Friday, September 5, 2014

हिचकी

हिचकी 


क़िस्त - 4

चार
बिन्दु चाय ले कर आयी थी तो नन्दू जी उसी दिन डाक में आये पार्टी के मुखपत्र को हाथ में थामे-थामे ऊँघ-सा गये थे। मेज़ पर कप-प्लेट रखने की आवाज़ से वे चौंके थे और पार्टी के मुखपत्र को एक तरफ़ रख कर उन्होंने चाय का प्याला उठा लिया था। चाय की चुस्कियाँ लेते हुए उन्होंने बिन्दु से दिन भर का हाल-चाल लिया था।
० 
लक्ष्मीनगर वाले फ़्लैट में आने के बाद ही से बिन्दु का सामना उस भयानक अकेलेपन से हुआ था, जो दिल्ली के मध्यवर्गीय फ़्लैटों में ज़िन्दगी बसर करने वाली उन पढ़ी-लिखी महिलाओं को भुगतना पड़ता है, जिनके अभी बच्चे नहीं हुए होते और जो कहीं काम नहीं करतीं। ख़ास तौर से उन महिलाओं को, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के संयुक्त परिवारों से आ कर अपने पतियों के साथ अपना परिवार बसाने की कोशिश कर रही होती हैं। कुसुम विहार में इस अकेलेपन का एहसास उसे इसलिए नहीं हुआ था, क्योंकि वहाँ बहुत-से परिवार पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के थे, लगभग उसी पृष्ठभूमि के जिससे नन्दू जी और बिन्दु आये थे और एक कॉलोनी में रहने की सामान्य असुविधाओं के चलते हर तरह से एक-दूसरे के सुख-दुख में शरीक होते थे। 
लक्ष्मी नगर वाले फ़्लैट का पर्यावरण बिलकुल अलग था। नीचे के वर्मा जी के दोनों बच्चे इतने बड़े हो गये थे कि अपनी देख-भाल ख़ुद कर सकें। वर्मा जी की पत्नी उन्हीं के बैंक की दूसरी शाखा में क्लर्क थीं और सुबह वर्मा जी के साथ ही उनकी हीरो हॉण्डा पर बैठ कर निकल जाती थीं। रहीं बंसल जी की पत्नी तो उनके पास घर-गिरस्ती सँभालने के बाद दोपहर को जो थोड़ा-बहुत ख़ाली वक़्त बचता, उसे वे नियमपूर्वक अपने जैसी अन्य पड़ोसिनों के साथ सत्संग करने में ख़र्च करतीं जिसमें भगवत भजन से अधिक अपनी और मुहल्ले की दूसरी बहुओं पर टीका-टिप्पणी की जाती।
एकाध बार वे बिन्दु को भी आग्रहपूर्वक अपने साथ ले गयी थीं, लेकिन उन अधेड़ अथवा बूढ़ी औरतों के साथ, जो ज़्यादातर व्यापारियों की पत्नियाँ थीं, नीरस, ऊबाऊ, धर्म-चर्चा करने या बेसुरे भजन गाने या फिर उनकी चरित-चर्चा सुनने की बनिस्बत घर रह कर अपने अकेलेपन को पत्र-पत्रिकाओं के सहारे काटना बिन्दु को कहीं बेहतर लगा था।
० 
उसके अकेलेपन को दूर करने के ख़याल से, और किसी हद तक आमदनी में इज़ाफ़ा करने के लिए भी, नन्दू जी ने उसे अपने परिचित प्रकाशकों से प्रूफ़ और पाण्डुलिपियाँ ला कर दी थीं। लेकिन प्रूफ़ पढ़ना ख़ासा सिरदर्द का काम था और भाषा की जानकारी के साथ एकाग्रता भी चाहता था। ऊपर से हिन्दी के प्रकाशकों में भाषा को ले कर न कोई समझ थी, न रुचि और न परवाह। वर्तनी से ले कर व्याकरण तक एक अजीब अराजकता थी। एक ही प्रकाशक की पाँच पुस्तकों में हिन्दी के सामान्य शब्द पाँच तरह से छपे मिलते थे। 
अरबी-फ़ारसी के शब्दों का तो और भी बुरा हाल था। अव्वल तो उनमें नुक़्ते लगाने की परम्परा ही त्याग दी गयी थी, लेकिन कभी-कभार, शायद लेखक के आग्रह पर, अगर नुक़्ते लगाये भी जाते तो अकसर ग़लत जगह पर लगा दिये जाते। ज़्यादातर प्रकाशकों को काग़ज़ काला करने और ऊपर की टीम-टाम दुरुस्त करके रिश्वत और रुसूख़ के बल पर सरकारी ख़रीदों में किताबें ठेलने में ही दिलचस्पी थी। ऐसी हालत में बिन्दु जल्द ही इस कुत्ते-ख़स्सी से तंग आ गयी थी। 
पिछले चार-पाँच महीनों से उसने आकाशवाणी के चक्कर लगाने शुरू कर दिये थे। आकाशवाणी अब दूरदर्शन के साथ प्रसार भारती बन चुका था और जब से सूचना संचार माध्यमों की क्रान्ति ने उपभोक्ता सामग्री के विज्ञापनदाताओं के साथ मिल कर नये-नये चैनलों के लिए रास्ता साफ़ कर दिया था, तब से दुर्दिन का शिकार था। टीवी चैनलों ने रेडियो के श्रोताओं में भारी कटौती कर दी थी। 
आकाशवाणी भले ही प्रसार भारती बन गया था, पर उसके कार्यक्रमों का वही पुराना ढर्रा था। बजट की कटौतियों ने अलग क़हर बरपा कर रखा था। जो कार्यक्रम पहले अलग-अलग प्रोग्राम एग्ज़ेक्यूटिवों के ज़िम्मे रहते, अब गिने-चुने लोगों के हवाले कर दिये गये। इस बोझ को बाँटने के लिए कैज़ुअल आर्टिस्टों की एक फ़ौज खड़ी की गयी थी। स्थायी पदों की तादाद घटा दी गयी थी, ताकि प्रॉविडेंट फ़ण्ड और अन्य भत्तों में ख़र्च की जाने वाली रक़म कार्यक्रमों में लगायी जा सके और अस्थायी कलाकारों द्वारा सस्ते में कार्यक्रम तैयार कराये जा सकें। 
इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान बिन्दु युव-वाणी और बाल-संघ जैसे कार्यक्रमों में कैज़ुअल आर्टिस्ट के रूप में काम कर चुकी थी। कार्यक्रमों के आलेख तैयार करने से ले कर उन्हें प्रस्तुत करने में भी प्रोग्राम एग्ज़ेक्यूटिवों का हाथ बँटाती रही थी। लेकिन इलाहाबाद की तुलना में दिल्ली के आकाशवाणी केन्द्र में मार-काट कहीं ज़्यादा थी। नन्दू जी ने अपने पुराने अख़बारी सम्पर्कों के बल पर बिन्दु को कैज़ुअल आर्टिस्ट के तौर पर स्वीकृत तो करा दिया था, लेकिन काम का मिलना प्रोग्राम एग्ज़ेक्यूटिव की मन-मर्ज़ी पर निर्भर था। बिन्दु को कार्यक्रम मिलने भी लगे थे, लेकिन अभी इनकी तादाद न तो बिन्दु की योग्यता के अनुरूप थी, न नन्दू जी की आकांक्षा के।
चाय पीते हुए नन्दू जी को पता चला था कि उस दिन बिन्दु को कार्यक्रम के लिए बुलाया नहीं गया था। जब उसने पास के पी.सी.ओ. से प्रोग्राम एग्ज़ेक्यूटिव को फ़ोन किया था तो उसे बताया गया था कि उस हफ़्ते उसे चार कार्यक्रम पहले ही मिल चुके थे और अब अगले हफ़्ते ही कोई गुंजाइश होगी। 
आम तौर पर शनिवार को युव-वाणी की रक़म मिल जाया करती थी। पिछले तीन शनिवारों से उसे लगातार युव-वाणी के लिए बुलाया जा रहा था और नन्दू जी आश्वस्त थे कि एक स्थायी व्यवस्था हो गयी है। इसीलिए बिन्दु से यह पता चलने पर कि उस शनिवार को नागा हो गया है, वे प्रोग्राम एग्ज़ेक्यूटिव के रवैये पर झल्लाये थे और उन्होंने मन-ही-मन फ़ैसला किया था कि जल्द ही वे किसी साहित्यिक समारोह के अवसर पर आकाशवाणी के केन्द्र निदेशक के कान में सफ़ाई से इस मसले को हल करने की बात डाल देंगे। 
केन्द्र निदेशक सीतेश मयंक एक कवि-सम्मेलनी गीतकार थे और यह उनके जुगाड़-तन्त्र का कमाल था कि वे लगातार प्रान्तीय राजधानियों के रेडियो स्टेशनों पर ही तैनात होते रहते थे, अपने गिर्द गीतकारों का एक झुण्ड जुटाये रखते थे और अब तक चार गीत संग्रह दिल्ली की प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थाओं से छपवा चुके थे, जिनमें वह प्रकाशन संस्थान भी था, जिसमें नन्दू जी काम कर रहे थे। मन में यह इरादा कर लेने के बाद, नन्दू जी ने केतली से अपने लिए चाय का एक और प्याला भरा था और बिन्दु को अपनी कारगुज़ारियाँ सुनाने लगे थे।

Thursday, September 4, 2014

हिचकी

क़िस्त - 3



तीन

ऊपर बिन्दु टीवी पर कोई चालू-सा धारावाहिक देख रही थी, जिसे किसी भी समय, कहीं से भी देखना शुरू किया जा सकता था और किसी भी समय, कहीं भी बन्द किया जा सकता था। यह टीवी नन्दू जी ने, मीडियम साइज़ के अपने फ्रिज के साथ, शादी करने के साल भर बाद ख़रीदा था, जब एक ओर दिल्ली के जानलेवा ख़र्चों ने उन्हें यह स्वीकार करने पर विवश कर दिया था कि घर-गिरस्ती को ठीक ढंग से चलाने के लिए पति के साथ पत्नी का भी काम करना बहुत ज़रूरी है। और दूसरी ओर, दिल्ली के भाग-दौड़-भरे जीवन और सीमित आय में घर की चूलें बैठाने के लिए सब्ज़ी ख़रीदने से ले कर खाना बनाने की पुरानी पद्धति बहुत काम नहीं आने वाली। 
     गर्मियों में तीन दिन तक लगातार दूध ख़राब होता रहा था और खाना तो अक्सर ताज़ा ही बनाना पड़ता था और केवल उतना, जितना एक बार में पूरे-का-पूरा ख़त्म किया जा सके। इसलिए जब पत्रकारों की माँग पर बैठाये गये आयोग ने आश्चर्यजनक रूप से वेतन वृद्धि की सिफ़ारिश की थी और उसे पूर्व प्रभावी ढंग से लागू किया था तो नन्दू जी ने इकट्ठा हाथ आयी राशि से सबसे पहले फ़्रिज लेने का फ़ैसला किया था। लेकिन जब वे और बिन्दु उनके एक पत्रकार-मित्र को साथ ले कर मित्र की परिचित दुकान पर पहुँचे थे तो नन्दू जी की नज़र सामने रखे टीवी सेटों की क़तार पर पड़ी थी, जिनमें हर सेट पर उन्हीं दिनों खेला जा रहा भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच आ रहा था। 
मैच में खिलाडि़यों को बल्लेबाज़ी करते देख कर अचानक उनके अन्त:स्तल के किसी गहरे कोने में छिपा हुआ क्रिकेट-प्रेम, पुराने विस्मृत प्रेम की तरह एकबारगी सतह पर आ गया था। उन्हें याद आया था कि पार्टी के क़रीब आने से पहले वे क्रिकेट को ले कर कितने पागल रहा करते थे। यह ठीक है कि उनके मध्यवर्गीय ग्रामीण परिवेश में उन्हें क़ायदे से क्रिकेट खेलने का मौक़ा कभी नहीं मिला था। न तो मँहगा बल्ला ख़रीदने के पैसे जुटे थे और न उनके इण्टर कॉलेज में खेलों की इतनी सुविधा ही थी। अलबत्ता, दिल की हसरत को वे और उनके साथी-संगी कैनवस बॉल क्रिकेट खेल कर पूरा कर लिया करते थे, जिसमें न मँहगे गेंद-बल्ले की दरकार थी, न पैड और विकेटों की और जिसके लिए ग्यारह-ग्यारह खिलाडि़यों का होना भी ज़रूरी नहीं था। 
हाँ, जब वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाख़िल हुए थे तो बी.ए. के पहले साल में उन्होंने क्रिकेट के इस पुराने शौक़ को पूरा करने की ठानी थी, मगर वहाँ पहले से कुछ ऐसे ख़ुर्रांट बन्दे जमे हुए थे, जो या तो पैसों से इतने मज़बूत थे कि क्रिकेट के कोच को उँगली पर नचा सकें या फिर इण्टर तक ऐसी महारत हासिल कर चुके थे, जो उन्हें टीम में जगह दिलाने के लिए काफ़ी थी, और जैसी महारत जसरा के महामना मदन मोहन मालवीय इण्टर कॉलेज में नन्दू जी या उनके साथियों को कभी हासिल नहीं हो सकती थी। 
     नन्दू जी ने अन्य ढेर सारी ख़्वाहिशों के साथ इसे भी दिल के किसी कोने में दफ़्न कर लिया था और धीरे-धीरे यह भी सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के उस इरादे की खाद बन गयी, जो इलाहाबाद विश्वविद्यालय के माहौल में विषमता के अनगिनत पहलुओं से साबक़ा पड़ने पर नन्दू जी के मन-मस्तिष्क में कुलबुलाने लगी थी और जो उन्हें अन्ततः पार्टी के छात्र संगठन की ओर खींच ले गयी। 
यह भी दिलचस्प है कि जब शुरू-शुरू में उनके वामपन्थी छात्र साथियों ने क्रिकेट को उपनिवेशवादी खेल और साम्राज्यवादी उपभोक्तावाद का वाहक क़रार दिया था और नन्दू जी के क्रिकेट-प्रेम का मज़ाक उड़ाया था तो नन्दू जी ने, जिन्होंने उन्हीं दिनों एक भारी-भरकम लघु पत्रिका में डॉ0 राम विलास शर्मा का लम्बा साक्षात्कार पढ़ा था, अपने साथियों को फ़ौरन यह कहते हुए चुप करा दिया था कि, ‘कॉमरेड, क्रिकेट तो डॉ0 राम विलास शर्मा का पसन्दीदा खेल है। क्या उनके मार्क्सवादी होने में आप सबको शक है ?’
 
     यही कारण था कि नन्दू जी ने जब फ्रिज पसन्द कर लिया था और पाया था कि उनके पास कुछ पैसे बच रहे हैं और दुकानदार उनके पत्रकार-मित्र ही से नहीं, उनसे भी प्रभावित हो चुका है तो उन्होंने कुछ रक़म की उधारी करते हुए फ़्रिज के साथ टीवी भी ख़रीद लिया था। बिन्दु को उन्होंने समझाया था कि टीवी महज़ मनोरंजन का ही नहीं, सूचना और जानकारी का भी स्रोत है और पत्रकार होने के नाते उनके लिए उत्पादन का साधन है और कलम-काग़ज़ जितना ही ज़रूरी है। यह बात अलग है कि वे दोनों पति-पत्नी जितना समय ख़बरें देखने में लगाते, उससे कई गुना क्रिकेट मैच या फिर धारावाहिक देखने में। नन्दू जी बेरोक-टोक और बिन्दु तब जब नन्दूजी घर पर न होते।
नन्दू जी के पहुँचते ही बिन्दु ने टीवी को फ़ौरन बन्द कर दिया था, क्योंकि अव्वल तो उसे नन्दू जी से धारावाहिकों के कुप्रभाव पर इतने प्रवचन सुनने पड़े थे कि वह उन्हें अब आगे कोई मौक़ा देने को तैयार नहीं थी; दूसरे, अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी के इन ढाई-तीन वर्षों के दौरान वह समझ गयी थी कि अपने तमाम मार्क्सवाद के बाद भी नन्दू जी कहीं अन्दर से अपने विवाहित जीवन में सबल पक्ष की भूमिका निभाने के क़ायल थे और उनके तईं स्त्री-स्वतन्त्रता की एक अदृश्य-सी सीमा थी, जिसे तय करने का अधिकार भी उन्हीं के पास था और जिसे पार करना शीत-युद्ध की-सी स्थिति पैदा कर सकता था। अपनी बेहतर वैचारिक समझ के चलते वे ही अक्सर तय करते कि  टीवी पर क्या देखना चाहिए, क्या नहीं।
बिन्दु ने नन्दू जी के हाथ से हेल्मेट ले कर कोने में रखी तिपाई पर टिकाया था और फिर चाय बनाने चली गयी थी। नन्दू जी ने दिन भर की थकान को कपड़ों के साथ उतार कर लुंगी-कुर्ता पहना था और आराम से बाहर के कमरे में दीवान पर पसर गये थे। यह बाहर का कमरा, जिसे नन्दू जी ड्रॉइंग-रूम कहते थे, दिल्ली के हज़ारों दो कमरे वाले फ़्लैटों की तरह एक मल्टी-पर्पज़ कमरा था, जो बैठक का भी काम देता था, खाने के कमरे का भी और कभी-कभार आये-गये को ठहराने का भी। जगह और जेब की तंगी के सबब से नन्दू जी ने सोफ़ा और डाइनिंग टेबल लाने का ख़याल छोड़ दिया था और कमरे को आधे देसी और आधे आधुनिक ढंग से सजाया था। 
दीवान के साथ वे चार मूढ़े और एक सेंटर टेबल ले आये थे। दीवान उनके और उनके मेहमानों के बैठने के काम भी आता था और कभी-कभार जब उनका बड़ा भाई, जो ओखला की एक फ़ैक्टरी की सुपरवाइज़री के साथ-साथ  फ़ैक्टरी में ही बने एक मन्दिर में पुजारी बन कर परम्परागत पुरोहिताई के साथ-साथ थोड़ी-बहुत झाड़-फूंक का काम भी करता था, उनसे मिलने आता और रात को रुक जाता तो पलँग की ज़रूरत भी पूरी करता। सेंटर टेबल खाने की मेज़ का भी काम करती और मेहमानों को चाय वग़ैरह पिलाने का भी। एक कोने में उन्होंने छोटी-सी मेज़ पर टीवी रख दिया था और दीवार में बनी खुली अलमारी में किताबें और पत्रिकाएँ सजा दी थीं। 
पत्रिकाओं में ज़्यादातर पार्टी के मुखपत्र और उसके सांस्कृतिक संगठन से यदा-कदा निकलने वाली पत्रिका के अंक थे और किताबों में पार्टी के ज़माने का मार्क्सवादी साहित्य, हालाँकि अब धीरे-धीरे इनमें दिल्ली और भोपाल से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाएँ और देशी-विदेशी लेखकों की चर्चित कृतियाँ और उनके अनुवाद बढ़ते जा रहे थे। 
इसी अलमारी में किताबों और पत्रिकाओं के बीच जगह बना कर सजावट का सामान भी रख दिया गया था, जो किताबों ही की तरह नन्दू जी की पुरानी और नयी अभिरुचियों का मेल प्रदर्शित करता था। मार्क्स के बस्ट के साथ गणेश की एक प्रतिमा भी रखी हुई थी और शिल्प मेले से ख़रीदे हुए विभिन्न भारतीय प्रान्तों के हस्तकला के नमूने भी। 
     दिल्ली आने के बाद से नन्दू जी धीरे-धीरे अपनी रुचियों को अन्य पत्रकार साथियों और साहित्यिक-सांस्कृतिक बिरादरी के लोगों के अनुरूप बनाने में जुट गये थे और जहाँ उन्हें सजावट की कोई नयी चीज़ या ढंग नज़र आता और उनके साधनों के भीतर होता, वे उसे अपने भण्डार में शामिल कर लेते। यों, उनकी बैठक भिन्न-भिन्न रुचियों के एक अजायबघर सरीखी हो गयी थी। ग़नीमत यही थी कि जगह की कमी ने उसके अजायबघरू चरित्र को बहुत नुमायाँ नहीं होने दिया था। 
अब घर के साज़-सामान की सूची में नन्दू जी ने प्राथमिकता पर डाइनिंग टेबल और सोफ़े को रखा हुआ था और वे इन्तज़ार कर रहे थे कि कब दक्षिण दिल्ली या कम-से-कम नदी की इसी तरफ़ पटपड़गंज के किसी उम्दा फ़्लैट में जायें और अपने ड्रॉइंग-रूम को वैसे सजा सकें जैसे सगुन राजगढि़या या फिर चर्चित युवा कवि-कहानीकार आदित्य प्रकाश ने अपने ड्रॉइंग-रूमों को सजा रखा था। 

Wednesday, September 3, 2014

हिचकी



क़िस्त - 2


दो


कुसुम विहार से लक्ष्मी नगर तक की छलाँग लगाने के इस क्रम में नन्दू जी के पिछले संगी-साथी और पड़ोसी ही नहीं बदले थे, उनके मकान मालिक भी बदल गये थे। 

कुसुम विहार के पुराने फ़्लैट का मालिक हरीराम कड़कड़डूमा की पुरानी बस्ती के अपने पुश्तैनी मकान में, अपने पाँच बच्चों और एक अदद बीवी के साथ मच्छरों, मलबे, गन्दी नालियों और गालियों वाले विकट और विशुद्ध भारतीय परिवेश में रहता था। शास्त्री भवन में किसी सरकारी दफ़्तर में चपरासी था और चूँकि उसके पास अपना ख़ुद का मकान था, इसलिए जब सरकारी कोटे के तहत कुसुम विहार वाले फ़्लैट की लॉटरी उसके नाम खुली थी तो न तो उसे  फ़्लैट लेने की ऐसी कोई ज़रूरत थी, न इच्छा। लेकिन जब उसका नम्बर आ गया तो उसके साथियों ने उसे फ़्लैट ले लेने की सलाह दी थी।
     ‘तीन लड़कियाँ हैं तेरी, हरीराम, वे तो अपने धोरे लगेंगी,’ ड्राइवर सुखराम ने बीड़ी का सुट्टा लगाते हुए कहा था, ‘पर अपने दो लौंडों का क्या करेगा तू ? इस चालीस गज़ की घुरनी में ना रहने वाले वो।’
     ‘किराये पर चढ़ा दीजो फ़्लैट को,’ हरीराम के साले ने कहा था, जो उद्योग भवन में गेट पर तैनात था, ‘किस्त अदा होती रहेगी और चार पैसे बच भी जाया करेंगे ऊपर से। पता भी नहीं चलेगा और फ़्लैट तेरा अपना हो जायेगा।’
     दोबारा सोचने पर हरीराम को इस तजवीज़ से फ़ायदे की कई सूरतें निकलती नज़र आयी थीं। और जब आबण्टन की सूचना आते ही एक प्रॉपर्टी डीलर ने उसे पच्चीस हज़ार रुपये ज़्यादा दे कर फ़्लैट ख़रीदने की पेशकश की थी तो उसने मन पक्का कर लिया था। लिहाज़ा उसने अपने साले से कुछ पैसे उधार ले कर पहली किस्त भर दी थी और चाभी मिलते ही फ़्लैट को किराये पर चढ़ा दिया था। 
     पिछले आठ वर्षों में नन्दू जी उसके तीसरे किरायेदार थे। हर महीने हरीराम ठर्रे का पौवा चढ़ा कर किराया लेने आता, किराया ले कर पास के ठेके से एक पौवा और ख़रीदता, और फिर अगली अमावस या पूर्णिमा तक ग़ायब हो जाता।
कुसुम विहार के फ़्लैट को छोड़ते समय नन्दू जी को एक साथ हैरत, दुख और राहत की परस्पर विरोधी भावनाओं का एहसास हुआ था। 
हैरत इसलिए कि वे कैसे दिल्ली जैसी राजधानी में रहते हुए भी ऐसे पिछड़े लोगों के बीच दिन गुज़ारते रहे जिन्होंने कभी गेब्रिएल गार्सिया मार्केज़, अरुन्धती राय, विक्रम सेठ, कृष्ण बलदेव वैद, तेजी ग्रोवर और सुधीर कक्कड़ का नाम तक नहीं सुना था। दुख इसलिए कि राजधानी के कला-जगत और साहित्यिक-सांस्कृतिक स्वर्ग के द्वार तक पहुँच जाने के बावजूद वे अन्दर से अब भी वही परिवर्तन-भीरु गामड़े थे, जिसके लिए फ़्लैट बदलना देश बदलने से कम अहमियत नहीं रखता था। 
यूँ भी, कुसुम विहार के ज़्यादातर निवासी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नहीं, बल्कि नन्दू जी जैसे ही मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा थे, जो दूर-पार के इलाक़ों से आ कर दिल्ली में जमने-जमाने की कोशिश कर रहे थे। उनके बीच नन्दू जी को कुछ वैसी ही आश्वस्ति होती, जैसी जैविक तत्वों को अपने अनुकूल परिवेश और पर्यावरण में होती है, ख़्वाह वह अन्य जैविक तत्वों के लिए कितना ही प्रतिकूल और घातक क्यों न हो। अलावा इसके, नन्दू जी ने अख़बार की नौकरी का एक साल पूरा होते-न होते विवाह कर लिया था और अपनी शादी-शुदा ज़िन्दगी के शुरुआती दौर में, जब वे तिनका-तिनका जोड़ कर अपने नीड़ का निर्माण कर रहे थे, कुसुम विहार उन्हें हर तरह से मुफ़ीद जान पड़ा था। 
उनकी पत्नी बिन्दु भी विवाहित जीवन की ख़ुमारी से बाहर आ कर दिल्ली की आपा-धापी से भरी एकरस रफ़्तार की ऊब से रू-ब-रू नहीं हुई थी और जल्द ही अपने जैसी अन्य पड़ोसिनों से उसका बहनापा हो गया था। रहा सवाल राहत का, तो यह एहसास अचानक उस दिन हुआ था, जब नन्दू जी एक महीने के दौरान तेरह फ़्लैट देखने के बाद आख़िरकार लक्ष्मी नगर वाले फ़्लैट के मकान मालिक के इण्टव्र्यू में पास हो गये थे।
लक्ष्मीनगर के इस नये फ़्लैट के मालिक सूरजप्रकाश बंसल चाँदनी चौक के भगीरथ प्लेस में (जिसे वे और अन्य सभी लोग भगीरथ पैलेस कहते) बिजली के सामान के मझोले व्यापारी थे। किराया लेने की तत्परता और नियमितता के अलावा उनमें और हरीराम में कोई समानता नहीं थी। बंसल साहब शराब तो दूर, लहसुन और प्याज़ तक न छूते थे। हालाँकि व्यापार की भाग-दौड़ के कारण अब उनका शाखा जाना छूट चुका था, मगर वोट वे बाकायदगी से भा.ज.पा. ही को देते और मंगल-शनि को निष्ठापूर्वक हनुमान मन्दिर जा कर प्रसाद चढ़ाते थे।
     पहले-पहल नन्दू जी को बंसल साहब की इस धार्मिक निष्ठा से बड़ी कोफ़्त हुई थी। ख़ास तौर पर जब घड़ी के अलार्म की-सी नियमबद्धता से सुबह के पाँच बजे ही से ‘ओम जै जगदीश हरे,’ ‘गायत्री मन्त्र,’ ‘दुर्गा सप्तशती’ या फिर हरि ओम शरण या नरेन्द्र चंचल के किसी कैसेट की ऊँची, बेसुरी और नींद-भगाऊ आवाज़ पूरी बिल्डिंग में गूँजने लगती।
० 
दरअसल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के असली महत्व को सबसे पहले कैसेट बनाने वाली कम्पनियों ने पहचाना था। उन्होंने शास्त्रीय संगीत के प्रेमियों को, जो किसी बड़े आयोजन में मँहगे टिकट ख़रीद कर, भीमसेन जोशी, रविशंकर या किशोरी अमोनकर को सुनने की औक़ात न रखते थे, घर-बैठे संगीत-लाभ करने की सुविधा हासिल करा दी थी। लेकिन यह तो श्रोताओं का एक सीमित वर्ग था। कैसेट कम्पनियों की असली कमाई फ़िल्मी गीतों और उससे भी ज़्यादा धार्मिक कैसेटों की बिक्री से होती, जिन्हें अपने टू-इन-वन पर लगा कर आम मध्यवर्गीय परिवार बड़े आराम से अपना इहलोक और परलोक सुधार सकते थे। 
बंसल जी के घर की पृष्ठभूमि में भी समय के हिसाब से ‘गायत्री मन्त्र’ या फिर ‘जुम्मा चुम्मा दे दे’ के स्वर गूँजते रहते और सामने दिन-चर्या के विभिन्न कार्य-व्यापार सम्पन्न होते रहते, जिनमें नहा-धो कर आले में रखी देवी-देवताओं की मूर्तियों के आगे अगरबत्ती जलाने से ले कर कपड़े धोने, दाल छौंकने और दोपहर के अवकाश में बड़ी तोड़ने की विविध-रूपी गतिविधियाँ शामिल थीं । 
     नीचे के वर्मा जी स्टेट बैंक में चीफ़ अकाउण्टेण्ट होने के बावजूद उसी धर्म-परायण फ़िल्म-प्रेमी मध्यवर्गीय बिरादरी के सदस्य थे, जिनमें बसंल जी और उनके परिवार का शुमार होता था, इसलिए उन्हें इस सारी चिल्ल-पों से कोई ख़ास एतराज़ नहीं था। मुश्किल नन्दू जी की थी, जो कभी-कभी आई.आई.सी., इण्डिया हैबिटैट सेंटर या त्रिवेणी सभागार के किसी लोकार्पण समारोह से थके-थकाये लौटते और अगले दिन कुछ देर तक सो कर पिछले दिन की थकान या रम की ख़ुमारी दूर करना चाहते, जिसके वे, मन को समझा कर ‘रसरंजन’ की दहलीज़ लाँघने के बावजूद, अभी तक अभ्यस्त नहीं हो पाये थे। कभी-कभी उनके जी में आता कि वे ध्वनि-प्रदूषण के बारे में बंसल साहब का ज्ञान-वर्धन करें। मगर फिर उन्होंने सामाजिक सीढि़याँ चढ़ने के अनुष्ठान में इस शोर-शराबे को एक अनिवार्य बुराई मान कर चुप लगा जाना ही श्रेयस्कर समझा था। 
     उन्होंने इस बात को भी नज़रन्दाज़ कर दिया था कि बंसल साहब ने फ़्लैट देते समय किसी सी.बी.आई. अधिकारी की तरह उनकी जाँच-पड़ताल की थी और आमदनी से ले कर घर-परिवार की पूरी जानकारी लेने के बाद इस बात पर सन्तोष व्यक्त किया था कि वे शादी-शुदा होने के साथ-साथ जसरा के शाण्डिल्य गोत्रीय तिवारी हैं।
     ‘भले मानसों का महल्ला है जी,’ उन्होंने कहा था, ‘यहाँ माँस-मदिरा का क्या काम होवे ? हम तो लस्सन-प्याज़ तक ना छूत्ते। फिर आप तो बामण ठैरे। आपको तो यूँ भी इन तामसी वस्तुओं से क्या लेना-देना जी।’
यह बात दीगर है कि बंसल साहब ने किराये में पचास रुपये कम करना भी स्वीकार न किया था और ऊपर से तमाम तरह की पाबन्दियाँ लगा दी थीं। पाबन्दियों का दायरा खान-पान और धरम-करम तक ही सीमित न था, बल्कि उसमें बिजली-पानी और आने-जाने वालों को भी समेट लिया गया था। बिजली का तो ख़ैर, सब-मीटर लगा था, लेकिन तीसरी मंज़िल के उस बरसाती-नुमा फ़्लैट में पानी तभी चढ़ता, जब बंसल साहब नीचे मोटर चालू करते। 
     शुरू-शुरू के दिनों में, जब एक बार नन्दू जी को उठने में देर हो गयी थी और बंसल साहब घड़ी देख कर आध घण्टा मोटर चालू करके बन्द कर चुके थे, तब दोबारा मोटर चालू करने के अनुरोध को स्वीकार करते हुए उन्होंने दो-टूक लहजे में यह स्पष्ट कर दिया  कि ऐसा वे अपवाद-स्वरूप ही कर रहे हैं। नन्दू जी को उसी शाम सारा काम छोड़ कर प्लास्टिक का एक बड़ा ड्रम लाना पड़ा था, जिसने पहले से घिरे हुए उनके छोटे-से ग़ुसलखाने की सारी व्यवस्था दरहम-बरहम कर दी थी। 
     इसी तरह एक इतवार को जब नन्दू जी के पुराने अख़बार वाले दिनों का एक साथी, फ़रहान अख़्तर, जो राष्ट्रीय सहारा के उर्दू संस्करण में उप-सम्पादक था और अपने गोरे, क्लीन-शेव्ड, सुते हुए चेहरे के कारण कश्मीरियों जैसा लगता था, उनके नये फ़्लैट को देखने आया था तो बंसल साहब ने उसे तीसरी मंज़िल की तरफ़ निर्देशित करते हुए ऐसी सन्देह-भरी नज़रों से देखा था, मानो वह एक प्रतिष्ठित दैनिक का पत्रकार न हो कर आई.एस.आई. का एजेण्ट हो। 
     कई बार नन्दू जी को लगता कि वे कुसुम विहार के खुले, आज़ाद मैदान से अदृश्य सलाख़ों वाले किसी कटघरे में आ फंसे हैं। पर धीरे-धीरे उन्होंने यह सोच कर इस कटघरे से समझौता कर लिया था कि उन्हें ज़िन्दगी भर थोड़े ही यहाँ रहना है, यह तो दक्षिण दिल्ली की उन्मुक्त फ़िज़ा की राह में एक पड़ाव भर है।
चूँकि मकान मालिक के पास एक सेकेण्ड हैण्ड मारुति कार थी, जिसे वह मकान के बाहर गली में खड़ा करता था, इसलिए फाटक के अन्दर सीढि़यों के पास की खुली जगह में मकान मालिक के बेटे की मोपेड और वर्मा जी की हीरो हॉण्डा के साथ अपना स्कूटर भी खड़ा करने की सुविधा नन्दू जी को मिली हुई थी। गो, ऐसा करने में उन्हें रोज़ जो पापड़ बेलने पड़ते, वे उन्हें स्कूटर ही से विरत करने को काफ़ी थे। लेकिन इस तकलीफ़ को भी उन्होंने उन्नति की कठिन राह की सामान्य मुश्किलों के खाते में डाल रखा था। 
     लिहाज़ा, महीने के इस आख़िरी शनिवार को भी उन्हांने सर्कस के नट की-सी कुशलता से अपना बजाज स्कूटर, मोपेड और हीरो हॉण्डा को छूने से बचाते हुए, सीढि़यों के पास खड़ा करके उसके हैण्डल को लॉक किया था। और फिर, हालाँकि बंसल साहब रात के दस बजे ही फाटक में ताला जड़ देते थे, जिससे स्कूटर चोरी होने का कोई ख़तरा न था, नन्दू जी ने अपनी स्वभावगत सावधानी से काम लेते हुए स्कूटर के स्टैण्ड में ख़ास तौर से लगवाये गये ताले में भी चाभी लगायी थी, हेल्मेट को एहतियात से बग़ल में दबाया था और हर तरह से इतमीनान करके ऊपर पहुँचे थे।

Tuesday, September 2, 2014

हिचकी

हिचकी

इरफ़ान और आर.चेतन क्रान्ति के लिए
वही ख़ू है तुम्हारी भी रगों में और मेरी भी’

एक

वह महीने का आख़िरी शनिवार था, जब नन्दू जी को अचानक हिचकियाँ आना शुरू हुईं। 
नन्दू जी हस्बमामूल दफ़्तर से फ़ारिग़ होने के बाद शाम के सात बजे के क़रीब, हाल ही में ख़रीदे अपने बजाज स्कूटर पर घर पहुँचे थे। यह घर दो छोटे-छोटे कमरों का एक ऐसा फ़्लैट था, जो दिल्ली के यमुना पार के इलाक़े की लगभग हर मध्यवर्गीय बस्ती में ग्यारह महीने की लीज़ और आदमी से एक दर्जा नीचे रहने की शर्त स्वीकार करने पर मिल जाता है। नन्दू जी दो-तीन महीने पहले ही इस फ़्लैट में आये थे, जब उन्हें अपनी दूसरी नौकरी में पहली तरक़्क़ी  मिली थी। फ़्लैट तीसरी मंज़िल पर था। दूसरी मंज़िल पर तीन कमरों वाले बड़े फ़्लैट में वर्मा जी रहते थे, जो स्टेट बैंक में चीफ़ अकाउण्टेण्ट थे, और नीचे के सारे हिस्से में मकान मालिक श्री सूरजप्रकाश बंसल अपने परिवार सहित डटे हुए थे।
इस फ़्लैट में आने से पहले नन्दू जी दिल्ली-ग़ाज़ियाबाद बॉर्डर पर चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों के लिए बनायी गयी एक कॉलोनी, कुसुम विहार में रहते थे। यह उन दिनों की बात है, जब वे एक दैनिक समाचार-पत्र के सम्पादकीय विभाग में काम करते हुए, दिल्ली नामक इस विराट शरणार्थी शिविर में किसी तरह पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे। 
चूँकि यह समाचार-पत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकलने के बावजूद नन्दू जी ही की तरह दिनों-दिन तरक़्क़ी की मंज़िलें तय कर रहा था, इसलिए नन्दू जी को वे सारी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं, जो पुराने पूँजीपति घरानों से निकलने वाले अख़बारों के पत्रकारों को उपलब्ध होती हैं। लिहाज़ा अख़बार और नन्दू जी, दोनों ही का कशमकश से सीधा सामना था। अख़बार के मालिक सहज वणिक बुद्धि से इस मुहिम में जुटे थे, जबकि नन्दू जी तीसरी धारा की वामपन्थी पार्टी से प्राप्त ज्ञान और अनुभवों से काम लेते हुए इस कशमकश को वर्ग-संघर्ष का अनिवार्य परिणाम मान कर मन को समझा लिया करते थे।
मगर जैसे ही नन्दू जी को एक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान के सम्पादकीय विभाग में नौकरी मिली थी और पत्रकारों की ऊबाऊ और काइयाँ बिरादरी की बजाय उनका सम्पर्क लेखकों-कलाकारों की चकाचौंध-भरी आकर्षक दुनिया से हुआ था, उन्हें दिल्ली-ग़ाज़ियाबाद बॉर्डर पर चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की कॉलोनी वाला फ़्लैट आउटर मंगोलिया के किसी दूरस्थ और दुर्गम गाँव की चौकी जैसा जान पड़ने लगा था। 
हालाँकि अख़बार की नौकरी के दौरान भी नन्दू जी का ज़्यादातर वक़्त प्रूफ़ पढ़ने और अनुवाद करने या सुधारने में ही गुज़रता था, मगर इस प्रकाशन संस्थान में आने के बाद वे ख़ुद को तसल्ली दे सकते थे कि वे जिन पुस्तकों के प्रूफ़ पढ़ रहे हैं, अनुवाद सुधार रहे हैं या फिर छपाई वग़ैरह की देख-भाल कर रहे हैं, वे अख़बार की तरह अगले ही दिन किसी रद्दी वाले कबाड़ी या लिफ़ाफ़े बनाने वाले के हाथ लगने की बजाय देश के किसी प्रतिष्ठित पुस्तकालय की शोभा बढ़ायेंगी। 
हाल ही में दिल्ली के इस जाने-माने प्रकाशन संस्थान ने बदलते हुए समय का साथ निभाने की ख़ातिर बरसों से चले आ रहे पुराने और आज़माये हुए ढर्रे में कुछ बुनियादी परिवर्तन किये थे। सबसे पहले तो अंग्रेज़ी और अन्य विदेशी भाषाओं की चर्चित कृतियों से हिन्दी के पाठकों को परिचित कराने का महत कार्य शुरू किया था और अंग्रेज़ी की अनेक बेस्ट-सेलर किताबों के सिलसिले में अनुबन्ध कर डाले थे। 
प्रकाशन के कार्यालय में अब भगवतीचरण वर्मा, हज़ारीप्रसाद द्विवेदी, अमृतलाल नागर, मोहन राकेश और फणीश्वरनाथ रेणु की जगह अचानक शोभा डे, विक्रम सेठ, सलमान रुश्दी, सुधीर कक्कड़, स्टीफ़न हॉकिंग और ख़ुशवन्त सिंह के नाम सुनायी देने लगे थे। अक्सर प्रकाशन संस्थान के मैनेजिंग डायरेक्टर के कक्ष में प्रतिष्ठित अथवा उदीयमान लेखकों की जगह ऐसे लेखकों का जमावड़ा दिखाई देने लगा जो लेखन में पर्याप्त हाथ-पैर मारने के बाद अब अपनी प्रतिभा अपने अनुवादों के सहारे मनवाने की जुगत में थे। 
प्रकाशन संस्थान वैसे तो एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी था और प्राइवेट  लिमिटेड कम्पनियों के तर्क से कई मालिकों को आते-जाते देख चुका था। लेकिन अब उसकी बागडोर एक ऐसे अपेक्षाकृत युवा व्यापारी के हाथ में थी, जिसने व्यापार के पाठ नेहरू-युगीन मिश्रित अर्थ-व्यवस्था में नहीं, बल्कि उनके सुयोग्य नाती द्वारा प्रचारित आर्थिक उदारीकरण और मुक्त व्यापार के युग में पढ़े थे। नतीजे के तौर पर जब इस प्रकाशन संस्थान के पुराने मालिकों ने, जो उसके प्रेस और भव्य शो-रूम की पगड़ी बड़े इत्मीनान से पहले ही डकार चुके थे, हवा के बदलते रुख़ को भांप कर समय रहते अवकाश ग्रहण करने की सोची थी तो हरीश अग्रवाल ने - कि यही नये मैनेजिंग डायरेक्टर का नाम था - ज़्यादातर शेयर अपने और अपने परिवार के विभिन्न सदस्यों के नाम ख़रीद कर उसे फिर से एक इजारेदारी में तब्दील कर दिया था। 
अपनी पुश्तैनी व्यापाराना सूझ-बूझ के चलते हरीश अग्रवाल जानता था कि इजारेदारी ही उदारीकरण और मुक्त व्यापार का आधार है, और उसका अनिवार्य लक्ष्य भी। इसलिए उसने अंग्रेज़ी के चालू चर्चित साहित्य के बढ़ते हुए वर्चस्व के साथ-साथ राजनीतिक व्यक्तित्वों की महत्वाकांक्षाओं को भी पहचाना था, जो बदलती फ़िज़ा में अपनी राजनीतिक जोड़-तोड़ के दौरान व्यक्त किये गये सूत्रों और आप्त-वाक्यों को गाँधी-नेहरू-लोहिया वांग्मय की क़तार में शामिल कराने के इच्छुक थे। 
नेताओं की इस इच्छा को पूरा करने और सरकारी ख़रीदों में अपनी पुस्तकों को शामिल कराने के परस्पर उपयोगी उद्देश्य से हरीश अग्रवाल ने एक तेज़-तर्रार पत्रकार, हेरम्ब त्रिपाठी, की सेवाएँ प्राप्त की थीं, जो बढ़ते हुए गंजेपन और वज़न की वजह से अब वरिष्ठों की कोटि में आने-आने को था। 
युवावस्था में, इस दौर के अनेक युवकों की तरह, इस पत्रकार ने भी क्रान्ति के सपने देखे थे और हथियारबन्द क्रान्ति का एक चर्चित लेखा-जोखा भी प्रस्तुत किया था, मगर वास्तविकता को पहचान कर उसने जल्द ही स्वप्न-मुक्त हो, एक परिचित मुख्यमन्त्री से भारी अनुदान लेने के बाद एक राजनीति प्रधान मासिक पत्रिका निकाली थी। पत्रिका तो कुछ ही महीने चली, पर अपनी विफलता की एवज़ में पत्रकार को एक मकान और मारुति कार अलबत्ता उपलब्ध करा गयी। 
पत्रकार का काम अब पुराने क्रान्तिकारी साथियों को बुरा-भला कहने और नये सम्पर्क सूत्र साधने तक सीमित था। चूँकि अब वह सारे पुराने सपनों को तिलांजलि दे चुका था, लिहाज़ा उसके लिए राजनीति एक ऐसा शयन-कक्ष थी, जहाँ किसी भी विचार या दल के नेता के साथ हमबिस्तरी की जा सकती थी। बशर्ते कि इसकी वाजिब क़ीमत मिलती रहे। 
हरीश अग्रवाल की ज़रूरत और नेताओं की हसरत को पहचान कर पत्रकार ने पुस्तकों की एक श्रृंखला का ख़ाका बनाया था जिसमें एक-एक पुस्तक एक-एक नेता के व्यक्तित्व पर केन्द्रित होने वाली थी। देखते-ही-देखते प्रकाशन संस्थान की डाक में आने वाले ऐसे लिफ़ाफ़ों की तादाद बेतहाशा बढ़ गयी जिन पर राज्य सभा या लोकसभा के तीन शेरों वाले चिन्ह अंकित होते या प्रान्तीय सरकारों के राज चिन्ह।
हवा के बदलते रुख़ को प्रकाशन संस्थान के मालिक ही ने नहीं पहचाना था। कुछ पुराने साहित्य-सेवी भी थे, जो जैसी बहे बयार पीठ तब तासी दीजे की उक्ति के अनुभवजनित सत्य को पहचानते थे। इनमें से कुछ को  - जो पुराने मालिकों के भी ख़ैर-ख़्वाह रहे थे - हरीश अग्रवाल ने विरासत में प्राप्त किया था और उनकी प्रयोग-सिद्ध उपयोगिता को पहचान कर उनके अनुभवों से फ़ायदा उठाने का फ़ैसला किया था। 
इन्हीं पुराने हितचिन्तकों में एक, जो बहुत-से विश्वविद्यालयों को एक-एक करके सुशोभित करते हुए अन्ततः राजधानी के एक अति-प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान में आ टिके थे, लम्बे अर्से से प्रकाशन संस्थान के सलाहकार बने हुए थे और किसी राजनीतिज्ञ की-सी चतुराई से अपने साम्राज्य का विकास और विस्तार करने के लिए प्रकाशन संस्थान का उपयोग करते आ रहे थे। 
चूँकि वे अवकाश ग्रहण करने के बाद भी अनेक केन्द्रीय और प्रान्तीय पाठ्य-क्रम और पुरस्कार समितियों में कहीं सदस्य, कहीं संयोजक और कहीं अध्यक्ष की हैसियत से मौजूद थे, इसलिए हरीश अग्रवाल ने उन्हें उसी प्रकार सिर-आँखों पर लिया था, जैसे धनी-धोरियों की नयी पीढ़ी पुश्तैनी हवेली को, उसकी ‘एथनिक’ साज-सज्जा में आधुनिक साधनों का समावेश करके बनाये रखती है। 
आचार्य प्रवर भी, अपनी देसी धज के बावजूद, देशी-विदेशी पुराने और आधुनिक साहित्य से परिचित थे, अपूर्व वक्ता थे और ‘तन्त्री नाद कबित्त रस सरस राग रति रंग’ के अपने पाठ में ‘सरस’ का अभिप्राय ‘सुरा’ से लगाते हुए सायंकालीन रस-रंजन गोष्ठियों को अपनी उपस्थिति और वक्तृता से धन्य करते रहते थे। एक ओर वे पाठ्य-क्रमों में पुस्तकें स्वीकृत कराने की दृष्टि से उपयोगी थे, दूसरी ओर पुरस्कारों के माध्यम से प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित कृतियों को प्रतिष्ठा दिलाने की दृष्टि से और तीसरी ओर पारम्परिक और आधुनिक ख़ेमों को एक ही समय में साधे रखने के लिए।
ज़ाहिर है, इन बहुरंगी, बहुविध हलचलों का साथ देने के लिए प्रकाशन संस्थान को अपनी समूची कार्य-शैली बदलनी पड़ी थी। चूँकि प्रकाशन संस्थान के पुराने मालिक भव्य नये शो रूम की पगड़ी को बेच कर उसकी ‘अतिरिक्त आय’ पहले ही ख़ुर्द-बुर्द कर चुके थे, इसलिए हरीश अग्रवाल के हाथ प्रतिष्ठा और पुस्तकों के स्टॉक से अलावा प्रकाशन संस्थान का पुराना कार्यालय ही लगा था, जो उसी बिल्डिंग के पिछवाड़े की तंग गली में पहली मंज़िल के चार छोटे-छोटे कमरों में बेतरतीबी से फैला हुआ था। गली में मोटरों की मरम्मत और रँगाई के बहुत-से मिस्त्रियों की दुकानें थीं। हर वक़्त गली में स्प्रे पेंट और स्पिरिट की तेज़ महक बसी रहती और हवा में मिस्त्रियों की ठेठ गालियाँ। 
गली का तो ख़ैर हरीश अग्रवाल कुछ नहीं कर सकता था, मगर कार्यालय को उसने आधुनिक ढंग से सुसज्जित करके छोटे-छोटे कैबिन बनवा दिये थे। कार्यालय के अन्दर बीड़ी-सिगरेट पीना बन्द करवा दिया था। दिन में दो बार चाय की व्यवस्था करा दी थी ताकि कर्मचारी चाय के बहाने मटरगश्ती करने से बाज़ आयें। अपने कैबिन में उसने आदमक़द काँच का दरवाज़ा और काँच ही के पैनल लगवाये थे कि वह कर्मचारियों पर नज़र रख सके। हालाँकि कार्यालय ऐसा था कि एक कमरे में कही गयी बात बख़ूबी दूसरे कमरे में सुनायी देती थी, तो भी उसने इण्टरकॉम की व्यवस्था करके एक रिसेप्शनिस्ट बैठा दी थी, जो सीढि़याँ चढ़ कर ऊपर आते व्यक्ति को दहलीज़ ही से नज़र आती।
कार्य-शैली का यह परिवर्तन नयी पुस्तकों के प्रचार-प्रसार में सबसे पहले लक्षित हुआ। छोटे-छोटे सभागारों और साहित्यिक-सामाजिक संस्थाओं के भवनों में पुस्तकों के विमोचन की पुरानी परम्परा को त्याग कर प्रकाशन संस्थान ने राजधानी के कुछ हाई-फ़ाई  सांस्कृतिक क्लबों में भव्य और दिव्य ‘लोकार्पण समारोहों’ की लीक पकड़ ली थी, जहाँ लोकार्पण के बाद आयोजित चाय-पान में चाय को छोड़ कर भाँति-भाँति के पेय-पदार्थ पेश किये जाते। 
इसी के साथ प्रकाशन संस्थान के मालिक ने यह भी बख़ूबी समझ लिया था कि मौजूदा दौर में आवरण ही अन्तर्वस्तु है। लिहाज़ा प्रकाशन संस्थान में एक नया विभाग बनाया गया, जो पुस्तकों के कलेवर को हर तरह से नये युग के अनुरूप बनाने में पूरी एकाग्रता से जुट सके। तीन-चार नये कम्प्यूटर लगाये गये, पुस्तकों के कवर डिज़ाइनों को आकर्षक बनाने के लिए उन्हें इसी विभाग के सुपुर्द कर दिया गया। एक कुशल बेरोज़गार युवा-कवि को, जो कुछ दिनों तक पत्रकारिता की ख़ाक छानने और उसके ताल-तिकड़म से मेल न बैठा पाने के कारण बेकार था, पाण्डुलिपियाँ सँवारने, प्रूफ़ पढ़ने और छपाई का काम-काज सँभालने के लिए रख लिया गया। 
कुछ ही महीनों में इस युवक की ख़ामियाँ हरीश अग्रवाल के सामने उजागर हो गयीं। वह काम तो पूरी निष्ठा से और कुशलतापूर्वक करता था, लेकिन उसका ढर्रा अब भी उन्हीं आदर्शवादी युवकों का-सा था, जो नयी उम्र में भारी तादाद में वामपन्थी पार्टियों की तरफ़ आकृष्ट होते हैं और फिर ज़िन्दगी के थपेड़े झेलते हुए किसी-न-किसी हीले से जा लगते हैं। के.विक्रम स्वामी किसी हीले से तो क्या जा लगता, यह नौकरी भी उसे अपने मित्रों के आग्रह पर स्वीकार करनी पड़ी थी, जो देख रहे थे कि पत्रकारिता के तिलिस्म को भेद पाने की विफलता उसे ज़रूरत से ज़्यादा तीखा और तल्ख़ बनाये दे रही थी। 
यह कड़वाहट तो नौकरी के बाद कुछ मन्द हो चली थी, लेकिन पाण्डुलिपियों की प्रेस-कॉपी तैयार करने या उनके प्रूफ़ पढ़ने के दौरान जब स्वामी का साबक़ा दिल्ली घराने के लेखकों से पड़ता तो यह कड़वाहट कभी-कभी उभर आती और लेखकों ही को नहीं, हरीश अग्रवाल को भी अस्वस्ति से भर जाती, जो कड़वे-से-कड़वे सच को गोल-मोल लफ़्ज़ों के शीरे में लपेट कर परोसने का हामी था। 
फिर, स्वामी के पास अक्सर उसके पुराने कॉमरेड आते रहते और वह कुछ देर के लिए गली में बाहर निकल कर उनके साथ चाय पीते हुए बीड़ी के कश लगाया करता, क्योंकि कार्यालय में तो किसी भी प्रकार के धूम्रपान की सख़्त मनाही थी। एक दिन हरीश ने उसे बीड़ी फूंकते देख लिया था और उसे एक झटका-सा लगा था कि कहीं उसने आदमी चुनने में भूल तो नहीं कर दी। लेकिन स्वामी अपने काम में इतना माहिर था और ढब के लोग इतनी मुश्किल से मिलते थे कि हरीश अग्रवाल ने धीरज से काम लेते हुए फ़ैसला किया था कि देर-सबेर वह एक ‘क़ायदे का आदमी’ इस विभाग में ला बिठायेगा। 
‘क़ायदे का आदमी’ से उसका मतलब ऐसे आदमी से था, जो पुस्तकों की छपाई वग़ैरह भी करा सके और उनके प्रचार-प्रसार अभियान में भी उसकी सहायता कर सके और सबसे बड़ी बात - प्राचीन भृत्यों की तरह हर प्रकार से और पूरी तरह अनुगत हो । नन्दू जी की नियुक्ति इसी विभाग में हुई थी और हालाँकि वे स्वामी से साल भर बाद इस प्रकाशन संस्थान में आये थे और पार्टी के मुखपत्र में स्वामी के बराबर के सहयोगी रहे थे, तो भी उन्हें स्वामी से ढाई गुना ज़्यादा तन्ख़्वाह पर लाया गया था। कारण बिलकुल सीधा था। स्वामी पार्टी के मुखपत्र से अलग होने के बाद कहीं फ़िट नहीं हो पाया था, जबकि नन्दू जी के साथ दैनिक समाचार-पत्र का  तजरुबा, घिसाई और ग्लैमर जुड़ा हुआ था। 
नन्दू जी ने जल्द ही इस नये माहौल में ख़ुद को ढाल लिया था और इस नाते कुछ तो अपने काम के तक़ाज़े से और इस से अधिक साहित्य-संस्कृति के चकाचौंध-भरे जगत में प्रवेश करने की ललक के चलते वे बीच-बीच में प्रकाशन संस्थान द्वारा आयोजित भव्य और दिव्य पार्टियों में जाने लगे थे और लेखकों-कलाकारों का सान्निध्य प्राप्त करने लगे थे। अभी उन्होंने ‘रसरंजन’ की दहलीज़ तो नहीं पार की थी, पर वे उसके काफ़ी क़रीब आ चुके थे। 
प्रकट ही, उन्हें यह बताते हुए बड़ी शर्मिन्दगी महसूस होती कि वे कहाँ रहते थे। इसीलिए जब एक पार्टी में सगुन राजगढि़या ने, जो एक जाने-माने कथाकार की तीस बरस छोटी, दूसरी पत्नी थीं और ख़ुद भी कविताएँ लिखती थीं, रम की चुस्की ले कर, अपनी बड़ी-बड़ी काजल-डली आँखें नचाते हुए हरीश अग्रवाल से कहा था - ‘हरीश जी, नन्दू को कहीं नज़दीक ही घर दिलवाइए न, ताकि कभी अगर इनसे कुछ डिस्कस करने का मन हो तो हम इनके घर भी जा सकें’ - तो नन्दू जी ने फ़ैसला कर लिया था कि वे अपने नाम के नीचे दक्षिण दिल्ली का कोई क़ाबिले-ज़िक्र पता दर्ज करवा के ही रहेंगे। 
लेकिन दिल्ली के भौगोलिक अर्थशास्त्र के हिसाब से कुसुम विहार अगर आउटर मंगोलिया का दूरस्थ और दुर्गम गाँव था तो दक्षिण दिल्ली का इलाक़ा न्यूयॉर्क के मैनहैटन आइलैण्ड का स्वप्नलोक। इसलिए फ़िलहाल इस अभियान के पहले चरण में नन्दू जी ने आई.टी.ओ. पुल की दहलीज़ की उस तरफ़, मगर प्रकाशन संस्थान और दक्षिण दिल्ली, दोनों के निस्बतन क़रीब आ जाने पर ही सन्तोष कर लिया था। दौड़-धूप करके और प्रकाशन संस्थान के अपने नये सहयोगियों की मदद से उन्होंने जमुना नदी के ठीक उस पार लक्ष्मी नगर के इलाक़े में इस फ़्लैट को खोज निकाला था और अपनी पिछली ज़िन्दगी को मानो पिछले अक़ीदों की तरह एकबारगी ख़ैरबाद कहते हुए इस फ़्लैट में उठ आये थे। 

Saturday, April 5, 2014

               भूमिका द्विवेदी की एक कहानी सभी कथा-प्रेमियों के लिए    
                 
                     रेड लाइट वर्सेज़ रेड लाइट एरिया


                    “दिमाग़ ख़राब हो जाता है स्साला हिसाब देते-देते .. अरे कैबिनेट की मिनिस्ट्री मिली है कि बनिये का बहीखाता खुल गया है ..जिसको देखो मू उठाये चला आता है ..दम मारने को भी स्साला जगै खोजनी पड़ती है .. चैन से जीने ही नहीं देते साले सब ...."
  कमरे में घुसते ही मंत्री जी बड़बड़ाने लगे।

मालविका शांति से बैठी कल हुए प्ले का रिव्यू पढ़ रही थी।
पहली बार भानु जी के साथ काम करने का मौका मिला था, देर रात एन.एस डी.से लौटी थी .
त्रिपाठी जी के बेकल स्वरों ने उसे बीच में ही उठा दिया।

  मालविका ने बोतल खोली, दो पैग बनाये .. एक बेहद लाइट, सोडा-भर गिलास में दो चम्मच रम और दूसरा ज्यादा ही हार्ड, गिलास भर रम में दो चम्मच सोडा।
रम जाने को कुछ तो चाहिये ना ..कहाँ रमे, आदमी नाम का प्राणी, इस हलाकान कर देने वाली बेतहाशा, दौड़ती-भागती दुनिया में ...
ज़हरीली, रेंगती-रिरियाती दुनिया में...
हर लम्हा हर रंग बदलती, घिघियाती, मिमियाती दुनिया में...
उसने चुपचाप दोनों गिलास टेबल पर रख दिए और मंत्री जी को देखने लगी।

   लकदक सफ़ेद कुर्ते के ऊपर पहना बुलेट-प्रूफ जैकेट उतार कर आलमारी में रखा राजशेखर त्रिपाठी जी ने, रिवॉल्वर भी वहीं रख दी। कुर्सी पर बैठते-बैठते  उनका अन्दर से उबला हुआ जी और गरमाया हुआ बेचैन जिस्म वाणी की शक्ल लेकर फिर सक्रिय हो गया,
                     
         "घर जाओ तो वो देहातिन चली आती है, टेसुए बहाती.. जब देखो झाओं-झाओं…
ये नहीं लाये, वो नहीं ख़रीदा .. इसका मुंडन, उसका जनेऊ .. ई नहीं दिया, ऊ नहीं पंहुचवाए.. ससुरी भेजा खा जाती है.. बाबूजी अलग सिर-दर्दी लिए हैं .. चउथा पेट्रोल-पम्प काहे हाथ से जाने दिए ..  तीन से पेट नहीं भरा उनका… उनके साढू के नाती के बियाह में देना है उन्हें …सी एम की भतीजी से तय कर आये हैं लपक के। तब तो मसविरा नहीं किये थे हमसे। अब काहे उम्मीद कर रहे हैं।“
   राजशेखर एक-दो घूँट हलक़ में ढनगाने को रुका दम भर के लिए, तत्क्षण उसने अपनी चिर-परिचित रौ फ़िर से पकड़ ली :
       “और वो चूतिया, दुई बार पार्टी छोड़ के भग गया था। अब भगोड़े के रिस्तेदार कहलायेंगे हम्म। बीस साल से पार्टी की सेवा कर रहे हैं हम, और रसमलाई चाटेगा वो मिसरवा की दुम्म्म। अरे सादी-बियाह में पेट्रोल-पम्प काहे भिड़ा दिए बाबूजी। टिकट तो जित्ते कहें हम बिछा दें उनके चरणों में…..ऊ चिन्दी-चोरों के न्योछावर में उड़ाये, चाहे नातेदारों के बीच हवा बनाये। हमें कउनो दिक्कत नहीं। लेकिन जबरियन की  झाओं-झपड़  नहीं अच्छी लगती ….. मेरा अपना बस चले तो हाई कमान के दरवज्जे मूतने ना जाऊं, लेकिन बाबूजी रिरियाने भेज के ही दम लेंगे ...”

      त्रिपाठी जी को कैबिनेट में अभी-अभी जगह मिली थी, सांसद की कुर्सी तो वो बरसों से तोड़ रहे थे ।
वो लम्हा भर फिर से खामोश हुए, आवाज़ में नरमी उड़ेलते हुए बोले :

        "माल्नी आप काहे चुप्प हैं .... और  इत्ता दूर काहे खड़ी हैं हमसे ?
गुस्सा हैं का हमसे .. हम तनिष्क वाला सेट आडर कर दिए हैं, आपके लिए .. परसों होम-डिलेवरी हो जायेगा… ई लीजिये रसीद ..."
 
   अपने झक्कास सफ़ेद कुर्ते की जेब से उसने फ्रेश बड़ी-सी रसीद निकाली।
पहले तो टेबल पर, बोतल के बगल में रखनी चाही, लेकिन फिर हाथ में लिए-लिए ही बोले, "लीजिये, लीजिये माल्नी, रख लीजिये कही सँभाल के।"
 मालविका के बोल अब फूटे जो काफी देर से गिलास हाथ में लिए राजशेखर को देख रही थी,

     "अरे मंत्री जी, आप नाहक हमें पटाने की कोशिश क्यूँ करते हैं। हम तो पटे-पटाये हैं आपके। ये सब ड्रामा फ़ैलाने की क्या ज़रूरत है ... ये सेट-वेट आप अपनी घरवाली के लिए रख लीजिये.. मुझे नहीं चाहिए. वास्तव में नहीं चाहिए मुझे।"
 "क्यों नहीं चाहिए आपको .. हर लड़की को चाहिए , तो फिर आपको क्यों नहीं चाहिए.. ये तो हम आपके लिए इस्पेसल बनवाए हैं ."
  मालविका धीरे से राजशेखर की कुर्सी तक पँहुची, उसके चौड़े सीने पर सिर टिकाया, वही चन्दन का इत्र महका जो उसने राजशेखर को गिफ्ट में दिया था .. वो मुस्कुरा दी।
उसने उसके मजबूत कंधे को ज़ोर से पकड़ा और बोली :
"त्रिपाठी जी, ये सब काहे के लिये … तुम हो ना बस्स.. कुछ  और की दरक़ार नहीं मुझे .. तुमसे दूर बहोत अकेली थी मैं, अब कुछ भी नहीं चाहिये मुझे ... सब कुछ है, जो तुम हो मेरे पास .. ये सबका बोझ ना चढ़ाओ मुझ पर .. "
   मालविका का लहजा ज़रा सा बदल गया .. उसने शरारती अंदाज़ में आगे कहा, “...और फिर तुम्हारा अपना वज़न कोई कम है क्या मुझ बिचारी पर चढ़ाने के लिए .."

राजशेखर ने गिलास रखा और बड़े आवेग, बड़े प्यार से, बड़े ही दुलार से मालविका को समेट लिया ..
करीब बीस मिनट तक दोनों ख़ामोश रहे।
फ़िर मालविका ने ही पूछा,
"खाना लगवा दूँ, या खाकर आये हैं प्रेसीडेंट-हाउस से .. आज तो मीटिंग थी ना कोई ?"
   "मै सोचता हूँ, तुम ना होतीं तो मेरी ज़िन्दगी का क्या होता .. यूँही बिना सुकून, बिना चैन-आराम के भटकता रहता दुनिया के फ़रेबी जंगल में।"
"जंगलराज में ही तो कुर्सी मिली है तुमको .. ऐक्चुअली तुम हो ही जंगल के राजा .. जंगल का राजा जंगल में नहीं फिरेगा तो और कहाँ है उसका ठिकाना .. "
राजशेखर मुस्कुराने लगा। उसने मालविका को और ज़ोर से जकड़ लिया। उसका सारा क्रोध, उसकी उलझनें, उसका शुद्ध यूपी वाला तेवर, उसका भाषा-प्रवाह, सब नियंत्रित हो गया अपने आप।

अब उसकी दारू की तलब भी जाती रही।
 "आपने खाना नहीं खाया होगा ना.. मै भी फोर्मेलिटी करके ही लौटा हूँ . चलिये आप साथ में खा लीजिये ....”
उसने उपेन्द्र को आवाज़ दी,
"खाना लगा दो, फुल्के सेंको, हम आ रहे हैं.. और सुनो कार में कुछ पिस्ते की बर्फ़ी रखी हैं, उसे लेते आना। " मन्त्री जी मालविका का टेस्ट खूब जानते हैं।

उपेन्द्र, राजशेखर का पुराना घरेलू नौकर था, और उसका सबसे पक्का राज़दार भी, ख़ास कर उसकी लौंडियाबाजी का .. यहाँ पासा पलट जाना उसकी अन्तरात्मा को सुहा नहीं रहा था, उसके ’दुधारू गाय’, मन्त्रीजी किसी एक के ही आंचल से काहे चिपके बैठे हैं, आगे बढ़ना भूल गये क्या।

वो देर से, कमरे के बाहर आदेश के इंतज़ार में बैठा था,फ़ौरन रसोई में दाख़िल हुआ
मालविका, राजशेखर के सीने में चेहरा छुपाये रही।
राजशेखर ने उसे उठाया,
“चलिये खा लीजिये, नहीं आप सो जाएँगी ...नौकर-चाकर भी आराम करेंगे।"


 सबेरा हुआ..
लाल सूरज ने सलामी दाग़ी, चिड़ियें चहचहाई, हवायें गुनगुनाईं।
बेसुध रात की, बेक़रार ख़ुमारी को जैसे अल-सुबह के मदमस्त सुरूर ने सीना ठोंक के चुनौती दी। राजशेखर ने ’लेमन-ग्रास’ कटवाई, महकती-सोंधी चाय खुद तैयार की अपनी बौद्धिक खूबसूरत शहज़ादी के लिये।

राजशेखर विद्यार्थी-जीवन से ही सबेरे उठने का आदी था।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय का पढ़ा था, सर सुन्दर लाल छात्रावास की छत प्राणायाम करता था।
रोज़ाना पाँच मील की दौड़ लगाता था।
उसका छह फुट दो इंच लम्बा-गोरा-सख्त बदन कसरती अंदाज़ से दमकता था।

सरकारी नौकरी में रहते हुए भी उसने अपना टाइम-टेबल नहीं बिगाड़ा था।

ना जाने उसे क्या सूझी के अपनी लगी-लगायी सरकारी नौकरी छोड़ दी, फिर अपने होम-टाउन से एम.एल.ए. हुआ। लेकिन सुबह की सैर पर ज़रूर निकलता था।
 अपने बॉडीगार्ड्स को भी उसने अपनी आदत के साँचे में ढाल लिया।
अब जब ‘शहरी विकास मन्त्रालय’ का दारोमदार उस पर आया तो भी वह अपनी आदतों से,
 अपनी जीवन-चर्या से कोई समझौता न कर सका।
वही पुरुषोचित गर्व से तना सिर , वही लुभावने अंदाज़ और एकदम वही मीठी बेहद विनम्र वाणी .. ।
वही झूमकर चलने वाली निराली-अदाबाज़ चाल, वही मस्ती, वही सम्मानित गुरूर भी।
  कुछ अगर बदला तो जीवन में दो अहम चीजें बदलीं, एक घर-खानदान की जबरदस्त अपेक्षायें बदल गईं, सच कहा जाये तो बदली नहीं बल्कि बहोत बढ़ गईं।
और दूसरी ... दूसरी उसके बिस्तर पर नई लेकिन एक ’स्थायी’ लड़की।
 ये नई लड़की मालविका मिश्रा, उसे यूँ ही एक दिन मिल गई ..... ।
ऐसी मिली की ना छोड़ते बनी, ना अपनाते। दो बड़े बच्चों का पिता लगभग आधी उमर की लड़की से  कैसे, किस मुँह से ब्याह रचाये ?
  खानदान-समाज-बिरादरी को क्या जवाब दे, बहनोई-भतीजों-भांजियो से कैसे, किस तरह आँख मिलाये?
बड़े सवाल थे, परेशान करने वाले प्रश्नचिन्ह थे .. ।
राजशेखर जिस परम्परावादी, मर्यादित और मान-सम्मान वाले परिवार से  वाबस्ता  था, वहाँ इस तरह की कोई भी चर्चा जलजला लाने से कम नहीं थी।

   लेकिन दूसरी कोई से भी उसका जी नहीं लगता, उसका पेट ही नहीं  भरता था।
कोई उबाऊ किस्म की, कोई अजब नखड़ीली, कोई गज़ब भड़कीली, कोई चलती-फिरती मेकअप की दुकान सी तो, कोई संत-साध्वी सी। कोई ऐसी चिपक गई थी के छुड़ाए नहीं छूट्ती, सिर पर पाप की तरह मढ़ी हुई।
  खूब हँसता था, मालिनी को बता-बताकर, किसी की काली-काली टांगें तो किसी  की मोटी तोंद, किसी की उल्लू-पंती की बातें, तो किसी की  झटुअल-बेहूदा कवितायें, किसी के चिरकुट एस.एम.एस. तो किसी की लीचड़ फोटुयें ….।

   वैसे तो  नेता जी से कोई प्रान्त, कोई रंग, कोई देस-भेस, कोई भी  ज़बान बोलने वाली, कोई जात-बिरादरी, कोई संस्कृति, कोई संस्कार का, बदन छूटा ना था चखने से।
कभी बाढ़-पीड़ितों की राहत-सामग्री का मुआयना  करने के बहाने, तो कभी सूखा ग्रस्त इलाकों के दौरे के बहाने, कभी विदेश-यात्रा में, तो कभी इलाज के नाम पर, घूम-घूम कर, ढूढ़-ढूढ़कर, झूम-झूम कर, उसने हर तरह के तन-बदन  का खूब भरपूर सेवन किया था, ….और तो और शोक-सभाओं और प्रार्थना-सभाओं में भी उसकी मौजूदगी उसकी तयशुदा रातों का ही सबब होती थीं।
लेकिन मालविका नाम की ’बूटी’ ने ऐसा क्या असर बरपाया कि मालविका के बाद उसे कोई और नहीं सुहा रहा था।
जबसे वो मालविका के फेर में पड़ा, उसका दिल कहीं रम ही नहीं पाया।
बल्कि ये कहना ज़्यादा सही होगा कि वो दोनों एक दूसरे में ही रमते थे.. ।
दोनों एक दूसरे के बिना बड़े बेचैन हो जाया करते थे, एक दूसरे से ही दोनों का जी खूब लगता था .. ।
मालविका की सोहबत बचपने से विलायती रही। उसके पितामह स्वीडन के प्रान्तीय-विश्वविद्यालय में ता-उम्र संस्कृत के प्राध्यापक रहे। बाप अमेरिकी महिला से ब्याह करके कैलिफोर्निया में नौकरीयाफ़्ता जीवन में अनुरक्त हुए। उसकी अपनी सगी माँ संस्कृत की विदुषी जानी जाती थी। उसने वृन्दावन के एक विधवाश्रम में अपनी बची जिंदगी के लिए रास्ते खोज लिए थे।
अब शेष रह गई थी, इकलौती औलाद मालविका।
उसे नियति ने आवारा फिरंगियो की बेलगाम-टोली का बेबाक सदस्य बनाया था।
जहाँ वो अपनी स्वछन्द ज़िन्दगी के दिन सिगरेट के उन्मुक्त धुएं में और मँहगी शराबों के निर्बाध प्रवाह में काफी हद तक बर्बाद कर रही थी।
धुएं के उस ग़ुबार में और प्रवाह की उस ख़ुमारी में, ना अतीत का कोई भी मातम था, और ना ही भविष्य की कैसी भी परवा।

राजशेखर का साथ मिलने से पहले इस रंग-रंगीले ब्रह्माण्ड का फेरा लगा कर हालिया ही लौटी थी। दिलजलों की बस्ती दिल्ली में, थियेटर के बहाने दिल  लगा रही थी।

मालविका को आत्मा से देसी-मिट्टी का चाव था।
विदेशी फूल चाहे जितने रंगीन हों, आकार-प्रकार-प्रजाति से जी को लुभाते हों, लेकिन ’देसी महक’ का मुक़ाबला नहीं कर सकते ।
यही मजबूत प्यारी देसी  महक मालविका को राजशेखर के दामन में, चौड़े सीने में, ऊँचे-विशाल कंधो के साथ-साथ, उसके घर-आंगन में  भी मिली थी .. ।
  इस सोंधेपन ने मालविका के तन-बदन-मन में एक सुरक्षित जगह बना ली और आत्मा में जगह बनाने के लिए राजशेखर का तृप्ति से आकंठ सिंचा हुआ मधुर-मादक-मदमस्त सुरीला प्रेम था।

राजशेखर का ये करीने से सजा आवास मालविका को उसके पैतृक घर की याद दिलाता था, जिसे उसे बहोत-बहोत लाड़-दुलार करने वाली उसकी दादी ने बसाया था।
 वही आत्मीयता  सोंधेपन से सराबोर घर, जहाँ गेंदे-रजनीगंधा-देसी गुलाब की लहकती क्यारियाँ थीं, रातरानी-इन्द्रबेला-जूही-चमेली की महकती बेलें थीं, चौखट पर मुस्कुराता लाल गुड़हल का पेड़ था, जो देवी-माँ को चढ़ता है, जिसकी पूरे नवरात्रि भर बड़ी डिमांड रहती थी .. अशोक का मस्ताना, झूमता पेड़ था, शिव लिंग पर चढ़ाया जाने वाला बेल-पत्र का वो काँटे वाला पेड़ भी था, जो बड़े गैराज की दीवार के पीछे मुस्तैदी से  सभी आने-जाने वालों पर दिन-रात नज़र रखता था, एक कुआं भी था, जिसके ठंडे पानी की बोरिंग बाबा ने पूजाघर तक करा रखी थी।  
जजेज़-कॉलोनी का फैला-पसरा मकान जिसमे मालविका ने अपना बचपन बिताया  था। बाबा का स्पेन से छुट्टियो में यहीं आने-जाने-रुकने का अपना का ठौर था।
काली गायें , घर का बना घी-रबड़ी,  मुनक्का और गाँव से आया ताज़ा देसी गुड़ ..... सब सब
रह-रह कर, एक-एक कर, तेज़ हवा में फड़फड़ाते पन्नों सा सामने से गुज़र जाता और वो लिपट-लिपट, महक-महक, चहक-चहक जाती थी, राजशेखर नाम की ’दिलफ़रोश फुलवारी’ के चहुँ-ओर।

मालविका एक थियेटर-ग्रुप की मामूली-सी कलाकार थी।
बनारस की गलियों से संसद-भवन के अव्वल-दर्जे नौटंकी-निर्माताओं तक अपने थियेटर-ग्रुप की प्रस्तुतियों के माध्यम से ही पँहुची थी। मालविका मिश्रा और राजशेखर  त्रिपाठी एक दिन एस. आर. सी. (श्री राम सेंटर) में हैमलेट की प्रस्तुति के दौरान एक साहित्यिक मित्र की मध्यस्थता से मिले थे।
राजशेखर  त्रिपाठी अपने मित्र की मित्रता का मान रखने को प्ले देखने आया था।
वरना तो लाल-बत्ती वाले फीता काटने और उद्घाटन-दीप जलाने ही आते थे, और बड़ा हाथ हिलाकर, नौटंकी भाँज कर चले जाते थे। निर्देशन की बारीकियों, कलाकारों के अभिनय-क्षमता का के कमाल या फ़िर मंच और लाइटिंग में रँग के उपयोग का महत्व से  भला इन सब ड्रामेबाजों का क्या वास्ता ?
यहाँ तो व्यवहार निभाना था, और बनावटी सत्कार की दरकार को छोड़कर आना था।
लेकिन मज़ा तो ये हुआ,वो कहीं और ही गिरिफ़्तार, बेक़रार हो गए थे .सच तो ये था,
 कि वो प्यार में पड़ गए थे।
पहले-पहल उन्होंने मालविका को बड़ी सम्मानित दृष्टि से नहीं देखा था।
क्योंकि छोटी जगहों पर, छोटे-कस्बों-शहरों में थियेटर को ही बड़ी सम्मानित दृष्टि से देखा ही नहीं जाता था।
राजशेखर त्रिपाठी, छोटे शहरों की छोटी मानसिकता से वो बाहर नहीं निकल पाया था। उसका मन-कर्म-वचन उसकी तुच्छ सोच की गवाही यदा-कदा देते रहते थे ..
छोटे-कस्बों-शहरों में थियेटर का कारोबार प्रायः वही लोग सँभालते थे, जिनका पढ़ाई-लिखाई में ज्यादा मन नहीं लगता था। और ऐसे लड़के-लडकियाँ तो ख़ास कर थियेटर में बहुतई उचकते थे, जिनका गली-मोहल्ले में कोई न कोई टांका भिड़ा हो .. ये लोग थियेटर के बहाने अपने-अपने दिलदारों से घंटों नैन-मटक्का करते थे।  देहात-कस्बों की लडकियाँ अपने इन थियेटर वाले 'लच्छनों' के चलते पर्याप्त बदनाम भी होतीं थीं।
   इसी तरह का  थियेटर-परिवेश जानता था। दिल्ली-मुंबई के हाई-प्रोफाइल और मँजे हुए स्तरीय थियेटर  से उसका राबेता अभी तक नहीं रहा था।
   अपनी उसी दकियानूसी और घटिया नज़रिये से थियेटर को देखा और बड़ी नाज़-ओ-अदा से  लपक कर, मालविका को 'स्पेशल डिनर' का न्योता भी दे आया था।
ये बड़ी विचित्र अजीब-ओ-गरीब पहली रात थी दोनों की।
एक दूसरे के साथ दोनों एक बहुत बड़े से अकेले कमरे में थे।
चाँदनी भी छिटक-छिटक कर ख़ूब सुनहरे गीत गा रही थी।
इस पूरे खुशनुमा प्रकरण में अजीब ये था के दो के दोनों एक दूसरे को "कुछ और ही" समझ कर मिले थे।
यदि  वे एक दूसरे की ज़मीनी वास्तविकता से परिचित होते तो यूँ तन्हाई में मिलना होता ही नहीं।
मालविका का ताज़ा ब्रेकअप उसके स्पेनिश प्रेमी निकोलस से हुआ था, खुद को बहला रही  कि उसी वक़्त राजशेखर महोदय टकराए थे।
यदि  हकीक़तों को जानते, तो निस्सन्देह आज एक दूसरे के सामने हर्गिज़ ना होते।

  मालविका ने समझा कोई थियेटर का सच्चा कद्रदान होगा।
तभी अदना-सी कलाकार को बड़ी भारी हैसियत से न्योता दे रहा था, अरे भाई पहली बार में ही शानदार लाल-बत्ती गाड़ी भिजवाई थी लिवाने के लिए।
उधर राजशेखर ने समझा, थोडा टेस्ट में बदलाव और तजुर्बे में इज़ाफा हो जायेगा और खूबसूरत-अदाबाज-संभ्रांत लड़की के साथ एक नई रात रंगीनी में बीत जाएगी।
राजशेखर  इतनी चापलूसी और सलीके से निमंत्रण देकर गया कि मालविका इस ज़रूरत से कहीं ज्यादा विनम्र प्रस्ताव को ना नहीं कह सकी थी।
वो ये समझ कर निकली थी, थियेटर के इतिहास पर विमर्श होगा, बड़े-बड़े सम्मानित कलाकारों के काम करने के अनुभव पर चर्चा होगी, एक सुन्दर-सभ्य-सलीकेदार डिनर के बाद वो अपनी पी.जी. समय से लौट आयेगी।

लेकिन वो रात कड़वी गोली जैसी थी, जिसे आत्मीयता और भ्रम के आकर्षक और मनमोहक वरक़ में लपेटकर राजशेखर ने मालविका को चखाने का एक असफल प्रयास किया था।
मालविका गुस्से से आगबबूला होकर दनदनाती हुई, आधी रात को हॉस्टल लौट आई थी।
अकेले बिस्तर पर पड़ी सोचती रही, "ये साले लाल-बत्ती वाले लड़की को इंसान कब समझेंगे .कलाकार, लेखक या कोई भी सर्जक कब समझेंगे ..  कितना कमीना निकला साला .. ब्राह्मण होकर भी इतना अधमी। उफ़्फ़, बेकार चली गई मैं। बड़ा थियेटर का भक्त बता रहा था खुद को .. दुष्ट . पाखंडी . बदतमीज़।"

और इधर राजशेखर तो एकदम ही झन्ना गया था। उसके पांव के नीचे से ज़मीन जैसे कि हिल गई हो।
‘ये क्या हुआ।’
 उसको तो कुछ समझ ही नहीं आया।
ना जाने कितनी रात कितनी लौंडियो के साथ बिताता रहा था, कितनी-कितनी सेवा करके, बहला-के-फुसला-के, अपनी-अपनी फीस लेकर जाती रहीं थीं। किसी ने पच्चीस तो किसी ने पचास ऐंठे थे।
किसी ने सरकारी नौकरी लगवाई, तो किसी ने प्रोमोशन करवाया, कोई अपने होमटाउन में ट्रान्सफ़र करवा गई।
किसी ने तगड़ा लैपटॉप झटक लिया तो किसी ने केवल मंहगा मोबाइल बदलवाया।
अब तो नारी-जागरण का ज़माना था, टिकट के लिए भी नारियाँ आती रहीं और नाड़े खुलवाती रहीं।

लेकिन ... लेकिन ये कौन आयी. ये कैसी लड़की आई ..?
चार गाली सुना कर, झटक-फटक कर चली भी गई।
अरे चूमा-चाटी तो दूर की बात हाथ तक नहीं लगाने दी।
ऐसी करारी गाली तो किसी औरत से आज तक नहीं खायी थी। सब ‘मंत्रीजी-मंत्रीजी’ करती फिरतीं थीं, ‘नेताजी-नेताजी’ करके सीने से लिपटाती फिरती थीं। आगे-पीछे डोलती थीं।
लेकिन ये हुआ क्या मेरे साथ ?’

राजशेखर यही सब सोचता रहा देर तक। फिर चार पैग चढ़ाये और झल्लाकर सो गया।
सुबह हाउस पँहुचना था। मॉनसून-सेशन चल रहा था।
उसका मन नहीं लग रहा था। बगल में बैठे शहाणे ने टेबल थपथपाया, तो उसने खुद को संसद के अन्दर बड़ा बेचैन पाया। लंच-ब्रेक में उसकी बेक़रार उंगलियों ने मालविका का नम्बर लगाया, जिसे मालविका ने उठाया ही नहीं।
देर रात गए राजशेखर ने फिर उसे फोन लगाया।
आँखे बंद किये मालविका मनोयोग से हेडफोन लगाये मेंहदी हसन साहब को सुन रही थी। सेल फोन की झनझनाहट से आँखे खोली और बड़ी लापरवाही से उसने फोन डिसकनेक्ट कर दिया।
मालविका प्रायः इसी मुद्रा में सोती आई है, और उस दिन भी ऐसे ही ग़ज़लों की गोद में सो गई।

 दूसरे दिन सवेरे कॉलेज में रिहर्सल के लिए जाते वक़्त उसने कपड़े बदले, उसे ख़याल आया कि उसका मैचिंग-स्कार्फ राजशेखर के बँगले में छूट गया है। गुस्से में दनदनाती हुई उठकर चली जो आयी थी.
निकोलस  ने गिफ्ट किया था, धर्मशाला से लाया था, सभी ड्रेस पर चलता था, कितना सुन्दर और यूनिक था,  हर रंग के साथ फबता था, मल्टी-कलर्ड जो था .. अब क्या, गया हाथ  से।
‘वो बेहया आदमी अब क्या लौटाएगा ! जाये भाड़ में रंडीबाज कहीं का !
दूसरा ले ही लूंगी कही से..एकदम वैसा मिलना मुश्किल है, फिर भी कोशिश करती हूँ सरोजिनीनगर या जनपथ में कहीं.. ।
मैंने सच में पाप किया उस कमीने के यहाँ जाकर ही !
कितना अनमोल स्कार्फ गंवा दिया, उफ़ !
बत्तमीज़ मंत्री कहीं का, हुँह !’
मालविका ने गुस्से में भुनभुनाते हुए नीली जीन्स की जगह काली जीन्स चढ़ायी, प्रिंटेड शॉर्ट-कुर्ते की जगह सफ़ेद चिकेन की हाफ शर्ट पहनी और काली-सफ़ेद स्कार्फ हाथ में लपेट कर कॉलेज की ओर निकल पड़ी।

  राजशेखर ने दोपहर बाद एक बार और आख़िरी उम्मीद लगाकर मालविका को फोन घुमाया, ये सोचकर कि, " आज भी नहीं उठाई, तो दोबारा नहीं ही करूँगा..बहोत देखी हैं इस जैसी नकचढ़ी, अरे एक गई तो सौ आएँगी और फिर इस साली की औक़ात ही क्या है, लेकिन घमंड तो देखो, आसमान चढ़कर बरसता है …बस्स ये आख़िरी कॉल है मेरी ..।”
ये राजशेखर का आख़िरी कॉल दोनों के ही जीवन में न सही तूफ़ान मगर, अंधड़ लाने वाला ज़रूर सिद्ध हुआ।
दोनों की जिंदगियो में ऐसा कोई हड़कंप तो नहीं मचा, लेकिन दोनों के ज़ेहन में पलने वाले बड़े-बड़े भ्रम ज़रूर टूट गए।
ठीक उसी तरह जैसे तूफान तो पूरा शहर ही उजाड़ डालता है लेकिन, अंधड़ केवल जमे हुए पक्के बड़े पेड़ों को जड़ से उखाड़ डालता है।
रिहर्सल के दौरान ये फोन-कॉल आयी थी, जब मालविका को अपने डायलॉग पर सरसरी निगाह डालकर मंच पर उतरना था।
उसने थोड़ी-सी लापरवाही से फोन रिसीव किया, कि शायद स्कार्फ लौटाने को मंत्री जी कॉल कर रहे हों।
वैसे भी किसी अनमोल चीज के लिए एक फोन रिसीव करना बड़ी क़ुरबानी नहीं थी
एक अत्यंत संक्षिप्त औपचारिक बातचीत में स्कार्फ लौटाना तय हुआ।
उसी शाम राजशेखर के पर्सनल-ड्राईवर ने मालविका को फोन किया कि वो अपने हॉस्टेल-गेट पर आकर अपना स्कार्फ ले ले …
वो गेट पर आयी तो पाया राजशेखर ख़ुद मिठाई का डिब्बा और सलीके से इस्त्री किया स्कार्फ लिए खड़ा है।
बिना लाग-लपेट के, बिना किसी भी औपचारिकता के, किसी भी कैसे भी अभिवादन के बगैर उसने झपटकर उसने अपना स्कार्फ ले लिया और पलटकर जाने लगी तो राजशेखर ने फ़ौरन रोका,
"सुनिए तो, ये मिठाई भी आपके लिए है। इसे भी ले लीजिये।"
"मिठाई किस लिए भला?" उसने नाक-भौं चढ़ाकर पूछा।
"आपको मीठा पसंद है ना, इसलिए भला," राजशेखर ने अपनी वाणी को चाशनी की कढ़ाही में डुबो कर निकाला।
"आइ डोन्ट वॉन्ट एनिथिंग एल्स, इक्सेप्ट माय स्कार्फ," मालविका लगभग गरज कर बोली।
"लेकिन सुनिए तो, त्यौहारों का सीज़न है आजकल, ऐसे ना नहीं कहते. देखिये किसी की कोई चीज़ खाली हाथ नहीं लौटाते। ये तो तमीज़ की भी बात हुई ना ?"

"ओहहोहोहोहो, तो तमीज़ जानते हैं आप ????
अर्रे वाआह !!! " मालविका ने भरपूर आँख नचाकर, खूब बुरी तरह भौं मटका कर गुस्से से तमतमा कर कहा।
राजशेखर के दिल में शायद एक तीखी छुरी पहले ही चुभी हुई थी, मालूम होता था वो छुरी आज और गहरी धँस गई है, गहरी उतर गई है।
वो उसे प्यार से देखता रहा और मुस्कुरा दिया; और ये तिलिस्मी मर्दाना मुस्कुराहट जिसके असंख्य/अनेकों अर्थ होते हैं, मालविका की तमतमाहट, उसके क्रोध को कुछ, ज़रा-सा हल्का कर गई।
"आप उस दिन बिना खाए, बिना विदा लिए ही लौट आयी थीं। नाराज़गी वश ना?"
"उस दिन की बात ना करें तो बेहतर होगा। ओकेA"
"आपका आदेश सर माथे पर।" राजशेखर मुस्कुराता रहा, जवाब देता रहा।
"ये नाराज़गी वश अच्छा यूसेज़ है, शुद्ध हिंदी के साथ उर्दू भीA नाईसA" मालविका के स्वर कुछ सामान्य हुए।
"देखिये उस दिन की बात ना करने का फ़रमान मिला है मुझे, क्या मै आज की बात कर सकता हूँ?"
"कैसी आज की बात, भला?"
"चलिए, कहीं चलते हैं, पाँच-सात मिनट्स के लिए ही सही। अगर आपको पसंद नहीं तो हर्गिज़ घर नहीं, जहाँ आप कहें, वहीँ सही। आप जिस जगह कहिये वहाँ खाना खाकर लौट आयेंगे। आप को हॉस्टल छोड़ के मैं घर निकल जाऊँगा। बस आपकी हुकूमत चलेगी।आप देख लीजियेगा।"
"देखिये, मैं खाना कहीं भी बाहर नहीं खाती। यहीं, हॉस्टल में खाऊँगी। मुझे पसंद ही नहीं कहीं का भी खाना।"
"जी बहोत अच्छे, लेकिन यूँ ही एक राउण्ड बस्स...जहाँ आप उचित समझें। मै समझूँगा आपने मुझे मेरी नासमझी, मेरी अभद्रता के लिए माफ़ कर दिया।"
मालविका ने दिमाग़ भिड़ाया कि कई दिन से रिहर्सल की व्यस्तता के चलते निकोलस के हॉस्टल तक जाना हो नहीं सका, इसकी कार से एक फेरा लग जायेगा और समय भी बचेगा। इसका कहना भी रह जायेगा और इससे पिंड भी छूट जायेगा।वो चलने को तैयार हो गई।
"मेरे हॉस्टल-मेस के डिनर-टाइम तक लौट आयेंगे ना?"
"जी बिलकुल। मैंने कहा ना, आपकी हुकूमत चलेगी।"
"ठीक है, इंटरनेशनल हॉस्टल तक चलते हैं, नॉर्थ कैम्पस तक।"
"बेशक़ ..." कहते-कहते उसने कार का पिछला दरवाज़ा खोला, मालविका को सलीक़े से बिठाया और ख़ुद भी जल्दी से आकर, साथ बैठ गया। राजशेखर का हाल ही में बैकबोन का गंभीर ऑपरेशन हुआ था, तबसे वो आगे की सीट में ड्राईवर के साथ ही बैठा करता था, लेकिन आज उत्साहित होकर पीछे जा बैठा था और कैसी भी तकलीफें उसे जैसे याद ही नहीं थी।
जब गाड़ी इंटरनेशनल हॉस्टल पर रुकी, मालविका ने बड़े गर्व से निकोलस का कमरा राजशेखर को दिखाया।
उसने हॉस्टल-परिवेश की वो हर जगह दिखाई जहाँ वो निकोलस के साथ उठती थी, बैठती थी, चहकती थी, गाती थी।
राजशेखर मालविका के बरताव से पहले ही बड़ा अचम्भित था, आज तो वो एकदम ही हतप्रभ हुआ था।' कैसी अजीब लड़की मिली है ये, पहली बार साथ में कहीं निकली है, और अपने प्रेमी का कमरा मुझे दिखा रही है।'
वो सोचता रहा, और चुपचाप सब देखता रहा।
और मालविका निकोलस की ड्योढ़ी पर कुछ देर खड़ी रही चुपचाप।
राजशेखर उसके कशिश से भरे मासूम चेहरे पर तत्काल ही उभरी ग़मगीन लकीरों को पढ़ता रहा, समझता रहा।
लौटकर मालविका अपने हॉस्टल में बेपरवाह सो गई, खूबसूरत ग़ज़लों की मादक पनाह में।
ज़िन्दगी ग़ज़ल लिखने को तैयार बैठी थी, मय कागज़-कलम-दवात।
ज़िन्दगी ग़ज़ल सुनाने को, मौसिक़ी सजाने को तैयार खड़ी थी ठीक अगले कदम पर, मय साज़-सुर और साजिंदा।
साजिंदा वो, जो हर साज़, हर राग, हर सुर को, हर तरह से साध लेने में सिद्ध-हस्त था।
वो रंगीन साजों का आदी था, शौक़ीन था।
लेकिन मालविका सो रही थी, आँख-कान बंद किये।
बेसुध, बेखबर।

राजशेखर का मनाना-रिझाना अपनी तेज़ लय पर था। और उसकी नखड़ीली परी, अब रीझ भी रही थी, मन भी रही थी, धीरे-धीरे, हौले-हौले, लेकिन थोड़ा-थोड़ा, ज़रा-ज़रा।
राजशेखर के आलीशान बँगले के बड़े से फाटक पर अक्सर लाल गुड़हल का पेड़ देखकर ठिठक जाया करती थी और उसे बड़े मनोयोग-से निहारने लगती थी।

"आइये." राजशेखर उसे हर बार याद दिलाता था, कि घर के अन्दर भी तो जाना है। हर बार हाथ पकड़ कर साथ ले जाता था.
बस, यूँ ही इसी राजशेखर के प्रेम से बनाये हुए सुन्दर-सलीकेदार माहौल में दिन से महीने, महीनों से बरस बीतने लगे।
मालविका की हॉस्टल की अवधि भी इसी ख़ुमारी में पूरी हो गई और इस बार वो किसी फिरंगी के कन्धे पर सिर टिकाये, उस फिरंगी के वतन, उसके घर नहीं गई।
इस बार वो बड़ी निश्चिन्त राजशेखर के दामन से लिपटी, उसकी बाँह थामे, बड़े अरमान, बड़े इत्मीनान, बड़े एहतराम से, मय सामान उसके सरकारी आवास में शिफ्ट हो गयी।

     बड़ा निर्णय था, बड़ा परिवर्तन था, बड़ी बात थी ... समाज के बदलते ढांचे के लिहाज़ से क्रांतिकारी फैसला तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन हाँ, राजशेखर के निजी पारिवारिक माहौल के हिसाब से यह एक तूफानी कदम ज़रूर था। लेकिन यह तूफ़ान उसे बहारों के भेस में  मिला था जिसे उसने गले लगा कर अपनाया था. दिल से, आत्मा से, अपने प्राणों से चाह कर अपनाया और मालविका जीवन पर्यन्त  उसकी हो कर रह गयी . इस बेस्वादी, उलझनों से भरी अजीब सी दुनिया में, उसकी उलझनें दूर न सही, कम करने की कोशिश करने लगी।
       
  कभी राजशेखर की खीझ दूर करती, कभी खुद खीज कर चार बातें सुना दिया करती थी।
मालविका का गरियाना भी राजशेखर के लिए प्रसाद-मानिन्द था।
खूब हँसना-खिलखिलाना यही सब था जीवन, और यही थे जीवन जीने वाले वे दो प्राणी।
कभी चहकते दोनों ’श्रीराम सेंटर’ से निकलते, कभी ’इंडिया इस्लामिक सेंटर’ में साथ तस्वीरें खिंचवाते।
कभी ‘इण्डियन हैबिटैट सेंटर’ तो कभी ‘इण्डिया इंटर नेशनल सेंटर’, कभी ‘आइ. सी. आर. आर.’ तो कभी सुदूर गुडगाँव का ‘ए.पी.-थियेटर’। कभी संसद-भवन का अहाता तो कभी प्रेसीडेंट-हाउस का दिलनशीं बागीचा।
ज़िन्दगी मस्ती और नूर की बारिश करती रही, और दोनों नहाते रहे।
   उस लाल बत्ती वाले ने लाल सिंदूर तो नहीं लगाया, लाल बिंदिया, लाल साड़ी से भी नहीं सजाया, क्यूंकि दोनों में से किसी को, इन सारे ताम-झाम की ज़रूरत ही नहीं पड़ी...लेकिन हां, पूरी शिद्दत, पूरी आत्मीयता, पूरे सम्मान, पूरे दायित्व, पूरे रस्म-ओ-रिवाज़ से अपनी शिराओं में बहते खून के लाल रंग पर एक ही  नाम ज़रूर लिख दिया .. ’मालविका मिश्रा’ .



                                         



Monday, August 6, 2012


आज खुशी का दिन है. एक मंजिल हासिल की गयी है, सीमा आज़ाद और विश्वविजय को जमानत मिल गयी है, पर अभी लम्बा रास्ता तय करना बाकी है. न्याय की लड़ाई के बहुत-से मोर्चे हैं, बहुत-से मुकाम. हमारी जानी-मानी साथी और पत्रकार शीरीं ने यह लेख हमें भेजा है. इसे हम यहां दे रहे हैं इसमें अपनी आवाज भी मिलाते हुए

सीमा आज़ाद व विश्वविजय को मिली ज़मानत का निहितार्थ

आखिरकार सीमा आज़ाद और विश्वविजय को इलाहाबाद हाईकोर्ट से ज़मानत मिल गयी। सीमा और विश्वविजय के शुभचिन्तकों ने राहत की सांस ली। पिछले दो साल छः महीने उनकी जि़न्दगी में एक पीड़ादायी अध्याय के रूप में हमेशा के लिए दर्ज हो गए। पर सम्भवतः सीमा और विश्वविजय अन्याय की इस भट्टी में तप कर और इस्पाती बन गए होंगे। उम्मीद है कि आने वाले समय में वे जनता की लड़ाई में और धारदार तरीके से शरीक होंगे।
सीमा और विश्वविजय को जमानत अनायास ही नहीं मिल गयी है। इसके पीछे उस न्यायपसंद जनता की ताकत निहित है जो सीमा और विश्व के लिए उनको उम्रकैद की सज़ा सुनाए जाने के बाद से ही उनकी रिहाई के लिए लड़ रही थी। जिस दिन से निचली अदालत ने सीमा व विश्वविजय को आजीवन कारावास की सज़ा सुनायी थी, उसी दिन से देश भर के तमाम प्रगतिशील बुद्धिजीवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता और ढेर सारी न्यायपसंद जनता इस फैसले के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलन्द कर रहे थे। तमाम सारे तरक्कीपसंद ब्लागांे ने उनकी रिहाई के लिए एक मुहिम छेड़ रखी थी। सीमा और विश्वविजय के पक्ष में नेट के आभासी संसार पर भी एक मुहिम सी छिड़ी हुयी थी। ऐसे में हाईकोर्ट का यह फैसला इन तमाम लोगों की जीत है। सम्भव है चिदम्बरम की गृहमन्त्रालय से विदाई भी इस रिहाई के लिए जिम्मेदार एक कारक हो।
लेकिन सीमा व विश्वविजय के ज़मानत से न्याय-अन्याय की परिभाषा नहीं बदल जाती। यह लड़ाई यहां आकर समाप्त नहीं हो जाती। लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। अभी भी देश के तमाम जेलों में हज़ारों की संख्या में राजनीतिक बन्दी हैं। जो धारा निचली अदालत द्वारा सीमा-विश्वविजय को आजीवन कैद का फैसला सुनाए जाने के बाद से बही थी उसका रुख अब इन तमाम राजनीतिक बन्दियों को छुड़वाने की दिशा में मुड़ जाना चाहिए।
सीमा व विश्वविजय की रिहाई का एक मायने यह भी है कि अब मसला माओवादी होने या न होने का नहीं है। मसला है, सही और गलत का। आज बुद्धिजीवियों और समाज का एक तबका अपना पक्ष तय करने लगा है। सरकार को अगर लगता है कि न्याय के पक्ष में खड़ा होना माओवाद है, हर तरह के अन्याय का प्रतिकार करना माओवाद है, अगर पत्रिका निकालना माओवाद है, अगर इस देश के जल, जंगल, ज़मीन पर जनता के कब्जे की बात करना माओवाद है, अगर हक-हुकूक की बात करना माओवाद है, अगर विस्थापन के खिलाफ खड़े होना माओवाद है, अगर भूमि अधिग्रहण के खिलाफ खड़े होना माओवाद है, अगर भूमि के बंटवारे की मांग करना माओवाद है, अगर मंहगाई के खिलाफ खड़े होना माओवाद है, अगर ग़रीबी के खिलाफ संघर्ष करना माओवाद है, अगर सबको शिक्षा की मांग करना माओवाद है, अगर बेरोजगारी के खिलाफ खड़े होना माओवाद है, अगर छात्रसंघ की बहाली की मांग करना माओवाद है, अगर किसानों की आत्महत्या के खिलाफ खड़े होना माओवाद है, अगर मजदूरों के संघर्षों में शामिल होना माओवाद है, अगर कश्मीर, उत्तरपूर्व, बंगाल, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा आदि की संघर्षरत जनता का पक्ष लेना माओवाद है तो ज़रूरी है माओवाद को पब्लिक बहस का एक मुद्दा बनाया जाए और उस पर खुल कर चर्चा की जाए। अगर मसला उपरोक्त सवालों पर केन्द्रित है तो कहीं न कहीं इस देश की 80 प्रतिशत जनता माओवाद की ज़द में आ जाती है।
सरकार अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए माओवाद को देश का नम्बर एक खतरा बताते हुए तमाम संघर्षाें ेमें शिरकत कर रहे लोगों का मुंह बन्द करने की मंशा रखती है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जनता की आवाज़ को कभी भी कोई भी सरकार फौजी बूटों से नहीं कुचल पायी है। जनता की ताकत के सामने सरकार हमेशा गश खाती रहती है। उसे हमेशा अपने अपदस्थ होने का खतरा बना रहता है।
ऐसे में सीमा और विश्वविजय की ज़मानत का एक अर्थ यह भी है कि जिस माओवाद से सरकार इतना खौफ खाए हुए है उसे सिर्फ सरकारी नजरिए से और कारपोरेट मीडिया के नजरिए से न देखा जाए। ऐसे में इस आन्दोलन को ज्यादा से ज्यादा समझने, और उस पर चौतरफा बहस करने की ज़रूरत है। सीमा व विश्वविजय की क़ैद और उनको मिली ज़मानत का सम्भवतः यही निहितार्थ है।

शीरीं
6.8.12

Sunday, July 1, 2012

क्या न्याय की लड़ाई का भी वर्गीय पहलू है ?






8 जून को शाम हो चुकी थी जब इलाहाबाद से लेखिका नीलम शंकर ने एस.एम.एस पर वह बुरी ख़बर दी थी कि सीमा आज़ाद और विश्वविजय को इलाहाबाद में निचली अदालत ने उमर क़ैद और जुरमानों की सज़ा सुनाई है. तब से अब तक बाईस-पचीस दिन बीत चुके हैं, मानवाधिकार संस्था पी.यू.सी.एल. और अन्य कई संगठन हरकत में आ चुके हैं. दिल्ली में बैठकें हुई हैं, इलाहाबाद में बैठकें जारी हैं, रणनीति विचारी जा रही है, इरादे खंगाले जा रहे हैं, सलाहों और एकजुटता के संदेसों की झड़ी लगी हुई है, जो लोग अब तक ख़ामोशी से इन्तज़ार कर रहे थे वे आन्दोलित हो चुके हैं, पूरी उम्मीद है कि हम इस बार भी संगठित हो कर राज्य शक्ति का मुक़ाबला करेंगे और सीमा आज़ाद और विश्वविजय को रिहा कराने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे.

लेकिन दोस्तो, इस मुक़ाम पर जब मैं थोड़ा रुक कर सोचता हूं तो मन में कुछ सवाल उठते हैं. पहला सवाल तो यह है कि क्या सीमा आज़ाद और विश्वविजय की रिहाई के बाद हम अपने संघर्ष कि इति मान लेंगे ? हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि भले ही प्रशान्त राही और विनायक सेन जैसे लोग रिहा होने में कामयाब हो गये हों, अभी ढेरों बन्दी कमोबेश उन्हीं धाराओं में क़ैद हैं जो सीमा और विश्वविजय पर लगायी गयी थीं. वे अभी अनाम हैं. क्या हम तब चेतेंगे जब उन्हें भी ऐसी ही कोई सज़ा सुनायी जायेगी जो सीमा आज़ाद और विश्वविजय को सुनायी गयी है.  क्या तभी हमें उनके नामों का भी पता चल पायेगा ? क्या हम उस समय फिर एक बार हलचल से भर उठेंगे और भाषणों, तजवीज़ों, एकजुटता के संदेसों, राज सत्ता के प्रति कोसनों की झड़ी लगायेंगे ?

दूसरा सवाल जो इसी पहले सवाल से जुड़ा है, वह यह है कि क्या न्याय, समता, मानवाधिकारों की लड़ाई, हिन्दुस्तान को दमन और शोषण से मुक्त कराने की लड़ाई, का कोई वर्गीय पहलू भी है ? क्या जब हम सोचते हैं कि कौन-कौन राज सत्ता के निशाने पर है और किस-किस के लिए हमें आवाज़ उठानी चाहिये तो हम अपने समाज की तरह दो हिस्सों में बंट जाते हैं ? एक हिस्सा विनायक सेन और अरुन्धती राय को ले कर आन्दोलित हो उठता है जबकि दूसरे सामान्य वर्ग में आने वाले सीमा आज़ाद और विश्वविजय जैसे लोग तब तक उपेक्षित रहते हैं जब तक कि राज सत्ता उन्हें अपनी ओर से सज़ा सुना कर सारे मानवीय अधिकारों से वंचित न कर दे ? क्या इन सभी लोगों को यह नहीं बताना चाहिये कि वह कौन सी अड़चन थी जिसकी वजह से वे चुप बैठे थे ?

दोस्तो, यह सवाल इधर बहुत शिद्दत से मुझे परेशान करता रहा है. कारण यह है कि 6 फ़रवरी 2010 से ले कर 8 जून 2012 तक -- इन दो बरसों के दौरान हम सभी कमोबेश ख़ामोश और निष्क्रिय बैठे रहे हैं. बीच-बीच में सीमा आज़ाद और विश्वविजय के बारे में और वह भी ख़ासकर हिन्दी दैनिक "जनसत्ता" में कुछ ख़बरें ज़रूर प्रकाशित हुईं; मासिक पत्रिका "समकालीन तीसरी दुनिया" ने भी कुछ लेख-टिप्पणियां प्रकाशित कीं लेकिन बाक़ी जगह सन्नाटा छाया रहा. पी.यू.सी.एल. जो इस मुद्दे पर अपनी ही इलाहाबाद इकाई की संगठन सचिव के पक्ष में एक देश-व्यापी आन्दोलन छेड़ सकता था चुप बैठा रहा या सिर्फ़ क़ानूनी लड़ाई लड़ता रहा. बाक़ी बहुत-से संगठन जो अचानक सक्रिय हो उठे हैं, हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहे.

लेकिन आप देखिये कि विनायक सेन वाले मामले पर एक हंगामा बरपा हो गया था. बयानों की झड़ी लग गयी थी. अपर्णा सेन और शर्मिला टैगोर जैसी अभिनेत्रियां ही नहीं, हमारी जुझारू लेखिका अरुन्धती राय भी मैदान में कूद पड़ी थीं. यह बात दीगर है कि छूटने के बाद सबसे पहला काम "सीमा बहन को छुड़ाने" का घोषित करने वाले विनायक सेन सीधे मोनटेक सिंह आहलूवालिया और उनके योजना आयोग से जा जुड़े. सीमा और विश्वविजय जेल में सड़ते रहे और अभी तक सड़ रहे हैं. 

इन पंक्तियों के लेखक ने दो बरस के इस अरसे में कम नहीं लगभग  बारह-पन्द्रह बार अरुन्धती राय से आग्रह किया -- कभी फ़ोन पर और कभी ईमेल द्वारा कि वे सीमा के मामले को उठायें. पर वे देश-विदेश घूमती रहीं, उन्होंने किसी भी  प्रेस सम्मेलन में या टिप्पणी में इस की चर्चा करना गवारा नहीं किया. ज़ाहिर है, उनकी तरफ़ हमारी निगाहें इसलिए उठी थीं क्योंकि उन्होंने -- अगर अपने मित्र अजय सिंह के शब्दों में कहूं तो -- "हमारी अपेक्षाएं जगायी थीं." इसके साथ ही मैंने कम-से-कम पांच-छै बार गौतम नौलखा से भी इस मामले को ले कर बात की. लेकिन वे कश्मीर जाने का वक़्त तो निकाल पाये लेकिन सीमा आज़ाद का ज़िक्र करने का नहीं. यह बात मैं इसलिए ज़ोर दे कर कह रहा हूं क्योंकि अरुन्धती राय अब केवल एक व्यक्ति नहीं रह गयी हैं, वे लगभग एक संगठन का स्वरूप ग्रहण कर चुकी हैं और गौतम नौलखा तो बाज़ाब्ता एक संगठन से जुड़े हैं और जिस तरह की लड़ाई की मांग सीमा का मामला करता था वह संगठित हो कर ही लड़ी जा सकती है.

क्या यह इसलिए होता है कि न्याय, समता और मानवाधिकारों की लड़ाई को वर्गीय नज़रों से देखा जाने लगा है. बड़े लोगों की गिरफ़्तारी और सज़ाएं तत्काल हलचल पैदा करती हैं, जबकि उसी लड़ाई को लड़ने वाले साधनहीन लोग गुमनामी में डूबे रहते हैं ? राजनीति में अगर-मगर का खेल नहीं होता पर मन करता है इस अटकल पर ग़ौर करने को कि पिछले दो वर्षों के दौरान अगर विनायक सेन और अरुन्धती राय जैसे लोगों के मामलों पर आन्दोलित होने के साथ-साथ हम ने सीमा आज़ाद और विश्वविजय के मामले पर भी आवाज़ बुलन्द की होती तो शायद राज सत्ता यह सज़ा देने से पहले दस बार सोचती और हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से सीमा अज़ाद और विश्वविजय की अर्ज़ियां यों लौटायी न जातीं. क्योंकि यह बात अब स्पष्ट है कि यह सज़ा इसलिए दी या ऊपर से दबाव डाल कर दिलवायी गयी है क्योंकि हमारे गृह मन्त्री और गृह मन्त्रालय एक नज़ीर क़ायम करना चाहते हैं, लोगों को बताना चाहते हैं कि राज सत्ता का विरोध करने पर आप के साथ भी क्या या क्या नहीं हो सकता. 

बहरहाल, ख़ुशी की बात है कि हमारी साथी अरुन्धती राय ने अपने अत्यन्त व्यस्त कार्यक्रम से समय निकाल कर जुलाई के पहले हफ़्ते में यानी इस सज़ा के घोषित होने के महीने भर बाद प्रेस सम्मेलन को सम्बोधित करना स्वीकार कर लिया है और यह भी खबरें हैं कि वे लखनऊ में भी एक प्रेस सम्मेलन को सम्बोधित करेंगी. अगर ऐसा होता है तो यकीनन लड़ाई को बल मिलेगा. अंगेज़ी की कहावत के अनुसार हमें हर छोटे-से-छोटे और हर बड़े-से-बड़े अनुग्रह के लिए शुक्रगुज़ार होना चाहिये.

लेकिन साथ ही अब वक़्त आ गया है कि हम एक बार फिर बैठ कर सोचें कि हमें रुक-रुक कर हरकतज़दा होने की बजाय निरन्तर इस मुहिम को जारी रखना है जब तक कि राज सत्ता का विरोध करने वालों को इस तरह क़ैदें और सज़ाएं दी जाती रहती हैं. और जो वर्ग-भेद धीरे-धीरे हमारी लड़ाई में रेंगता हुआ या रिसता हुआ चला आया है, उसे दूर करें.

१ जुलाई २०१२