा है. मरने-मारने को तैयार है. तो साहेब, इश्क़ की तरह ग़ालिब के लिखे को भी चाहे जितनी बार उलटिये-पलटिये-बरतिये, हर बार नया लुत्फ़ मिलता है, नये मानी खुलते हैं, खयाल नयी दिशाओं की तरफ़ जाते महसूस होते हैं, ज़िन्दगी के -- और उसे देखने के ढंग के -- नये पहलू उजागर होते हैं.
चुनांचे यही सब सोच कर हमने अपनी इब्तेदाई हिचक पर क़ाबू पाते हुए यह फ़ैसला किया कि कुछ दिन अपने इस महबूब शायर की सोहबत में गुज़ारेंगे. अगर हमारे इल्म में कोई इज़ाफ़ा न भी हुआ तो क्या, उनकी सोहबत में यह वक़्त गुज़ारने की लज़्ज़त से तो हमें कोई महरूम न कर सकेगा. अलबत्ता, हमारी अक़ीदत को हमारी पाबन्दी से आंकना शायद हम पर कुछ ज़्यादती होगी. कोशिश तो हमारी यही रहेगी कि हम पाबन्द रहें, मगर ख़ुदा-ना-ख़्वास्ता इस पाबन्दी में कोई ख़लल पैदा हुआ तो बहुत करके उसकी वजह वही होगी जो ग़ालिब ने ही अपने एक शेर में बयान करते हुए बतायी थी कि 
गो मैं रहा रहीन-ओ-सितमहा-ए-रोज़गार 
फिर भी तेरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं रहा

तो दोस्तो, इस छोटी-सी भूमिका के बाद हम ग़ालिब का ज़िक्र अपने टेढ़े-बैंगे अन्दाज़ में उनके एक ख़त का एक छोटा-सा अंश और उनका एक असंकलित शेर उद्धृत करते हुए शुरू कर रहे हैं.
१६ फ़रवरी १८६२ को, यानी १८५७ की उथल-पुथल के तक़रीबन पांच साल के बाद, ग़ालिब ने अपने अज़ीज़ मिर्ज़ा अलाउद्दीन अहमद ख़ां अलाई को लिखा--
"ऐ मेरी जान, ये वो दिल्ली नहीं है जिसमें तुम पैदा हुए हो; वो दिल्ली नहीं है जिसमें तुमने इल्म तहसील किया है; वो दिल्ली नहीं है जिसमें तुम शाबान बेग की हवेली में मुझसे पढ़ने आते थे; वो दिल्ली नहीं है जिसमें मैं सात बरस की उम्र से आता-जाता हूं; वो दिल्ली नहीं है जिसमें इक्यावन बरस से मुक़ीम हूं. एक कैम्प है -- मुसलमान, अहले हर्फ़ा या हुक्काम के शागिर्द पेशा, बाक़ी सरासर हनूद."
दिलचस्प बात है कि डेढ़ सौ साल के अर्से में दिल्ली की यह कैफ़ियत काफ़ी हद तक वैसी-की-वैसी है. बरबादी के जिन निशानात ने ग़ालिब के वक़्त में इस शहर को नाक़ाबिल-ए-रिहाइश बना दिया था, वे मिट गये हैं. दिल्ली फिर चाक-चौबन्द हो गयी है, पर उसका बुनियादी रंग-ढंग पुराना है. ढहने ही का ज़िक्र करना हो तो आज ही की ख़बर है कि दिल्ली की हृदय-स्थली, गुरुद्वारा शीशगंज के पास फ़व्वारे के नज़दीक "घण्टेवाला" के नाम से मिठाई की जो दुकान पिछले २२५ बरस से मौजूद थी उसने अपने दरवाज़े हमेशा के लिए मुक़फ़्फ़ल कर लिये. अलबत्ता, इज़ाफ़ा हुआ है तो बाहर से आने वाले उन लोगों का जो ग़ालिब द्वारा गिनायी गयी कोटियों में से बीच की कोटि में आते हैं -- अहले हर्फ़ा या हुक्काम के शागिर्द पेशा. तो जनाब, इसी दिल्ली में जिसमें मैं भी सात बरस की उम्र से आता-जाता हूं और पिछले आठ बरस से मुक़ीम हूं, हम ग़ालिब को याद कर रहे हैं.
इस मौज़ूं को बन्द करने से पहले तीन बातें. पहली यह कि यह ज़िक्र ग़ालिब का है, चुनांचे इसमें उनकी शायरी तो आयेगी ही, उनके ख़ुतूत का भी अच्छा-ख़ासा दख़ल रहेगा, क्योंकि वे भी उनके अशआर और कलाम के साथ एक अलग ही अहमियत रखते हैं. दूसरे, दिल्ली का भी उल्लेख ग़ालिब ने अपने कलाम ही में नहीं, बल्कि ख़तों में भी बार-बार किया है. हम उस तरफ़ भी बीच-बीच में पलटेंगे. तीसरी बात यह कि हम कोई आलोचना की पुस्तक नहीं लिख रहे, अपने महबूब शायर की सोहबत कर रहे हैं तो इस का क्रम भी किसी तन्क़ीदी मज़मून की तरह आदि, मध्य और अन्त की शक्ल में नहीं होगा. उसकी अपनी गति और अपनी रविश रहेगी.माशूक़ की महफ़िल में रखी शमा से उठते धुएं के पेच-ओ-ख़म की मानिन्द.
आज यहीं तक. कल उस असंकलित शेर के हवाले से अपनी बात शुरू करेंगे जिसका ज़िक्र हम ऊपर कर आये हैं.

Tuesday, April 21, 2015

जैज़ पर लम्बा आलेख


चट्टानी जीवन का संगीत 

सत्ताईसवीं और समापन कड़ी

31.
जैज़ के इस लम्बे सफ़र में हम उसके स्रोत से धीरे-धीरे निकलने वाली पतली-सी धार से ले कर उसके एक महानद बनने तक का विकास देख आये हैं. जैसा कि हमने कहा 1960 तक पहुंचते-पहुंचते जैज़ दुनिया के बेहतरीन संगीत की सफ़ में शामिल हो चुका था. उसका, कहा जाय, एक शास्त्र बन गया था, समीक्षा-प्रणाली निर्मित हो चुकी थी, उसे ले कर वाद-विवाद और बहसें होने लगी थीं. इसके बाद उसका विकास वैसे ही होना था जैसे एक छतनार पेड़ का होता है -- नयी-नयी डालियों और शाखाओं-प्रशाखाओं के साथ, जो अब तक जारी है.
1960 के बाद के कुछ दशकों के दौरान पुराने तपे हुए उस्तादों के साथ कुछ नये उस्ताद भी सामने आये, जिन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर जैज़ की परम्परा को निखारने की कोशिश की। पियानोवादक सेसिल टेलर, ब्रिटेन के ट्रॉम्बोन-वादक जार्ज चिज़म, फ्रान्सीसी जिप्सी गिटार-वादक जैंगो राइनहार्ट, बेस-वादक नील्स हैनिंग, आस्र्टीड पेडरसन, सैक्सोफ़ोन-वादक ऐल्बर्ट आइलर, आदि इन्हीं प्रतिभा-सम्पन्न जैज़ संगीतकारों में शामिल हैं, हालाँकि सूची इससे कहीं लम्बी हो सकती है।
इनमें भी जैंगो राइनहार्ट का नाम बिल्कुल अलग स्थान रखता है। 

https://youtu.be/wLjG8L4nnh4?list=PLMdpMzOy0l11KN-XHOckXjg5lb7OR9h3E ( जैंगो राइनहार्ट - औल औफ़ मी)

जैंगो राइनहार्ट को संगीत का शौक़ बचपन ही से था। जिप्सी होने के नाते संगीत उनके ख़ून में था, यह कहना शायद ग़लत न होगा। मगर इस शौक़ को एक नयी दिशा मिली युवावस्था में जब, उन्होंने लुई आर्मस्ट्रौंग और ड्यूक एलिंग्टन के रिकॉर्ड सुने और जैज़-संगीत की ओर आकर्षित हुए। जैंगो राइनहार्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने जैज़-संगीत में -- जो पिछले कई दशकों से पियानो, सैक्सोफ़ोन और ट्रम्पेट अथवा बैस जैसे वाद्यों के इर्द-गिर्द केन्द्रित रहा है -- एक बार फिर गिटार, यानी तार वाले वाद्य का समावेश किया है, जो बात कि इस शैली की जड़ों में रैगटाइम और बैंजो तथा गिटार की उपस्थिति से मेल खाती है। 

https://youtu.be/UoaJprTBYRc?list=PLMdpMzOy0l11KN-XHOckXjg5lb7OR9h3E (जैंगो राइनहार्ट - ब्लूज़ एन मिनियोर)

इस दौर में संगीत के वाद्यों के साथ-साथ सुनने के साधनों में जो तकनीकी विकास हुआ, उसने जैज़ संगीत को और भी ज़्यादा लोकप्रिय बनाने में मदद दी. मिसाल के लिए पुराने 78 आरपीएम के तवों से ले कर जिनमें अमूमन 3.5 मिनट की रिकौर्डिंग हो सकती थी, एक्स्टॆंडेड प्लेयिंग और लौंग प्लेयिंग रिकौर्डों तक और फिर कैसेट से ले कर सीडी और डीवीडी तक -- जिस तरह संगीत के प्रसार का विकास हुआ है, जैज़ का दायरा सिर्फ़ अफ़्रीकी-अमरीकी अश्वेत संगीतकारों तक सीमित न रह कर धीरे-धीरे दुनिया भर में फैलता चला गया है. इसके अलावा जैज़ के प्रसार का एक कारण यह भी है कि भले ही उसकी भौतिक जड़ें अफ़्रीकी-अमरीकी अश्वेत समुदाय में गहरे उतरी हुई हों, लेकिन इस संगीत के अन्दर सम्वेदना के जो पहलू हैं, वे इसे इस काबिल बनाते हैं कि दूसरे देशों के लोग भी इससे जुड़ सकें. आशु प्रेरणा का आधार भी इस संगीत को सहज ही अपना लिये जाने योग्य बनाता है. यही वजह है कि जैसे-जैसे 1960 के बाद जैज़ दूसरे देशों में फैला, वहां के संगीतकारों ने इसे अपना कर, अपनी-अपनी संगीत परम्पराओं से समृद्ध करके इसके नये-नये रूप विकसित किये हैं. लैटिन जैज़, ऐफ़्रो-क्यूबन जैज़, सोल जैज़, ब्रज़िलियन जैज़, जैज़ फ़्यूजन, पंक जैज़, साइकेडेलिक जैज़, जैज़ फ़ंक, रौक जैज़, स्मूद जैज़ -- फ़ेहरिस्त ख़ासी लम्बी है और बजाने की तकनीकें और नये वाद्यों का दख़ल भी उतना ही अलग है जितना बजाने वाले. लेकिन इस सारे विकास और विभिन्नता के बीच एक धारा लगातार इस बात की कोशिश करती रही है कि सारे विकास और प्रयोग के बावजूद, जैज़ को उसकी जड़ों से इतना दूर न जाने दिया जाये कि वह अपनी बुनियादी प्रतिज्ञाएं ही भूल जाये, जो उसे एक दलित उत्पीड़ित जाति के विरोध और अभिव्यक्ति का दस्तावेज़ बनाती हैं. यही कारण है कि इसी दौर में जब जैज़ हैरतंगेज़ रफ़्तार से फैल रहा था, संगीतकारों का एक समूह ऐसा भी था जो परम्परा को बरक़रार रखने की कोशिश कर रहा था. आर्ची शेप और सेसिल टेलर का नाम लिया ही जा चुका है, उनसे आगे बढ़ने पर हमें विंटन मार्सेलिस,  हर्बी हैनकौक, चिक कोरिया और पियानोवादिका मेरी लू विलियम्स जैसे संगीतकार मिलते हैं जिन्हों ने उस धारा को फिर से जीवित करने की कोशिश की थी जो लुई आर्मस्ट्रौंग और ड्यूक एलिंग्टन के समय में मौजूद थी. 

https://youtu.be/oP-vD4ScAGA?list=PL8eK2Ek-HETlLMD7SyDgce8miz74_gaCG (हर्बी हैनकौक - वौटरमेलन मैन)

https://youtu.be/z4THBVc47ug (मेरी लू विलियम्स - इट ऐन्ट नेसेसैरिली सो) 

     
हाल के वर्षों में जैज़ का दायरा कई देशों में फैल गया है। जैज़ में एक आश्चर्यजनक बहुलता देखी जाती है. हर देश के अपने-अपने जैज़-प्रेमी हैं, हालाँकि यह एक दिलचस्प तथ्य है कि आज जैज़ के ज़्यादातर रिकॉर्ड जर्मनी और जापान में बिकते हैं। कुछ जानकारों का ख़याल है कि कुछ देशों में जहाँ स्थानीय लोक-संगीत की परम्परा लुप्त हो गयी थी और जीवन्त लोक-संगीत मौजूद नहीं था, वहाँ जैज़ संगीत ने जड़ें जमा ली हैं क्योंकि यह एक ऐसा संगीत था, जिसके साथ लोगों को महज़ गीत गाने की ज़रूरत नहीं थी, बल्कि वे उसके साथ प्रयोग कर सकते थे। अपने किस्म का संगीत तैयार कर सकते थे। शायद यही वजह है कि आज जैज़ संगीतकार किसी भी देश में, किसी भी जाति में पैदा हो सकते हैं। मिसाल के तौर पर जापान की महिला पियानो-वादक तोशिको आकियोशी को ही लिया जा सकता है, जिन्होंने अनेक प्रयोग किये हैं और जिनका रिकॉर्ड ’प्रेम पत्र’ उनकी प्रतिभा का प्रमाण है।

https://youtu.be/5eTDfJTqoZ4 (तोशिको आकियोशी - प्रेम पत्र)


लेकिन इस सब के बावजूद यह सच है कि चाहे जितने देशों में जैज़ के फूल खिलें, जब तक उसमें अमरीकी नीग्रो संगीत के स्वर सुनायी देते रहेंगे, श्रम और पीड़ा और मानवीय उदासी और अन्याय के विरोध के साथ, आंखों के पानी और दिल की आग के साथ उसका रिश्ता बना रहेगा, तब तक उसका अनोखापन और उसकी एक अलग पहचान भी बरकरार रहेगी। क्योंकि जैज़-संगीत महज़ संगीत की शैली नहीं है, बल्कि उसमें एक पूरी-की-पूरी जाति के संघर्ष का इतिहास गुँथा हुआ है।

https://youtu.be/Alga6OjOQeY?list=PLaqZLT1Rv3-Jus64lBH7uLjvljbpIWeTO (तोशिको आकियोशी - मिंगस को विदाई)

(तमामशुद)


हर्फ़े-आख़िर

दोस्तो, 
जैज़ की यह मुख़्तसर-सी कहानी यहीं आ कर ख़त्म होती है. लेकिन जैसा कि हमारे प्रिय कवि मुक्तिबोध ने कहा था "नहीं होती, कहीं भी ख़त्म कविता नहीं होती, कि वह आवेग त्वरित काल-यात्री है," जैज़ की कहानी भी यहां एक पड़ाव तक पहुंची है, ख़त्म नहीं हुई. वह भी आवेग-त्वरित काल-यात्री है. मैंने भरसक कोशिश की है कि इस सैर-बीनी तस्वीर को आप के सामने पेश कर सकूं ताकि आप इस नायाब संगीत से परिचित हो सकें, यह जान सकें कि कैसे जान-लेवा श्रम और अमानवीय व्यथा के बीच से भी एक जाति अपने लिए जीने के आधार बनाती है और दूसरों को भी जीने की प्रेरणा देती है. ज़ाहिर है, जैज़ की समूची कहानी कहना एक आदमी के एक प्रयास के बस की बात नहीं. इस कहानी में कई पहलू छूट गये होंगे. उम्मीद है, यह आपको यह कमी पूरी करने के लिए भी प्रेरित करेगी. यही मेरे इस विनम्र प्रयास की सार्थकता होगी.

नीलाभ  




Monday, April 20, 2015

जैज़ पर लम्बा आलेख


चट्टानी जीवन का संगीत 

छब्बीसवीं कड़ी

30.


1958 में जैज़ संगीत का एक ऐल्बम आया जिसमें सिर्फ़ सैक्सोफ़ोन, बेस और ड्रम -- तीन वाद्य इस्तेमाल किये गये थे. न पियानो था, न ट्रम्पेट और न और कोई वाद्य. ऐल्बम के आवरण पर लिखा था -- "कैसी विडम्बना है कि नीग्रो के साथ, जो और किसी भी समुदाय से ज़्यादा अमरीकी संस्कृति को अपना कह सकता है, इतना बुरा सलूक हो रहा है; उसे दबाया और कुचला जा रहा है; कि नीग्रो, जिसने अपने अस्तित्व में ही मनुष्यता का सबूत दिया है, ऐसी अमानवीयता का शिकार बनाया जा रहा है." इस ऐल्बम की शीर्षक धुन लगभग बीस मिनट लम्बा और तात्कालिक प्रेरणा से रचा गया एक टुकड़ा था जो सुनने वाले को काल और युगों के फ़ासले लंघा कर उस मन:स्थिति में ले जाता था जो जैज़ संगीत के शुरुआती दौर की ख़ासियत थी -- एक नाराज़, उदासी-भरी कैफ़ियत. रिकौर्ड के कुछ हिस्से बेहद तनाव से रचे-बसे थे और आने वाले दिनों में उभरने वाले अफ़्रीकी-अमरीकी अश्वेत समुदाय के आक्रोश की पूर्व-सूचना देते थे. ऐल्बम का नाम था ’फ़्रीडम सुइट"  और इसके रचयिता थे सनी रौलिन्स जिन्होंने इसमें सैक्सोफ़ोन बजाया था. 

https://youtu.be/CERGVEqPoT0 (सनी रौलिन्स - फ़्रीडम सुइट)

रौलिन्स जैज़ संगीतकारों के उस समूह के एक्ज प्रमुख सदस्य थे जिसने 1960 के दशक में जैज़ को कोरे पेशेवराना संगीत और मनोरंजन के दायरों से बाहर निकालने में एक बड़ी भूमिका अदा की।
वैसे तो सनी रॉलिन्स ने काफ़ी पहले ही सैक्सोफ़ोन बजाना शुरू कर दिया था और एकल वादन के अलावा वे नाइट-क्लबों, संगीत-सभाओं और रिकॉर्ड कम्पनियों के लिए भी सैक्सोफ़ोन बजाया करते थे, मगर पचास के दशक के मध्य तक पहुँचते-पहुँचते सुनने वालों को ऐसा महसूस होने लगा था कि वे ख़ुद को दोहरा रहे हैं। एक समीक्षक ने तो यहाँ तक कह दिया था कि सनी रॉलिन्स को उन संगीतकारों में शुमार किया जा सकता है, जो अपनी निजी प्रतिभा के बल पर जैज़ की प्रथम श्रेणी के कलाकार रहते हैं, लेकिन जैज़ संगीत में सीधे कोई योगदान करने के योग्य नहीं जान पड़ते। इसी बीच तरह-तरह की अफ़वाहें भी उड़ती रहीं-कि सनी रॉलिन्स ने सैक्सोफ़ोन छोड़ कर बाँसुरी जैसा वाद्य -- ओबो -- सीखना शुरू कर दिया है; कि दोहराव से बचने के लिए उन्होंने संगीत-सभाओं में शिरकत करना बन्द कर दिया है; कि वे नयी धुनों पर काम कर रहे हैं; कि शुरू की प्रशंसा को वे सहेज नहीं पाये; कि अब वे बिना संगत के सफल सैक्सोफ़ोन-वादन करेंगे। इस आख़िरी अफ़वाह के पीछे चोट करने की एक छिपी हुई प्रवृत्ति भी थी, जैसा कि कला के क्षेत्र में अक्सर होता है, क्योंकि कुछ समय पहले ही सनी रॉलिन्स ने संगीत के कार्यक्रमों में अक्सर पियानोवादक के बिना ही सैक्सोफ़ोन बजाना शुरू कर दिया था और कई बार धुन की रचना तथा ऑकेस्ट्रा का निर्देशन भी ख़ुद ही सँभाल लिया था।
इसके पीछे एक कारण तो संगीतकार का अपना व्यक्तित्व हो सकता है। मगर व्यापक रूप से पचास के दशक के मध्य में जैज़-संगीत फिर एक नयी दिशा ले रहा था। इस दौर में कलाकारों के सामने जैज़ की बुनियादी ’भाषा’ या ’रंग’ को पहचानने या परखने की समस्या नहीं थी, बल्कि समस्या यह थी कि जैज़-संगीत के प्रचलित मुहावरे के भीतर कुछ ऐसा ताल-मेल बैठाया जाय, लय-ताल-सुर और धुन को ऐसा व्यवस्थित रूप दिया जाय, जो पहले की शैलियों के सन्दर्भ में बीस के दशक में जेली रोल मॉर्टन ने, तीस के दशक में ड्यूक एलिंग्टन ने और चालीस के दशक में चार्ली पार्कर ने दिया था। पचास के दशक में इस समस्या को कई लोग सुलझाने की कोशिश कर रहे थे। एक ओर पियानोवादक तथा कम्पोज़र थियोलोनियस मंक और उनकी मण्डली थी तो दूसरी ओर बेस वादक चार्ल्स मिंगस, सैक्सोफ़ोन वादक माइल्स डेविस और उनकी ’माइल्स डेविस सेक्स्टेट’ नामक मण्डली, और्नेट कोलमैन और उनका दल और तीसरी ओर आर्ची शेप और सनी रॉलिन्स जैसे संगीतकार, जो अकेले ही इस काम में जुटे हुए थे।
एक अर्थ में जैज़ संगीतकार अब भी उसी मूल समस्या से जूझ रहे थे, जो लुई आर्मस्ट्रौंग के ज़माने से चली आ रही थी -- संगीत को दोहराव की एकरसता से बचाते हुए किस प्रकार धुन और एकल वादन की लम्बाई को बढ़ाया जाय। भारतीय संगीत में भी किसी-न-किसी समय यह समस्या ज़रूर पैदा हुई होगी कि राग को लम्बे समय तक कैसे पेश किया जाय। ज़ाहिर है इस तरह की समस्या में वादकों के रचनात्मक कौशल का बहुत बड़ा हाथ होता है और जब मौलिक प्रतिभा के बल पर कल्पनाशील के साथ धुन पेश की जाती है तो उसका महत्व निश्चय ही बढ़ जाता है। बहुत अच्छे वादक तो निश्चय ही इससे भी आगे बढ़ कर एक तरह से नया संगीत ही रचने की कोशिश करते हैं। जैज़-संगीत में इसकी मिसाल के तौर पर चार्ली पार्कर तो पहले से ही मौजूद थे। लेकिन पार्कर के एकल वादन की विशेषता थी -- उसका सीधी रेखा में विस्तार। जैसे किसी माला में कडि़याँ जुड़ती चली जायें। सनी रॉलिन्स ने जब लम्बे-लम्बे एकल वादन किये तो उन्होंने कुछ ऐसी पद्धति अपनायी, जैसी एक वास्तु-शिल्पी भवन का नक्शा तैयार करते समय अपनाता है। संगीत की अमूर्तता को ध्वनि-बिम्बों के सहारे उन्होंने मूर्त-और वह भी कई दिशाओं में मूर्त करने की कोशिश की। शायद इसी लचीलेपन की सहायता से वे माइल्स डेविस, जॉनी कोल्ट्रेन, थियोलोनियस मंक, मैक्स रोच और जॉन ल्यूइस जैसे विविध प्रकार के उस्तादों का साथ निभा सके।
जैज़ संगीत में अक्सर गायकों और वादकों ने पहले के रचनाकारों के गाये या बजाये संगीत को दोबारा अपने ढंग से पेश करके अपनी निजी शैली साबित की है. सनी रौलिन्स इसके अपवाद नहीं हैं. उन्होंने मशहूर गायिका बिली हौलिडे के गाये गीत "गौड ब्लेस द चाइल्ड हू’ज़ गौट हिज़ ओन" कुछ इस तरह पेश किया :

https://youtu.be/_O-wMuGt63c?list=PLZS7EwPLsVu0RMpG0Xu8yAGydiWz3lXm- (सनी रौलिन्स - गौड ब्लेस द चाइल्ड हू’ज़ गौट हिज़ ओन)

1949 में अपनी पहली रिकौर्डिंग में हिस्सा लेने के बाद सनी रौलिंस ने तरह-तरह के प्रयोग किये और हर तरह के वादकों और मण्डलियों के साथ संगत की. संगत करते समय उन्होंने बड़े और छोटे बैण्डों और संगीत की बड़ी सभाओं में कोई फ़र्क नहीं किया, जिससे सैक्सोफ़ोन पर उनकी महारत का बख़ूबी अन्दाज़ा होता है. उनके प्रयोगों का मामला सिर्फ़ पियानो को इस्तेमाल करने या न करने से ही ताल्लुक़ नहीं रखता, बल्कि उनमें यह ख़ूबी भी है कि वे बेहद मामूली धुनों और गीतों को ले कर उन्हें नया बना कर पेश कर दें. यह भी सनी रौलिन्स की ख़ूबी ही कही जायेगी कि उन्होंने जब-जब पाया कि उनका संगीत ठहराव का शिकार हो रहा है तो उन्होंने अपनी मर्ज़ी से कुछ समय तक जैज़ संगीत की दुनिया से छुट्टी भी ले ली. पहला मौका १९६० के दशक में आया जब समीक्षकों ने उनके संगीत में दोहराव की शिकायत की और ख़ुद सनी रौलिन्स को भी लगा कि वे एक मुक़ाम तक पहुंच कर ठहर-से गये थे. इस दौर का एक मज़ेदार क़िस्सा यह है कि अपने पड़ोस के घर में रहने वाली औरत के आराम और सुकून के खयाल से, जो बच्चे से थी, सनी रौलिन्स विलियम्सबर्ग सेतु पर जा कर अभ्यास करते. तीन साल के अवकाश के बाद जब उनकी "वापसी" हुई तो उन्होंने अपने नये ऐल्बम का नाम रखा "द ब्रिज" -- "सेतु". यही वह पुल था जिसने सनी रौलिन्स के पहले के दौर को नये दौर से जोड़ने का काम किया. 
अवकाश का दूसरा मौक़ा १९७० के दशक के आरम्भ में आया जब रौलिन्स ने योग, ध्यान और पूर्वी दर्शन के अध्ययन के लिए सैक्सोफ़ोन बजाने और मण्डलियों में संगत करने से छुट्टी ली. जब वे 1972 में दोबारा जैज़ संगीत की दुनिया में लौटे तो एक नये अवतार में. उन्होंने वाद्यों और वादन की पुरानी शैली से अलग हटते हुए इलेक्ट्रिक गिटार, इलेक्ट्रिक बेस और आम तौर पर पौप या फ़ंक की तर्ज़ पर ड्रम बजाने वालों की संगत करनी शुरू की. बस पुराना अगर कुछ था तो वह था उनका अपना सैक्सोफ़ोन. लेकिन सारे रिकौर्ड डिस्को क़िस्म के नहीं थे. इसी दौर में एकल वादन की इच्छा उनके अन्दर बढ़ती चली गयी और 1985 में उन्होंने "द सोलो ऐल्बम" के नाम से अपने एकल वादन का ऐल्बम रिकौर्ड कराया. 

https://youtu.be/s6bgbaVpukE (सनी रौलिन्स - एकल वादन)

रौलिन्स को 2001 में उनके रिकौर्ड "दिस इज़ वौट आई डू" के लिए ग्रैमी पुरस्कार मिला और जैज़ संगीत में उनके योगदान के लिए 2004 में उन्हें ग्रैमी लाइफ़ टाइम अवौर्ड से सम्मानित किया गया. 

https://youtu.be/xb85Y2TZTp0 (सनी रौलिन्स - दिस इज़ वौट आई डू)


मगर रौलिन्स का असली पुरस्कार सुनने वालों और समीक्षकों की तरफ़ से आया है. और इस तरह सनी रौलिन्स लगातार किसी-न-किसी शहर में दोपहर के वक्त या रात के आठ बजे की सभा में अपने सैक्सोफ़ोन के साथ सुनने वालों को मोहित करते रहते हैं मानो यह भी एक रोज़मर्रा का काम हो, जैसा कि वह लगभग डेढ़ सौ साल पहले  उन्नीसवीं सदी के अन्त में हुआ करता था.
(जारी)