Saturday, February 14, 2015

जैज़ संगीत पर एक लम्बा आलेख


चट्टानी जीवन का संगीत

ग्यारहवीं कड़ी

13.

प्यार की तरह झरते हुए स्वर : सिड्नी बेशेत
--फ़िलिप लार्किन

किंग औलिवर के दौर ही में यानी पहले विश्वयुद्ध के बाद सन बीस के दशक में जैज़ संगीत में एक नया मोड़ भी आया था। इस मोड़ के महत्व का अनुमान केवल इसी एक बात से लगाया जा सकता है कि जो संगीत खेत-खलिहानों से शुरू हो कर नाच-घरों और संगीत-सभाओं तथा रिकॉर्ड कम्पनियों तक पहुँचा था, उसमें पहली बार उस्तादों की आहटें सुनायी पड़ने लगीं। स्कॉट जॉपलिन हों या जेली रोल मॉर्टन और बडी बोल्डन, या फिर उन्हीं जैसे अन्य नीग्रो संगीतकार -- वे सब-के-सब जैज़ संगीत के पुष्कर थे -- मनोरम; मोहक; गहरे, नीले, शफ़्फ़ाफ़ पानी के चश्मे, मगर जैज़ संगीत को परम्परा की धारा के रूप में बहाने का काम किया किंग ऑलिवर और उनके क्रियोल जैज़ बैण्ड ने। और जैज़-संगीत को उसके कुछ पहले-पहले महान संगीतकार दिये.
जैज़ के प्रारम्भिक चरण में किंग ऑलिवर ने जो भूमिका निभायी, उसका मूल्यांकन आसान नहीं है। किंग ऑलिवर को जैज़ का अविस्मरणीय स्तम्भ कहा जाय तो ग़लत न होगा। उनका संगीत सचमुच प्यार और मुहब्बत का संगीत था। उसमें ग़म था, दर्द था, अपने नीग्रो समुदाय के उत्पीड़न की व्यथा थी, लेकिन साथ ही ख़ुशियाँ और प्यार की गर्मी भी थी। कटुता और नफ़रत का उसमें लेश भी न था।

http://youtu.be/ONDr4zau53c (किंग ऑलिवर और उनका क्रियोल जैज़ बैण्ड )

किंग ऑलिवर ने अपना बैण्ड शुरू तो न्यू ऑर्लीन्स में किया था, लेकिन सन 1918 में वे अपने साथियों समेत शिकागो चले गये, जहाँ नीग्रो समुदाय अच्छी-ख़ासी तादाद में बसा हुआ था और जैज़ की बड़ी माँग थी। लगभग दस साल तक किंग ऑलिवर ने शिकागो में ही अपना डेरा जमाये रखा और संगीत प्रेमियों को अपनी कला से मोहित करते रहे। जैज़ संगीत को किंग ऑलिवर की जो देन है, वह तो अपनी जगह है ही, इससे भी बड़ी है उनकी वह देन, जिसने जैज़ की पूरी परम्परा को प्रभावित किया। किंग ऑलिवर का व्यक्तित्व सचमुच उस्ताद का व्यक्तित्व था। वे केवल अपनी निजी फ़नकारी में ही दिलचस्पी नहीं रखते थे, बल्कि अन्य उभरती हुई प्रतिभाओं को पहचानने, परखने, तालीम देने और सामने लाने की ज़िम्मेदारी भी निभाते थे। उन्हीं के बैण्ड में जैज़ के दो अमर संगीतकारों सिडनी बेशेत और लुई आर्मस्ट्रौंग (1900-1979) ने जैज़ की दुनिया में अपना सिक्का जमाया. लुई आर्मस्ट्रौंग तो आगे चल कर जैज़ के अघोषित राजदूत ही साबित हुए.
मगर लूई आर्मस्ट्रौंग की चर्चा से पहले एक ऐसे जैज़ फ़नकार का ज़िक्र जिसने बहुत ही ख़ामोशी से इस संगीत को सजाया और नयी धाराओं से समृद्ध किया. यह संगीतकार थे -- सिडनी बेशेत (1897-1959).


14.

सिड्नी बेशेत न्यू और्लीन्ज़ की पैदावार थे, लेकिन दूसरे बहुत-से जैज़ संगीतकारों के विपरीत वे एक मध्य-वर्गीय परिवेश से आये थे,  बड़े भाई लेनार्ड बेशेत कुलवक़्ती दांतों के डौक्टर थे और फ़ुरसतिया जैज़ बजाते थे. उनका साज़ था ट्रौम्बोन और वे अपनी एक मण्डली के सर्वे-सर्वा भी थे. ज़ाहिर है घर में न सिर्फ़ संगीत था, बल्कि साज़ भी थे. और वे भी हर तरह के. जल्दी ही बेशेत ने कई तरह के साज़ बजाना सीख लिये, ख़ुद अपने बल पर सीखते हुए और फिर छै साल की उमर में पहली बार परिवार में किसी के जन्मदिन के एक अवसर पर अपने भाई के बैण्ड में क्लैरिनेट बजा कर उन्होंने सब को हैरत में डाल दिया. 
कुछ और बड़े होने पर सिडनी बेशेत ने लोरेन्ज़ो टियो, लूइस नेल्सन डेलाइल और जौर्ज बैके जैसे जाने-माने क्लैरिनेट वादकों की शागिर्दी भी की. इसके कुछ ही समय बाद सिडनी बेशेत न्यू और्लीन्ज़ के अलग-अलग बैण्डों में शामिल हो कर बजाने लगे और अभी वे सोलह-सत्रह साल के थे कि उन्होंने किंग औलिवर के ओलिम्पिया बैण्ड में उनकी संगत भी की. लेकिन उनके सितारों में दूर-दूर के सफ़र लिखे थे और हालांकि वे न्यू और्लीन्ज़ में पले बढ़े थे, 1914 ही से उन्होंने यात्राएं करनी शुरू कर दी थीं जो उन्हें शिकागो तक ले गयी थीं. 1919 में वे न्यू यौर्क गये और वहां एक मशहूर जैज़ मण्डली के साथ उन्हें पहली बार विदेश जाने का मौक़ा मिला. 
लन्दन पहुंचते ही उन्हें "रौयल फिलहार्मौनिक हौल" में अपनी मण्डली के साथ अपने जौहर दिखाने का अवसर मिला और बेशेत ने अपने संगीत से सभी तरह के लोगों का मन जीत लिया. लन्दन से लौट कर बेशेत ने अपने संगीत को रिकौर्ड कराना शुरू किया और 1923 में पहले-पहले रिकौर्ड तैयार कराये. इस मामले में वे लूई आर्मस्ट्रौंग से आगे-आगे थे. 

http://youtu.be/6AHozQ_Llgo (सिड्नी बेशेत -- टेक्सास मोनर ब्लूज़)

दो साल बाद फ़्रान्स की यात्रा ने बेशेत के सामने यूरोप के दरवाज़े खोल दिये और अगले कई वर्षों तक उन्होंने रह-रह कर यूरोप के दौरे किये और रूस तक अपनी फ़नकारी के नमूने पेश किये. तभी जब वे अपने हुनर और शोहरत के शिखर पर थे एक ऐसी घटना हुई जिसने उन के जीवन पर गहरा असर डाला. पैरिस में बेशेत को लगभग साल भर जेल काटनी पड़ी जब गोलीबारी की एक घटना में एक राह-चलती औरत घायल हो गयी. कुछ लोगों का कहना था कि गोलीबारी तब शुरू हुई जब किसी दूसरे संगीतकार/प्रोड्यूसर ने बेशेत से कहा कि वे ग़लत सुर बजा रहे थे और बेशेत ने उस आदमी को यह कहते हुए द्वन्द्व-युद्ध की चुनौती दी कि "सिडनी बेशेत कभी ग़लत सुर नहीं बजाता." दूसरे स्रोतों के अनुसार बेशेत पर एक प्रतिद्वन्द्वी संगीतकार ने घात लगा कर हमला किया था.
बहरहाल, असली क़िस्सा जो भी हो इतना सच है कि बेशेत के मिज़ाज में चिड़चिड़ापन और गर्मी कुदरती थी और इसका ख़मियाज़ा उन्हें भुगतना भी पड़ता था. 1932 में अमरीका लौटने के बाद हालांकि बेशेत कई नामी-गिरामी लोगों की संगत करते रहे पर उन्हें काम मिलने में लगातार दिक़्क़तें होती रहीं. बीच में उन्होंने दर्ज़ी की एक दुकान भी खोली जिसके पीछे वे अपने यहां आने वाले कई मशहूर जैज़ वादकों के साथ सैक्सोफ़ोन बजाते रहे जिसे उन्होंने अपनी पहली लन्दन यात्रा के दौरान खोजा था और क्लैरिनेट की जगह अपना लिया था. लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति 1940 के दशक के अन्त में ही जा कर सुधरी. 

http://youtu.be/ApSkzu22-94 (सिडनी बेशेत -- डियर ओल्ड साउथलैण्ड)

1950 में  उन्हें पैरिस के जैज़ मेले में एकल वादन के लिए न्योता गया. मेले में उनके प्रदर्शन से एक बार फिर उनकी शोहरत बुलन्दियों पर जा पहुंची.  वे अमरीकी जैज़ परिदृश्य से निराश तो थे ही, अब उन्होंने पैरिस जा बसने का फ़ैसला किया. इसके बाद उन्हें पैसों की दिक़्क़त न रही, भरपूर मौक़े मिले और रिकौर्ड बनाने वाली कम्पनी "फ़्रेन्च वोग" के साथ उनका अनुबन्ध उनके जीवन के अन्त तक चलता रहा जिस दौरान उन्हों अनेक लोकप्रिय रिकौर्ड बनाये जिनमें उनकी अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति हासिल करने वाली धुन "पेति फ़्लियुर" (नन्हा फूल) शामिल थी. 

http://youtu.be/y3CTc6pgGKc  (पेति फ़्लियुर)

इस दौरान उन्होंने अपने पुराने साथी लूई आर्मस्ट्रौंग के साथ और जिप्सी जैज़ गिटार वादक जैंगो राइनहार्ट के साथ कई बार संगत की.  बेशेत की ख़ूबी सिर्फ़ जैज़ के अप्रतिम वादक के तौर पर ही नहीं थी. उनका दायरा पश्चिमी शास्त्रीय संगीत तक फैला हुआ था और साहित्य और दर्शन तक भी. अब यही देखिये कि पैरिस में रहते हुए उन्होंने सुप्रसिद्ध रूसी शास्त्रीय संगीतकार की रूमानी शैली में एक नृत्य नाटिका का संगीत भी तैयार किया -- रात एक डायन है. उनकी हरदिल अज़ीज़ी का यही सबूत है कि फ़्रान्स में अस्तित्ववादी उन्हें "ले दियू" -- देवता -- कहते थे और अंग्रेज़ी के जाने-माने कवि फिलिप लार्किन ने उन पर एक कविता भी लिखी :
मुझ पर झरते हैं तुम्हारे स्वर जैसे झरना चाहिए प्यार
एक विशाल हां की तरह 
चांद की फांक जैसा मेरा शहर * ही है
जहां समझी जाती है तुम्हारी बोली
और स्वागत होता है उसका 
भलाई के स्वाभाविक स्वर की तरह
बिखेरता हुआ लम्बे बालों वाला दुख और खरोंच-लगी दया

( * न्यू और्लीन्स को चांद की फांक सरीखा शहर यानी क्रेसेण्ट सिटी भी कहते थे)

बेशेत का देहान्त 1959 में अपने जन्मदिन पर 14 मई को पैरिस में फेफड़ों के कैन्सर से हुआ. अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले उन्होंने कविता में अपनी आत्मकथा लिखी "ट्रीट इट जेंटल."
सिडनी बेशेत जैज़ के पहले महत्वपूर्ण एकल वादक थे और शायद पहले जाने-माने सैक्सोफ़ोन वादक. स्पष्ट अदायगी, सुनियोजित संरचनाएं और बढ़त और एक निजी व्यापक शैली उनके वादन की विशेषता थी. जैज़ की कथित शुद्धता को बरक़रार रखते हुए, उसमें प्रयोग करते हुए बेशेत ने पश्चिमी शास्त्रीय के अपने ज्ञान से अपने संगीत को समृद्ध भी किया. विभिन्न साज़ों में उनकी महारत का सबूत यह है कि 1941 में एक प्रयोग के तहत उन्होंने एक रिकौर्डिंग की जिसमें उन्हों एक-एक करके छै अलग-अलग साज़ -- क्लैरिनेट, टेनर सैक्सोफ़ोन, सोप्रानो सैक्सोफ़ोन, पियानो, बेस और ड्रम्स -- बजाये, बारी-बारी से अन्य वादकों के साथ संगत करते हुए. आगे आने वाले अनेक जैज़ फ़नकारों,  मसलन औल्टो सैक्सोफ़ोन वादक जौनी हौजस,  पर बेशेत का गहरा प्रभाव पड़ा  जो युवावस्था में उनकी शागिर्दी करते रहे.  अकारण नहीं है कि उनके योगदान को याद करते हुए ड्यूक एलिंग्टन ने बाद में कहा, "मेरे निकट बेशेत जैज़ के प्रतीक थे...जो कुछ उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में बजाया, वह बिलकुल मौलिक था. मैं ईमानदारी से सोचता हूं कि वे इस संगीत में सबसे अनोखे आदमी थे."
अन्त में सैक्सोफ़ोन पर सिड्नी बेशेत द्वारा प्रसिद्ध धुन "सेंट लूइज़ ब्लूज़" की एक अदायगी पेश है : 

http://youtu.be/XzG3vllEwyg (सिड्नी बेशेत -- सेंट लूइज़ ब्लूज़)

(जारी)


जैज़ संगीत पर एक लम्बा आलेख



चट्टानी जीवन का संगीत

दसवीं कड़ी

11.


किसी क़ौम की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति उसके संगीत और नृत्य में है
-- अफ़्रीकी कहावत

न्यू ऑर्लीन्स के बहुत से जैज़ संगीतकारों के लिए देश के बाकी हिस्से की ओर जाने वाला सबसे बड़ा मार्ग था मिसीसिपी नदी का चौड़ा, नावों से भरा पाट। नदी किनारे बसे शहरों के लोग एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए नदी का इस्तेमाल करते और दर्जनों बड़े-बड़े बजरे अपने भाप के इंजनों से धुँआ उड़ाते नदी के सीने को चीरते रहते। जहाँ तक यात्रियों का सवाल था, वे चाहे एक दिन के लिए बजरे पर सवार हुए हों या शनिवार-इतवार की छुट्टियाँ मनाने या फिर पूरे हफ़्ते के नौका-विहार के लिए -- उनके मनोरंजन की ज़रूरत का ज़्यादातर हिस्सा बजरों पर मौजूद जैज़ मण्डलियों द्वारा उपलब्ध कराया जाता।
इन बजरों पर न्यू ऑर्लीन्स की कौन-सी जैज़ टोलियों ने पहले पहल गाना-बजाना शुरू किया, इसकी याद किसी को नहीं। लेकिन बाद में आने वालों में कुछ लोग निश्चय ही आगे चल कर बहुत मशहूर हुए। इन्हीं में थे कॉर्नेट-वादक शुगर जॉनी जो कई वर्षों तक छै सदस्यों वाली अपनी टोली के साथ बजरों पर जैज़ बजाते दौरा करते रहे और 1916 के आस-पास अन्ततः शिकागो जा बसे। अपनी टोली में उन्होंने जो नयी बात पैदा की, वह थी महिला पियानो वादक लिलियन हार्डिन को शामिल करना। लिलियन एक युवा छात्रा थी, जो शास्त्रीय संगीत में और अधिक प्रवीणता प्राप्त करने के लिए शिकागो आयी थी, लेकिन जैज़ से परिचय होने पर वह जैज़ की ही हो कर रह गयी और बाद में श्रीमती लुई आर्मस्ट्रौंग बनी।
मिसीसिपी नदी पर तैरते बजरों में दौरा करने वाली जैज़ मण्डलियों में से सबसे बड़ा बैण्ड सेण्ट लुई शहर के पियानो वादक फेट मैरेवल का था।

http://youtu.be/sOQxq2466Z0?list=PL2pWdW_TMrMXqq4bomdOjxn-vfU6TwvNe (शी’ज़ क्राइंग फ़ौर मी)


फ़ेट मैरेबल (1890-1947) पडुका, केण्टकी के रहने वाले थे और उन्होंने अपनी मां से पियानो सीखा था. सत्रह साल की उमर से वे मिसिसिपी नदी पर भाप से चलने वाले विशाल बजरों पर पियानो बजाने लगे और जल्दी ही ऐसे बजरों पर बैण्ड संचालक हो गये जो मिसिसिपी नदी पर आवा-जाही या सैर-सपाटे के लिए बजरों का इस्तेमाल करते थे. ये बजरे नदी पर न्यू और्लीन्ज़ और लूज़िआना से ले कर मिनिआपोलिस और मिनेसोटा तक जाते थे और यात्रियों और सैलानियों को इन लम्बी-लम्बी यात्राओं को गुलज़ार बनाने के लिए गीत-संगीत की दरकार रहती. फ़ेट मैरेबल को वह "नया जैज़" संगीत बहुत पसन्द था जो न्यू और्लीन्ज़ में तरुणाई की मंज़िलें तय कर रहा था और उनके बैण्ड के ज़्यादातर संगीतकार उसी शहर से भरती किये गये थे.
फेट मेरेबल की मण्डली में अमूमन दस साज़ और इतने ही वादक होते थे और शायद उन्होंने न केवल सबसे ज़्यादा संगीतकारों को न्यू ऑर्लीन्स से अमरीका के अन्य शहरों की ओर ले जाने में मदद की, बल्कि शायद सबसे अच्छे संगीतकारों को भी -- मिसाल के तौर पर लुई आर्मस्ट्रौंग। ऐसी किंवदन्ती है कि जब बजरा ऑल्टन नामक जगह से रवाना होता तो लुई ऑर्मस्ट्रौंग धुन बजाना शुरू करते और पन्द्रह मील दूर सेण्ट लुई पहुँचने तक वे उसकी अन्तराएँ ही बजा रहे होते।

http://jazz.tulane.edu/sites/all/themes/Howard_Tilton/images/exhibits/riverboats/large/rj_exhibit_5_large.jpg (कैपिटल नामक बजरे पर फ़ेट मैरेबल के बैंड का चित्र)

उस ज़माने में मिसिसिपी नदी पर बहुत-से बड़े-बड़े बजरे चला करते थे जो लोगों को नदी के किनारे बसे शहरों के बीच लाया-ले जाया करते. इन बजरों में सवारियों के मनोरंजन के लिए गायकों और वादकों की मण्डलियां भी होतीं. इन बजरों में कैपिटल नामक बजरा स्ट्रेकफ़स लाइन का सबसे बड़ा बजरा था और इस बजरे के बैण्ड की बाग-डोर पियानो वादक और प्रबन्धक फ़ेट मैरेबल के हाथ में थी. मैरेब्ल ने स्ट्रेकफ़स लाइन के साथ 1907 से 1940 तक काम किया और इस लाइन के सभी बैंडों का बन्दोबस्त संभाला.

http://youtu.be/3NtrSJMKQ7A (फ़ीलिक्स केप्ट औन वौकिंग) 

मैरेबल अपने बैण्ड के सदस्यों से यह उम्मीद करते थे कि वे गर्मा-गर्म, फड़कते हुए गीतों के साथ-साथ हल्के-फुल्के शास्त्रीय संगीत के नमूने भी पेश करें और सबसे बड़ी बात, संगीत की धुनों पर नाचने-थिरकने वाले यात्रियों को ख़ुश रखें. नतीजे के तौर पर फ़ेट मैरेबल संगीत कौशल की अपेक्षा के साथ-साथ कड़े अनुशासन पर भी ज़ोर देते. मिसाल के लिए जब लूई आर्मस्ट्रौंग उनकी मण्डली में शामिल हुए तो मैरेबल ने जल्दी ही यह पहचान लिया कि आर्मस्ट्रौंग में हाथ-के-हाथ धुन को नयी दिशाओं में ले जाने का स्वाभाविक गुण था और उन्होंने आर्मस्ट्रौंग को लकीर का फ़क़ीर बनने की बजाय प्रयोग करने की खुली छूट दी. मैरेबल के बैण्ड ने बहुत-से जैज़ संगीतकारों के लिए शुरुआती पाठशाला का काम किया जो आगे चल कर जैज़ में जाने गये मसलन रेड ऐलन, बेबी डौड्स, पौप्स फ़ौस्टर, ऐल मौर्गन, आदि.

http://youtu.be/plfshlhD_BY (बेबी डौड्स -- ड्रम)

http://youtu.be/qMDO7fk7buI (रेड ऐलन -- ट्रम्पेट)



जौर्ज रसेल जिन्होंने आगे चल कर संगीत के सुरों के बारे में अपना मशहूर "लिडियन सिद्धान्त" निरूपित किया, फ़ेट मैरेबल की मण्डलियों को सुनते हुए ही बड़े हुए थे. रसेल के मुताबिक संगीत में डौमिनेण्ट काम करने वाला सुर ही सबसे बड़ा प्रेरक तत्व होता है. इस पर उन्होंने एक किताब भी लिखी और अपने सिद्धान्त को विस्तार से समझाया. आगे आने वाले संगीतकारों जैसे जौन कोल्ट्रेन और माइल्स डेविस पर इस सिद्धान्त का बहुत असर हुआ. 

12. 

न्यू ऑर्लीन्स पहुँचने से पहले मिसीसिपी नदी में कई नदियाँ आ कर मिलती हैं, जिनमें से एक बड़ी नदी का नाम है मिसूरी और दूसरी का नाम है इलीनॉय। ये दोनों नदियाँ सेण्ट लुई नाम की जगह के आस-पास मिसीसिपी नदी में मिलती हैं। लिहाज़ा न्यू ऑर्लीन्स से मेम्फ़िस और सेण्ट लुई होते हुए सैलानियों से भरे बजरे एक ओर तो मिसूरी नदी के किनारे बसे शहर कैन्सस सिटी की तरफ़ चले जाते और दूसरी ओर इलिनॉय नदी के माध्यम से शिकागो की ओर। ज़ाहिर है बजरों के साथ सिर्फ़ सैलानी या मुसाफ़िर ही इन बड़े नगरों तक नहीं पहुँचते थे, बल्कि न्यू ऑर्लीन्स की जैज़ मंडलियाँ भी। कुछ ही वर्षों में कैन्सस सिटी की उर्वर भूमि में जैज़ के अंकुर पनपने लगे। 
कैन्सस सिटी में संगीत एक अपनी परम्परा थी -- ब्लूज़ पर आधारित भारी लय वाले पियानो वादन की -- जो बाद में ‘बूगी वूगी’ के नाम से मशहूर हुई। इसके अलावा कैन्सस सिटी में जैज़ के लिए दो और महत्वपूर्ण आधार थे -- एक बड़ा नीग्रो समुदाय और ढेर सारे नाचघर और संगीत मंच। कैन्सस सिटी के संगीतकारों ने न्यू ऑर्लीन्स के जैज़ को ज़ज्ब तो किया ही, अपने तईं उसे चुनौती भी दी। घुमन्तू मण्डलियों को वहाँ एक ऐसे संगीत की परम्परा मिली, जो उनके संगीत जितना परिष्कृत तो नहीं था, लेकिन उसमें एक ज़्यादा मज़बूत मर्दाना लय थी और उसकी ताल ज़्यादा लौकिक और तीव्र थी। कैन्सस सिटी के अलावा जो दूसरा महत्वपूर्ण केन्द्र जैज़ को मिला, वह था शिकागो। सन 20 के दशक के मध्य तक जैज़ की लगभग सभी धाराएँ, जो मेम्फ़िस, न्यू ऑर्लीन्स, कैन्सस सिटी और सेण्ट लुई से होते हुए अपने जन्म-स्थान न्यू ऑर्लीन्स तक बिखरी हुई थीं, शिकागो में आ कर केन्द्रित होने लगीं।
बहरहाल, जैज़ संगीत के पहले-पहल रिकॉर्ड भले ही गोरे संगीतकारों ने रिकॉर्ड कराये, मगर इसके बाद मोर्चा एक बार फिर नीग्रो संगीतकारों ने सँभाल लिया और इसमें कोई शक नहीं कि जैज़ की न्यू ऑर्लीन्स शैली के सबसे उम्दा रिकॉर्ड सन 1926 में जेली रोल मॉर्टन और उनके दल -- रेड हॉट पेपर्स -- ने पेश किये और उनका ज़्यादातर संगीत स्वयं जेली रोल मॉर्टन का रचा हुआ था।
इस सदी के आरम्भिक वर्षों में जैज़ मण्डलियों द्वारा बजायी जाने वाली बहुत-सी परम्परागत धुनों पर उन धुनों का भी असर है, जो कवायद के समय या फिर जुलूसों के आगे-आगे चलने वाले बैण्डों द्वारा बजायी जाती थीं। मिसाल के तौर पर किंग ऑलिवर और उनके क्रियोल जैज़ बैण्ड द्वारा बजायी गयी मशहूर धुन ‘हाई सोसाइटी’।

http://youtu.be/rvw0a_2uezE  ( किंग ऑलिवर और उनका क्रियोल जैज़ बैण्ड -- हाई सोसाइटी)

जोज़ेफ़ नैथन औलिवर (1881-1938), जिन्हें जैज़ संगीत की दुनिया ने "किंग औलिवर" का ख़िताब दिया और इसी नाम से जाना, कौर्नेट वादक और जैज़ मण्डली के संचालक थे. उन्हें ख़ास तौर पर उनके वादन की शैली और नयी धुनें बनाने की ख़ूबी से शोहरत मिली. उनकी बनायी बहुत-सी धुनें आज भी बजायी जाती हैं, जैसे "डिपरमाउथ ब्लूज़," "स्वीट लाइक दिस" और "डौक्टर जैज़." हालांकि लूई आर्मस्ट्रौंग ने शुरुआत फ़ेट मैरेबल के साथ की थी, लेकिन उनके असली गुरु और उस्ताद किंग औलिवर ही थे. जैज़ संगीत पर उनका इतना गहरा असर पड़ा था कि आर्मस्ट्रौंग ने आगे चल कर बाद में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति पाने के बाद एक बार कहा था, "अगर जो औलिवर न होते तो जैज़ वहां न होता जहां वह आज है."

http://youtu.be/BEF9QeHxrYw (किंग औलिवर -- क्रिओल जैज़ बैंड -- डिपर माउथ ब्लूज़)

औलिवर लूज़िआना के एक कस्बे में पैदा हुए थे लेकिन अपनी जवानी ही में न्यू और्लीन्ज़ आ गये थे. पहले उन्होंने ट्रौम्बोन पर हाथ आज़माया पर जल्दी ही वे कौर्नेट बजाने लगे. वे आम मण्डलियों में भी बजाते और नृत्य के आयोजनों से जुड़ी मण्डलियों में भी और न्यू और्लीन्ज़ के उस इलाके में भी जो अपनी तवायफ़ों के लिए जाना जाता था. सबसे बड़ी बात यह थी कि रंग-जाति और नस्ल के भेद-भाव के होते हुए भी किंग औलिवर के चाहने वालों में हर रंग, जाति, नस्ल और वर्ग के लोग थे, ग़रीब भी और अमीर भी, काले भी और गोरे भी. और किंग औलिवर की कलाकारी उसी हरदिलअज़ीज़ी के साथ काम-काजी काले समुदाय और तवायफ़ ख़ानों में और ऊंचे तबक़े के गोरों के जलसों में चमकती. 1910 के दशक के अन्त में किंग औलिवर का बैण्ड न्यू और्लीन्ज़ के सबसे लोकप्रिय बैण्डों में शामिल हो चुका था. तभी एक ऐसी घटना हुई कि औलिवर को अपनी पत्नी और बेटी के साथ अपने पसन्दीदा शहर न्यू और्लीन्ज़ को छोड़ कर शिकागो जाना पड़ा. बहुत बाद में औलिवर की पत्नी एस्टेला ने एक इण्टर्व्यू में बताया कि नाच के एक जलसे में लड़ाई-झगड़ा हो गया. पुलिस आयी और उसने झगड़ा करने वालों के साथ औलिवर और उनकी मण्दली के सभी संगीतकारों को भी गिरफ़्तार कर लिया. साथ ही उन दिनों तवायफ़ों के इलाक़े "स्टोरीविले" भी बन्द कर दिया गया. नतीजा यह हुआ कि 1918 में किंग औलिवर अपनी पत्नी एस्टेल और बेटी रूबी के साथ शिकागो चले आये. न्यू और्लीन्ज़ के इस नुक़सान से फ़ायदा शिकागो के जैज़ जगत को हुआ.
चार बरस में किंग औलिवर ने एक बार फिर अपना बैण्ड खड़ा कर लिया था और 1922 में उन्होंने "किंग औलिवर ऐण्ड हिज़ क्रियोल जैज़ बैण्ड" की बुनियाद रख दी थी जिसमें एक-से-एक कलाकारों की भरमार थी -- लूई आर्मस्ट्रौंग (कौर्नेट), बेबी डौड्स (ड्रम), जौनी डौड्स (क्लैरिनेट), होनोरे डूट्रे (ट्रौम्बोन) और विलियम मैनुएल जौन्सन (बेस गिटार) तो थे ही, औलिवर ने एक महिला संगीतकार लिलियन हार्डिन को पियानो वादक के तौर पर मौक़ा दिया. लिलियन आगे चल कर श्रीमती आर्मस्ट्रौंग बनीं. 1923 से किंग औलिवर ने बाक़ायदा संगीत रिकौर्ड कराना शुरू किया और एक नये क्षेत्र को अपने संगीतकारों के लिए खोल दिया.

http://youtu.be/T2QEBshAQ68 (कनैल स्ट्रीट ब्लूज़ -- किंग औलिवर -- क्रिओल जैज़ बैंड )

अफ़सोस की बात यह थी कि संगीत  के  फ़न में किंग औलिवर जितने बड़े उस्ताद थे, कारोबार के मामले में उतने ही अनाड़ी थे. कई प्रबन्धकों ने उन्हें चूना लगाया और उनके पैसे हड़प कर गये. ख़ुद औलिवर ने कई बार ज़्यादा पैसे मांगने की वजह से अवसर खो दिये, जैसा न्यू यौर्क के मशहूर "कौटन क्लब" के सिलसिले में हुआ, जब यह मौक़ा उनकी बजाय ड्यूक एलिंग्टन को मिल गया जिन्हों ने यह अवसर स्वीकार कर लिया और आगे चल कर शोहरत हासिल की. ऊपर से 1929 की मन्दी के दौर ने रही-सही कसर पूरी कर दी. औलिवर का सारा पैसा जो बैंक में जमा था बैंक के दीवालिया हो जाने पर डूब गया. फिर जैसे इतना ही काफ़ी नहीं था, उनके मसूढ़ों की तकलीफ़ की वजह से उन्हें कौर्नेट बजाने में परेशानी होने लगी. मण्डली टूट गयी. इस महान संगीतकार के आख़िरी दिन सवाना, जौर्जिया के एक मनोरंजन केन्द्र में सफ़ाई कर्मचारी की नौकरी करते हुए बीते, जहां 1938 में जिगर की बीमारी से उनकी मृत्यु हो गयी, जिसका इलाज करने के साधन भी उनके पास नहीं बचे थे. 
लेकिन इस सब के बावजूद किंग औलिवर ने जैज़ को आगे बढ़ाने में जो काम किया वह अनमोल था. जाने कितने जैज़ कलाकारों को उन्होंने आगे बढ़ाया, प्रेरित किया और अनगिनत गायकों-वादकों पर अपना असर छोड़ा.

(जारी) 






Thursday, February 12, 2015

जैज़ संगीत पर एक लम्बा आलेख


चट्टानी जीवन का संगीत

नवीं कड़ी


10.

अगर संगीत एक स्थान है तो जैज़ एक नगर है 
--वेरा नज़ारियन

सच तो यह है कि न्यू ऑर्लीन्स की चर्चा के बग़ैर जैज़ की चर्चा करना सम्भव नहीं। और देखा जाये तो न्यू ऑर्लीन्स था भी ऐसा ही एक मस्त शहर जहाँ जैज़ जैसे जीवन्त, ज़िन्दगी की धड़कनों से भरपूर संगीत के विकसित होने की पूरी गुंजाइश थी। अमरीका के दक्षिणी लूज़ियाना प्रान्त की इस बन्दरगाह को ही संगीत के अधिकतर पारखी जैज़ की -- जैसा कि हम आज उसे जानते हैं -- जन्मभूमि मानते हैं। उसी तरह जैसे न्यू ऑर्लीन्स निवासी जेली रोल मॉर्टन को जैज़ का जन्मदाता। हालाँकि उन दिनों अनेक संगीतकार विभिन्न शहरों और इस सदी के रैगटाइम और ब्लूज़ से जैज़ तक के पड़ाव तय कर रहे थे। पिछली सदी के अन्तिम और इस सदी के आरम्भिक वर्षों में न्यू ऑर्लीन्स अपने किस्म का अनोखा नगर था। बन्दरगाह की चहल-पहल, मल्लाहों की आवा-जाही, स्पेनी, फ्रांसीसी और अंग्रेज़ी मूल के गोरों और अफ्रीका से लाये गये लोगों की मिली-जुली आबादी, हल्ला-गुल्ला, नाच-गाना और तरह-तरह के खेल-तमाशे, हवा में समुद्र की पागल कर देने वाली गन्ध और हौलियों और शराबख़ानों में समुद्री डाकुओं और जाँबाज़ नाविकों की गाथाएँ। राग-रंग और संगीत में रचे-बसे चकले और तवायफ़ख़ाने। बाज़ारों और गलियों में डाभ और मछली बेचने वालियों की हाँक-पुकार। चूने से पूते हुए सफ़ेद मकान, जिनकी बनावट पर स्पष्ट फ्रांसीसी और स्पेनी छाप थी। न्यू ऑर्लीन्स अमरीका के दक्षिणी हिस्से का एक बड़ा और रंग-बिरंगा शहर था, इसलिए इस पूरे इलाके से लोग खिंच कर वहाँ आते। इसी गहमा-गहमी ने जैज़ के लिए एक बिल्कुल मुनासिब ज़मीन तैयार की।
उत्सव और समारोह न्यू ऑर्लीन्स की फ़िज़ा का अनिवार्य अंग था। कोई भी समारोह होता बैण्ड-बाजे और संगीत-मण्डलियाँ मौजूद रहतीं। खेतों में अकेले काम करते हुए अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने वाले एकाकी खेत मज़दूर का संगीत रैगटाइम को जन्म देने वाली देहाती संगीत-सभाओं के साथ मिल कर न्यू ऑर्लीन्स में एक नये रूप में उभरा। श्रम से तो यह जुड़ा ही हुआ था, अब सामूहिकता से भी जुड़ा। व्यक्ति का महत्व कम नहीं हुआ, बल्कि दलगत सामूहिक अभिव्यक्ति में उसमें एक नया पहलू दिखायी देने लगा। ब्लूज़ अगर मुख्य रूप से गाये जाते थे और रैगटाइम में बैंजो, गिटार और पियानो की अहमियत थी तो न्यू ऑर्लीन्स में कुछ नये वाद्य जैज़ में आ जुड़े। जैसे ट्रम्पेट, ट्रॉम्बोन और क्लैरिनेट।
न्यू ऑर्लीन्स में काम की कमी नहीं थी। न तो मज़दूरों के लिए, न संगीतकारों के लिए, न गोरों के लिए, न कालों के लिए और न ही गोरों और कालों के मेल से पैदा हुई ‘क्रियोल’ जाति के लिए। यही नहीं, बल्कि न्यू ऑर्लीन्स में संगीत का दायरा बहुत व्यापक था। तवायफ़ख़ानों और नाचघरों की दीवारों के भीतर भी और बाहर खुली फ़िज़ा में भी। झील के किनारे पिकनिक मनाते लोग हों या तरह-तरह की संस्थाएँ, जो उन दिनों न्यू ऑर्लीन्स में फल-फूल रही थीं, हर जगह संगीत की गुंजाइश थी --यहाँ तक की अर्थियों और अन्त्येष्टि के गम्भीर, गरिमा-भरे वातावरण में भी, जिनके साथ-साथ अक्सर बैण्ड-बाजे कवायद करते हुए दिखायी देते। इन्हीं बैण्डों से जैज़ को परेड-नुमा धुनें मिलीं और मिले वे वाद्य, जिनका जिक्र अभी हमने किया। यानी ट्रम्पेट, ट्रॉम्बोन और क्लेरिनेट।
मगर यह तो बहुत बाद की बात है। न्यू ऑर्लीन्स में नीग्रो संगीत की जड़ें अमरीकी गृह युद्ध के बाद ही पनपने लगी थीं और उस युग का उल्लेख जैज़ के विकास को समझने के लिए ज़रूरी है। एक तरह से यह दौर उन लोगों की दुख-भरी कहानी का हिस्सा है, जिन्हें अपनी धरती से उखाड़ कर, अपनी परम्परा, धर्म और लोक संस्कृति से काट कर, पहले तो ग़ुलाम बनाया गया और फिर एक ऐसी आज़ादी का आश्वासन दिया गया, जो अस्पष्ट और भ्रामक साबित हुई। अमरीकी गृह युद्ध के बाद नीग्रो दासों के लिए स्वाधीनता का अर्थ केवल इतना ही नहीं था कि उनके साथ-कम-से-कम काग़ज़ पर-भेद-भाव और ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं बरती जायेगी, बल्कि इसका एक पहलू यह भी था कि उन्हें अचानक मुक्त करके शहरी जीवन की क्रूरता के बीच अकेला और असहाय छोड़ दिया गया था, जहाँ उनके पास कोई आसरा नहीं था। ज़ाहिर है यह कहानी ऐसे लोगों की कहानी है, जो बलपूर्वक अपनी संस्कृति से वंचित कर दिये जाने पर एक नयी संस्कृति बनाने की कोशिश कर रहे थे।

न्यू ऑर्लीन्स के कॉर्नेट-वादक बडी बोल्डन की कहानी इसी दौर की कहानी है।

11.

उस दौर की याद करते हुए बड़ी बोल्डन के साथी ड्यूक बॉटली ने बताया है कि गृह युद्ध के बाद न्यू ऑर्लीन्स शायद सबसे बदकिस्मत अमरीकी शहर था। दक्षिणी राज्यों की बग़ावत को कुचलने के बाद अन्य शहरों की तरह न्यू ऑर्लीन्स पर अमरीकी सेना के साथ-साथ किस्म-किस्म के दूसरे चोर-बदमाशों का राज्य हो गया था और विडम्बना यह थी कि जिन लोगों ने नीग्रो दासों की मुक्ति के लिए दक्षिणी राज्यों की बग़ावत को दबाया था, उन्हीं ने नीग्रो लोगों का दमन करने के लिए तरह-तरह के भेद-भाव को बढ़ावा दिया और दमनकारी कानून बनाये और पाबन्दियाँ लगायीं। 
पहली पाबन्दी तो यह थी कि नीग्रो लोग किसी सार्वजनिक उद्यान में इकट्ठे नहीं हो सकते थे। अगर होते तो उन पर जुर्माना हो सकता था। जेल हो सकती थी। लिहाज़ा शहर के बीचों-बीच कौंगो स्क्वेयर नामक मैदान उजड़ गया और इतवार की शाम को खेल-तमाशे और नाच-गाना शहर के बाहरी खुले इलाके की ओर खिसक गया। धीरे-धीरे जैसे-जैसे ख़बर फैली, वहाँ भीड़ की तादाद भी बढ़ने लगी और किराये पर घोड़े-गाडि़याँ चलाने वाले एक खाते-पीते व्यापारी मिस्टर पोरी ने इस इलाके में अपना अस्तबल बना लिया। इतवार-के-इतवार होने वाले मेले में खोंचे वालों को धड़ल्ले से धन्धा करते देख कर मिस्टर पोरी ने वहीं एक बड़ा-सा हॉल बनवा दिया, जिसके बाहर खुले में कनात तान कर लोक-सभाएँ की जा सकती थीं। इसी हाल और उसके बाहर की जगह में खेल-तमाशे, नाच-गाना और इसी किस्म के दूसरे सामाजिक उत्सव होने लगे। 
अब्राहिम लिंकन की याद में मिस्टर पोरी ने इस हाल का नाम रखा लिंकन पार्क। लिंकन पार्क का उद्घाटन बड़ी धूमधाम से हुआ और जब तक यह हॉल कायम रहा -- यानी बड़े क्लबों, होटलों और मनोरंजन स्थलों के युग से पहले -- लिंकन पार्क न्यू ऑर्लीन्स की सबसे मशहूर तफ़रीहगाह थी। इसी लिंकन पार्क में पिछली सदी के आख़िरी दशक में, यानी 1890 के आस-पास, बड़ी बोल्डन ने अपने कार्यक्रम शुरू किये। इनमें गाना-बजाना तो होता ही था, मगर उसके साथ-साथ आपस में या दर्शकों के साथ लतीफ़ेबाज़ी और हाज़िर जवाबी के मुकाबिले भी चलते रहे थे। 
बडी बोल्डन पेशे से नाई थे। काफ़ी छैल-चिकनिया किस्म के आदमी। शानदार कपड़े पहनते और जम कर इश्कबाज़ी करते -- जिसमें कहना न होगा कि उनकी सफलता के पीछे उनके अद्भुत कॉर्नेट-वादन का भी हाथ था। बोल्डन की दुकान छोटी, मगर बड़ी साफ़-सुथरी थी। उनके ग्राहक गिने-चुने, मगर खुला ख़र्च करने वाले होते। बोल्डन हर किसी की हजामत नहीं बनाते थे। वे अपने ग्राहकों को ख़ुद चुनते थे। दूसरे शब्दों में बड़ी बोल्डन से हजामत बनवाने के लिए ग्राहकों का उनसे परिचित होना ज़रूरी था, अन्यथा ग्राहक को उनके सहयोगी सँभाल लेते। जब वे दुकान में बझे न होते तो बोल्डन दुकान के बाहर खड़े हो कर आस-पड़ोस के तमाम छोटे-बड़े बच्चों से बोलते-बतियाते। बच्चों के लिए वे आज के किसी फ़िल्मी सितारे से कम नहीं थे। कई बार वे बच्चों को मिठाइयाँ ख़रीद देते या अगर मूड होता तो छै-सात बच्चों को दुकान में ले जाकर उनके सिर मूँड देते और बाद में जब बच्चों की माँएँ हाय-तोबा मचातीं तो वे ख़ूब मज़ा लेते। बोल्डन की लोकप्रियता सिर्फ़ उन्हीं तक सीमित नहीं थी। बहुत-से लोग भी, जिन्हें बोल्डन का संगीत पसन्द नहीं था, उनका आदर करते थे। उनकी अपनी तो कोई रिकौर्डिंग मौजूद नहीं है, पर उनकी बनायी धुनें बाद में बहुत-से लोगों ने बजायीं. यहां एक धुन पेश है.

http://youtu.be/WbkkSN_sSfc (बडी बोल्डन --- डिक्सीलैण्ड)


उस ज़माने में सिर्फ़ भले लोग ही संगीत की इन इतवारी सभाओं में नहीं जाते थे, बल्कि रात ढलने पर न्यू ऑर्लीन्स के चोर, उचक्के, शोहदे, जुआरी, गिरहकट और वेश्याओं के दलाल भी जुट जाते। लेकिन बड़ी बोल्डन में भीड़ को सँभालने की अद्भुत क्षमता थी। वादकों में घनघोर स्पर्धा तक भी थी, लेकिन उस ज़माने में न तो प्रेस एजेण्ट थे, न रंगीन पत्रिकाएँ और न ही प्रचार-प्रसार के दूसरे साधन। लिहाज़ा हर ख़लीफ़ा अपने चाहने वालों की ख़ातिर अपने मुकाबले में खड़े दूसरे ख़लीफ़ा को ज़्यादा और ज़्यादा देर तक गा-बजा कर ही चित कर सकता था। ऐसी हालत में बडी बोल्डन का बैण्ड बारह लम्बे वर्षों तक मैदान में जमा रहा यहाँ तक कि लोगों ने बडी बोल्डन को ‘किंग’ का ख़िताब दे दिया। 
कई बार वे लिंकन पार्क में अपना कार्यक्रम शुरू करते और फिर कुछ देर के बाद किसी और को अपनी जगह खड़ा करके बिना किसी हिचक के पास-पड़ोस के दूसरे बैण्डों में संगत करने चले जाते और फिर पाँच-सात धुनें बजाने के बाद अपने कार्यक्रम का आख़िरी हिस्सा ख़ुद पेश करने के लिए वापस आ जाते। बडी बोल्डन की विशेषता थी उनके ब्लूज़, जिनमें भजनों की अलौकिकता के साथ-साथ लौकिकता का बेजोड़ मेल था। वे जब चाहते, लोगों को थिरकने पर मज़बूर कर देते और जब चाहते उन्हें उदासी के नीले नीम-अँधेरों में खींच ले जाते। बोल्डन का देहान्त 54 साल की उमर में हुआ लेकिन आख़िरी लगभग बीस साल वे मानसिक बीमारी का शिकार रहे. 


http://youtu.be/vgmZyImasvA?list=RDvgmZyImasvA (बडी बोल्डन की एक धुन पेश करते हुए जेली रोल मोर्टन)

जैसे-जैसे न्यू ऑर्लीन्स में जैज़ संगीत के अँखुए फूटने लगे और उसकी लोकप्रियता बढ़ी, गोरे संगीतकारों ने भी जैज़ को अपनाना और उसे धड़ल्ले से बजाना शुरू कर दिया। कुछ ने तो यह दावे भी किये कि जैज़ का आविष्कार उन्हीं ने किया हालाँकि किसी भी संगीत समालोचक ने इन पर कान नहीं दिया। तो भी यह बात शायद सबसे दिलचस्प है कि जिस अनोखी संगीत-शैली को अमरीकी नीग्रो समुदाय ने विकसित किया था, उसे सँजोया था और परवान पर चढ़ाया था, उसके पहले-पहल रिकॉर्ड 1917 में एक ऐसे बैण्ड ने रिकॉर्ड कराये, जो गोरे संगीतकारों का था -- "द ओरिजिनल डिक्सीलैण्ड जैज़ बैण्ड।" इसके विपरीत किंग ऑलिवर और उनके "क्रियोल जैज़ बैण्ड" को -- जो 1917 के आस-पास न्यू ऑर्लीन्स का शायद सबसे अच्छा बैण्ड था -- अपना संगीत रिकॉर्ड कराने के लिए न केवल और पाँच बरस इन्तज़ार करना पड़ा, बल्कि अपने दल-बल समेत न्यू ऑर्लीन्स छोड़ कर शिकागो जाना पड़ा। 
(जारी)

Wednesday, February 11, 2015

जैज़ संगीत पर एक लम्बा आलेख


चट्टानी जीवन का संगीत 

आठवीं कड़ी

9. 

जैज़ का एक पहलू उसके वाद्यों से जुड़ा हुआ है. एकदम शुरुआत में जब अफ़्रीका से ला कर ग़ुलाम बनाये गये लोगों को ढोल-नगाड़े बजाने की भी इजाज़त नहीं थी, उनके पास ले-दे कर अपनी आवाज़ें, अपने शरीर और लय-ताल-सुर का अपना परम्परागत ज्ञान ही था. फिर धीरे-धीरे एक ओर तो पाबन्दियां ढीली पड़ीं, दूसरी तरफ़ ये ग़ुलाम पश्चिमी वाद्यों और पश्चिमी संगीत के सम्पर्क में आये और उन्होंने इन वाद्यों को बजाने की सलाहियत हासिल की. पियानो, फ़िडल यानी वायोलिन और माउथ और्गन और किसी हद तक बैन्जो उस संगीत के बुनियादी वाद्य थे जिस से जैज़ विकसित हुआ. पाबन्दियां उठने पर फ़ौजी ड्रम और अलग-अलग क़िस्म के नगाड़े इस्तेमाल होने लगे. उन्नीसवीं सदी की दहलीज़ पार करते-न करते क्लैरिनेट, ट्रम्पेट, बेस, गिटार, बांसुरी   जैसे वाद्य शामिल हुए. यहां तक आते-आते अफ़्रीकी-अमरीकी संगीत में कई वाद्य जुड़ गये थे -- पियानो तो था ही, साथ ही फ़िडल यानी वायोलिन और अलग-अलग आकार के ढोल-नगाड़े भी थे. धीरे-धीरे माउथ और्गन, क्लैरिनेट, ट्रम्पेट, गिटार, बेस, बांसुरी जैसे वाद्यों ने अपनी जगह बनायी और फिर सबसे आख़िर में ट्रौम्बोन और जैज़ के सबसे जाने-माने वाद्य -- सैक्सोफ़ोन का प्रवेश हुआ और इन के आने के बाद कहा जाये कि एक तरह से पूरा बैण्ड तैयार हो गया. बाद में इन्हीं के और साथी-संगी आ-आ कर जमावड़े को समृद्ध करते रहे. 
इतना सब लिखने के बाद जैज़-संगीत के एक प्रमुख और बुनियादी वाद्य की चर्चा न करना ¤ज्यादती ही कहा जायेगा। और वह वाद्य है-ड्रम्स. भारतीय संगीत में जिस तरह ढोलक, तबला, मृदंग, पखावज और खड़ताल तथा मंजीरा इस्तेमाल किये जाते हैं, उससे जैज़ संगीत में इस्तेमाल होने वाले ड्रम्स की तुलना नहीं की जा सकती। जैज़ का ड्रम-वादक हाथ से भी काम लेता है और ड्रम-स्टिक्स से भी। ड्रम्स का आकार-प्रकार भी अलग होता है। बैण्ड में बजाये जाने वाले बड़े ढोल-नुमा ड्रम से ले कर छोटे-छोटे बौंगो ड्रम्स तक। इसके साथ ही ड्रम्स से जुड़ी धातु की एक थाली भी होती है, जिस पर आघात करके एक छनछनाहट-सी पैदा की जाती है।
जैसा कि मैंने कहा, ड्रम्स जैज़-संगीत का बुनियादी साज़ है, क्योंकि इसके बिना वे ताल नहीं पैदा की जा सकती, जो लय के साथ जैज़-संगीत की अपनी ख़ासियत है। लेकिन अमूमन जैज़ की चर्चा में ज़्यादा ज़ोर कॉर्नेट, ट्रम्पेट, पियानो और सैक्सोफ़ोन की बारीकियों पर दिया जाता है-शायद इसलिए कि ड्रम्स को एक अनिवार्य अंग मान कर पृष्ठभूमि में ही रखा जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि पियानो हो अथवा ट्रम्पेट या सैक्सोफ़ोन-किसी भी धुन को पेश करने में प्रमुख भूमिका इन्हीं की होती है और केवल ड्रम्स के बल पर जैज़ प्रस्तुत करना सम्भव नहीं। इसके बावजूद सैक्सोफ़ोन, पियानो आदि दूसरे वाद्यों के एकल वादन के लिए जो फलक तैयार किया जाता है, वह ड्रम्स के बिना सम्भव नहीं।
चूँकि जैज़ का विकास ही शब्द से हुआ है, यानी ब्लूज़ की गायकी से, इसलिए गायक की और बाद में वादक की भी संगत के लिए ड्रम एक ज़रूरी साज़ था। प्रारम्भिक युग में पियानो बहुत महँगे थे और इसीलिए दुर्लभ भी। ट्रम्पेट, कॉर्नेट आदि के लिए बड़े बैण्ड का होना ज़रूरी था। लिहाज़ा शुरूआत में गायक के साथ बैंजो, गिटार या माउथ ऑर्गन और सीधे-सादे ड्रम का होना ही काफ़ी था और बहुत-सा संगीत बस इतने भर ही से पेश किया जाता रहा। ज़ाहिर है कि लय की तरह इस संगीत की ताल में भी अफ्रीकी प्रभाव की मात्रा भरपूर थी। एक ओर अगर लय लोगों को थिरकने पर मजबूर कर देती तो दूसरी ओर उसकी ’बीट’ लोगों को अनायास ही ताल देने पर विवश कर देती। चूँकि अफ्रीकी संगीत में ढ¨ल-ताशों की एक प्रमुख भूमिका है, इसलिए स्वाभाविक रूप से जैज़ में भी अफ्रीकी ताल सहज रूप से चली आयी है।
कहने की बात नहीं है कि जैज़ का इतिहास उसकी लय-ताल का इतिहास है। शुरू के दिनों में जैज़ की मण्डलियों में पियानो, गिटार या बैंजो बड़ी ट्रम्पेट और तार वाली बड़ी वायलिन के अलावा पैरों से भी निरन्तर लय के साथ ताल देता चलता है। ताल यानी ’बीट’ धुन का एक ज़रूरी हिस्सा है और ’सुर’ में रहना भी उतना ही ज़रूरी था, जितना ’ताल में’ रहना। बहुत-से वादकों के लिए अपने बल पर ताल में रहना कठिन साबित होता था और कुछ ऐसे भी थे, जिनके लिए जैज़ की लय, उसकी गति, उसका स्विंग मुश्किलें पैदा करता था। यही वजह है कि बहुत-से दल लय-ताल के इस संयुक्त मोर्चे पर लड़खड़ा जाते थे। चूँकि शुरू-शुरू में ताल की बिनावट बहुत सीधी-साधी थी, इसलिए वक्त के साथ सिर्फ़ ताल देना ही काफ़ी न रहा और उसका रूप बदलने लगा। इसलिए भी कि लय के मोर्चे पर काम करने वाले वादकों ने उसकी जगह भरने के लिए संगीत के दूसरे टुकड़े ईजाद कर लिये। लेकिन अपने नये स्वरूप में ड्रम्स का महत्व और भी बढ़ गया। मिसाल के तौर पर काउण्ट बेसी के दल में जो जोन्स ड्रम-वादक थे और न सिर्फ़ वे बहुत हल्के हाथों से, बल्कि एक बिलकुल अलग तरीके से ड्रम बजाते थे। बारीकियों में न जाकर इतना कहा जा सकता है कि जोन्स ने एक ऐसा तरीका खोज निकाला था, जिससे वे ताल को महज़ लय का सहारा देने के लिए नहीं इस्तेमाल करते थे, बल्कि लय के साथ बहते चले जाते थे और जब लय की अदायगी में सामने की पंक्ति के वाद्य बारी-बारी से धुन बजाते तो वे अपने ड्रम-वादन से हस्तान्तरण की इस प्रक्रिया में योग देते। मानो उसके ड्रम की ताल धुन को एक वादक से दूसरे वादक तक पहुँचाने में वादन का काम कर रही हो। 

http://youtu.be/LjJZJJ5QBhc?list=RDW8L7JZP97X0 (जो जोन्स ड्रम एकल वादन - ड्यूक एलिंग्टन की संगत में)

एलविन जोन्स जैज़-संगीत के उन ड्रम-वादकों में से हैं, जिनमें प्रतिभा और मौलिकता एक साथ दिखायी पड़ती है। विभिन्न वाद्यों के बीच उनके ड्रम के टुकड़े महज़ संगत के लिए नहीं होते, बल्कि एक ऐसी जुगलबन्दी का काम करते हैं, जो पूरे संगीत के साथ सीधी हिस्सेदारी करती है। ऐसे ही एक और मशहूर ड्रम-वादक हैं मैक्स रोच, जो सनी रॉलिन्स के साथ थिलोनियस मंक के विचारों को संगीत में उतारने की कोशिश करते रहे। यहाँ तक कि कई बार वे सिर्फ़ पार्श्व में ही न रह कर धुन की थीम तक को अपने ड्रम के माध्यम से व्यक्त करने की कोशिश करते।

http://youtu.be/Q0yANhawGaU (मैक्स रोच -- डिज़ी गिलेस्पी की संगत में)

 इसी तरह आर्ट ब्लेकी ने भी जैज़ में अपनी ओर से कुछ जोड़ते हुए मैक्स रोच की ही परम्परा को आगे बढ़ाया। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि ब्लेकी अपने ड्रमवादन से दूसरे वादकों को कोंच-कोंच कर प्रेरित करने की कोशिश कर रहे हों। शायद यही वजह है कि उनके वादन में भी वही विशेषता दिखायी देती है, जो एल्विन जोन्स में। यानी वे सिर्फ़ संगत नहीं करते बल्कि जुगलबन्दी पर उतर आते हैं। 

http://youtu.be/2IQNPlnc9c0  (आर्ट ब्लेकी -- ए नाइट इन ट्यूनिशिया -- ड्रम संगत में)

इस तरह, पहले विश्वयुद्ध के दिनों में ड्रम बजाने वाले ’टिन कैन’ ऐलन से ले कर बेबी डॉड्स, केनी क्लार्क, कोनी के, और शैली मैन तक-निजी प्रतिभा वाले ड्रम-वादकों की एक लम्बी सूची है और अगर जैज़-संगीत की धारा को आगे बढ़ाने में पियानो तथा सैक्सोफ़ोन ने प्रमुख भूमिका निभायी है तो ड्रम-वादकों ने भी कम योगदान नहीं किया।
इस बात का ज़िक्र इसलिए किया गया है कि ख़ुद वाद्यों को बनाने की तकनीक में भी विकास होता रहा है और संगीत को रिकौर्ड करने की तकनीक में भी. यही कारण है कि रैगटाइम के उरूज पर पहुंचने के बाद जब पियानो की तकनीक बदली तो उसने ग्रामोफ़ोन के तवों यानी पुरानी तर्ज़ के रिकौर्डों के साथ मिल कर जैज़ की राहों को खोलने का काम किया. अब "लिखे" हुए रैगटाइम संगीत की तुलना में ज़्यादा खुला, जटिल, आशु-कलाकारी पर आधारित संगीत सम्भव हो गया जिसमें तयशुदा, "लिखे हुए" सुर-ताल की बजाय प्रयोगशीलता की अधिक गुंजाइश थी और जैज़ के अलमबरदारों ने इस का फ़ायदा उठाने में कोई कोताही नहीं की.
यह उस ज़माने की बात है जब जैज़ संगीत का अभी यह नामकरण नहीं हुआ था और अमरीका के दक्षिणी राज्यों में तरह-तरह के बैण्ड ब्लूज़ और रैगटाइम ही बजाते थे, भले ही उनमें शामिल कुछ संगीतकार जैज़ की दिशा में क़दम बढ़ा चुके थे। कुछ बैण्ड तो अपने-अपने शहरों तक ही सीमित थे, मगर बहुत-से बैण्ड या फिर उनके गायक और वादक दूर-नज़दीक का दौरा भी किया करते थे। ऐसे दौरों में स्थानीय बैण्डों के मुकाबले और ‘दंगल’ हो जाना आम बात थी। फिर चूँकि उन दिनों अमरीकी नीग्रो संगीत की कोई सुनिश्चित परम्परा नहीं बनी थी -- जैसा कि बाद में हुआ -- इसलिए बहुत-से बैण्ड किसिम-किसिम के करतबों का भी सहारा लेते थे। एक बैण्ड में ट्रम्पेट बजाने वाला एक साथ दो ट्रम्पेटों पर रैगटाइम की मशहूर धुन ‘टाइगर रैग’ बजा सकता था तो दूसरे में कुछ ऐसे वादक थे, जो बीच-बीच में कलाबाज़ियाँ लगाते थे। ज़्यादातर बैण्डों में इस तरह की निराली अनोखी चीज़ें हुआ करती थीं, ताकि लोगों को आकर्षित किया जा सके। यह बात अलग है कि जिन बैण्डों में अच्छे संगीतकार होते, उन्हें इस तरह की हिकमतों का आसरा लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। 

लेकिन ब्लूज़ हो या रैगटाइम या फिर नीग्रो भजनीकों के बिलकुल अलग किस्म के गीत, जिन्हें ‘स्पिरिचुअल्स’ कहा जाने लगा -- जैज़ संगीत और जैज़ से पहले के इस तमाम नीग्रो संगीत के बीच एक काफ़ी चौड़ी खाई थी। इस खाई को लाँघने वालों में शायद सबसे महत्वपूर्ण नाम न्यू ऑर्लीन्स के नीग्रो संगीतकार और पियानोवादक जेली रोल मॉर्टन (1885-1941) का है।
जैली रोल मॉर्टन का एक किस्सा प्रसिद्ध ब्लूज़ गायक जिमी रशिंग अक्सर सुनाया करते थे। उन दिनों जिमी रशिंग जेली रोल के साथ कैलिफ़ोर्निया का दौरा कर रहे थे। जेली रोल का नाम वहाँ बहुत जाना-माना नहीं था, लेकिन इससे उनके नाज़-नख़रों पर कोई असर नहीं पड़ा था और वे इस बात पर ज़ोर देते थे कि जब वे आयें तो सबको उठ कर उनके सम्मान में खड़े हो जाना चाहिए। चूँकि जेली रोल केवल बात के धनी नहीं थे, बल्कि जो कहते थे, वह अपने संगीत में कर दिखाने की कूवत भी रखते थे, इसलिए लोग उनकी अदाएँ चुपचाप सह जाते।
एक बार उनका बैण्ड इतालवी आप्रवासियों की किसी शादी में बुलाया गया। जेली रोल उस दिन ड्रम्स पर थे और जिमी रशिंग ने पियानो सँभाल रखा था। बैण्ड में जो गायिका थी, उसे लगा कि साज़िन्दे उसके गीत के साथ ठीक सुर में संगत नहीं कर रहे हैं और जब उसे पता चला कि गड़बड़ जिमी रशिंग के साथ है तो उसने पहले तो जिमी रशिंग की ख़बर ली फिर जा कर बैण्ड के मैनेजर से कहा कि इन साज़िन्दों को चलता करके दूसरे साज़िन्दे बुलाये जायें। तब जेली रोल ने सँभाला, ड्रम जिमी रशिंग के हवाले किये और संगत शुरू की। इसके बाद सारी रात जेली रोल पियानो बजाते रहे, भीड़ उन्हीं के इर्द-गिर्द जुटी रही और जिमी रशिंग को पियानो के पास फटकने तक का मौका नहीं मिला।
जेली रोल मॉर्टन बड़े ही रंगीन-मिज़ाज, छैल-छबीले किस्म के आदमी थे। शुरू की ज़िन्दगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन्होंने न्यू ऑर्लीन्स के वेश्यालयों में पियानो-वादक की हैसियत से गुज़ारा था। स्वभाव से बड़बोले और डींग हाँकने वाले शख़्स थे। शायद इसीलिए जब सन तीस के दशक में उन्होंने बड़े तमतराक से यह दावा किया कि उन्हीं ने जैज़-संगीत ईजाद किया था तो बहुत-से लोग नाख़ुश और नाराज़ हो गये थे। ज़ाहिर है जैज़-संगीत की ईजाद के पीछे किसी एक व्यक्ति का हाथ नहीं है, लेकिन आज जब लोग पीछे झाँक कर जैज़-संगीत पर नज़र डालते हैं तो जेली रोल मॉर्टन के दावे में काफ़ी-कुछ सच्चाई जान पड़ती है। कम-से-कम इतना तो तय है कि वे रैगटाइम और जैज़ के बीच की शायद सबसे महत्वपूर्ण कड़ी थे और शुरू उन्होंने भले ही रैगटाइम से किया हो, लेकिन उसकी लय-ताल को एक अलग अन्दाज़ से पेश करके उन्होंने उसे काफ़ी हद तक जैज़ के निकट पहुँचा दिया था।
इसकी सबसे उम्दा मिसाल है जैली रोल मॉर्टन द्वारा अपने पूर्ववर्ती स्कॉट जॉपलिन के ‘मेपल लीफ़ रैग’ की प्रस्तुति। वैसे तो जेली रोल मॉर्टन ने इस धुन को अपने जीवन में बीसियों बार बजाया होगा, मगर मृत्यु से तीन वर्ष पहले की गयी उनकी रिकॉर्डिंग को जब हम सुनते हैं और स्कॉट जॉपलिन की मूल धुन से मिलान करते हैं, तब हमें पता चलता है कि स्वरलिपि में परिवर्तन न करने के उन तमाम विधि-निषेधों के बावजूद (जो स्कॉट जॉपलिन ने निर्धारित किये थे) जेली रोल मॉर्टन ने धुन की अदाकारी में कितनी छूट से काम लिया था। 

http://youtu.be/OqFL9t9og_I जेली रोल मौर्टन -- मेपल लीफ़ रैग

जहाँ तक छूट का सवाल है, वह तो जेली रोल मॉर्टन ने केवल रैगटाइम के साथ ही नहीं ली, बल्कि ब्लूज़ के साथ भी ली। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है स्वयं उनके अपने नाम से मशहूर ‘जेली रोल ब्लूज़’ जिसे उन्होंने ‘रेड हाट पेपर्स’ नामक अपने बैण्ड के साथ पेश किया।

http://youtu.be/Zt203us6TME (जेली रोल मौर्टन -- जेली रोल ब्लूज़)

http://youtu.be/m0JBNj2urb8 (dead man blues)


जेली रोल मॉर्टन ने रैगटाइम और जैज़ के बीच की खाई को पाटने की महत्वपूर्ण भूमिका तो अदा की ही, साथ ही उन्होंने लूज़ियाना राज्य के बिखरे नीग्रो संगीत को, जो रैगटाइम और ब्लूज़ से होते हुए जैज़ तक पहुँचने की अलग-अलग मंज़िलों को तय कर रहा था, उसका पहला महत्वपूर्ण केन्द्र मुहैया कराया -- न्यू ऑर्लीन्स।

(जारी : अगली बार न्यू और्लीन्स)

Tuesday, February 10, 2015


चट्टानी जीवन का संगीत 

जैज़ संगीत पर एक लम्बे आलेख की सातवीं कड़ी

7.

नीग्रो मज़दूरों के गीतों और खेतिहर मजूरों के टिटकारीदार टप्पों से हो कर ब्लूज़ तक का सफ़र जैज़-संगीत के उन रेशों को खोलता है, जो मूल रूप से अफ्रीकी हैं, जिन्हें अपनी दुनिया से उखाड़ कर एक दूसरे मुल्क में ग़ुलाम बना कर ले जाये जाने वाले लोगों ने अपनी जातीय स्मृति में सँजोये रखा और अपने ख़ून और पसीने से, अपनी पीड़ा और श्रम से सींच कर मज़बूत किया। दूसरी ओर जैज़-संगीत के बहुत-से रेशे यूरोपीय संगीत के हैं। ईसाई भजनों और नाच-गाने की महफ़िलों तथा फ़ौजी धुनों से मिल कर बने हैं। जैज़ की ऐसी ही एक प्रारम्भिक मंज़िल है -- रैगटाइम।

http://youtu.be/A44QDL-K-bY?list=PL8DF504CDE7860A2C  ( रैगटाइम)

ब्लूज़ की तरह रैगटाइम के स्रोत भी 19वीं सदी के अमरीकी गृह-युद्ध के बाद की उथल-पुथल में खोये हुए हैं, लेकिन इतना तय है कि जैज़ में पियानों तथा बैंजो और गिटार जैसे तार वाले वाद्यों का समावेश रैगटाइम के ही माध्यम से हुआ। रैगटाइम उन्नीसवीं सदी की आख़िरी चौथाई में उभर कर सामने आया था और उसके पहले-पहले नमूने १८९० के आस-पास मिलने लगे थे और उसकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा दौर १८९५ से ले कर १९१५-१६ तक रहा जब धीरे-धीरे जैज़ ने ब्लूज़ के साथ रैगटाइम को भी अपने अन्दर समा लिया. बाक़ायदा प्रकाशित संगीत के रूप में सामने आने से पहले रैगटाइम की शुरुआत सेंट लूइज़ और न्यू और्लीन्ज़ जैसे शहरों के अफ़्रीकी-अमरीकी वेश्यालयों और रूप के बाज़ारों में हुई थी जहां न केवल ग्राहकों का मनोरंजन दरकार था, बल्कि नाचने-गाने के लिए संगीत की संगत भी. 
रैगटाइम के विकास में उन संगीत-सभाओं का बड़ा योगदान रहा, जो 19वीं सदी में अमरीका के गाँव-देहात और कस्बों में हुआ करती थीं। ये संगीत-सभाएँ, जिन्हें ‘मिंस्ट्रेल शो’ कहा जाता था, ऐसे अजीबो-ग़रीब सांस्कृतिक उत्सव थे, जिनमें गोरे संगीतकार अपने चेहरों पर काला रंग मल कर नीग्रो संगीतकारों की नकल करने की कोशिश किया करते। बाद में नीग्रो संगीतकारों ने इस तरह की अपनी मण्डलियाँ भी बना ली थीं। ब्लूज़ और रैगटाइम के बीच का फ़ासला सिर्फ़ अफ्रीकी अथवा यूरोपीय संगीत-शैलियों की वजह से नहीं था, बल्कि दोनों शैलियों के उद्देश्यों में भी अन्तर था। ब्लूज़ अगर अभिव्यक्ति-प्रधान थे, तो रैगटाइम का सारा उद्देश्य था -- मनोरंजन। ब्लूज़ की प्रेरणा और उत्स किसी हद तक अन्तर्मुखी था तो रैगटाइम बहिर्मुखी संगीत था। एक मानवीय पीड़ा की सहज अभिव्यक्ति था तो दूसरा स्वाँग और नकलचियों की जटिलता से युक्त। ब्लूज़ में शब्दों का महत्व था तो रैगटाइम में धुनों का।
‘मिन्स्ट्रेल शो’ में पेश की जाने वाली धुनों को परखने पर उनमें और रैगटाइम में काफ़ी साम्य दिखायी देता है। इसके अलावा रैगटाइम के विकास में उन फ़ौजी बैण्डों का भी एक अपना ही योगदान रहा, जो अमरीका के जर्मन, इतालवी और फ्रांसीसी आप्रवासियों ने बनाये थे। इस तरह जो संगीत गाँव-देहात की नाच-गानों की महफ़िलों में पैदा हुआ था और बैंजो तथा गिटार पर बजाया जाता था, उसमें इन फ़ौजी बैण्डों तक आते-आते पियानो और ट्रम्पेट -- दो और वाद्य जुड़ गये। रैगटाइम की कुछ धुनों के सिलसिले में तो पियानो वादक को साफ़ हिदायत दी गयी रहती थी कि धुन को फ़ौजी कवायद की लय पर बजाया जाय।
कुछ जानकारों ने रैगटाइम की धुनों में भी अफ्रीकी प्रभाव खोजने की कोशिश की है, लेकिन ऐसा शायद तभी हुआ होगा, जब ब्लूज़ की परम्परा से पुष्ट नीग्रो संगीतकारों ने रैगटाइम बजाना शुरू किया होगा। लेकिन बुनियादी तौर पर संरचना और स्वर-दोनों ही पहलुओं से रैगटाइम पर यूरोपीय प्रभाव ज़्यादा गहरे थे।
रैगटाइम उस तरह तालबद्ध नहीं है जैसे फ़ौजी क़वायद और नाच की धुनें तालबद्ध होती हैं -- २/४ या ३/४ की ताल पर, नल्कि रैगटाइम में धुन कुछ इस तरह बजायी जाती है कि वह किसी भी ताल पर सही बैठ जाये. उसकी सबसे बड़ी निशानी होती है एक  ख़ास क़िस्म का स्वर-लोप जिसमें लय का चढ़ाव-उतार ताल के बीच-बीच में होता है. नतीजा यह होता है कि कुछ सुर प्रमुख हो कर उभरते हैं जो लगता है कि ताल की अगवानी कर रहे हैं या उसके पीछे-पीछे चल रहे हैं. लय और ताल का यह अनोखा मेल ताल को कुछ इस तरह तेज़ कर देता है कि सुनने वाले धुन के साथ-साथ अनायास हरकत करने लगते हैं और इसी ख़ूबी ने रैगटाइम को नाच के लिए इतना मुफ़ीद बना दिया था.
ब्लूज़ की सबसे बढि़या मिसाल अगर ‘सेंट लूइज़ ब्लूज़’ है तो रैगटाइम का सबसे उम्दा नमूना है ‘मेपल लीफ़ रैग।’ ‘मेपल लीफ़ रैग’ रैगटाइम की उन मशहूर धुनों में से एक है, जो पिछली सदी के आख़िरी दशक में, रैगटाइम के उत्कर्ष काल में उभर कर सामने आयीं। इसके रचयिता थे रैगटाइम के सबसे मशहूर संगीतकार और पियानोवादक -- स्कॉट जॉपलिन।

http://youtu.be/reI43yUCaUI  (मेपल लीफ़ रैग)

अमरीका के मिसूरी राज्य में सेंट लूइज़ नगर के पास सिडेलिया नामक स्थान में जा बसने से पहले स्कॉट जॉपलिन (1868-1917) बरसों तक पियानोवादक के रूप में अमरीका के दक्षिणी प्रान्तों के छोटे-छोटे घटिया किस्म के कस्बों का दौरा करते रहे थे। लेकिन स्कॉट जॉपलिन के सिडेलिया पहुँचने के बाद जल्द ही यह कस्बा रैगटाइम का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया।
स्कॉट जॉपलिन ने अनेक धुनें बनायीं, जिनमें रैगटाइम की एक शुद्ध-सी शैली अपनायी गयी है, जहाँ चार अलग-अलग थीमों को उठा कर उन्हें दोहराया जाता है। यही नहीं, बल्कि पश्चिमी परम्परा के आधार पर स्वर-लिपि को भी इस प्रकार तैयार किया जाता है कि धुन ठीक वैसे ही पेश की जाय, जैसे कि वह ‘लिखी’ गयी है; उसमें हेर-फेर की या अपनी तरफ़ से जोड़ने-घटाने की कोई गुंजाइश नहीं रहती थी। जौपलिन ने, जिन्हें लोग "रैगटाइम का सम्राट" कहने लगे थे, रैगटाइम के प्रभाव को "अजीब और नशीला" कहा था. उन्हीं ने संगीत के सिलसिले में "स्विंग" शब्द का प्रयोग भी किया था कि रैगटाइम को कैसे बजाया जाये. "धीरे-धीरे बजाओ जब तक कि तुम पेंग न पकड़ लो" यानी झूमने न लगो. यही वजह है कि यह शब्द "स्विंग" आगे चल कर जैज़ के एक आरम्भिक रूप पर लागू भी किया गया जो रैगटाइम से विकसित हुआ था. बहुत बारीक़ी में न भी जायें तो भी इतना कहा जा सकता है कि किसी ग़ैर-रैगटाइम संगीत को रैगटाइम में बदलने के लिए उसके सुरों की लय को बदल दिया जाता है जिस से मूल धुन की ताल में भी फ़र्क़ आ जाता है. सबसे लोकप्रिय बिनावट थी चार-चार मात्राओं के टुकड़ों की जिन्हें दोहराया जाता या हल्का-सा व्यवधान दे कर फिर से शुरू किया जाता. ख़ास-ख़ास बिनावटें थीं -- अअबबअससस, अअबबअससदद और अबबससअ. लेकिन चार-चार मात्राओं की ये बिनावटें चार से ले कर चौबीस मात्राओं के बीच किसी भी लम्बाई की हो सकती थीं. रैगटाइम का ज़माना साउण्ड-रिकौर्डिंग से पहले के युग में आ चुका था, मगर उसकी आरम्भिक धुनें बची रह गयी हैं तो इसलिए कि ब्लूज़ और दूसरे अफ़्रीकी-अमरीकी संगीत के विपरीत, जिसमें सुन कर नक़ल करने या सीधे-सीधे आशु-रचना करने का चलन था, रैगटाइम पूरी तरह पियानो-आधारित था और उसकी स्वर-लिपि "लिख" कर तैयार की जाती थी. इसी ने रैगटाइम को उसकी शास्त्रीय संगीत जैसी ख़ासियत दी थी.
रैगटाइम के विकास में उसके नज़दीकी रिश्तेदार "केकवौक डान्स" का बड़ा हाथ था. यह नाच, जो अमरीका के दक्षिणी राज्यों में बगानों पर काम करने वाले दासों के बीच उपजा था, "केकवौक डान्स" दरअसल गोरों के नाचने के तरीकों की नकल था और दास-प्रथा के उन्मूलन के बाद सामने आया. इसमें काले ग़ुलाम भाग लेते थे और अक्सर बगान के मालिक दर्शकों के तौर पर मौजूद रहते. चूंकि यह यूरोपीय नाचों की नक़ल में उभरा था इसलिए हरकतों में लयात्मकता होते हुए भी कुछ अजीब-सा मखौलियापन घुला-मिला रहता. इसका मूल नाम तो "चौकलाइन वौक" था, मगर चूंकि इस नाच के अन्त में भाग लेने वाले ग़ुलाम जोड़े बना कर अदा और अन्दाज़ के साथ लय-ताल पर तीन बार नाच के पूरे दायरे में "चलते" हुए उसका चक्कर लगाते और सबसे अच्छे जोड़े को बतौर इनाम केक दिया जाता, इसलिए इसे "केक वौक" कहा जाने लगा. ज़ाहिर है, इस नाच की अपनी धुनें भी बनने लगीं और रैगटाइम में इन धुनों की ख़ास भूमिका रही. ग़ुलामी के दिनों को याद करते हुए बहुत-से लोगों ने अपने संस्मरणों में "केकवौक नाच" के दिलचस्प ब्योरे दिये हैं.
एक ज़माने में रैगटाइम बजाने वाले शेपर्ड एड्मण्ड्स ने 1950 में कुछ यादें दर्ज करायी थीं जो उन्होंने टेनेसी में रहने वाले अपने माता-पिता से सुनी थीं. शेपर्ड ने बताया था कि "केकवौक मूल रूप से बगानों का नाच था, महज़ एक हरकत जो लोग खुशी-खुशी बैन्जो के संगीत के साथ किया करते थे क्योंकि उनके लिए बिना हिले, थिर खड़े रहना मुश्किल था. यह इतवार को हुआ करता जब ज़्यादा काम न होता और ग़ुलाम -- जवान और बूढ़े, दोनों -- मालिकों की अच्छी उतरनें पहन कर बैन्जो की धुनों पर टांगें ऊंची-ऊंची उछालते और इठलाते हुए एक घेरे में चला करते. दरअसल वे यह सारी कूद-फांद "बड़े घर" में रहने वाले गोरे मालिकों की नकल में किया करते थे, लेकिन मालिक लोग जो इन सारे करतबों को देखने के लिए इकट्ठा होते, इन लोगों का असली मकसद पकडअ न पाते और उलटे उस जोड़ी को इनाम में एक केक देते जो सबसे अच्छी नकल करती." इस तरह हालांकि यह सारा नाच-गाना गोरों पर व्यंग्य करने के लिए होता, गोरे मालिक इसे एक सीधा-सादा शगल मान कर खारिज कर देते जो ग़ुलामों ने उनकी दिलजोई के लिए पेश किया होता. लेकिन यह भी सही है कि गोरों के खिल्ली उड़ाने के लिए किये जाने वाले इस नाच को वक्त के साथ ग़ुलामों ने अपना लिया और इसकी धुनें अफ़्रीकी धुनों के साथ घुल-मिल कर रैगटाइम के लिए खाद बन गयीं.


http://youtu.be/s8qpMcrEtTg (Judy Garland performs a cakewalk in the 1944 MGM musical, Meet Me In St. Louis.)



बहरहाल. १८९९ में "मेपल लीफ़ रैग" और उसके बाद "द एण्टरटेनर" जैसे लोकप्रिय नमूनों के प्रकाशन के साथ ही स्कौट जौपलिन मशहूर हो गये और बरसों तक संगीतकारों के लिए लय, ताल और मात्राओं की बिनावट और उनके आरोह-अवरोह के लिहाज़ से प्रेरणा-स्रोत बने रहे. हालांकि जैज़ के उभरने के साथ ही उन्हें और सच पूछिये तो रैगटाइम संगीत शैली को भुला दिया गया, लेकिन बीच-बीच में रैगटाइम को नयी ज़िन्दगी भी मिलती रही मिसाल के लिए १९४० के दशक में जब बहुत-से बैण्डों ने रैगटाइम की रिकौर्डिंग 78 आर.पी.एम. के पुराने तवों पर करके उन्हें बाज़ार में जारी किया. मगर सब से महत्वपूर्ण पुनुरुद्धार 1950 के बाद हुआ जब रैगटाइम के विविध नमूनों के रिकौर्ड सामने आये. और 1971 में जोशुआ रिफ़्किन ने स्कौट जौपलिन की धुनों का एक संकलन तैयार किया जिसे ग्रमी पुरस्कारों के लिए नामांकित भी किया गया.  1973 में अमरीका की न्यू इंग्लैण्ड रैगटाइम संरक्षण मण्डली ने "द रेड बैक बुक" के नाम से स्कौट जौपलिन की धुनों को उन्हीं के समय के संगीत-संयोजन के साथ प्रस्तुत किया. इस ऐल्बम ने "चेम्बर संगीत" की श्रेणी में उसी वर्ष का ग्रैमी पुरस्कार जीता. 
रैगटाइम को (स्कौट जौपलिन के काम को सामने रखते हुए) मोत्सार्त, शोपां और ब्राह्म्स जैसे पश्चिमी शास्त्रीय संगीतकारों द्वारा मिनुएट, माज़ुर्का और वौल्ट्ज़ जैसे नृत्यों के लिए रचे गये संगीत का अमरीकी प्रारूप कहा गया है और उसने क्लौद देबुसी और इगोर स्त्राविंस्की जैसे बहुत-से शास्त्रीय संगीतकारों पर अपना असर भी छोड़ा.
रैगटाइम के पीछे जो असर थे, उनमें एक दिलचस्प असर उन धारणाओं का भी था जो गोरों ने काले ग़ुलामों के बारे में बना रखी थीं और जिन्हें कुछ काले लोगों ने भी अपना लिया था. मसलन १८९५ में मनोरंजन के क्षेत्र में एक जाने-माने काले संगीतकार अर्नेस्ट होगन ने एकदम शुरुआती रैगटाइम धुनों में से दो प्रकाशित कीं, जिनमें से एक का शीर्षक था "औल कून्ज़ लूक अलाइक टू मी" याने "सारे कल्लू मुझे एक-से लगते हैं." 

कल्लू की मुश्किलों की बात कर रहे हो
मुझसे पूछो क्या गुज़री है मेरे साथ

मेरी जानू है लूसी जेनी स्टबल्स
जिसने छोड़ दिया है आखिर मेरा हाथ
वर्जिनिया से आया एक और कल्लू नाई
तबियत उसी पे मेरी लूसी की आयी
कहती है  कल्लू दिखें  एक जैसे
ज़रूरत मुझे अब रहे तेरी कैसे

मिला है मुझे अब इक और दिलबर जानी
तू छोड़ मेरा पीछा ये दुनिया है फ़ानी
ज़रूरत मुझे अब रहे तेरी कैसे
 कल्लू मुझे सब दिखें  एक जैसे 


http://youtu.be/AvfaNKBpIgk (औल कून्ज़ लूक अलाइक टू मी)

(Talk about a coon a having trouble, I think I have enough of ma own. Its all about ma Lucy Janey Stubbles, and she has caused my heart to mourn. Thar s another coon barber from Virginia. In society he is the leader of the day. And now ma honey gal is gwine to quit me, yes she s gone and drove this coon away. She had no excuse, to turn me loose. I have been abused, I am all confused. Cause these words she did say....CHORUS - All coons look alike to me, I have got another beau you see. And he is just as good to me as you ever tried to be. He spends his money free, I know we cant agree. SO, I DONT LIKE YOU NO HOW, ALL COONS LOOK ALIKE TO ME.)

कून बिज्जू को कहते हैं और यह शब्द काले ग़ुलामों के लिए हिकारत और व्यंग से इस्तेमाल होता था. जहां इस गीत और उसकी धुन ने रैगटाइम को पूरे अमरीका भर में लोकप्रिय बनाने में मदद दी, वहीं इसमें जो नस्लवादी छींटाकशी का इस्तेमाल था, भले ही व्यंग के तौर पर, उसकी वजह से बहुत-से लोगों ने इसकी नक़ल में इसी क़िस्म के और भी कई गीत और धुनें बनायीं जिनमें न सिर्फ़ बेहद नस्लवादी भावनाएं व्यक्त की गयी थीं, बल्कि काले लोगों की पिटी-पिटाई हिकारत-भरी छवियां अंकित की गयी थीं. आगे चल कर होगन ने रैगटाइम को बड़े पैमाने पर लोकप्रिय बनाने और एक विशाल श्रोता समुदाय के सामने लाने के लिए गर्व प्रकट किया तो साथ ही बड़े अफ़सोस के साथ अपने पहले गीत पर शर्म का इज़हार भी किया और कहा कि समझ के विकसित होने के साथ उन्हें शिद्दत से यह एहसास हुआ था कि उन्होंने वह गीत लिख कर जैसे अपनी नस्ल और जाति के साथ ग़द्दारी की थी. 
समय के साथ रैगटाइम की अनेक शाखाएं-प्रशाखाएं फैलती चली गयीं और १९१५ के बाद हालांकि जैज़ ने अफ़्रीकी अमरीकी संगीत के अखाड़े में अपनी ज़ोरदार हाज़िरी दर्ज करा दी थी, रैगटाइम के कलाकार नयी-नयी दिशाओं में प्रयोग करते रहे. केकवौक का ज़िक्र किया ही गया है, उसके साथ-साथ फ़ोक रैगटाइम, स्लो ड्रैग, टू स्टेप, क्लासिक रैग, नौवल्टी पियानो और स्ट्राइड पियानो जैसे अनेक रूप विकसित होते चले गये.
जैसा कि मैंने कहा, परिपक्व रैगटाइम 1897 में उभर कर सामने आया जब कई जाने-माने गीत और धुनें प्रकाशित हुईं. उस समय जहां कुछ संगीतकार पूरी तरह रैगटाइम को समर्पित थे, वहीं जेली रोल मौर्टन जैसे वादक भी मौजूद थे जो रैगटाइम के साथ-साथ जैज़ संगीत की शुरुआती रचनाएं भी पेश कर रहे थे. जेली रोल मौर्टन ने, जिनका ज़िक्र आगे किया जायेगा, इस दौर में बहुत-से प्रयोग किये और अपनी प्रस्तुतियों में स्पेनी असर भी समोया, जिससे उनके संगीत में हाबानेरा या कहा जाये कि ख़ास टैंगो लय भी सुनायी देने लगी. हुआ यह कि कैरिब्बियाई क्षेत्र के समुद्र-तट के शहरों जैसे हवाना  और न्यू और्लीन्ज़ और अमरीका की दक्षिणी बन्दरगाहों के बीच नियमित आवा-जाही थी और संगीत और संगीतकार इस आवा-जाही में शामिल थे. नतीजे के तौर पर अफ़्रीकी-अमरीकी संगीत में अफ़्रीकी-क्यूबाई प्रभावों का समावेश उन्नीसवीं सदी से ही होने लगा था जब हाबानेरा की लय-ताल लोकप्रिय होने लगी. हाबानेरा अफ़्रीकी आधार पर "लिखी" जाने वाली पहली लय थी. इसमें ऊंचे सुरों और निचले सुरों का इस्तेमाल एक साथ होता था जिन्हें त्रेसियो और बैकबीट कहते थे. त्रेसियो के साथ-साथ उसके एक और रूप सिन्क्वियो का समावेश भी हुआ. लय-ताल की इन सारी बिनावटों की जड़ें अफ़्रीकी थीं, जिन्हें अमरीकी, स्पेनी और फ़्रान्सीसी मूल की अलग-अलग शैलियों ने अपना लिया था.

http://youtu.be/Lw033a5Nozw?list=PLgM3h2uWLn7LMfdDltkL1jPPrFyw9hDEh (हाबानेरा)

(जारी)

Monday, February 9, 2015

चट्टानी जीवन का संगीत

जैज़ पर एक लम्बे आलेख की छठी कड़ी


6.

अमरीकी विस्थापितों की स्थिति में जो सबसे बड़ा परिवर्तन घटित हुआ वह था 1864 में दास प्रथा का उन्मूलन. वैसे तो अमरीकी गोरों में बहुत-से लोग दास-प्रथा और मनुष्य को मनुष्य से एक दर्जा नीचे रखने के विरोधी थे, लेकिन एक बहुत बड़ा समुदाय कई कारणों से दास-प्रथा के पक्ष में था. एक कारण तो था नस्लवादी सोच. सदियों से यूरोपीय और अमरीकी गोरे यह मानते आये थे कि अफ़्रीकी लोग गोरी जातियों से हीनतर हैं. दूसरा कारण आर्थिक था. अमरीका के दक्षिणी हिस्से की अर्थ-व्यवस्था काले ग़ुलामों पर टिकी हुई थी जो तम्बाकू, कपास, मक्का, केला और दूसरी फ़सलों की खेती के काम में सबसे अनिवार्य तत्व --  श्रम -- उपलब्ध कराते थे और साथ ही घरेलू कामगरों की एक फ़ौज भी. यह सस्ता श्रम अमरीका के दक्षिणी क्षेत्र की अर्थ-व्यवस्था का आधार था. लेकिन इस बीच अमरीका के उत्तरी क्षेत्र में कल-कारख़ानों और उद्योग-धन्धों के विकास ने औद्योगिक मज़दूरों की एक अच्छी-ख़ासी मांग पैदा कर दी थी. इसी का नतीजा था 1862-63 का अमरीकी गृह-युद्ध, जिसने पूरे देश को दो विरोधी ख़ेमों में बांट कर रख दिया था. हालांकि गृह-युद्ध में जीत का सेहरा अमरीका के उत्तरी हिस्से के सिर बंधा और क़ानूनी तौर पर दास-प्रथा रद्द कर दी गयी, मगर नीग्रो समुदाय की स्थिति बहुत करके पहले जैसे ही रही. जो उत्पीड़न खुल्लम-खुल्ला होता था, वह अब छिपे तौर पर होने लगा.

आम तौर पर अनुमान है कि अमरीकी नीग्रो संगीत अमरीकी गृहयुद्ध (1861-64) के बाद के अर्से में अमरीका के दक्षिणी हिस्से के अन्दरूनी इलाक़े में, उसके मुफ़स्सिल में ब्लूज़ के रूप में उभर कर सामने आया और इसकी जड़ें खेत-मजूरों की टिटकारियों, गुहार और जवाब, काम के समय गाये जाने वाले गीतों, तुकबन्दियों और सरल आख्यानपरक छन्दों में खोजी जा सकती हैं। ये गीत अक्सर जीवन की कठोरता अथवा विरह-विछोह और खोये हुए प्यार के इर्द-गिर्द बुने जाते थे। थे गायक-गायिकाएं अक्सर कड़वी हक़ीक़तों वाली दुनिया में अपने निजी दुखों को  व्यक्त करते थे -- प्रेम में निराशा, ज़िन्दगी की मुसीबतें और उसकी कठोरता, पुलिस के सिपाहियों की क्रूरता, गोरों का बेरहम सुलूक़ और बदक़िस्मती के थपेड़े . लेकिन ऐसा नहीं है कि उनमें हमेशा उदासी और विषाद ही व्यक्त होता था। सीधी, सरल और अकृत्रिम -- यहाँ तक कि भोलेपन को छूती हुई -- अभिव्यक्तियों से ले कर जटिल और संश्लिष्ट भावनाओं तक -- ब्लूज़ के गीत एक व्यापक दायरे में फैले हुए हैं। लोक-गायकों की प्रस्तुतियों में उनकी लम्बाई भी छोटी-बड़ी हो सकती थी, मगर विशुद्ध ब्लूज़ की एक अपनी ख़ास बिनावट है और इसी के आधार पर आज ब्लूज़ को पहचाना जाता है।

जैज़ की बुनियादी विशेषता -- गुहार और जवाब -- ब्लूज़ में भी अनिवार्य रूप से मौजूद थी और इसमें मात्राएं ख़ास तरह से आगे को बढ़ती थीं. साथ ही एक अजीब-सी समाधि वाला असर भी मौजूद रहता था जो अक्सर पैरों की हरकत में भी नज़र आता था, जहां शरीर बड़े धीमे-धीमे, लय-भरे अन्दाज़ में लहराते हुए आगे-पीछे सरकता रहता था. विशुद्ध ब्लूज़ में बारह मात्राओं की बिनावट होती है और उसके गीतों में तीन-तीन पंक्तियों के टुकड़े होते हैं। पहली पंक्ति गाने के बाद उसी पंक्ति को दोहराया जाता है और फिर तीसरी पंक्ति गायी जाती है। मिसाल के तौर पर प्रसिद्ध ‘सेंट लूइज़ ब्लूज़’ जिसे वैसे तो शायद हर बड़े जैज़-फ़नकार ने गाया और बजाया, मगर जिसकी सर्वोत्तम प्रस्तुतियों में से एक बेसी स्मिथ (1894-1937) ने पेश की। ब्लूज़ की गायिकाओं में बेसी स्मिथ की एक अपनी ही जगह थी, जिसे उन्होंने अपनी शानदार आवाज़ और तपी हुई अदाकारी के बल पर हासिल किया था। बोल थे -- ‘आई हेट यू सी द ईवनिंग सन गो डाउन।’ इस पंक्ति को दोहराया जाता था और फिर अगली पंक्ति -- ‘इट मेक्स मी थिंक ऑफ़ लास्ट गो राउण्ड’ -- गायी जाती थी।

http://youtu.be/jNWs0LsimFs?list=PL28D01AC6950859CA (बेसी स्मिथ)

जैसा कि हमने कहा है, जैज़ की ऐसी बहुत-सी धुनें और गीत हैं जिन्हें उनके रचने वालों के अलावा भी बहुत-से गयकों और वादकों ने पेश किया है. ’सेंट लूइज़ ब्लूज़’ ऐसी ही रचनाओं में शुमार किया जा सकता है. बेसी स्मिथ के बहुत बाद सुप्रसिद्ध अभिनेत्री और गयिका अर्था किट ने भी इसकी एक अदायगी अपने ख़ास अन्दाज़ में पेश की :

http://youtu.be/GPYVlUV_xk4 (अर्था किट-- आई हेट यू सी द ईवनिंग सन गो डाउन)

ब्लूज़ में बारह मात्राओं की यह बिनावट कैसे विकसित हुई, यह तो बताना मुश्किल है, लेकिन इसमें निश्चय ही नीग्रो संगीत-विशेषज्ञ डब्ल्यू. सी. हैंडी की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी, जिन्होंने बड़ी संख्या में ब्लूज़ इकट्ठे करके उन्हें प्रकाशित कराया था। यह बात पहले महायुद्ध से कुछ पहले की है. 
विलियम क्रिस्टोफ़र हैंडी (1873-1958) अमरीका के ठेठ दक्षिणी इलाक़े में फ़्लोरेन्स (ऐलाबामा) के रहने वाले थे. रोज़ी-रोटी कमाने के लिए उन्होंने बढ़ई, मोची और राज-मिस्त्री का काम सीख रखा था ताकि जब वे संगीत से अपना ख़र्च न चला पायें तो इन पेशों में से किसी को अपना सकें. संगीत का शौक़ हैंडी को लड़कपन ही से था जब वे गिरजे में जा कर भजन गाया करते या और्गन बजाया करते. बाद में उन्होंने बताया था कि उन्हें अपने चारों तरफ़ फैली प्रकृति से भी संगीत की बहुत-सी प्रेरणा मिली थी,"पक्षियों, चमगादड़ों और उल्लुओं की पुकारों और उनकी अजीबो-ग़रीब आवाज़ों से."

हैंडी की पहली नौकरी इस्पात के कारख़ाने में भट्ठी में कोयला झोंकने वाले मज़दूर की थी. यहां उन्होंने पाया कि भट्ठी में कोयला या कच्चा लोहा झोंकने वाले मज़दूर अपने बेलचों से तरह-तरह की आवाज़ें निकालते और "जब दस-बारह लोग ऐसा कर रहे होते तो असर अद्भुत होता. किसी फ़ौजी बैण्ड में बजाये जा रहे ढोल-नगाड़ों से बेहतर." उन्होंने यह भी देखा कि दक्षिणी अमरीका के नीग्रो मज़दूरों में किसी भी चीज़ से लय-ताल पैदा करने की कुदरती कूवत थी.

1900 के आस-पास जब हैंडी सत्ताईस साल के थे, तब नीग्रो लोगों के लिए बने ऐलाबामा के कृषि विश्वविद्यालय ने उन्हें संगीत शिक्षक नियुक्त कर दिया., लेकिन हैंडी की दिलचस्पी पश्चिमी शास्त्रीय संगीत से ज़्यादा अपने अनोखे अफ़्रीकी अमरीकी संगीत में थी. लिहाज़ा वेसंगीत शिक्षक की नौकरी छोड़ कर एक घुमन्तू बैण्ड  में शामिल हो गये और जल्दी ही अश्वेत संगीतकारों की एक मण्डली के निर्देशक बन गये. इस बीच अलग-अलग जगहों पर घूमते हुए धीरे-धीरे हैंडी को उस नीग्रो संगीत को सुनने के ढेरों मौके मिले जो अमरीका के दक्षिणी हिस्से के गांव-देहात में और कारख़ानों में गाया-बजाया जाता था. ये सभी लोग गुमनाम संगीतकार थे और अपनी फ़ुर्सत की घड़ियों में दिल बहलाने के लिए गाया-बजाया करते थे. इनमें से बहुत-से लोग ऐसे भी थे जो आम कस्बों और गांवों के चौराहों या नुक्कड़ों पर खड़े हो कर अपने गीत गाते और इसी से खर्चा चलाते. इनमें से बहुत-से लोग घुमन्तू गायक होते जो गांव-गांव, शहर-शहर घूम कर अपनी अपनी फ़नकारी से पैसे कमाते. यह सारा अनुभव विलियम हैंडी के अन्दर दर्ज होता जा रहा था और जब वे 1909 में टेनेसी प्रान्त के मेम्फ़िस शहर आ बसे तो पहली बार उनकी अपनी रचना "मेम्फ़िस ब्लूज़" के रूप में व्यक्त हुआ. नीचे हैंडी वाले प्रारूप के लिंक के साथ साथ दो और लिंक दिये जा रहे हैं :

http://youtu.be/ZGqBmlZR3dc   (मेम्फ़िस ब्लूज़  -- विलियम क्रिस्टोफ़र हैंडी)
http://youtu.be/PEHLK0TKln0     (          "        ड्यूक एलिंग्टन)
http://youtu.be/3ZkdRjAWR6g   ( " जिम हेसियन)

"मेम्फ़िस ब्लूज़" दरअसल मेम्फ़िस के नगर प्रमुख पद के लिए खड़े होने वाले उम्मीदवार एड्वर्ड क्रम्प के चुनाव अभियान के लिए लिखा गया था. बाद में हैंडी ने इस धुन को संवार-सुधार कर इसका नाम "मिस्टर क्रम्प" की बजाय "मेम्फ़िस ब्लूज़" रख दिया. 1912 में इस धुन के प्रकाशित होते ही ब्लूज़ की 12 मात्राओं वाली शैली मानो तय हो गयी और उनकी इस पहली कामयाबी ने आगे के गीतों और धुनों के रास्ते खोल दिये. हैंडी ने "मेम्फ़िस ब्लूज़" के दो साल बाद "सेंट लुइज़ ब्लूज़" की रचना की और ब्लूज़ की बुनियाद पक्की कर दी. 

http://youtu.be/dmFUXYaZIMk  ( सेंट लुइज़ ब्लूज़  W C Handy)

अब तक वे संगीत को ही रोज़ी-रोटी के साधन के रूप में अपना चुके थे और न सिर्फ़ संगीत रचने तक सीमित थे, बल्कि इस ख़ास क़िस्म के अफ़्रीकी अमरीकी संगीत के नमूने खोजने, उनकी स्वर-लिपि तैयार करने और इन स्वर-लिपियों को बाज़ार में अन्य गायकों वादकों को उपलब्ध कराने में भी जुट गये थे, जो काम कि वे अपने जीवन के अन्त तक करते रहे.

1917 में हैंडी न्यू यौर्क आ गये और वहां सुप्रसिद्ध गेइटी थिएटर में एक दफ़्तर खोल कर अपने रचे संगीत की स्वर-लिपोइयों के प्रकाशन का काम करने लगे. न्यू यौर्क में ज़्यादा गुंजाइशें थीं और यहां हैंडी के जौहर सही तौर पर उजागर हुए. उन्होंने ब्लूज़ की 53 रचनाओं की स्वर-लिपियों के साथ उनके बोल भी एक संकलन की शक्ल में प्रकाशित किये और अफ़्रीकी अमरीकी संगीत को लोगों के बीच फैलाने के लिए एक बेहद ज़रूरी भूमिका अदा की. यह शायद पहली पुस्तक थी जो ब्लूज़ को अमरीका के दक्षिणी इलाक़े की संस्कृति और उसके इतिहास के अखण्ड हिस्से के रूप में स्थापित करती है.  लेकिन यह दिलचस्प है कि उन्होंने पाया कि उस समय के ज़्यादातर नीग्रो बैण्ड और गायक-वादक अपनी जड़ों की तरफ़ जाने की बजाय पश्चिमी शैली के प्रचलित गीतों को ही गाते-बजाते. शायद वे डरते थे कि अगर वे "कालों का संगीत" गायेंगे-बजायेंगे तो आम सुनने वाले उनकी तरफ़ तवज्जो नहीं देंगे. मगर यह भी एक मज़ेदार बात थी कि गोरे लोगों के बैण्ड और उनके फ़नकार नयी-नयी शैलियों की तलाश में रहते थे और वे विलियम हैंडी की रची धुनों और गीतों को पेश करने के लिए हमेशा तैयार रहते. इसके साथ-साथ जो नीग्रो फ़नकार मंचीय कार्यक्रम पेश करते हुए अभिनय के साथ-साथ गाने भी गाते थे उन्होंने भी हैंडी के गीत इस्तेमाल करने शुरू कर दिये थे ताकि गोरे फ़नकारों के प्रदर्शन में कोई अड़ंगा न पैदा हो. फिर जैसे इतना ही काफ़ी न हो, हैंडी ने फ़िल्मों में भी दिलचस्पी लेनी शुरू की और दूसरे रचनाकारों की रचनाओं को भी पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया. अपने समय से बहुत पहले हैंडी ने ऐसे गोरे गायकों को प्रोत्साहित किया जिनके स्वर अफ़्रीकी-अमरीकी संगीत की इस ख़ास शैली के अनुकूल पड़ते थे. 1958 में जब 85 साल की उमर में विलियम हैंडी का निधन हुआ तो वे अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर न केवल "ब्लूज़ के जनक" माने जा चुके थे, बल्कि संगीत की इस विधा को अमरीकी समाज और संस्कृति के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार भी करा चुके थे.

शुरू-शुरू के ब्लूज़ में चार-चार पंक्तियां होती थीं जिन्हें दोहराया जाता था, लेकिन डब्ल्यू. सी. हैंडी के संकलन करने तक नमूना बदल चुका था और तीन-तीन पंक्तियों की बिनावट सामने आयी थी. इन गीतों में से जो सबसे ज़्यादा मशहूर हुए -- जैसे ‘सेंट लूइज़ ब्लूज़’ --उनमें बारह मात्राओं की यही बिनावट थी। फिर शायद इन्हीं नमूनों को सामने रख कर अन्य ब्लूज़ की रचना हुई होगी।

बेसी स्मिथ की रिकॉर्डिंग में कॉर्नेट पर उनकी संगत की थी जैज़ के महान संगीतकार लुई आर्मस्ट्रौंग ने, जिन्होंने बीसवीं सदी में जैज़ को दुनिया के कोने-कोने में फैलाने के सिलसिले में इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी कि उन्हें ‘जैज़ का राजदूत’ कहा जाने लगा। ‘सेंट लूइज़ ब्लूज़’ के इस रिकॉर्ड की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसमें लुई आर्मस्ट्रौंग द्वारा कॉर्नेट पर की गयी संगत बड़ी ख़ूबी के साथ गायिका के स्वरों की प्रतिगूँज पैदा करती है। 

http://youtu.be/hpu14BRmvGA?list=PL28D01AC6950859CA (बेसी स्मिथ और लूई आर्मस्ट्रौंग) http://youtu.be/3rd9IaA_uJI (बेसी स्मिथ और लूई आर्मस्ट्रौंग) 
http://youtu.be/D2TUlUwa3_o (लूई आर्मस्ट्रौंग और वेल्मा मिडलटन -- सेंट लूइज़ ब्लूज़)

वाद्य-यन्त्रों द्वारा मानवीय स्वरों का यह अनुकरण जैज़ संगीत की एक और ख़ासियत है और जिन संगीत-प्रेमियों ने उस्ताद विलायत खाँ का सितार-वादन सुना है -- ख़ास तौर पर ‘बाट चलत नयी चुनरी रंग डारी’ वाली सिन्धी भैरवी -- वे सहज ही जैज़-संगीत की इस विशेषता को समझ सकते हैं।

ब्लूज़ गायकी और उसके वादन के बहुत-से तत्व अफ़्रीकी संगीत से आये थे, जिनमें लगातार यूरोपीय तत्वों की मिलावट होती रही थी. इस गायकी का नाम ब्लूज़ कैसे पड़ा, इसके बारे में कई विचार प्रकट किये गये हैं. एक ख़याल यह है कि इस का ताल्लुक़ नील और उससे जुड़े रहस्यवाद से है. बहुत-से अफ़्रीकी समुदायों में मृत्यु और शोक के साथ नील का गहरा सम्बन्ध था जहां मातम करने वालों के सारे कपड़े नील से रंगे होते थे और इस तरह नीला रंग दुख और पीड़ा को व्यक्त करने लगा. चूंकि नील की खेती अमरीका के दक्षिणी हिस्से के बहुत से इलाक़ों में होती थी और उसका इस्तेमाल कपास को रंगने के लिए होता था, ख़ास तौर पर इन विस्थापित लोगों के बीच शोक के अवसरों पर, चुनांचे उनकी पीड़ा को व्यक्त करने वाले गीतों को भी ब्लूज़ कहा जाने लगा. वैसे यह नाम "नीले प्रेत" से भी आया हो सकता है जो जौर्ज कोलमैन के एकांकी प्रहसन "ब्लू डेविल्स" (१७९८) का शीर्षक है और अवसाद और उदासी के अर्थों में इस्तेमाल हुआ है.  ब्लूज़ का नाम चाहे जैसे पड़ा हो, इसमें किसी को शक नहीं है कि उसके स्रोत जितने अमरीका में ग़ुलाम बना कर लाये गये अफ़्रीकियों के दुख और दुर्दशा में थे, उतने ही इग्बो, योरुबा और पश्चिमी अफ़्रीका के स्थानीय समुदायों के रीति-रिवाजों, कर्म-काण्डों और अभिव्यक्ति के तरीक़ों में.

समय के साथ ब्लूज़ के बोल ही नहीं बदले, उनकी अदायगी भी बदली. हालांकि ब्लूज़ का बुनियादी स्वर पीड़ा और उत्पीड़न का ही रहा, उसके बोल कई बार हास्य, व्यंग्य और छेड़-छाड़ वाले भी होते. मसलन बिग जो टरनर की रचना "रिबेका" को लीजिये -- 

http://youtu.be/Bx937X08iO8  ( रिबेका - बिग जो टर्नर)

जैसे-जैसे ब्लूज़ की लोकप्रियता बढ़ी, उनके विषयों का दायरा भी फैलता गया. कई बार अश्लीलता को छूने वाले और दो अर्थों वाले शब्द भी इस्तेमाल होने लगे, हालांकि इन "गन्दे ब्लूज़" को अपवाद ही कहा जा सकता है, क्योंकि 1908 में पहले-पहले ब्लूज़ गीतों के प्रकाशन के बाद जो ब्लूज़ प्रमुखता से सामने आये उनमें पुरानी परम्परागत भावनाएं ही व्यक्त हुई थीं और यही ब्लूज़ का आधार बना रहा. इसी तरह हालांकि ब्लूज़ की मात्राओं की गिनती 12 ही रही लेकिन प्रयोग के तौर पर 16 मात्राओं का प्रयोग भी हुआ जैसे रे चार्ल्स के "स्वीट सिक्स्टीन बार्ज़" में --

http://youtu.be/Y3_vM6GNrY8 (रे चार्ल्स -- स्वीट सिक्स्टीन बार्ज़)

या  हर्बी हैनकौक के "वौटरमेलन मैन" में --

http://youtu.be/RzPZvKSdN7g (हर्बी हैनकौक -- "वौटरमेलन मैन")

इसी तरह 8 मात्राओं में भी कई रचनाएं मिलती हैं, जैसे "ट्रबल इन माइण्ड" और बिग बिल ब्रून्ज़ी के "की टू द हाइवे" में --

http://youtu.be/KN_f0WVsHuw (बिग बिल ब्रून्ज़ी -- टू द हाइवे)

कभी-कभार विषम मात्राओं वाली रचनाएं भी देखने को मिल जाती हैं जैसे वौल्टर विन्सन की रचना "सिटिंग औन टौप औफ़ द वर्ल्ड" में -- 
http://youtu.be/RqeW7-tmVU4  (वौल्टर विन्सन -- सिटिंग औन टौप औफ़ द वर्ल्ड )

(जारी)

Sunday, February 8, 2015


चट्टानी जीवन का संगीत 

जैज़ पर एक लम्बे आलेख की पांचवीं कड़ी


4.
ग़ुलाम सबसे ज़्यादा तब गाते हैं जब वे दुखी और ग़मज़दा होते हैं 
- फ़्रेड्रिक डगलस


गोरों के क़ानूनों ने भले ही ग़ुलामों के नगाड़ों पर पाबन्दी लगा दी हो, उनको दसियों तरीक़ों से ज़लालत भुगतने पर मजबूर किया हो, उन्हें उनके वतनों से जबरन एक पराये देश में ला कर ग़ुलामी की ज़ंजीरों से बांध दिया हो, मगर वे न तो वे इन अफ़्रीकी लोगों की जिजीविषा को ख़त्म कर पाये, न उनके जीवट को और न उनके अन्दर ज़िन्दगी की तड़प को. वाद्यों की कमी को इन लोगों ने कुर्सी-मेज़ पर या फिर टीन के डिब्बों और कनस्तरों और ख़ाली बोतलों पर  थपकी या ताल दे कर पूरा कर लिया था.

जहां तक दूसरे वाद्यों का सवाल था, ग़ुलाम बना कर लाये गये इन लोगों ने धीरे-धीरे पश्चिमी वाद्यों को अपनाना शुरू कर दिया था. उन्नीसवीं सदी के शुरू से ही पश्चिमी वाद्यों के इस्तेमाल के सबूत मिलने लगते हैं और जो सबसे पहला वाद्य ग़ुलामों ने अपनाया, वह था वायोलिन, जिसे आम तौर पर फ़िडल भी कहा जाता था. फिर जैसे-जैसे समय बीता उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक आते-आते दूसरे वाद्य जैसे बिगुल, तुरही और कैरिनेट भी शामिल कर लिये गये. अलावा इसके, जहां नगाड़ों पर पाबन्दी नहीं लगी थी या जल्दी ही हटा ली गयी थी, जैसे अमरीका के दक्षिणी भाग न्यू और्लीन्ज़ में, वहां चमड़े से मढ़े घरेलू ढोल-नगाड़े सार्वजनिक-सामूहिक गीत-संगीत और नाच के आयोजनों में इस्तेमाल किये जाते थे. 

जहां एक ओर इसमें कोई शक नहीं है कि इन विस्थापित और उत्पीड़ित लोगों का जीवन आम तौर पर अकथनीय कष्टों से भरा था, वहीं दूसरी ओर यह भी एक सच्चाई है कि इन सभी मज़लूम लोगों ने अपने दारुण जीवन और उसके नीरस, निरानन्द, निराशा-भरे माहौल का सामना करने के लिए राहत के अपने शाद्वल बना लिये थे. कला के अन्य रूपों का रास्ता अवरुद्ध पाने पर उन्होंने संगीत में राहें खोज निकालीं. उन्नीसवीं सदी के मध्य तक आते-आते जब खेतों और फ़सलों की सालाना कटाई हो चुकती तो कुछ दिन मौज-मस्ती के लिए अलग कर दिये जाते. कई इलाक़ों में इन अवसरों पर जो उत्सव मनाये जाते, उनमें नर्तक सिर पर सींगों वाले पहरावे और ऐसे लोक-परिधान पहन कर नाचते जिनमें गाय-बैलों की दुमें लगी होतीं. वाद्यों में घरेलू नगाड़े, लोहे के तिकोन और मवेशियों के जबड़ों की हड्डियां इस्तेमाल की जातीं. वक़्त के साथ अफ़्रीकी धुनों और रागों में यूरोपीय धुनों की मिलावट भी होने लगी.

एक और असर जो इस विस्थापित अफ़्रीकी समुदाय पर पड़ा, वह ईसाई भजनों का था. बहुत-से ग़ुलामों ने ईसाई गिरजे में गाये और बजाये जाने वाले धार्मिक संगीत के स्वर-संयोजन को सीख लिया था और उसे अपने मूल अफ़्रीकी संगीत में घुला-मिला कर एक नया रूप तैयार कर लिया था जिसे वे "स्पिरिचुअल" कहते थे -- आध्यात्मिक संगीत.

चूंकि उस दौर में आस-पास के इलाक़े से बहुत-से व्यापारिक जहाज़ अमरीका के दक्षिणी हिस्से में आते, इसलिए कैरिब्बियाई क्षेत्र के अफ़्रीकी विस्थापितों का संगीत भी मल्लाहों और मज़दूरों के माध्यम से आता. इन कैरिब्बियाई इलाक़ों में फ़्रान्सीसी और स्पेनी असर लिये हुए अफ़्रीकी संगीत विकसित हुआ था. धीरे-धीरे यह भी उस धारा में आ कर शामिल होने लगा जो अमरीका में लाये गये ग़ुलामों ने विकसित किया था.
यहीं यह बात ख़ास तौर पर ध्यान देने की है कि अफ़्रीका से ग़ुलाम बना कर अमरीका लाये गये लोगों के संगीत की चर्चा जब की जाती है तो अक्सर उस अवधि पर ध्यान नहीं दिया जाता जब वह संगीत उभर कर सामने आया. गीत-संगीत के जमावड़ों, फ़सलों की कटाई के बाद मौज-मस्ती के पलों या फिर संगीत मण्डलियों का विकास बहुत करके १८६२-६४ के अमरीकी गृह-युद्ध और अमरीका में दास-प्रथा के उन्मूलन के बाद के दौर में हुआ और इसे भी किसी ढब का बनते-बनते चार-पांच दशक लग गये. जिन लोगों को ग़ुलामी और उस भयंकर नस्लवादी भेद-भाव का तजरुबा नहीं है, जो अमरीका में अफ़्रीकी मूल के लोगों को भुगतना पड़ा (और यह शायद आज तक पूरी तरह दूर नहीं हुआ है), वे अपनी सादालौही में मान लेते हैं कि इन ग़ुलामों का संगीत उनके सुख-सन्तोष का इज़हार है. ग़ुलामी से भागने में सफल होने के बाद एक भूतपूर्व दास फ़्रेड्रिक डगलस(१८१८-१८९५) ने, जो आगे चल कर दास-प्रथा के उन्मूलन और नीग्रो समुदाय के हक़ों के जाने-माने आन्दोलनकारी और सुप्रसिद्ध वक्ता बने, अपनी आत्म-कथा में लिखा :

"...मैंने कभी-कभी सोचा है कि ग़ुलामी के बारे में फलसफ़े की पूरी-पूरी किताबों को पढ़ने की बनिस्बत महज़ इन गीतों को सुनना कुछ लोगों के दिमागों पर ग़ुलामी की भयानक फ़ितरत के बारे में एक गहरी छाप डाल सकता है....जब मैं ग़ुलाम था तब मैं इन रूखे, बीहड़ और प्रकट रूप से अबूझ गीतों के गहरे अभिप्रायों को नहीं समझता था. मैं ख़ुद दायरे के भीतर था; लिहाज़ा न तो मैं उस तरह देखता था न सुनता था जैसे वे लोग देख-सुन सकते थे जो बाहर थे. ये गीत दुख की ऐसी कथा बयान करते थे जो मेरी कमज़ोर समझ के बिलकुल परे थे; ये ऊंचे, लम्बे और गहरे सुर थे; उनमें उन आत्माओं की प्रार्थनाएं और शिकायतें बसी हुई थीं जो अत्यन्त कड़वी व्यथा से छलक रही थीं. हर सुर ग़ुलामी के ख़िलाफ़ एक गवाही था और ज़ंजीरों से छुटकारे के लिए ईश्वर से एक प्रार्थना...अगर किसी को ग़ुलामी के अमानुषिक और आत्मा का हनन करने वाले प्रभाव के बारे में जानना हो तो उसे कर्नल लौयेड के बगान पर जाना चाहिए और दिहाड़ी वाले दिन चुपके से चीड़ के सघन वन  में छिप कर ख़ामोशी से उन ध्वनियों को जांचना-परखना चाहिए जो उसके कानों और आत्मा के गलियारों से गुज़रती हैं और तब अगर वह अविचलित रह जाये तो ऐसा तभी हो सकता है जब ’उसके निष्ठुर हृदय में ज़रा भी मांस न हो’....अमरीका के उत्तरी हिस्से में आने के बाद मुझे ऐसे लोगों से मिल कर अक्सर बेइन्तहा हैरत हुई जो ग़ुलामों के बीच गीत-संगीत को उनके सन्तोष और ख़ुशी का सबूत मानते हैं. इससे ज़्यादा बड़ी भूल मुमकिन नहीं है. ग़ुलाम सबसे ज़्यादा तब गाते हैं जब वे दुखी और ग़मज़दा होते हैं. ग़ुलामों के गीत उनकी व्यथाओं और पीड़ा की निशानियां हैं; उसे उनसे राहत मिलती है, वैसे ही जैसे दर्द-भरे दिल को आंसुओं से मिलती है. कम-से-कम मेरा तो यही अनुभव है. मैंने अपने दुख को व्यक्त करने के लिए अक्सर गीत गाये हैं, बिरले ही अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करने के लिए. जब तक मैं ग़ुलामी के जबड़ों में जकड़ा हुआ था, ख़ुशी में रोना और ख़ुशी में गाना मेरी कल्पना से परे था. किसी ग़ुलाम का गाना उसी हद तक सन्तोष और ख़ुशी का सबूत माना जा सकता है जिस हद तक किसी निर्जन टापू पर ले जा कर छोड़ दिये गये आदमी का गाना; दोनों के गीत उसी सम्वेदना से उपजते हैं."
--फ़्रेड्रिक डगलस का जीवन-वृत्तान्त 

5.


अमरीका में दास-प्रथा लगभग तीन सौ साल तक रही और ये ग़ुलाम चूँकि अफ्रीका के अलग-अलग हिस्सों से लाये गये थे, इसलिए उनके संगीत-रूपों में भी विविधता थी। जहाँ तक यूरोपीय संगीत का सवाल है तो उसका अधिकांश ब्रिटेन से आया था, लेकिन अमरीका के लूज़ियाना राज्य पर बीच-बीच में फ्रांस और स्पेन का भी क़ब्ज़ा रहा, इसलिए फ्रान्सीसी और स्पेनी संगीत भी वहाँ की फ़िज़ा में रचा-बसा था। यूरोपीय संगीत में भजन और फ़ौजी धुनें तो थीं ही, साथ ही नाच के समय बजाया जाने वाला संगीत भी था।

क्रिस्टोफ़र कॉडवेल ने कविता के स्रोतों पर विचार करते हुए कविता को गीत से और गीतों को श्रम से, काम की लय से, जोड़ा था। जैज़-संगीत के स्रोत भी अमरीकी नीग्रो दासों की इसी काम की लय में खोजे जा सकते हैं। मज़दूरों के गीत, जैसा कि नाम से ज़ाहिर है, ऐसे गीत थे, जिन्हें लोग काम करते समय गाते थे। हमारे यहाँ भी धान की बोआई या गेहूँ की कटाई करने वाले किसान, गंगा पर बजरे खींचने वाले मल्लाह और मकान बनाने वाले मजूर इसी किस्म के गीत गाते हैं। इन गीतों की ताल और सुर, तुक और धुन काम की लय से जुड़ी होती है और इस तरह इन गीतों में गुहार और जवाब की एक बिनावट नज़र आती है। एक आदमी गुहार लगाता है और बाकी लोग जवाब में गीत की कडि़याँ दोहराते हैं और यह तान बराबर चलती रहती है। मैंने एक बार किसी इमारत के निर्माण के दौरान मज़दूरों की एक टोली को लोहे के बड़े-बड़े गर्डर उठाते समय ऐसी ही गुहार-जवाब लगाते सुना था। टोली का नायक गुहार लगाता-‘शाबाश ज्वान,’ ‘खींच के तान,’ आदि और हर गुहार के बाद टोली रस्सा खींचती हुई जवाब में ‘हेइस्सा’ कहती और लोहे का गर्डर इंच-इंच कर ऊपर चढ़ता जाता।

अमरीकी नीग्रो ग़ुलामों के ये मजूर-गीत भी इसी प्रकार के थे, जीवन और श्रम से जुड़े हुए, जो अपने आप में एक अफ्रीकी विशेषता थी। दिलचस्प बात है कि गुहार और जवाब की यह ‘जुगलबन्दी’ वहाँ भी बरकरार रही, जहाँ एक ही अकेला कामगार होता था। उस स्थिति में वह गीत की कडि़याँ बारी-बारी से मोटे और पतले सुरों में गाता -- बेस (भारी) सुर में एक कड़ी और फिर ‘फ़ौल्सेटो’ (स्त्रैण, पतले) सुर में दूसरी। आज जैज़-संगीत के परिष्कृत, शुद्ध सुरों को सुनते हुए भले ही यह कल्पना करना कठिन हो कि वह मज़दूरों के इन्हीं गीतों और उनकी गुहार-जवाब से विकसित हुआ होगा, लेकिन ध्यान से सुनने पर यह ‘जुगलबन्दी’ बराबर जैज़-संगीत में मौजूद मिलती है।

अमरीका के ग़ुलामी के दौर में और भी बहुत से संगीत-रूप निकल कर सामने आये और आज भी अमरीका के सुदूर ग्रामीण इलाकों में सुने जा सकते हैं, हालाँकि जब वे धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। ऐसी ही एक मिसाल है खेतिहरों के टिटकारी गीत, जिन्हें खेतों पर काम करने वाले मजूर, कहा जाय कि ख़ुद अपने आप से या अपने मवेशियों से बात करने के लिए, गाया करते थे। इन गीतों की टिटकारियाँ और भारी तथा पतले सुरों की जुगलबन्दी काफ़ी हद तक मज़दूरों के गीतों की ही तरह की थी और इन्हीं से हो कर जैज़ संगीत का सफ़र अपनी अगली मंज़िल -- ब्लूज़ -- तक पहुँचा।

आज जब ब्लूज़ की बात की जाती है तो यह ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि ब्लूज़ के शुरुआती दौर की कोई रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं है। मौजूदा रूप में जो ब्लूज़ उपलब्ध है, वह भी जैज़-संगीत की तरह अपनी जड़ों से इतनी दूर चला आया है कि उसके स्रोत अँधेरे में खोये हुए हैं। तो भी बुनियादी तौर पर ब्लूज़ की जड़ें मज़दूरों के गीतों और खेत-मजूरों के टिटकारी गीतों में ही खोजी जा सकती हैं। खेत के किसी अकेले कोने में काम करने वाला अमरीकी ग़ुलाम अपनी जातीय स्मृति में कैद बिम्बों को एक नयी सीखी भाषा में ढालते समय ज़ाहिरा तौर पर बेहद निजी गीतों का ही माध्यम अपना सकता था। इसीलिए ब्लूज़ मुख्य रूप से उदासी के, अवसाद के, विषाद के गीत हैं -- निजी और ज़्यादातर एकालाप में निबद्ध। अपने आप से की गयी संगीत-भरी बातचीत। शुरू के ब्लूज़ गाये ही जाते थे, पर आगे चल कर ब्लूज़ की धुनें बजायी भी जाने लगीं।

यहां एक ही धुन के दो रूप दिये जा रहे हैं. पहला, मशहूर गायिका बिली हौलिडे के स्वर में ब्लूज़ का प्रसिद्ध गीत "सेंट लूइज़ ब्लूज़" है और दूसरा, जाने-माने जैज़ वादक लूइज़ आर्मस्ट्रौंग द्वारा बजायी गयी वही धुन है जिसमें उनके साथ संगत वेल्मा मिडलटन कर रही हैं.

http://youtu.be/TmbQVx6SGao (बिली हौलिडे -- सेंट लूइज़ ब्लूज़)

http://youtu.be/D2TUlUwa3_o (लूइज़ आर्मस्ट्रौंग-- सेंट लूइज़ ब्लूज़)

(जारी)