Saturday, June 30, 2012

अदालती आतंकवाद


डा. शिवमंगल सिद्धांतकर न सिर्फ़ प्रतिबद्ध कवि हैं बल्कि शब्द को कर्म में रूपान्तरित करने वाले संस्कृतिकर्मी भी. सीमा आज़ाद और विश्वविजय के पक्ष में आवाज़ बुलन्द करने वालों में वे अग्रणी हैं. यहां उनकी ताज़ा टिप्पणी दी जा रही है जो आपातकाल विरोधी दिवस 26 जून को जारी की गयी थी

अदालती आतंकवाद

कोई एक दल या संगठन या व्यक्ति अन्यायपूर्ण सरकार और सत्ता के खिलाफ यदि संघर्ष छेड़ता है तो वह संघर्ष देश और दुनिया भर में चल रहे संघर्षों का एक हिस्सा होता है और जिस दल, संगठन या व्यक्ति ने संघर्ष छेड़ा होता है वह किसी एक दल या संगठन या व्यक्ति का संघर्ष नहीं रह जाता बल्कि इस प्रकार के सभी तत्त्वों का संघर्ष बन जाता है। सत्ता विरोधी किसी दल या संगठन या व्यक्ति को यदि प्रतिबंधित किया जाता है तो वह इस तरह के अन्य तत्त्वों पर भी प्रतिबंध समझ लिया जाता है। ऐसी हालत में प्रतिरोधकारी और विद्रोहकारी एकता जरूरी हो जाती है। इसी आधार पर हमारा यह कार्यभार बन जाता है कि हम सीमा आजाद और विश्व विजय के आजीवन कारावास को खारिज कराने के लिए कानूनी रास्ते तो अपनायंे ही, आन्दोलन के रास्ते पर भी बढंे़, जो स्थानीय राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय धरातल पर संभव किया जा सके।
अंगे्रजी राज से अब तक राज्य विरोधी  क्रांतिकारी शक्तियों की अदालती हत्या का एक लंबा सिलसिला रहा है और आजीवन कारावास से भी क्रांतिकारियों को गुजरना पड़ा है जिसके विस्तार में जाने की बजाय हमारा यह मानना है कि सीमा आजाद और विश्व विजय को आजीवन कारावास दिया जाना अदालती आतंकवाद है। इस अदालती आतंकवाद के खिलाफ राज्य बंदी रिहाई अभियान चलाना जरूरी तो है लेकिन बदले हुए समय में इस रिहाई अभियान में मौजूदा राज्य सत्ता और सरकार के विरोधी राजनीतिक दलों का एकजुट होकर संघर्ष चलाना जरूरी हो गया है; क्योंकि घोषित आपाकाल से मौजूदा अघोषित आपातकाल ज्यादा क्रूर और खतरनाक बनने जा रहा है इसलिए कि साम्राज्यवादी भारत सरकार बकौल प्रधानमंत्राी कड़े फैसले लेने जा रही है; जाहिर है जिससे मेहनतकश, सर्वहारा, नव सर्वहारा, अर्द्ध सर्वहारा को बदहाली झेलने पड़ेगी।
इस अदालती आतंकवाद के खिलाफ स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय धरातल पर अभियान चलाना बहुत जरूरी हो गया है और इसमें सूचना तकनीक के विभिन्न औजारों का इस्तेमाल तो जरूरी है ही; समाज के निचले पायदान से ऊपर के पायदान तक संघर्षशील जनसेवक ईकाइयों का निर्माण भी जरूरी हो गया है जो परिवर्तनकारी नव सर्वहारा औजार से लैस हो न कि नागरिक अधिकार आंदोलन तक ही सीमित रहे; क्योंकि हमारा मानना यह है कि सीमा आजाद और विश्व विजय को आजीवन कारावास की सजा सरकार और सत्ता के खिलाफ युद्ध के ‘अपराध’ में सुनाई गई है। ऐसे हालात में यह सजा राजनीतिक बन जाती है इसलिए इसके खिलाफ संघर्ष भी नई क्रांतिकारी राजनीतिक शक्तियों द्वारा एकताबद्ध होकर चलाना होगा।
भूमाफिया, राजनेता और पुलिस और कौशाम्बी जिले के जन प्रतिनिधियों के खिलाफ भी आंदोलन जरूरी है जहां यह सब हो रहा है। क्रांतिकारियों पर तो सदा आपातकाल रहा है 26 जून 1975 को शासक वर्ग के विरोध पक्ष पर भी आपातकाल लग गया था।
इन्हीं शब्दों के साथ 26 तारीख को आपातकाल विरोधी दिवस मनाये जाने के हम साथ हैं और सीमा आजाद तथा विश्व विजय को सजामुक्त कराने की लड़ाई के लिए हमारे पास भारतीय जनसंसद और दूसरे बहुतेरे जो सांगठनिक औजार हैं उन्हें शामिल करने के लिए तैयार हैं। इस सिलसिले में स्थानीय राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय धरातल पर अपने सांगठनिक औजारों का इस्तेमाल करने का हम साझा संकल्प करते है।
-शिवमंगल सिद्धांतकर
महासचिव: सी. पी. आई. एम. एल. न्यू प्रोलेतारियन
फोन: 011-25269471, 09810400430

तनी हुई मुट्ठी को काट कर प्रतिरोध को खामोश नहीं किया जा सकता!




जिन लोगों ने सीमा आज़ाद द्वारा सम्पादित पत्रिका "दस्तक" के अंक देखे हैं उनके लिए शीरीं कोई नया नाम नहीं है. सीमा ही की तरह शीरीं ने भी दलित शोषित वर्गों के पक्ष में दृढ़ता से आवाज़ बुलन्द की है. यहां हम उनका ताज़ा लेख दे रहे हैं

तनी हुई मुट्ठी को काट कर प्रतिरोध को खामोश नहीं किया जा सकता!
 

सीमा आजाद को दी गयी आजीवन सज़ा की खबर ने सबको सकते में डाल दिया है। लेकिन इसके पहले एक और घटना घटी जिसको राष्ट्रीय मीडिया में ज्यादा जगह नहीं मिली। गत 7 मई को उड़ीसा के जाजनगर की गोबरघाटी की 55 वर्षीय महिला सिनी साय को पुलिस ने माओवादी बता कर गिरफ्तार कर लिया। सिनी साय को पुलिस ने उस वक्त गिरफ्तार किया जब वह बे्रन मलेरिया का इलाज कराने के लिए एक अस्पताल में भर्ती थी। सिनी एक ऐसी मां है जिसकी आंखों के सामने उसके 25 वर्षीय बेटे भगवान साय को पुलिस ने गोली मार दी थी और उसकी कलाई को काट दिया था।
यह घटना उस समय की है जब सन 2006 में कलिंगनगर में टाटा द्वारा आदिवासियों की जमीन छीनने के खिलाफ और आदिवासियों के विस्थापन के खिलाफ तथा आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के हक के लिए आन्दोलन चल रहा था। उस प्रदर्शन में स्वयं सिनी साय भी शामिल थी। विस्थापन विरोधी उस प्रदर्शन पर पुलिस ने फायरिंग कर दी और उसमें 14 आदिवासी मारे गए। उन 14 मृत लोगों में उनका जवान बेटा भगवान साय भी शामिल था। पुलिस ने उनकी आंखों के सामने न केवल उसे गोली मारी बल्कि उसकी विरोध में तनी हुयी मुट्ठी को भी काट दिया। जाहिर है पुलिस उस वक्त सरकार और टाटा की रक्षा कर रही थी।
सिनी साय दो बार अपने गांव गोबरघाटी की सरपंच रह चुकी हैं। सरपंच के रूप में उन्होंने न केवल अपने गांव का नेतृत्व किया बल्कि वह अपने आदिवासी समूह की हक की लड़ाई में भी शामिल हो गयी। उसी लड़ाई को लड़ते हुए वह एक दिन अपने बेटे की कलाई कटी हुयी लाश लेकर घर लौटीं।
सिनी साय अब एक शहीद की मां भी थीं। उन्हांेने अपने बहते आंसुओं को अपने सीने में ही दफन कर दिया और समाज परिवर्तन की लड़ाई मंे कूद पड़ीं। पुलिस फाइल में वह एक माओवादी के रूप में दर्ज हो गयीं। हमें उन कारणों पर विचार करना होगा जिनके कारण एक मां को 50 साल की उम्र में माओवादी होना पड़ा। उनके दूसरे बेटे के अनुसार सरकार, पत्रकार और मीडिया के लिए वह माओवादी हो सकती हैं। लेकिन उनके लिए वह एक मां हैं। उनके लिए अपने बेटे की हत्या का बदला लेने के लिए इसके अच्छा कोई रास्ता नहीं था।
उनकी गिरफ्तारी के बाद उनसे मिलने गयी एक पत्रकार सारदा लाहंगीर से उन्होंने कहा ‘‘आप जानती हैं कि जमीन की लड़ाई, अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए मेरे बेटे ने अपने सीने पर पुलिस की गोली खाई। मेरे सामने उसे न सिर्फ बेरहमी से मारा गया बल्कि बाद में उसकी लाश के भी टुकड़े कर दिये गए। एक मां यह कैसे बर्दाश्त करती कि जिस बेटे को मैंने नौ महीने अपनी कोख में रखकर जन्म दिया, उसी बेटे को पुलिस वाले बेरहमी से एक लाश में बदल दें।’’(देखें-माओवादी सिनी साय की कहानी-ravivar.com पर )
सीमा और सिनी में एक समानता हैं। दोनो अन्याय के खिलाफ लड़ रही थीं। सिनी की तरह ही सीमा आजाद भी जल-जंगल-जमीन के लिए चल रही लड़ाई की समर्थक है। वह भी विस्थापन के खिलाफ आवाज उठा रही थी। दोनो की उम्र में फरक हो सकता है। लेकिन दोनो के जज्बे में कोई अन्तर नहीं है। दोनो इस समाज को बदलना चाहती हैं।
सीमा कुल 36 वर्ष की हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में एमए करने के बाद उन्होंने एक ऐसी राह चुनी जो बहुत ही चुनौती पूर्ण थी। सामन्ती समाज की बेडि़यों को तोड़ कर उन्होंने अपना नाम आज़ाद रखा। इसी क्रम में शायद उन्हें यह समझ में आया कि व्यक्तिगत आजादी का कोई मतलब इस समाज में नहीं है। जब तक पूरा समाज नहीं मुक्त होता, वह अकेले मुक्त नहीं हो सकती। इसी समझदारी के साथ वह समाज की मुक्ति के लिए चल रही लड़ाईयों के साथ जुड़ीं। सामन्ती बेडि़यों से तो वह एक हद तक मुक्त हुयीं लेकिन राज्य की दमनकारी ज़ंजीरों ने उसे कैद कर लिया और उसकी इन्तहां तब हुयी जब लोअर कोर्ट ने उन्हंे आजीवन कारावास की सजा सुना दी।
सीमा और सिनी दोनो आपस मे कभी नहीं मिलीं। दोनो की वर्गीय पृष्ठभूमि में भी अन्तर है। सीमा पढ़ी लिखी और शहर में रहने वाली एक मध्यवर्गीय महिला है और सिनी एक अनपढ़, आदिवासी और गांव की औरत है। पर दोनो का मकसद एक ही है-अन्याय का प्रतिकार करना। एक बात मुझे नहीं समझ आती अगर अन्याय का प्रतिकार करने का अर्थ है माओवादी होना तो माओवादी होने में क्या गुनाह है? लेकिन दिक्कत यह है कि यहां की अदालतें न्याय की वही परिभाषा दोहराती हैं जिसे राज्य ने लिख दिया है। और बचाव पक्ष का वकील पूरे समय यही सिद्ध करने में उलझ के रह जाता है कि अभियुक्त माओवादी नहीं है। कानूनी दांव-पंेच की भूल-भुलैया में यह पक्ष कहीं खो जाता है की वह कौन सी परिस्थितियां थीं जिनमें व्यक्ति माओवादी बनता है।
ऐसे में मुद्दा माओवादी होने या न होने का नहीं है। मुद्दा है अन्याय की वह पृष्ठभूमि जिस पर संघर्ष की कोई भी इबारत दर्ज होती है।
मुझे नहीं पता कि सीमा को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद सीमा की मां के कलेजे में कितने तूफान उठ रहे होंगे और वह इस तूफान को कौन सी दिशा दें। लेकिन सच्चाई यही है कि राज्य दमन के इस दौर में गोर्की की हजारों-हजार मां जन्म लेंगी। ऐसे समय में हम तटस्थ कैसे रह सकते हैं? इतिहास गवाह है कि तनी हुयी मुट्ठियों को काट कर राज्य कभी भी प्रतिरोध की आवाज को खामोश नहीं करा पाया है।


शीरीं
21.6.12


Monday, June 18, 2012

सीमा आजाद और विश्वविजय की रिहाई के लिए एक अपील


सीमा आजाद और विश्वविजय की रिहाई के लिए एक अपील

प्रिय दोस्तो,
जैसा कि आप जानते हैं, मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की सांगठनिक सचिव और युवा पत्रकार सीमा आजाद को उनके जीवन साथी विश्वविजय के साथ 6 फरवरी 2010 को गिरफ्तार कर लिया गया था। उन पर लगभग उन्ही धाराओं में आरोप लगाया गया है जिन धाराओं में डाक्टर विनायक सेन को आरोपित किया गया था। यानी कम्युनिस्ट पार्टी आफ इन्डिया माओवादी का सदस्य होना और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ना। इसके अलावा कुछ अन्य धाराओं में भी आरोप लगाए गए हैं।

डा. विनायक सेन तो रिहा हो चुके हैं लेकिन सीमा और विश्वविजय को आजीवन कारावास की सजा सुना दी गयी है और उनपर जुर्माना भी ठोंक दिया गया है। शायद यह उन बिरले मामलों में से ही होगा जिनमें इन धाराओं के तहत आरोपित व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी है। स्पष्ट है कि मनमोहन सिंह की सरकार उन सभी से बदला ले रही है जो उनकी नीतियों से सहमत नहीं हैं। यह बात ध्यान देने की है कि ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला है कि सीमा आजाद और विश्वविजय किसी भी समय हथियारों या विस्फोटकों की कार्यवाइयों में लिप्त रहे हों। उनका एकमात्र ‘अपराध’ यही है कि वे अपनी रजिस्टर्ड द्वैमासिक पत्रिका ‘दस्तक’ के माध्यम से सरकार की नीतियों का विरोध कर रहे थे और ‘गंगा एक्सप्रेस वे’ और ‘आॅपरेशन ग्रीन हण्ट’ के खिलाफ पुस्तिकाएं निकाल रहे थे।

राज्य सीमा आजाद और विश्वविजय को किसी भी कीमत पर सजा सुनाना चाहता था। नीचे हम राज्य द्वारा उन्हें दोषी सिद्ध करने के उसके प्रयास के विभिन्न अन्तरविरोधों, असंगतियों और मनगढ़न्त बातों का एक तथ्यगत ब्योरा दे रहे हैं-

1- फैसले के पृष्ठ नम्बर 57 पर यह स्पष्ट उल्लिखित है कि रिमाण्ड के दौरान जिस सामग्री की बरामदगी की गयी थी और उसे सीलबन्द किया गया था, उसे पुलिस स्टेशन में बिना कोर्ट की अनुमति के ‘अध्ययन के उद्देश्य से’ पुनः खोला गया। लेकिन दुर्भाग्य से कोर्ट ने इस प्रक्रिया में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं पाया।

2- यह भी उल्लेखनीय है कि रिमाण्ड को दो बार अदालत द्वारा अस्वीकार किया गया और अन्ततः जब रिमाण्ड दिया गया तो यह गैरकानूनी तरीके से हुआ। इसमें उन सभी कानूनों का उल्लंघन हुआ जो किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को रिमाण्ड पर लेने के लिए कानून द्वारा तय हैं। अदालत ने इस स्पष्ट गैर कानूनी काम को क्यों होने दिया। क्या यह इसलिए था कि एफआईआर के बाद पुलिस नेे जिन मनगढ़न्त और झूठे साक्ष्योें का उल्लेख किया था उनको रिमाण्ड के दौरान तथाकथित बरामदगी के रूप में पेश किया जा सके?

3-सीमा के मोबाइल काॅल डिटेल्स को अदालत में पेश किया गया। लेकिन उनमें सिर्फ 5 फरवरी 2010 तक का ही ब्योरा था। उनमें उसकी गिरफ्तारी के दिन यानी 6 फरवरी 2010 की काॅल डिटेल्स का कोई ब्योरा नहीं है। सवाल यह है कि काॅल डिटेल्स को जान-बूझ कर क्यों छिपाया गया। यदि 6 फरवरी की काॅल डिटेल्स को र्ट में प्रस्तुत किया जाता तो इस तथ्य की पुष्टि हो जाती कि सीमा और विश्वविजय को, सीमा के नई दिल्ली से रीवा एक्सप्रेस द्वारा 6 फरवरी को सुबह 11.45 बजे इलाहाबाद उतरते ही गिरफ्तार कर लिया गया था। यानी 6 फरवरी को दोपहर 2.30 बजे हीरामनि की गिरफ्तारी के बहुत पहले। पुलिस यह कहानी क्यों गढ़ रही है कि हीरामनि द्वारा पुलिस को सीमा और विश्वविजय के बारे में दी गयी सूचना के बाद उन्होंने सीमा और विश्वविजय को 6 फरवरी को रात 9.30 बजे गिरफ्तार किया। पुलिस की क्या मजबूरी थी कि उसने जान-बूझ कर 6 फरवरी 2010 की काॅल डिटेल्स को छिपाया।

4-फैसले के पृष्ठसंख्या 58 पर यह दर्ज है कि गिरफ्तारी की जगह के बारे में पुलिस गवाहों के बयानों में बहुत अन्तरविरोध है। लेकिन फैसले में कहा गया है कि ‘ये छोटे अन्तरविरोध हैं’ और इन्हें नजरअन्दाज किया जा सकता है।

5- अदालत में जब यह पूछा गया कि क्या पुलिस ने सीमा के मोबाइल के काॅल डिटेल्स/ फोन नम्बर / मैसेज में कुछ भी आपत्तिजनक पाया है तो पुलिस का साफ उत्तर था - नहीं। लेकिन फैसले में सीमा के मोबाइल को विभिन्न तिथियों पर विभिन्न जगहों पर दर्शाया गया है। जैसे - लखनऊ, बाराबंकी (30-31.08.09), वाराणसी (4.10.09), कानपुर, फतेहपुर (21-22.11.09) (12-13.01.2010), मिर्जापुर (4.10.09), इटावा, खुर्जा एवं हिमांचल प्रदेश (22-23-24.012010)। (पृष्ठ-55)।  क्या ये जगहें ‘संदेहास्पद जगहें’ हैं? यदि हां तो किस तर्क से?

6-पुलिस ने सीमा के मोबाइल को गिरफ्तारी के वक्त प्रस्तुत क्यों नहीं किया। उन्होंने उसके मोबाइल को रिमाण्ड के बाद (गिरफ्तारी के 5 महीने से ज्यादा वक्त के बाद) क्यों प्रस्तुत किया।

7- ‘26 पेज के पत्र’, ;जिसके बारे में पुलिस दावा करती है कि वह उसने रिमाण्ड की अवधि में यानी गिरफ्तारी के 5 महीने बाद सीमा के कमरे से बरामद किया हैद्ध की बरामदगी पर किसी भी स्वतन्त्र गवाह के हस्ताक्षर क्यों नहीं हैं? सीमा के पड़ोसी और सीमा के पिता रिमाण्ड के दौरान वहां उपस्थित थे। तब इस तथाकथित ‘बरामदगी’ पर उनके हस्ताक्षर क्यों नहीं लिये गये।

8- फरवरी 2012 के पहले सप्ताह में निचली अदालत में अन्तिम गवाह की गवाही हो चुकी थी, फिर केस को अप्रैल के मध्य तक क्यों खींचा गया? जबकि सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश था कि इसमें देरी नहीं होनी चाहिए और केस को दिन-प्रतिदिन के हिसाब से सुना जाना चाहिए। न्यायाधीश अनिल कुमार (जिन्होंने पूरे केस की सुनवाई की) का स्थानान्तरण उनके द्वारा फैसला सुनाए जाने से पहले ही क्यों कर दिया गया? मई में केस को दूसरे न्यायाधीश सुनील कुमार सिंह को दे दिया गया। जिन्होंने अन्ततः आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

9-एक दूसरी बात भी उल्लेखनीय है कि फैसले में इस बात को नोटिस में लिया गया है कि सीमा ने एक पत्र अन्नू अर्थात कंचन को लिखा था। और इसे इस साक्ष्य के रूप में पेश किया गया है कि चूंकि अन्नू अर्थात कंचन अपने पति गोपाल मिश्रा के साथ दिल्ली में समान आरोप में गिरफ्तार हुई थीं, इसलिए सीमा का माओवादियों से सम्बन्ध स्पष्ट है। मजे की बात यह है कि दिल्ली कोर्ट ने कंचन और उनके पति को बेल पर रिहा कर दिया है। जबकि वहीं सीमा और विश्वविजय को बेल देने की बात तो दूर, उन्ही समान आरोपों में सजा सुना दी गयी है।

उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि राज्य ने सभी तरह के विरोधों का गला घोंटने का निर्णय कर लिया है। भारतीय सरकार ने लोकतन्त्र के सभी रूपों से पल्ला छुड़ा लिया है। सीमा आजाद और विश्वविजय के खिलाफ यह क्रूर फैसला इसलिए सुनाया गया है ताकि जनता के सामने इसे एक उदाहरण के रूप में पेश किया जा सके कि जो भी राज्य का विरोध करेगा या उसकी आलोचना करेगा उसे सीमा आजाद और विश्वविजय की तरह ही दण्डित किया जाएगा।

यह हमारा दृढ़ विश्वास और आकलन है कि इस निर्णायक मौके पर यदि हम चुप रहते हैं तो दमनकारियों और हत्यारों के ही हाथ मजबूत होंगे।

हम आप सभी से अपील करना चाहते हैं कि आप जिन-जिन मोर्चों से जुड़े हुए हैं वहां इस मुद्दे को उठायें या किसी अन्य तरीके से भी, जैसा आपको उचित लगे, इस मामले को उठायें। इसके अलावा आप इस अपील को उन सभी के पास फारवर्ड कीजिए जो इस अभियान के दायरे को बढ़ाने और तत्पश्चात सीमा आजाद और विश्वविजय के समर्थन में लोगों को एकजुट करने में मदद करें।


नीलाभ
सीमान्त (सीमा के भाई)  संगीता (सीमा की भाभी)

Sunday, June 17, 2012

AN APPEAL FOR THE RELEASE OF SEEMA AZAD AND VISHWAVIJAYA




AN APPEAL FOR THE RELEASE OF SEEMA AZAD AND VISHWAVIJAYA




Dear Friends,


as you must have come to know, Seema Azad, a young journalist and organising secretary of  the human rights organisation PUCL was arrested along with her husband Vishwavijaya on 6th February 2010 and charged with almost the same sections with which Dr,. Binayak Sen was charged, that is, being a member of the Communist Party of India (Maoist) and waging war against the State, besides some other sections. 


While Dr. Binayak Sen was released, Seema and Vishwavijaya have been awarded a life sentence along with fines. This is probabaly one of the rarest cases where a verdict of life imprisonment has been given to persons charged under these sections. Obviously the Manmohan Singh government is out to wreak vengeance on those who do not agree with their policies. It is to be noted that their is no evidence that Seema Azad and Vishwavijaya at any time indulged in activities involving arms or explosives. Their only supposed "crime" was of opposing the policies of the government through their registered bi-monthly "Dastak" or by publishing booklets against the Ganga Expressway or Operation Greenhunt.    


We are giving below a factual list of the contradictions, anomalies and concoctions by the State in order to convict and sentence Seema Azad and Vishwavijaya at any cost : 


1. It has been clearly mentioned in the judgement (page-57) that the material recovered during the remand and sealed was opened in police station without any court permission for ‘study purpose’. But unfortunately the court did not find anything objectionable in this process !!!


2. This is also worth noting that twice the remand was refused. And when finally the remand was given it was illegal as it contravened all regulations laid rown by law for the remand of an arrested person. Why did the court allow this blatant illegality ? Was it because the tailored or concocted evidence which the police produced after the FIR had been filed could only be submitted after the so called recovery during remand ? 


3. Seema’s mobile call details which were produced in the court are only till 5th Feb, 2010. There was no mention of the calls made or received on 6th Feb, 2010 which was the date of arrest. Now the question is – why call details were tailored intentionally? If call details of 6th Feb would have been provided in the court then it would have supported the fact that Seema & VishwaVijay were arrested immediately after Seema arrived in Allahabad from New Delhi Rewa express at 11.45 am on 6th Feb (much before Heeramani's arrest at 14.30 pm on 6th Feb). Why police is cooking up the story that they arrested Seema & VishwaVijay at 9.30 pm on 6th Feb after Heeramani provided the information about Seema & VishwaVijay to the  police. Also what was the compulsion for the police to intentionally hide the call records of 6th Feb 2010?


4. There were many contradictory statements given by the Police witnesses about the place of arrest in the court which has been mentioned in the judgement also (page-58). Judgement says that these are ‘minor contradictions’ so they can be ignored!!!


5. When asked by the court whether police had found any objectionable call detail/phone number/message in Seema’s mobile, police simply said – ‘No’. But the judgement quotes several locations of Seema’s mobile phone on different dates, such as,  Lucknow , Barabanki (30-31.08.09), Varanasi (4.10.09), Kanpur, Fatehpur (21-22.11.09)(12-13.01.2010), Mirzapur(4.10.09), Itawa, Khurja and Himachal pradesh(22-23-24.01.2010) (page-55). Are these locations ‘suspicious locations’ ? If so by which logic?


6. Why police did not produce Seema’s mobile during the time of arrest? Why did they produce her mobile after remand (after more than 5 months of the arrest).


7. Why there is no signature of the independent witnesses on the ’26 page letter’ which police is claiming to have recovered from Seema’s house during remand (after 5 month of arrest). Seema’s neighbours and Seema’s father were present during the remand then why their signature were not taken on the so called ‘recovery’?


8. The last witness was examined in the lower court in the first week of Feb 2012. Why was the case dragged  till mid April inspite of the Supreme Court instruction not to delay the case and hear it on a day-to-day basis ? Why was Justice Anil Kumar (who had heard the entire proceedings of the case) transferred before he could deliver a verdict? In May, the case was transferred to another judge (Sunil Kumar Singh) who finally delivered the verdict of life imprisonment!!!


9. Another thing worth noting. The verdicy has taken into account a letter written to Annu alias Kanchan as evidence of Seema's involvement with the Maoists because Annu alias Kanchan along with her husband Gopal Mishra was arrested on the same charges in Delhi. Strangely the Delhi Courts have allowed the bail of Kanchan and her husband, while Seema and Vishwavijaya were not only not allowed any bail, but they were convicted of the same offence. 


It is clear from the above facts that the State has decided to stifle all forms of protest. The Indian Government has done away with all norms of democracy and the draconian verdict against Seema Azad and Vishwavijay has been given to set an example before the people that whosoever will criticise or protest against the State will have to suffer the same fate as has been meted out to Seema Azad and Vishwavijaya.


It is our firm belief and understanding that keeping silent at this juncture will only strengthen the hands of executioners and oppressors.


We would like to appeal to all of you to raise this matter in all the forums with which you are associated and also by any other suitable means which you can think of. And also forward this appeal to all those who in your view can help us widen the scope and effect of this campaign to rally support for Seema Azad and Vishwavijaya.




Neelabh                     Seemant            Sangita
(Brother and sister-in-law of Seema)



Monday, June 11, 2012

सीमा आजाद के बहाने विरोध की आवाज को कुचलने की साजिश

सीमा आजाद के बहाने विरोध की आवाज को कुचलने की साजिश






नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद और उनके पति विश्व विजय को देशद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप मंे गैर कानूनी गतिविधि निवारण कानून (यूएपीए) के विभिन्न प्रावधानों के तहत इलाहाबाद की एक निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा देकर एक बार फिर इस बात की पुष्टि की है कि यह व्यवस्था जनतांत्रिक विरोध की हर आवाज को कुचलने पर आमादा है। आठ जून को उम्रकैद की सजा का आदेश जारी करते हुए इन दोनों लोगों पर 70 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। इन पर आरोप है कि ये दोनों भूतपूर्व छात्र नेता और सामाजिक कार्यकर्ता भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सदस्य हैं और ‘गैर कानूनी गतिविधियों’ में शामिल है।


सीमा आजाद और विश्व विजय को 6 फरवरी 2010 को उत्तर प्रदेश में स्पेशल टास्क फोर्स ने इलाहाबाद में उस समय गिरफ्तार किया जब ये लोग दिल्ली से विश्व पुस्तक मेला देखने के बाद लौट रहे थे। एसटीएफ का दावा था कि इनके पास से माओवादी साहित्य बरामद किया गया है और ये दोनों प्रतिबंधित माओवादी पार्टी से संबद्ध हैं। एसटीएफ ने इस मामले को उत्तर प्रदेश के आतंकवाद विरोधी स्क्वैड को हस्तांरित कर दिया।


सीमा आजाद द्वैमासिक पत्रिका ‘दस्तक’ की संपादक तथा पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) उत्तर प्रदेश के संगठन सचिव के बतौर नागरिक अधिकार आंदोलनों से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनके पति विश्व विजय छात्र आंदोलन और इंकलाबी छात्र मोर्चा के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। सीमा आजाद ने अपने लेखन व पत्रकारिता के जरिए और विश्व विजय ने अपनी राजनीतिक सक्रियता के जरिए पूर्वी उत्तर प्रदेश में मानवाधिकारों पर हो रहे दमन के खिलाफ लगातार आवाज उठायी। इन दोनों का कार्य क्षेत्र इलाहाबाद व कौशाम्बी जिले का कछारी क्षेत्र रहा है जहां माफिया, राजनेता व पुलिस की मिलीभगत से अवैध तरीके से बालू का खनन किया जा रहा है और इस प्रक्रिया में काले धन की कमाई के साथ-साथ मजदूरों का भीषण दमन और शोषण जारी है। इन दोनों राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने पुलिस-माफिया-राजनेता गठजोड़ के खिलाफ आवाज उठायी जिससे वे सत्ता की आंख की किरकिरी बन गए थे। ये दोनों युवा जिन गतिविधियों और क्रियाकलाप में लगे थे उन्हें न तो किसी भी तरीके से गैर कानूनी कहा जा सकता है और न उन्होंने कभी कोई ऐसा काम किया जो भारतीय संविधान द्वारा अपने नागरिकों को दिए गए अधिकारों के दायरे से बाहर हो। सीमा आजाद की पत्रिका ‘दस्तक’ ने उस गंगा एक्सप्रेस-वे योजना पर एक विस्तृत जांच की थी जिससे हजारों किसानों के उजड़ने का खतरा था। इसने आजमगढ़ के मुस्लिम युवकों की अंधाधंुध गिरफ्तारी और उत्पीड़न पर एक लंबी रपट प्रकाशित की थी। इन दोनों राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और अभी का फैसला पूरी तरह दुर्भावना से प्रेरित है और उन लोगों को सबक सिखाने के लिए है जो सरकारी तंत्र की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाते हैं और उत्पीड़ित लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं।


हम इस फैसले की घोर निंदा करते हैं और आम जनता से अपील करते हैं कि वह मामले की तह तक जाय और सरकार के इस जनविरोधी चेहरे को बेनकाब करे। हम अंग्रेजों द्वारा बनाए गए उस कानून को समाप्त करने की भी मांग करते हैं जिसके तहत आए दिन सामाजिक कार्यकर्ताओं को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है और सालों-साल बगैर मुकदमा चलाए जेलों में रखा जाता है। यही स्थिति विनायक सेन, प्रशांत राही और अरुण पेरेरा की हुई। ऐसी ही हालत में भारत की जेलों में सैकड़ों हजारों युवकांे को ‘देशद्रोही’ करार देते हुए बंद रखा गया है। सीमा आजाद और विश्व विजय का मामला सभी जनतंत्रप्रेमी लोगों के लिए एक चुनौती है जिसका मुकाबला डट कर किया जाना चाहिए।

Thursday, February 2, 2012

जयपुर साहित्योत्सव : पैसे का खेल

प्यारे मित्रो,
एक लम्बी ख़ामोशी के बाद एक बार फिर मैं आपकी महफ़िल में हाज़िर हूं. इधर बीच कई तरह की उलझनें रहीं, 28 दिसम्बर को मज़े की मोटर साइकिल दुर्घटना हो गयी. शायद पीड़ा का कोटा अभी पूरा नहीं हुआ था या शायद सेवा कराने का. जो भी हो, नये साल का पहला पखवाड़ा काफ़ी कष्ट में बीता. पर जैसा कि संगीतकार-विचारक कुमार गन्धर्व कहते थे, दुख हाथी की चाल आता है और चींटी की चाल जाता है, पर जाता ज़रूर है. सो, दुख-भरे दिन लगभग बीत चुके हैं. ज़माने ने एक करवट ली है, आज ही सुप्रसिद्ध ब्लोग "जानकी पुल डाट काम" संचालित करने वाले मेरे मित्र और हिन्दी के कथाकार प्रभात रंजन ने याद दिलाया कि मुझे डुबकी मारे बहुत दिन हो गये, लिहाज़ा मैं भी पिछला खाता साफ़ करके नयी बही के साथ उपस्थित हूं. नवम्बर से कलकत्ता के एक नये अख़बार "प्रभात वार्ता" के लिए एक स्तम्भ लिखना शुरू किया है. उसकी एक बानगी अपको इस बार मिलती रहेगी, मगर सबसे पहले जयपुर में हाल ही में सम्पन्न हुए साहित्योत्सव की चर्चा. तो लीजिये पेश है --


जयपुर साहित्योत्सव : पैसे का खेल

ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन-सा दयार है, हद-ए-निगाह तक जहां ग़ुबार-ही-ग़ुबार है.

हालांकि घर से चलने से पहले ही कुछ-कुछ अन्दाज़ा था कि इस बार का जयपुर साहित्योत्सव पहले से काफ़ी अलग साबित होने वाला है, मगर वह इस क़दर अजीबो-ग़रीब होगा इसका अनुमान किसी को नहीं था, यहां तक आयोजकों को भी नहीं. बेसाख़्ता मेरे दिमाग़ में "उमराव जान" की ये पंक्तियां कौंध उठीं.
अभी आयोजन में कई दिन बाक़ी थे कि भारत में जन्मे अंग्रेज़ी के लेखक सलमान रुशदी अचानक ही उस समय चर्चा में आ गये जब देवबन्द के उलूम की ओर से इस आयोजन में उनकी शिरकत पर विरोध किया गया. ज़ाहिर है, इस विरोध के पीछे उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव थे, क्योंकि रुशदी की किताब "शैतानी आयतें" पर उठे विवाद और उनके खिलाफ़ जारी किये गये फ़तवे तो कभी के दब-दबा गये थे. ख़ुद सलमान रुश्दी भी इधर कुछ ख़ास चर्चा में नहीं थे. देवबन्दियों का विरोध भी जनता के एक हिस्से की जनतान्त्रिक कार्रवाई ही थी. यही नहीं, भारत सरकार ने भी यह साफ़ कर दिया था कि रुशदी को बिना रोक-टोक हिन्दुस्तान आने का अधिकार है और वे कई बार यहां आ भी चुके हैं. लेकिन चूंकि रुशदी की भारत यात्रा पर विरोध देवबन्दियों की तरफ़ से हुआ था, इसलिए मामले ने कुछ और ही रंगत अख़्तियार कर ली और ऊपर से रुशदी ने यह कह कर उसे और भी उलझा दिया कि उन्हें विश्वस्त सूत्रों ने बताया है कि मुम्बई के किसी डौन ने उन्हें मारने की सुपारी दी है. हालांकि बाद में यह ख़बर रुशदी ही की उड़ायी हुई जान पड़ी, लेकिन इसका प्रकाशित-प्रसारित होना था कि सुरक्षा-व्यवस्था हरकत में आ गयी और इस आयोजन के शुरू होने से पहले ही सबसे बड़ा सवाल यह बन गया कि सलमान रुशदी उत्सव में भाग लेंगे कि नहीं. उद्घाटन वाले रोज़ तक कभी यह घोषणा होती कि वे आ रहे हैं, कभी यह कि वे पहले नहीं दूसरे दिन आयेंगे. आख़िरकार जब यह पता चल गया कि वे नहीं आ रहे तब भी उनकी छाया समारोह पर मंडराती रही क्योंकि उद्घाटन की शाम को चार लेखकों ने, जो रुश्दी ही की तरह अंग्रेज़ी में लिखते हैं और जिनमें से दो अमरीका में रहते हैं, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्ष में और रुशदी को न आने देने के विरोध में "शैतानी आयतों" के कुछ अंश सार्वजनिक रूप से पढ़ कर सुनाये. ज़ाहिर है, किताब पर अभी तक पाबन्दी लगी हुई है और लेखकों के इस क़दम ने न केवल उनके लिए, बल्कि आयोजकों के लिए भी ख़ासी परेशानी पैदा कर दी और उत्सव की एक निदेशक हड़बड़ा कर क़रीब ढाई सौ लेखकों को यह ईमेल भेजने पर मजबूर हुईं कि वे जो भी करें संविधान और क़ानून की हद में रह कर करें. विरोध प्रकट करने वाले चारों लेखकों को तुरत-फुरत जयपुर से रवाना करना पड़ा सो अलग. उत्सव के अन्तिम दिन आयोजकों ने रुश्दी की विडियो कौनफ़रेन्स कराने का जो बन्दोबस्त किया था, वह कुछ मुस्लिम संगठनों के विरोध के चलते रद्द करना पड़ा. एक औसत-से लेखक को मीडिया और राजनीति किस तरह हीरो बना सकती है, रुश्दी इसकी ताज़ा मिसाल हैं, क्योंकि वे पहले भी जयपुर साहित्योत्सव में आ चुके हैं और किसी के कान पर जूं भी नहीं रेंगी थी. दिलचस्प बात यह भी है कि तमाम तरह की स्वाधीनताओं की वकालत करने और पश्चिमी इशरत-ओ-आराम की ज़िन्दगी जीने वाले सलमान रुश्दी ने कभी दमन और उत्पीड़न के शिकार लोगों के पक्ष में आवाज़ बुलन्द नहीं की. न तो कश्मीरियों के पक्ष में, न पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों और आदिवासियों के पक्ष में. ऐसी हालत में हमेशा की तरह इस बार भी आख़िरी बाज़ी रुशदी के हाथ रही -- फिर से चर्चित होने का सुख और किताबों की बिक्री में आयी उछाल से बढ़ी हुई आमदनी.
बहरहाल, इस शुरुआती हंगामे को अलग करके देखें तो पांच दिन और 136 सत्रों में फैले इस आयोजन की प्रकृति, स्वरूप और प्रभाव के बारे में कई सवाल उठते हैं. पहला सवाल तो यही है कि इस आयोजन को कौन करा रहा है और किस उद्देश्य से. अगर आयोजकों के बयानों पर जायें तो सन 2006 में शुरू हुआ यह आयोजन प्रमुख रूप से कला, संगीत और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया था, ख़ास तौर पर साहित्य को. लेकिन जो देखने में आया वह ऐसा मंज़र था जिसमें गम्भीर साहित्यकार हाशिये पर थे और गुलज़ार, जावेद अख्तर, कपिल सिब्बल, अनुपम खेर, शशि थरूर, स्वामी अग्निवेश, चेतन भगत, बरखा दत्त, कबीर बेदी, अमरीकी मीडिया शख्सियत ओप्रा विन्फ़्रे, कवि सम्मेलनों में समां बांधने वाले कवि अशोक चक्रधर, फ़िल्मी गीतकार प्रसून जोशी और नये गुरु दीपक चोपड़ा जैसी सेलेब्रिटियां केन्द्र में. ऐसा लगता था कि यह साहित्य और संस्कृति का पेज थ्री है. चूंकि जानी-मानी शख्सियतों के प्रति लोगों का सहज आकर्षण होता है, इसलिए उत्सव में शामिल होने वाले श्रोताओं की एक बड़ी संख्या तो इसी से खिंच कर चली आयी थी. लेकिन इससे भी बड़ी संख्या उन लोगों की थी जो महज़ शनिवार-इतवार को थोड़ा रौनक़-अफ़रोज़ करने की ख़ातिर इस मेले में चले आये थे. एक समय तो समारोह में उमड़ी चली आ रही भीड़ ने बाहर सड़क पर आम आवा-जाही को भी बाधित कर दिया था. इन लोगों को न तो कला-संस्कृति से कुछ लेना-देना था, न वहां चल रहे कार्यक्रमों से. वे यहां-वहां मंडराते हुए तितलियों की तरह कभी इस सत्र पर पल भर रुकते, कभी उस कार्यक्रम में झांकते, शहर के इस पंच सितारा विरासती होटल डिग्गी पैलेस के परिसर में महंगी कौफ़ी-चाय और पेस्ट्री से ले कर इडली-दोसे और सैण्ड्विच उड़ाते हुए, सर्दियों की गुनगुनी धूप का मज़ा ले रहे थे. इतवार को तो ऐसा नज़ारा था कि बी.बी.सी. की पूर्व पत्रकार-प्रसारक रमा पाण्डे को कहना पड़ा कि यह उत्सव अब उत्सव नहीं रहा, भीड़ बन गया है.
इस बार के आयोजन की थीम भक्ति और हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाएं थी, मगर उन पर भी ज़्यादातर चर्चा अंग्रेज़ी में हो रही थी. कहा जाये कि अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत का बोलबाला था. वैसे भी, जो लेखक और प्रतिभागी बुलाये गये थे, वे उन्हीं लोगों में से थे जिनसे ईमेल और मोबाइल से सम्पर्क किया जा सकता था. इसलिए अगर उत्सव में घूमते समय कानों में उच्चाकांक्षी मध्यवर्ग द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली अंग्रेज़ी के टुकड़े पड़ रहे थे तो इसमें आश्चर्य कैसा. सारा आयोजन ही अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत में रंगा हुआ था -- प्रचार सामग्री से ले कर संचालन और दूसरी आयोजकीय कार्रवाइयों तक. ऐसे में बेचारे हिन्दी और देसी भाषाओं के लेखकों की क्या बिसात. वे तो जैसे प्रतीक स्वरूप वहां बुला लिये गये थे.
इसके अलावा एक ही समय में चल रहे चार-चार कार्यक्रमों ने भी इस साहित्य समारोह को तमाशे में बदल दिया था. यह ठीक है जिन लोगों की किसी ख़ास कार्यक्रम में दिलचस्पी थी, वे तो उसी कार्यक्रम में आदि से अन्त तक मौजूद रहते, मगर जो भारी भीड़ उमड़ आयी थी उसका भी एक हिस्सा इन सत्रों में जगह छेंक लेता और फिर बीच ही में गम्भीर श्रोताओं में खीज पैदा करता हुआ बाहर निकल आता, बिना यह सोचे कि अपनी इस ग़ैर ज़िम्मेदाराना हरकत से उन्होंने कुछ लोगों को कार्यक्रम से वंचित कर दिया है.
यों, अगर कार्यक्रमों पर नज़र डालें तो उनमें से कुछ बहुत मौज़ूं थे. सम्पादक-पत्रकार विनोद मेहता, पाकिस्तान से आये कवि मुहम्मद हनीफ़, सूफ़ी कवि-गायक मदन गोपाल सिंह, तेलुगू की दलित लेखिका गोगू श्यामला और पंजाबी कवि नवतेज भारती को सुनना ताज़गी-भरा अनुभव था. यहां तक कि दुख दरिद्रता के सरल उपाय बताने वाली अमरीकी मीडिया शख्सियत ओप्रा विन्फ़्रे ने भी कुछ समझदारी की बातें कहीं. भाषा, समाज और साहित्य के सवालों के इर्द-गिर्द बुने गये इन कार्यक्रमों को अगर सूझ-बूझ के साथ सजाया गया होता तो उनका प्रभाव पड़ सकता था. लेकिन अपने कुल स्वरूप में यह आयोजन बिखरा-बिखरा बन कर रह गया. हां, प्रतिनिधियों के तौर पर आये जिन लोगों की दिलचस्पी उस भव्य भोजन और विदेशी मदिरा पर थी जो नदी की तरह वहां बह रही थी या बहायी जा रही थी, उनके लिये आयोजकों ने सटीक इन्तज़ाम कर रखा था. पांच सितारा होटलों में ठहराने से ले कर लाने-ले जाने और महंगे उपहारों समेत दूसरी सभी सुविधाओं का बन्दोबस्त करने तक.
इसी को देख कर बारम्बार मन में सवाल उठता था कि जिस देश में भुखमरी और कुपोषण का दौर-दौरा है, विषमता ने महामारी की-सी सूरत अख़्तियार कर ली है, वहां ऐसा भव्य-दिव्य आयोजन किस तुफ़ैल में हो रहा है और इसके लिए पैसा किसने जुटाया है. और यही इस आयोजन का सबसे अंधेरा पक्ष कहा जा सकता है. शीर्ष पर तो बड़ी-बड़ी निर्माण परियोजनाओं के ठेके लेने वाली डी.एस. कंस्ट्रक्शन कम्पनी है, जिसने पिछले साल से दक्षिण एशियाई साहित्य के लिए 50 हज़ार डालर का पुरस्कार भी घोषित कर रखा है जो इस साल, श्रीलंकाई तमिल लेखक शेहन करुणातिलक को उनके पहले उपन्यास "चाइनामैन" पर दिया गया. 1979 में स्थापित डी.एस. कंस्ट्रक्शन कम्पनी ने पिछले सात वर्षों में अभूतपूर्व प्रगति की है और कौमनवेल्थ खेलों के घोटाले में भी बड़ी हद तक लिप्त है. लेकिन इस कम्पनी के अलावा इस आयोजन के पीछे रियो टिण्टो और शेल जैसे बहुराष्ट्रीय निगम भी हैं जिन्होंने खदान और तेल उत्खनन के क्षेत्र में लगातार मानवाधिकारों का हनन किया है.
शेल पर तो नाइजीरिया के फ़ौजी शासकों द्वारा वहां के अत्यन्त प्रतिष्ठित साहित्यकार, प्रसारक और पर्यावरण कार्यकर्ता केन सारो वीवा को फांसी की सज़ा दे कर मार डालने का भी आरोप है जो ओगोनीलैण्ड में पर्यावरण की क़ीमत शेल की निर्मम मुनाफ़ाखोरी का विरोध कर रहे थे. रियो टिण्टो ब्रिटिश-औस्ट्रेलियाई कम्पनी है, जो तीसरी दुनिया के देशों की खनिज सम्पदा को हासिल करने की फ़िराक़ में रहती है और अब उसकी नज़र हिन्दुस्तान पर है. यही वजह है कि उत्सव में आये विदेशियों में अंग्रेज़ और औस्ट्रेलियाई बहुतायत में थे. रही कोकाकोला कम्पनी तो उसका कच्चा-चिट्ठा सब जानते ही हैं. इन चौधरियों के नीचे छोटे-बड़े, देसी-विदेशी ढेरों कार्पोरेट घरानों के नाम हैं -- टाटा स्टील और आर.पी.-संजीव गोयनका समूह से ले कर बैंक औफ़ अमरीका और ग्लेनलिवेट शराब बनाने वाली कम्पनी तक.
कहना न होगा कि यह उस भूमण्डलीय अर्थ-व्यवस्था और लुटेरी पूंजी का सांस्कृतिक मुखौटा है, हमारे देश में जिसकी शुरुआत उदारीकरण के युग में नयी आर्थिक नीतियों से हुई थी और जो अब साहित्य-संस्कृति के माध्यम से अवाम में नहीं, तो कम-से-कम उस ख़ास वर्ग में स्वीकृति चाहता है जो उसकी चालों को समझने की क्षमता भी रखता है, और उससे लाभान्वित भी होता है. इसी वर्ग को अपने पाले में लाने और रखने की एक कोशिश यह उत्सव है. अकारण नहीं था कि एक ओर "अनकही कहानियां : माओवादी गुरिल्ले और भारतीय गणतन्त्र" वाले सत्र में बढ़ती हुई हिंसा-प्रतिहिंसा की छान-बीन थी, दूसरी ओर स्टीवन पिंकर यह साबित करने पर जुटे थे कि कैसे "हिंसा का ग्राफ़ लगातार नीचे गिरता चला गया है." ओसामा से ओबामा तक, इस्रायल से फिलिस्तीन तक और अफ़्रीका से ले कर लातीनी अमरीका तक -- चर्चा के केन्द्र में सिर्फ़ साहित्य ही नहीं, राजनीति भी थी.
यह भी एक विडम्बना ही कही जायेगी कि इस बार के समारोह का उद्घाटन भूटान की राजमाता आशी दोरजी वांग्मो वांग्चुक ने किया जो देश कि अपने यहां जनतन्त्र की मांग करने वालों को सख़्ती से कुचलने और राज शाही को बनाये रखने के लिए हर हर्बा आज़माने के लिए कुख्यात है.
लेकिन सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने बताया कि मूल रूप में यह आयोजन जयपुर विरासत फ़ाउण्डेशन द्वारा शुरू किया गया था जो राजस्थानी दस्तकारी को बढ़ावा देने लिए श्रीमती फ़ेथ सिंह ने स्थापित की थी. दस्तकारी के ख़रीदारों को इस प्रान्त और देश का परिचय देने के लिए एक छोटा-मोटा सांस्कृतिक आयोजन किया जाता था. उसी आयोजन को हथिया कर नयी व्यावसायिक सूझ-बूझ के साथ जयपुर साहित्य समारोह नींव रखी गयी और धीरे-धीरे जयपुर विरासत फ़ाउण्डेशन तो महज़ एक स्टाल में सिमट गयी, जबकि डिग्गी पैलेस पर नवधनाड्य सांस्कृतिक आयोजकों का क़ब्ज़ा हो गया. हैरत नहीं कि इस पंच सितारा साहित्योत्सव के बारे में एक प्रतिनिधि की टिप्पणी थी कि यह आयोजन पैसे का खेल, साहित्य और बाज़ार का मेल और सेलेब्रिटियों की रेलमपेल ही है.

२३-१-२०१२

Friday, October 28, 2011

युवा कविता पर कुछ नोटनुमा टीपें

निवेदन
नीचे दी गयी टिप्पणी मैंने दिल्ली के सत्यवती कालेज में हिन्दी कविता पर केन्द्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी बीज-वक्तव्य के रूप में पढ़ी थी और अब यह युवा कवि मुकेश मानस के सम्पादन में नयी पत्रिका "मगहर" के प्रवेशांक में आ रही है जो जल्द ही प्रकाशित हो रह है.आपकी प्रतिक्रिया का मैं इन्तज़ार करूंगा.


सारे दृश्य बदल रहे हैं

युवा कविता पर कुछ नोटनुमा टीपें


अभी समय लगेगा इसका स्वाद पहचानने में
अभी तो आलाप है पहला पहला
आने को है सातों सुरों में रचा गया राग
अभी समय लगेगा असली आनन्द पाने में
धैर्य से सुनें आप
कवि का नहीं, कविता का नहीं,
प्रयत्न का करें सम्मान, श्रीमान!

"नये कवि की कविता" शीर्षक से लिखी गयी अपनी यह कविता मुझे आज बेसाख़्ता याद आ रही है, जब मैं ख़ुद युवा कवियों और उनकी कविता का एक जायज़ा लेने की कोशिश कर रहा हूं. इस प्रयास में शायद मेरा भी निवेदन यही है कि मेरे प्रयत्न ही को ख़ातिर में रखियेगा. कारण यह कि वैसे तो किसी एक कवि या रचनाकार का मूल्यांकन भी, अगर ईमानदारी से किया जाय तो, ख़ासा संकटपूर्ण काम साबित हो सकता है, लेकिन एक समूचे दौर की और वह भी ख़ास यौर पर युवा रचनाशीलता का जायज़ा, मूल्यांकन या समीक्षा निर्विवाद रूप से अजाने जोखिमों से भरा और नाशुक्रा काम होता है, जिसमें दोनों ही पक्षों के असन्तुष्ट रह जाने की गुंजाइशें रहती हैं. कवियों को शिकायत होती है कि उन्हें या तो ठीक से समझा नहीं गया या फिर सही वज़न नहीं मिला. जायज़ा लेने वाले को यह आपत्ति होती है कि उससे गागर में सागर भरने की उम्मीद क्यों रखी गयी, जो बुनियादी तौर पर रचना का काम है, समीक्षा या जायज़े का नहीं. चुनांचे, मैं यह बात एकदम शुरू ही में साफ़ कर देना चाहता हूं कि एक तो मैं कोई पेशेवर आलोचक नहीं, आज के युवा कवियों का सहकर्मी हूं, थोड़ा उम्रदराज़ ही सही. ऐन सम्भव है कि मैं साथी कवियों की अपेक्षाओं पर खरा न उतर पाऊं. इसे मेरी कमज़ोरी ही मानियेगा, इरादतन किया गया कृत्य नहीं.
मेरी कोशिश आज की युवा कविता के बदलते परिदृश्य तो कुछ इस तरह अंकित करने की है, जैसे तेज़ रफ़्तार से चल रही कार से किसी विराट और पैनोरैमिक दृश्यावली की विडियो तस्वीर पेश करना. ज़ाहिरा तौर पर रेखाएं मोटी होंगी और वही ब्योरे दर्ज होंगे जो नुमायां हैं. कुछ ध्वनियां छूट जायेंगी. बारीक़बीनी की गुंजाइश इस काम में शायद नहीं है.अस्तु.
सबसे पहले तो यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि युवा कविता य युवा कवियों से मेरी मुराद क्या है. अपनी हिन्दी में तो आजकल भारतीय राजनीति का-सा हाल है. जैसे 50-50 साल के नेता राजनैतिक दल की युवा इकाई में बने रहते हैं, वैसे ही बहुत-से कवि भी लगभग अधेड़ावस्था तक "युवा" बने रहते हैं. लेकिन मेरा यह जायज़ा उन कवियों को ध्यान में रख कर किया गया है जिनका जन्म १९७० के बाद हुआ है. कुछ तो ऐसे भी कवि हैं जिन्का जन्म १९८० या उसके बाद हुआ है. दूसरे इनमें भी जिनकी पर्याप्त चर्चा हो चुकी है, जैसे व्योमेश शुक्ल या निर्मला पुतुल, उनकी बजाय मैंने ऐसे कवियों पर नज़र डालने की कोशिश की है जो अभी चर्चा में नहीं आये हैं मगर जिनमें मुझे सम्भावनाएं दिखायी दी हैं. इनमें से कुछ के तो संग्रह भी नहीं आये हैं.
वैसे, मेरे एक साथी ने यह सुझाया था कि युवा कवि भी पुरानी बात कर सकता है और किसी प्रौढ़ कवि की कविता से भी युवा ख़ुशबू आ सकती है. सिद्धान्तत: इस बात से इनकार न होते हुए भी यह मसला एक बिलकुल ही भिन्न आलेख की मांग करता है. यहां मेरा वह अभीष्ट नहीं है. मैंने तो नये बिरवों को ही निरखा-परखा है और उनके पातों पर निगाह डाल कर उनके होनहार होने का अनुमान लगाने का प्रयास किया है.न तो मैं सर्वज्ञ हूं, न कोई नजूमी. बल्कि मैं तो ख़ुद को इन सभी युवा साथियों का सहकर्मी मानता हूं और मेरा मक़सद न तो नसीहत देने का है न इस्लाह करने का, बल्कि इन साथियों की कुछ ख़ूबियों की तरफ़ इशारा करने और अगर मुझे लगा है कि उनकी राह में कुछ गड्ढे आने की आशंका है तो उनके प्रति सावधान कर देने का.

२.

जब मैं इस दौर पर निगाह दौड़ाता हूं, जिसमें ज़िन्दगी ख़ासी कठिन हो गयी है और हिन्दी के कथा साहित्य और कथेतर गद्य ने पिछले डेढ़-पौने दो सौ साल में काफ़ी मंज़िलें तय कर ली हैं, तो एक सवाल मेरे मन में बार-बार उठता है. क्या कारण है - कविता आज पहले से कहीं ज़्यादा तादाद में लिखी जा रही है ? कविता से शुरू करके कथा साहित्य में चले आने वाले राजेन्द्र यादव हालांकि कई बार कविता की मृत्यु की घोषणाएं कर चुके हैं तो भी कोई वजह तो होगी कि कविता लोगों को आज भी अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने का एक कारगर साधन जान पड़ती है.
युवा कवि रविकान्त ने कविता की ज़रूरत को रेखांकित करते हुए अपनी कविता "लिखना ज़रूरी लगा मुझे" में इस सवाल का तसल्ली-बख़्श जवाब देने की कोशिश की है --

मैं लिखता हूं
इसलिए नहीं कि मैं लिखना चाहता हूं
मैं न लिखता
यदि लिखने से
मुझे मेरे प्रश्नों के हल न मिले होते
लिखना ज़रूरी लगा मुझे
एक बड़े जीवन को
उसके छोटेपन से मुक्त करने ले लिए
मैं जानता हूं कि मैं असुरक्षित हूं यहां
पर सुरक्षा की क़िलेदारी भी नहीं चाहिये मुझे
कुछ खिड़कियां और उनके बाहर का पूरा आसमान
ज़रूरी है मेरे जीने के लिए
चूंकि स्वतन्त्रता पल-पल का उद्देश्य है
इसलिए कोई हथियार उठा कर चलना
ज़रूरी लगा मुझे

मेरे निकट यह कविता लिखने की या कहा जाय कि लिखने की ही बहुत वाजिब वजह है. प्रसिद्ध जर्मन कवि-नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख़्ट की एक उक्ति है -- सच लिखने में पांच कठिनाइयां :
१. सच को लिखने का साहस भले ही उसे हर जगह दबाया जा रहा हो;
२. सच को पहचानने की चतुराई;
३. उसे हथियार की शक्ल में उपलब्ध कराने की कला;
४. उसे फैलाने की होशियारी;
५. और उन लोगों को चुनने का विवेक जिनके हाथों में वह सबसे ज़्यादा असरदार साबित होगा.

युवा कवियों में से बहुत-से कवि ऐसे हैं जो इस उक्ति को जाने बग़ैर कमो-बेश इस पर खरे उतरते हैं, लेकिन यह भी सही है कि अनेक कवि इर्द-गिर्द के साहित्यिक माहौल के दबावों के चलते कविता तो लिखते हैं जनता के लिए, मगर उसे सुना आते हैं आई.आई.सी या हैबिटैट सेंटर के सभागारों में -- सच को लिखने की आख़िरी कठिनाई पर ध्यान दिये बिना. यह एक ख़तरा आज की युवा ही नहीं सारी कविता के सामने तो है ही.

बहरहाल, सभ्यता के विकास-क्रम में कविता और नाटक से शुरू कर के साहित्य की कई विधाएं जन्मीं और विलीन हुईं. यह सब ज़रूरत के तहत हुआ. अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने के लिए ही विधाओं का विकास हुआ और जो विधाएं बहुत दूर तलक रचनाकारों का साथ नहीं दे पायीं, वे छूटती चली गयीं. मिसाल के लिए चम्पू ही को ले लीजिये. एक समय में चम्पू अभिव्यक्ति की एक लोकप्रिय विधा थी. अब नहीं है. लेकिन अगर तमाम दोष-दर्शन के बाद भी कविता क़ायम है, तो यह विधा के रूप में उसकी शक्ति का सबूत तो है ही.
अल्बत्ता, इसमें एक ख़तरा भी छुपा हुआ है, जिस पर हम कवियों की नज़र अमूमन नहीं जाती और जिसके बारे में अर्सा पहले मैंने ध्यान दिलाया था. ख़तरा यह कि कई बार हम कविता से ऐसी उम्मीदें करने लगते हैं जो हमें अन्य विधाओं से करनी चाहिएं. अगर हाल के दौर पर नज़र डालें तो कुछ विधाएं उपेक्षा का शिकार हुई हैं. इसलिए नहीं कि बज़ाते-ख़ुद उनमें कोई ख़ामी या कमी है, बल्कि इसलिए कि साहित्य का जो सत्ता पक्ष है, मसलन आलोचना, पत्र-पत्रिकाएं, पुरस्कार देने वाली संस्थाएं, आदि, उन्होंने कुछ विधाओं पर अनावश्यक रूप से अधिक बल देना शुरू कर दिया है, जिसकी वजह से रचनाकारों ने भी उन विधाओं से हाथ खींच लिये हैं. ललित निबन्ध, व्यक्ति-चित्र, रिपोर्ताज, हास्य-व्यंग्य, यात्रा-विवरण, रेखा-चित्र, संस्मरण - ऐसी अनेक विधाएं हैं जिनकी ओर लेखकों का ध्यान कम-से-कमतर जाने लगा है. नतीजा यह कि कई बार वह कथ्य जो किसी और विधा का विषय है, जबरन कहानी या कविता में पिरोया जाने लगता है. मैं जानता हूं कि यह कहना उस बहस को आमन्त्रित करना है कि कविता फिर क्या है आख़िर ? मेरा अपना ख़याल है कि इस बहस को भी इस नये दौर में एक बार फिर से कर ही लेना चाहिये, यहां इसका मौक़ा तो नहीं है, पर मैं एक प्रस्थान बिन्दु सुझा रहा हूं. हमारे एक साथी कवि राजेश जोशि की एक कविता है "अहद होटल" जिसमें उन्होंने अपने शहर के एक होटल के अत्तेत और वर्तमान को याद करने के बहाने बदलते समय और समाज का एक चित्र पेश किया है. राजेन्द्र यादव ने अपनी कहानी "तलवार पंचहज़ारी" में भी कुछ-कुछ ऐसा ही किया था. अगर हम "अहद होटल" शीर्षक कविता को कहानी में ढालना चाहें तो बहुत मौश्किल नहीं पेश आयेगी, वैसे ही जैसे राजेश जोशी की तकनीक से "तलवार पंच हज़ारी" को एक कविता में ढाला जा सकता है. राजेश यों भी आख्यानमूलक कविता के समर्थक हैं. लेकिन मुक्तिब्ध की कविता "अंधेरे में" हमारे समय का एक बड़ा आख्यान होते हुए भी कहानी के रूपाकार में पेश नहीं की जा सकती.
एक आरोप जो हाल के वर्षों में कविता पर लगता रहा है वह यह कि आज कविता लिखना बहुत आसान हो गया है. छ्न्द की बन्दिश रही नहीं, रूप की दूसरी बन्दिशें, मसलन रस, अलंकार, आदि महत्व खो बैठी हैं, सो कुछ भी लिख दीजिये कविता हो जाता है. मगर क्या सचमुच ऐसा है ? अगर नहीं तो कविता ने आज अपने लिए कौन-सी कसौटियों की ईजाद की है ? कहीं इसी वजह से तो शायद पाठक कविता के सिलसिले में यह सवाल नहीं उठाते कि वह समझ में नहीं आती, या वह कविता जैसी नहीं लगती. मैं जानता हूं कि कई बार ये सवाल नाजानकारी में उठाये जाते हैं. पाठक एक विशेष प्रकार की कविता के अभ्यस्त होते हैं और नयी रचनाशीलता धैर्य और समझदारी की मांग करती है. और फिर ऐसे एतराज़ हमें उसी पुरानी बहस की ओर ले जाते हैं जिसका ज़िक्र मैंने अभी किया - कि कविता क्या है, जिसकी आज यहां बहुत गुंजाइश नहीं है. इसलिए मैं यहां बस आपका ध्यान इस पहलू की तरफ़ दिला कर एक और नुक़्ते की तरफ़ इशारा करूंगा जो मुझे कभी-कभी खटकता है.
सामाजिक विषमता की बात करते हुए क्या हमारा ध्यान इस ओर जाता है कि सामाजिक विषमता सिर्फ़ समाज तक ही महदूद नहीं है, वह सामाजिक गतिविधियों में भी नज़र आती है. मसलन रोज़मर्रा के काम-काज में. या फिर अगर साहित्य भी एक सामाजिक कार्रवाई है तो उस विषमता का अक्स साहित्य में भी दिखाई देता है क्या ? क्या कुछ विधाएं उच्चवर्गीय हैं, कुछ निम्न और कुछ बीच की. कुछ सवर्ण विधाएं हैं, कुछ दलित और कुछ बीच की जातियों की. अब यही देखिए कि नाटक एक उपेक्षित विधा है, भले ही कभी-कभी वह शाही ताम-झाम के साथ नज़र आती हो. आज तक किसी नाटककार को ज्ञानपीठ पुरस्कार नहीं मिला, कम-से-कम हिन्दी में; और साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी आज तक किसी नाटककार को नहीं दिया गया है. इसी तरह व्यंग्य पर अकेले परसाई को और कहानी की विधा पर निर्मल वर्मा और उदय प्रकाश को सहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया गया है. सब से दिलचस्प बात यह है कि सुरेन्द्र वर्मा को जो नाटककार के रूप में जाने जाते हैं नाटक पर नहीं उपन्यास पर पुरस्कृत किया गया. कविताओं में नाटकीय लम्हे नज़र आते हैं पर नाटक बज़ाते-ख़ुद अछूत बना हुआ है.
एक ज़माना था कि कविता - या कहा जाय छ्न्द - ही सहित्यिक अभिव्यक्ति का एकमात्र साधन था. लेकिन जैसे-जैसे समाज विकसित हुआ कविता और नाटक के साथ अन्य विधाएं भी ईजाद की गयीं क्योंकि यह महसूस किया गया कि ऐसा बहुत कुछ है जो कविता की पहुंच से बाहर है, भले ही किसी काव्यात्मक कृति का कलेवर कितना ही विराट क्यों न कर दिया जाये. इसी ज़रूरत के चलते कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, यात्रा विवरण, ललित निबन्ध, आलोचना, आदि अनेक विधाएं सामने आयीं और अच्छे-ख़ासे समय तक फलती-फूलती रहीं. फिर धीरे-धीरे पहिया उलटी तरफ़ चलने लगा. ले-दे कर कविता, कहानी और उपन्यास -- इन्हीं तीन विधाओं का वर्चस्व साहित्य की वसुन्धरा पर दिखायी देने लगा. और बीच-बीच में इनके बीच में भी ऊंच-नीच की होड़ नज़र आने लगी. इसके सामाजिक कारणों की खोज ज़रूरी है. कहीं ऐसा तो नहीं है कि सामाजिक समता की लड़ाई जैसे-जैसे हाल के वर्षों में कमज़ोर हुई है, वैसे-वैसे सामन्ती मूल्यों की वापसी के साथ जातीय कट्टरता बढ़ी है, और इससे हुआ यह कि साहित्य में भी एक श्रेणी विभाजन हो गया है. वरना क्या कारण है कि बीसवीं सदी के शुरुआती पांच-छै दशकों तक अनेक साहित्यकार अनेक विधाओं में लिखते थे. कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने एक या दो विधाओं में ही रचनाएं कीं मगर वे अन्य विधाओं के प्रति असहिष्णु नहीं थे. यह तो हाल के वर्षों में हुआ है कि विधाओं और उनके अलमबर्दारों के बीच खींचातानी शुरू हुई है. राजेन्द्र यादव ने अगर कविता का फ़ातिहा पढ़ दिया तो अशोक वाजपेयी ने कविता के बाहर न झांकने की क़सम खा ली. मेरे निकट यह रवैया न तो कविता के लिए श्रेयस्कर है, न गद्य के लिए.


३.

इस हालत में जब हम कविता के मौजूदा परिदृश्य पर निगाह डालते हैं तो कविता की वसुन्धरा बहुत हरी-भरी नज़र आती है. केदारनाथ सिंह और कुंवर नारायण जैसे वयो-वृद्ध कवियों से ले कर अनुज लुगुन, मुकेश मानस, मुकुल सरल और रजनी अनुरागी तक -- कवियों की तीन-चार पीढ़ियां इस समय सक्रिय हैं. सिर्फ़ सक्रिय ही नहीं हैं, बल्कि उनमें आश्चर्यजनक विविधता भी दिखायी देती है और कहना न होगा कि सबसे ज़्यादा विविधता हमारे युवतर साथियों में है. युवा कवियों में अगर हम गिरिराज किराडू और अशोक पाण्डेय से ले कर पूनम तुषामड़, आस्तीक वाजपेयी और महेश वर्मा की कविताओं को देखें तो विषय, कथ्य और अन्दाज़-ए-बयां के लिहाज़ से -- उसी वसुन्धरा वाले रूपक को अगर और आगे बढ़ा कर कहूं तो -- एक विशाल उपवन हमें फलता-फूलता नज़र आता है. एक ओर अगर वह सीधी-सपाट शैली है जो साठ और सत्तर के दशक की कविता की शक्ति थी तो दूसरी ओर वह वक्रता है जो बीसवीं सदी के अन्तिम दशक की कविता ने अपने समय की जटिलता को अभिव्यक्त करने के लिए अपनायी. इसके साथ-साथ एक खिलन्दड़ापन भी है -- भाषा को नये ढंग से बरतने के सिलसिले में -- जो श्रीकान्त वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल जैसा न होते हुए भी उनके प्रयोगों की याद कराता है. मिसाल के लिए महेश वर्मा की कविता "पानी" में उनका ख़ास रंग --

पानी
अब वही काम तो ठीक से करता , वहाँ भी / पिछड़ ही गया वाक्य सफ़ेद कुर्ते में पान खाकर / तर्जनी से चूना चाटने की तरह कहा जाता
जहाँ उसी आसपास साईकिल अब कौन चढता है / प्रश्न के उत्तर की तरह चलता हुआ ब्रेक इसलिए / नहीं लगा पा रहा था कि रुकते ही प्यास
लगेगी. बिना अपमान के सादा पानी छूंछे / पीकर निकल जाना मुश्किल होते जाने के शहर / में या तो मंत्री हो गए सहपाठी का किस्सा सुनाते
परचूनिए से उधार ले लूं या पत्रकार बन जाऊं के विकल्प / को छोड़ कर कविता लिखना तो ट्यूशन पढ़ाने से भी
कमज़ोर काम कि पीटने के लिए छात्र और दांत / दिखाने के लिए विद्यार्थी की महिला रिश्तेदार भी
नहीं . धूप में साइकिल कहीं रोकने में पुराने पंक्चर / के खुलने का डर तो इस दोगलेपन का क्या / कि जो दरवाजा जीवन से कविता की ओर खुलता
वही दरवाजा कविता से जीवन में लौटने का नहीं.

इसी के बरक्स गिरिराज किराडू का अपना अन्दाज़-ए-बयां है --

रूपकों पर घिर आयी है एक बेरहम अजनबी छाया
कभी सपने जैसी भाषा में वे तैरते थे आँखों के आगे आपकी कविता की तरह
कितना निकट आना होता है आपकी कविता के
उसके जैसा न होने के लिए विनोदजी
एक उम्र गुजर रही है उस निकटता को पाने में
आप अपने नगर में आदिवास करते हुए मगन होंगे
जब सबसे छूट कर आपसे भी छूट जाऊंगा
हर तरफ हर बोली में लोग लाउडस्पीकर पर एक झूठा छत्तीसगढ़ बना रहे होंगे
आप मेरा आख़िरी रूपक हैं कह कर देखता हूं मीर को दस महीने के बच्चे को
मीर कहना उसे उस ख़ाली जगह रखना है जो
भविष्य के नमस्कार हो जाने से बनी है
सदा ख़ुश रहिये यूं ही लिखते रहिये मेरा आशीर्वाद है आपको

लेकिन इस सब का स्वागत करते हुए हमें उन ख़तरों के प्रति जागरूक रहना चाहिए जो बहुत अधिक कला से पैदा होते हैं. इस सिलसिले में रघुवीर सहाय की एक पंक्ति मुझे हमेशा याद आती रहती है और एक कसौटी का-सा काम करती है कि "जहां बहुत अधिक कला होगी वहां परिवर्तन नहीं होगा." सो, हमें कला का दामन वहीं तक थामे रहना है जहां तक वह परिवर्तन से हमें विमुख न करे.
गिरिराज किराडू की एक और विशेषता है. अक्सर उनकी कविता पहले के साहित्य से वस्तु या विषय या ख़याल या सन्दर्भ ग्रहण करती है, यों कहें कि उड़ान भरती है. इस प्रवृत्ति के बारे में अशोक वाजपेयी ने बहुत लिखा है और उसकी ताईद की है. लेकिन जब वह एक कवि का मुहावरा बनने लगे तो ? या फिर पाठक से यह अपेक्षा रखने लगे कि उसे भी उतना सुपठित-बहुपठित होना होगा जितना कि कवि तो ? ऊपर की कविता को लीजिये. ज़ाहिर है कि जो हिन्दी कविता से परिचित हैं वे तो जान जायेंगे कि इसमें कवि विनोद कुमार शुक्ल की बात हो रही है जो रायपुर में रहते हैं और जिनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ रचा-बसा है. मगर जो इस बात को नहीं जानते उनका क्या होगा ? वैसे जहां तक ख़ुद विनोद जी का ताल्लुक़ है, उनकी कविता में ऐसे लटके-झटके नहीं हैं. मिसाल के लिए उनकी कविता की एक बानगी पेश है -- "हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था मैं उस व्यक्ति को नहीं जानता था पर मैं हताशा को जानता था मैं ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया वह मुझे नहीं जानता था पर हाथ बढ़ाने को जानता था हम कुछ दूर साथ साथ चले हम एक दूसरे को नहीं जनते थे पर साथ साथ चलने को जानते थे."
इस सन्दर्भ में मुझे अक्सर एज़रा पाउण्ड की चुनी हुई कविताओं पर लिखी गयी टी.एस.एलियट की भूमिका के उस अंश की याद हो आती है जहां वे मौलिकता की चर्चा करते हुए कहते हैं कि "सच्ची मौलिकता महज़ विकास है; और अगर वह सही विकास है तो अन्त में वह इतना अनिवार्य महसूस हो सकता है कि हम लगभग उस नज़रिये तक पहुंच जायें कि हम कवि को "मौलिकता" के गुण से पूरी तरह रहित ठहरा बैठें...एक सतही-सी कसौटी है जिसके अनुसार मौलिक कवि सीधा जीवन की ओर जाता है और ’डेरिवेटिव’ यानी उद्भूत कवि ’साहित्य’ की ओर. जब हम इस मामले को परखते हैं तो हम पाते हैं कि जो कवि सचमुच "उद्भूत" है वह साहित्य को जीवन समझने की भूल कर रहा है और अक्सर इस भूल का कारण यह होता है कि उसने काफ़ी कुछ पढ़ा नहीं होता."
ज़ाहिर है कि गिरिराज के सिलसिले में यह मानने की भूल नहीं की जा सकती कि वे जीवन और साहित्य में अन्तर न कर पाते होंगे या उन्होंने काफ़ी कुछ पढ़ा न होगा, तो भी यह सवाल रह ही जाता है कि इस हद तक साहित्य को कविता का उपजीव्य बनाने की ज़रूरत क्यों महसूस की जाती है ? जिन पाठकों को उन सन्दर्भों का पता नहीं है, वे ऐसी कविताओं को कैसे समझ पायेंगे, समझने शब्द से अगर एतराज़ हो तो उसकी जगह आप बेखटके आनन्द रख दीजिये? यह प्रवृत्ति महेश वर्मा की कविता "रेमेदिओस" और प्रत्यक्षा सिन्हा की कविताओं में भी दिखायी देती है. "रेमेदिओस" लातीनी अमरीका के प्रसिद्ध उपन्यासकार गेब्रियेल गार्सिया मार्केज़ के उपन्यास "एकाकीपन के सौ वर्ष" की एक पात्र है. जिन्होंने मार्केज़ का उपन्यास नहीं पढ़ा है, वे इस सन्दर्भ को कैसे समझ पायेंगे ? निराला जब "सरोज-स्मृति" में कहते हैं "ऐसे शिव से गिरिजा विवाह करने की मुझको नहीं चाह" तो उन्हें कविता के नीचे फ़ुटनोट लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती.
इसके साथ ही युवा कविता में यह प्रवृत्ति भी दिखायी देती है कि कवि अपनी अलग राह खोजने के कठिन काम से बचने के लिए पहले की आज़मायी हुई हिकमतों से काम लेते हैं. यह प्रवृत्ति ख़ास तौर पर उन कवियों में दिखायी देती है जिनके पास चुस्त-दुरुस्त भाषा है. वे एक मुहावरा पकड़ते हैं और जल्दी से स्वीकृत कवियों की सफ़ में आने की जुगुत बैठाने लगते हैं. इसीलिए कई बार उनकी कविताओं में पहले के किसी प्रतिष्ठित कवि की झाईं नज़र आती है. पिछली पीढी के एक कवि की सलाह - "चालाक फ़िकरों से बच कर लिखो एक छोटा-सा सच और देखो कि वह कितना कारगर होता है" - उन्हें बेमानी लगती है. यक़ीनन कविता इर्द-गिर्द की दुनिया पर ही लिखी जायेगी, देखना तो यह है कि कवि उस दुनिया को कैसे पेश कर रहा है. क्या वह इस देखी गयी दुनिया के अनदेखे पहलू उजागर कर रहा है ? चीज़ों को नये कोण से देख और दिखा कर हमें उन्हें बदलने की लड़ाई में और होशमन्द बना रहा है या नहीं. इसलिए एक सवाल जो नये कवियों को अपने से पूछना होगा - और यह एक कसौटी का काम भी कर सकता है - कि कवियों ने अपने विषयों का चुनाव करने के साथ-साथ उन्हें अभिव्यक्त करने के कितने तरीक़े इस्तेमाल किये हैं. हमेशा से अभिव्यक्ति के चार तरीक़े होते हैं -- पुरानी बात को पुराने ढंग से कहना, बात पुरानी हो मगर नये ढंग से कही जाय, नयी बात पुराने ढंग से कही जाय और नयी बात नये ढंग से कही जाय. कविता की आज़मायी हुई कसौटियों में "उपज" को काफ़ी अहमियत दी गयी है. यही वह गुण है चीज़ों को नये पहलू से देखने का जिसके बल पर कविता अपनी परम्परा से जुड़ती है. प्रेम एक पुराना विषय है और जब से कविता कही-लिखी जाती रही है अपनी जगह पर मौजूद रहा है. देखना यह होगा कि उसके साथ कवि ने क्या सुलूक़ किया है और कविता प्रेम के साथ-साथ इर्द-गिर्द के जीवन के कौन-से नये पहलू खोलती है.

४.

इसी सन्दर्भ में एक और पंक्ति का ज़िक्र करना चाहता हूं जो मुक्तिबोध अक्सर नये-से-नये मिलने वाले से पूछ बैठते थे -- पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है ? यह लट्ठमार-सा प्रश्न उनकी ज़िन्दगी और कला का तो मूलमन्त्र बना ही रहा, आगे आने वालों के लिए भी एक ज़रूरी सवाल बन गया. यहां आप सब के सामने, जो कविता में ख़ूब रसे-पगे हैं, इस बात पर बल देने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि आप सब जानते हैं कि दुनिया की श्रेष्ठतम कविता राजनीति से किनारा करके नहीं, बल्कि राजनीति से जुड़ कर लिखी गयी है. और यह भी हम जानते हैं कि अगर कविता जनोन्मुखी नहीं है तो वह अपना फ़र्ज़ नहीं अदा कर सकती. मुझे याद आता है कि आपातकाल के दौरान और उसके बाद जब "कविता की वापसी" के दौर में कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने वाम राजनीति से जुड़े लोगों पर चोट करते हुए कविता में "फूल-पत्ती-बच्चे-प्रेम" की गुहार लगायी थी तो हमारे मित्र ज्ञानरंजन ने "पहल" के एक सम्पादकीय में नेरूदा या नाज़िम हिकमत के हवाले से लिखा था कि घोषित राजनीति कला को चमकाती है. इसमें कोई शक नहीं है कि राजनैतिक कविता का अर्थ सिर्फ़ गोली-बन्दूक पर लिखी कविता नहीं है, एक प्रेम कविता भी राजनैतिक कविता हो सकती है, होती है. और यह भी छिपी हुई बात नहीं है कि जो कहते हैं कि उनकी कोई राजनीति नहीं है, उनकी भी एक राजनीति होती है.सवाल तो पक्ष का है. यह तय करने का है कि किस ओर हो तुम.

यह छोटा-सा नोट लिखने का ख़याल मुझे तब आया जब युवा कविता पर सोच-विचार करते हुए मैंने हिन्दी "आउटलुक" में पत्रकार और प्रतिभाशाली कवि-कहानीकार आकांक्षा पारे की दो कविताएं पढ़ीं --"घर" और "कैसे हो सकता है ऐसा." पहली कविता में आकांक्षा ने सड़क किनारे कच्चे घरों और उन में रहने वालों की तस्वीर खींची है --

सड़क किनारे तनी हैं / सैकड़ों नीली, पीली पन्नियां / ठिठुरती रात / झुलसते दिन / गीली ज़मीन / टपकती छत के बावजूद / गर्व से वे उन्हें कहते हैं घर.
कल की फ़िक्र किये बिना / वे जीते हैं आज / कभी अतिक्रमण / कभी सौन्दर्यीकरण / कभी बिना कारण / उजाड़ दिये जाते हैं वे
बिना शिकन बांधते हैं वे / अपनी ज़मीन / अपना आसमान / निकल पड़ते हैं / सड़क के नये किनारे की तलाश में

ज़ाहिर है कि सड़क किनारे रहने वालों की दुनिया हमारे आधुनिक शहरी जीवन की एक हक़ीक़त है, जिसे हम कई बार देख कर भी अनदेखा कर देते हैं. पर इस कविता में औपरेटिव शब्द है "घर" - जो आकांक्षा की कविता के अनुसार "चूल्हे की राख, पेट की आग, सपनों की खाट, हौसले का बक्सा, उम्मीदों का कनस्तर" अपने भीतर समोये हुए है. और घर इन्हीं चीज़ों से तो बनता है. क्या आम तौर पर घर कहते समय इन चीज़ों का बिम्ब हमारे सामने उभरता है ? शायद नहीं, इसीलिए यह कविता अपनी सादगी में भी मानीख़ेज़ बन जाती है.
लेकिन जब मैंने आकांक्षा की दूसरी कविता "कैसे हो सकता है ऐसा" पढ़ी तो लगा कि कवित जितना उजागर कर रही है, उस से ज़्यादा छिपा रही है --

कैसे हो सकता है ऐसा जंगल में जब हार रही हो ख़ाकी वर्दी
उजड़ रहे हों सैनिकों के घर तब दो खिलाड़ियों के घर बसाने की चिन्ता में चर्चा करते रहें तमाम दिग्गज
विधवाओं के विलाप करते चेहरों पर ध्यान दिये बिना
चमकते रहें दो खिलाड़ियों के चेहरे टीवी पर दिन भर

इस कविता के साथ एक नोट भी आकांक्षा पारे ने दिया है -- "छत्तीसगढ़ में 72 सैनिकों की शहादत के बजाय सानिया की शादी और आईपीएल को टीवी पर ज़्यादा तवज्जो दिये जाने पर."

पहली बात तो यह है कि छत्तीसगढ़ में मारे गये सैनिकों से सम्बन्धित समाचार और इस घटना पर चर्चा किसी मानी में टीवी पर कम नहीं हुई थी. इसलिए अगर सानिया मिर्ज़ा या आईपीएल की चर्चा को ज़्यादा तवज्जो दी गयी तो यह कोई नयी बात नहीं. मेरा सवाल यह है कि मीडिया ही की तरह कवयित्री को छत्तीसगढ़ में पुलिस और तमाम तरह के सशस्त्र बलों के शिकार आदिवासी नज़र नहीं आये, उनकी बलत्कृत औरतें और बेटियां दिखायी नहीं दीं, पुलिस द्वारा हेमचन्द्र पाण्डे जैसे सहकर्मी पत्रकार की निर्मम हत्या ने उद्वेलित नहीं किया, आज़ाद और दसियों लोगों के झूठे एन्काउण्टरों ने संवेदित नहीं किया, उनकी नज़र गयी तो वहां जहां हमारी हत्यारी सरकार और गृह मन्त्रालय चाहता है कि जाये. वे अगर मात्र कवयित्री होतीं तो शायद यह चूक राजनैतिक समझ की कमी कही जा सकती थी, पर वे उस पत्रिका से जुड़ी हैं जिसने आदिवासियों की हालत के बारे में अरुन्धती राय के दिल दहलाने वाले लेख प्रकाशित किये हैं. ऐसी हालत में जब इसी वसुन्धरा पर आकांक्षा पारे के यह कविता और अनुज लुगुन और निर्मला पुतुल की कविताएं एक साथ मौजूद हों तो जांच-परख का पैमाना क्या होगा ? क्या हम मुक्तिबोध के सवाल से बच कर चलने का खतरा मोल ले सकते हैं ?

वैसे तो कविता की कसौटियां समय-समय पर बदलती रहती हैं, लेकिन कविता को जांचने के कुछ तरीक़े अब भी कारआमद साबित होते हैं. मसलन, जब हम कविता का, एक पुराना शब्द इस्तेमाल करूं तो, रसास्वादन करने से आगे बढ़ कर उसकी परख करने के काम की तरफ़ बढ़ते हैं तो हमें अनिवार्य रूप से कविता के बाहर आना पड़ता है, वैसे ही जैसे वास्तु-शिल्प के किसी नमूने का अन्दाज़ा हम अन्दर से कभी पूरी तरह नहीं लगा सकते. अगर हमारी आंखें बन्द करके हमें उस भवन में छोड़ दिया जाये तो हम कभी उसके रूपाकार के बारे में नहीं जान सकते चाहे हम उसके भीतर कितने ही दिन क्यों न बितायें. कविता को, या कहें कि साहित्य को, परखने के लिए हमें उसके बाहर आना ही पड़ेगा/पड़ता है भले ही कविता की जांच कविता के भीतर से करने की जितनी भी वकालत की जाये. और कविता के बाहर क्या है ? ज़ाहिर है, वह समय और उस समय का समाज जिसमें कविता लिखी जा रही है. इसीलिए कविता के बारे में कोई राय व्यक्त करते समय हम सबसे पहले यह देखते हैं कि जिस समय की कविता है, क्या उस समय की झाईं कविता में नज़र आ रही है या नहीं. यह सवाल उस समय और भी ज़रूरी हो उठता है जब चारों तरफ़ का समय और समाज तेज़ी से बदल रहा हो. युवा कवि मुकुल सरल ने अपनी एक कविता में इसी हक़ीक़त की तरफ़ इशारा किया है और एक वाजिब सवाल उठाया है -

सारे दृश्य बदल रहे हैं / कौन हो तुम? / साथ मेरे / हाथ थामे / जा रहे हैं हम कहां...

लेकिन कविता के अन्त तक पहुंचते-पहुंचते यह सवाल बदल जाता है --

सारे दृश्य बदल रहे हैं / कौन हो तुम / साथ उनके! / जा रहे हो / तुम कहां...?

लेकिन दृश्य तो हमेशा बदलते रहते हैं. ऐसा कोई समाज नहीं जो किसी विशाल चट्टान की तरह स्थिर और परिवर्तन की प्रक्रिया से अछूता रहा हो. सवाल तो यह है कि तब्दीली का स्वरूप क्या है और कारण कौन-से हैं. मुकुल इस तब्दीली के कारण कविता के उस अंश में स्पष्ट करते हैं जो इन दो उद्धरणों के बीच है. पृथ्वी की सुन्दरता की तरफ़ इशारा करते और इसी जगह घर बनाने की हसरत दर्ज करते हुए वे उस ओर भी नज़र डालते हैं, जहां आज लोग "कर रहे एक और विश्वयुद्ध की तैयारी." मुकुल को इस बात का पूरा एहसास है कि पागलपन दोनों ओर है, उनमें भी जो हथियार बना रहे हैं और उनमें भी जो हथियार जमा कर रहे हैं --

कर लिये कितने जमा हथियार घातक
एक हम-तुम दीखते पागल-दीवाने
घात में बैठे हैं ले कर बम विनाशक
जाने कब संहार कर दें इस जहां का

जिस बदलती हुई दुनिया के चित्र मुकुल अपनी कविताओं में दर्ज करते हैं वह हमारे समय ही की उत्तरोत्तर क्रूर और ख़ूंख़ार होती दुनिया है, जिस की छवियां हमें आज की युवा कविता में बराबर मिलती हैं. मिसाल के लिए मृत्युंजय की कविता में छत्तीसगढ़ के हवाले से --

"बस्तरिया मैना के कण्ठ में उग आये कांटे...
अबकी बसन्त में टेसू के लाल फूल
सुर्ख़-सुर्ख़ रक्त चटख झन-झन कर बज उट्ठे
ख़ून की होली जो खेली सरकार बेक़रार ने."

या फिर अशोक पाण्डेय की कविता "अरण्यरोदन नहीं है यह चीत्कार" में --

"यह पहला दशक है इक्कीसवीं सदी का
एक सलोने राजकुमार की स्वप्नसदी का पहला दशक
इतिहासग्रस्त धर्मध्वजाधारियों की स्वप्न सदी का पहला दशक
पहला दशक एक भूमण्डलीय धुरी पर घूमते गांव का
सबके पास हैं अपने अपने हिस्से के स्वप्न
स्वप्नों के प्राणान्तक बोझ से कराहती सदी का पहला दशक.

"स्वप्नों के प्राणान्तक बोझ से कराहती सदी " के इस पहले दशक में कुछ और भी स्वप्न हैं जिनकी शिनाख़्त हमें अनुज लुगुन और निर्मला पुतुल की कविताओं में होती है. अनुज लुगुन की कविता "हमारी अर्थी शाही नहीं हो सकती तो शुरू ही सपनों के ज़िक्र से होती है :

हमारे सपनों में रहा है
एक जोड़ी बैल से हल जोतते हुए
खेतों के सम्मान को बनाए रखना
हमारे सपनों में रहा है
कोइल नदी के किनारे एक घर
जहाँ हमसे ज्यादा हमारे सपने हों

और इन्हीं सपनों में है एक चाहत :

कि जंगल बचा रहे
अपने कुल-गोत्र के साथ
पृथ्वी को हम पृथ्वी की तरह ही देखें
पेड़ की जगह पेड़ ही देखें
नदी की जगह नदी
समुद्र की जगह समुद्र और
पहाड़ की जगह पहाड़

लेकिन यह कोई थोथी स्वप्नदर्शिता नहीं है, क्योंकि अनुज लुगुन को मालूम है कि -

हमारी चाह और उसके होने के बीच एक खाई है
उतनी ही गहरी
उतनी ही लम्बी
जितनी गहरी खाई दिल्ली और सारण्डा जंगल के बीच है
जितनी दूरी राँची और जलडेगा के बीच है


और है इसके बीच "खड़े होने की जि़द" और इस ज़िद पर टिके रहने का संघर्ष.

ज़ाहिर है कि यह उत्तरोत्तर जटिल होती दुनिया के बिम्ब हैं, उस दुनिया के जिस में मनुष्यविरोधी ताक़तें प्रतिरोध के बावजूद बार-बार उभरती हैं. मृत्युंजय ने अपनी कविता "कीमोथेरेपी" में बड़ी दक्षता से इस लड़ाई को मनुष्य के शरीर में होने वाले कैंसर और कीमोथेरेपी से उसके इलाज के रूपक द्वारा व्यक्त किया है. वे बड़ी खूबी से शरीर के कैंसर से परत-दर-परत पूंजीवाद का रूपक गढ़ते हुए इस संघर्ष को एक नयी नज़र से देख कर अंकित करते हैं. शरीर में कैंसर की मौजूदगी को संकेतित करते हुए जब वे लिखते हैं कि "यह एक समरभूमि है यहां लाख नियम एक साथ चलते हैं व्यूह भेद की लाख कलाएं लाखों मोर्चे एक ही वक़्त में एक ही जगह पर खुले रहते हैं" तो यह अन्दाज़ा नहीं होता कि वे उस विराट प्रक्रिया का ज़िक्र कर रहे हैं जो शरीर के अन्दर नहीं बाहर चल रही है और कविता की अन्तिम पंक्तियों में जब यह साफ़ होता है कि "कीमोथेरेपी की इस समरगाथा में कटे-फटे टुकड़े मनुष्यता के / पूंजी की भव्य-निर्जल चट्टानों पर यही कथा रोज़-रोज़ दुहराई जाती है" तो कविता एक सर्वथा नया अर्थ ग्रहण कर लेती है.

जिन कवियों ने राजनीति से परहेज़ किये बिना कविता का सफ़र तय करने की कोशिश की है उन में अच्युतानन्द मिश्र और सन्तोष चतुर्वेदी के नाम लिये जा सकते हैं. हालांकि अच्युतानन्द की कविता में कहीं-कहीं अवसाद की हल्की सी अन्तर्धारा महसूस होती है, उनकी कविता "इस बेहद संकरे समय में" मिसाल की तरह पेश की जा सकती है :


वहाँ रास्ते खत्म हो रहे थे और
हमारे पास बचे हुए थे कुछ शब्द
एक फल काटने वाला चाकू
घिसी हुई चप्पलें
कुछ दोस्त

हमारे सिर पर आसमान था
और हमारे पाँवों को जमीन की आदत थी
और हमारी आँखें रोशनी में भी
ढूँढ़ लेती थीं धुंधलापन

हम अपने समय में जरूरी नहीं थे
यही कहा जाता था
गोकि हम धूल या पुराने अखबार
या बासी फूल या संतरे के छिलके
या इस्तेमाल के बाद टूटे हुए
कलम भी नहीं थे,
हम थे
और हम बस होने की हद तक थे

लेकिन तिस पर भी वे अगर आत्म-दया में नहीं डूबते तो इसका श्रेय उनकी राजनैतिक प्रतिबद्धता ही को दिया जा सकता है, जो अचानक नहीं, बल्कि एक सचेत रूप से किया गया फ़ैसला है. इसीलिए कविता के अन्त में हताशा नहीं, बल्कि उम्मीद का स्वर ही उभरता है :

हमारी आँखों में
चमक रहे थे सूरज
और पैरों में दर्ज होने लगे थे
कुछ गुमनाम नदियों के रास्ते
खुद के होने की बेचैनी
और रास्तों की तरह बिछने का हौसला भी था।

सभ्यता की शिलाओं पर
बहती नदी की लकीरों की तरह
हम तलाश रहे थे रास्ते
एक बेहद सँकरे समय में!

और जहां अच्युतानन्द सीधे-सीधे राजनैतिक वस्तु को उठाते हैं, मसलन "म्यांमार की सड़कों पर ख़ून नहीं था" तो उनकी कविता में वैसी ही धार आ जाती है, जैसी मृत्युंजय जैसे उनके अन्य साथियों में. हां, यह ज़रूर ख़याल उन्हें रखना होगा कि वे भाषा के साथ चाहे जो सुलूक़ करें, व्याकरण को सही रखें. "कि" की जगह "की" का प्रयोग खटकता है और कई बार लिंग-प्रयोग में भी वे डगमगाते हैं.

युवा कवियों में सन्तोष चतुर्वेदी शायद उन गिने-चुने कवियों में हैं जिनकी कविताओं की लम्बाई पहले के दौर की याद कराती हैं, भले ही वे मौजूदा दौर की तस्वीरें उकेर रहे हों. "पेनड्राइव समय" हो या "मोछू नेटुआ" या "मां का घर" -- सन्तोष चतुर्वेदी की कविताओं का कलेवर आज की औसत कविताओं से ज़्यादा लम्बा है. इसके अलावा एक ओर नेटुआ और दूसरी ओर पेनड्राइव और दशमलव जैसे विषय चुनना भी सन्तोष की ख़ासियत है. "मोछू नेटुआ" इसलिए भी ध्यान आकर्षित करती है क्योंकि उसमें सन्तोष चतुर्वेदी ने उस बिरादरी के एक फ़र्द पर निगाह डाली है जो अंग्रेज़ों के ज़माने ही से अभिशप्त ज़िन्दगी जीने को विवश है और अभी तक उसका कोई निस्तार नहीं. कविता में मोछू नेटुआ, जो सांप पकड़ने का काम करता है, कहता है :

हां मालिक यह ससुरी सरकार तो
कभी हमें आतंकवादी बताती है
तो कभी घोषित कर देती है नक्सलवादी
.............
अब आपे बताइए मालिक
कि कैसे धोयें हम
अपने माथे पर जबरिया लादा गया
बेमतलब का कलंक
दिक्कत की बात तो यह कि
कभी कोई समझ ही नहीं पाया हमें
अब देखिए न आपे हमारी नियति
कि पुराने जमाने का अछूत मैं
इस जमाने का अपराधी हो गया हूॅ
होता रहा हमारे साथ
हमेषा बदतर सलूक
उठती रही बराबर मन में
एक अजीब सी हूक

कविता लम्बी है और आख्यान का अन्दाज़ उसमें नुमायां है. लेकिन जब एक पूरा समुदाय साम्राज्यवादी शक्ति द्वारा जन्मना अपराधी क़रार दिया जाये और कथित आज़ादी के बाद भी उसका कोई पुर्सांहाल न हो तो ऐसी कविता एक ज़रूरी दस्तावेज़ बन जाती है, जिसमें महज़ एक समाज-शास्त्रीय कोण ही नहीं है, बल्कि जो हमारे समय को उसकी सारी जटिलता में परखती है, जिसमें सांपों को चीन्ह लेने वाले मोछू नेटुआ के लिए "आदमी को आदमी की भीड़ से बीन कर / ज़हरीले तौर पर अलगा पाना""एकदमे से असंभव" होता जा रहा है. "और सबसे दिक्कत तलब यह कि / अभी तक के सारे तन्त्र-मन्त्रों को धता बताता / कांइयां किस्म का आदमी ऊपर से कुछ और / अन्दर से कुछ और हुआ जा रहा है ....बदलती हुई परिस्थितियों में / उसकी समस्या अब यह है कि/ लगातार जहरीली होती जा रही इस दुनिया में से / कुछ बेजहर लोगों को वह कैसे सामने लाये.....कैसे वह अपनी चाहत का कुछ रंग जुटा कर / अपने समय की / एक सुखद तस्वीर बनाये."

हिन्दी में व्यक्ति-केन्द्रित कविताओं की एक सुदीर्घ परम्परा रही है. त्रिलोचन की "नगई मेहरा" हो या लीलाधर जगूड़ी की "बलदेव खटिक" -- कवियों ने परिवर्तन की कामना से वंचित, दलित लोगों को हमेशा बीच मंच पर लाने का काम किया है. सन्तोष की कविता "मोछू नेटुआ" उसी परम्परा की अगली कड़ी है. "तद्भव" २० में प्रकाशित उनकी दोनों कविताएं - भभकना और पानी का रंग - बड़ी कुशलता से प्रतीकों और बिम्बों का इस्तेमाल करके जनता की पक्षधरता और परिवर्तनकामी राजनीति की अन्तर्ध्वनियों को व्यक्त करती हैं. ख़ास तौर पर "पानी का रंग," जिसमें पानी के बेरंगपन को सन्तोष चतुर्वेदी उन तमाम बेनाम लोगों से जोड़ देते हैं जो बेनामी में जीते हुए दुनिया को हरा-भरा बनाये रखते हैं. अल्बत्ता, लम्बी कविताओं के साथ जो ख़तरा जुड़ा होता है -- शब्द स्फीति में बह जाने का -- उसके प्रति संतोष को सदा सजग रहना होगा.
६.
लेकिन कोई सवाल कर सकता है कि आज के समय का यथार्थ इतना भर ही नहीं है, उसके और भी पहलू हैं. स्त्रियों की आधी दुनिया है, बच्चे हैं, घर-परिवार है, प्रेम है. ये सारे पहलू आज के युवा कवियों की कविताओं की वसुधा में मौजूद हैं. सारे-के-सारे भले ही एक कवि में न पाये जायें, लेकिन उनकी छवियां आज की युवा कविता में छिटकी हुई हैं. अलबत्ता यह ज़रूर चिह्नित किया जा सकता है कि प्रेम पहले ही की तरह आज भी एक सदाबहार विषय बना हुआ है और एक कसौटी का भी काम करता है. सन्ध्या नवोदिता अपनी एक कविता में साफ़-साफ़ अपने समय में प्रेम का एजेण्डा तय करते हुए लिखती हैं :

सारी कविताएँ
न तो युद्ध की होंगी
न प्रेम की
पर बिना प्रेम के
कैसे होगी कविता?

और इसी ज़रूरी सवाल का उत्तर देने के क्रम में हमें आज की कविता में प्रेम के अलग-अलग अक्स दिखायी देते हैं.

७.

वैसे तो, स्त्रियों की स्थिति पहले भी कुछ अच्छी न थी, पर हाल के दिनों में तो उनकी तमामतर कोशिशों के बावजूद आम लोगों का रवैया सख़्त होता दिखायी देता है. बड़ी मुश्किलों से दहेज हत्याओं के आंकड़े कुछ कम होने की ओर बढ़े थे कि ’इज़्ज़त के नाम पर और उसकी ख़ातिर’ लड़कियों की बलि दी जाने लगी है. लेकिन युवा कविता में स्त्री-पुरुष सम्बन्ध पहले की तुलना में अधिक मुखर, खुले और एक जुझारू तेवर के साथ चित्रित दिखायी देते हैं. पहली शिकायत तो वही है जो सन्ध्या की एक कविता में व्यक्त हुई है और जो अमूमन पहले भी स्त्रियों को रही है चाहे वे इस रूप में उसे व्यक्त न करती रही हों कि ’बड़ी उम्मीदों से / मैं तुममें तलाशती हूँ एक साथी /और / नाउम्मीद हो जाती हूँ / हर बार / एक पुरूष को पा कर.
यों, ऐसा नहीं है कि इस का एह्सास औरों को नहीं है. अरुण देव की कविता "छल" बड़ी ख़ूबी से इस "डिलेमा" इस उलझन को, इस द्वन्द्व को सामने रखती है जब वे लिखते हैं -

"अगर मैं कहता हूँ किसी स्त्री से
तुम सुंदर हो

क्या वह पलट कर कहेगी
बहुत हो चुका तुम्हारा यह छल
तुम्हारी नज़र मेरी देह पर है
सिर्फ देह नहीं हूँ मैं"

और इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए वे स्त्री-पुरुष अनुकूलता के अन्य पहलुओं की अपर्याप्तता की ओर इशारा करते हुए वहां पहुंचते हैं जहां स्त्री को सुन्दर कहने से बढ़ कर बात उससे प्रेम व्यक्त करने तक पहुंचती है.

सोचा कि कह दूँ कि मुझे तुमसे प्यार है
पर कई बार यह इतना सहज नहीं रहता
बाज़ार और जीवन-शैली से जुडकर इसके मानक मुश्किल हो गए हैं
और अब यह सहजीवन की तैयारी जैसा लगता है
जो अंततः एक घेराबंदी ही होगी किसी स्त्री के लिए

इस स्थिति में यह एक ख़ुशी की बात है और एक स्वस्थ संकेत भी कि युवा कविता में अंकित स्त्री अपनी स्वतन्त्र राह खोजने और बनाने की, ख़ुदमुख़्तारी की वकालत करती नज़र आती है, जैसे रेणु हुसैन की कविता "सफ़र" में जो शुरू ही स्त्री के इस अहद के साथ होती है कि सफ़र भले ही बहुत मुश्किल है "मगर निकल पड़ी हूं जब इस राह पर तो खोज ही लूंगी कोई मंज़िल अपनी मैं तुमसे सहारा क्यों मांगूं." इस क्रम में सपनों के खो जाने और उम्मीदों के बिखर जाने के ख़तरे को और गहरे अंधेरे की हक़ीक़त को तस्लीम करते हुए यह स्त्री कहती है कि "मैं हूं आसमान और अपना सितारा ख़ुद ही, मैं तुमसे चिराग़ क्यों मांगूं." रेणु ही कविता "उड़ान" की स्त्री के ख़्वाहिश यह है कि "उड़ जाने दो मुझे किसी तितली की तरह एक पंछी की तरह खुली हवा में." यह आकस्मिक नहीं है कि उड़ान का बिम्ब सन्ध्या नवोदिता की भी एक कविता में आता है.

मेरे पास चिडि़या है
चिडि़या के पास हैं पंख
पंखों के पास है परवाज़
और परवाज के पास है
पूरा आसमान

पंख, चिडि़या, परवाज़ आसमान और में
यह रिश्ता बहुत पुराना है।
८.


हिन्दी कविता में तीन ऐसे विषय हैं जो उसकी शुरूआत ही से कवियों की चिन्ता का केन्द्र रहे है - जातिवाद, साम्प्रदायिकता और स्त्रियों की स्थिति. आज की कविता में, ख़ासकर युवा कविता में यह देखने की बात है कि ये किस तरह और किस रूप में मौजूद हैं. इस लिहाज़ से देखने पर हम पाते हैं कि वर्ण-व्यवस्था और जातिवाद के ख़िलाफ़ युवा स्वर कहीं अधिक मुखर हुआ है. बल्कि कहा जाये कि बहुत-से युवा कवियों ने इन मसलों को जिस तरह अभिव्यक्त किया है वैसे वह पिछले दौर की कविता में नहीं नज़र आता. मुकेश मानस हों या मुकुल सरल, पूनम तुषामड़ हों या रजनी अनुरागी या और बहुत-से युवा कवि जिन्होंने समाज के दबे-कुचले तबक़ों की ओर से आवाज़ बुलन्द की है, इस तबक़े की बेगिनती छवियां हमें मिलती हैं.

मुकेश मानस की एक शुरुआती कविता ही में जात-पांत में बंटे समाज पर चोट है. इसी तरह पूनम तुषामड़ की कविता "दो शख़्स" में बड़े मुखर ढंग से इस सच्चाई को उजागर किया गया है कि उन दो शख़्सों में जिनकी "रहन-सहन वेश-भूषा भी मिली-जुली है" और जो दोनों ही ग़रीब हैं और "बंटवारे का शिकार" हुए हैं, अपने-अपने घरों से जुदा हुए हैं और सबसे बड़ी बात कि दोनों ही सफ़ाईकर्मी हैं, भेद पैदा करने वाला, उन्हें अलग करने वाला घटक धर्म है. यह कविता इसलिए भी ध्यान खींचती है, क्योंकि यह आदमी-आदमी के बीच दरार पैदा करने वाले तीनों तत्वों -- वर्ग, धर्म और वर्ण -- की प्रचालन शक्ति की दुरभिसन्धि को खोल कर सामने रख देती है, जहां साम्प्रदायिकता और जातिवाद के कुलाबे एक-दूसरे से मिलते नज़र आते हैं और ऐसा तफ़रका पैदा करते हैं जिसे वर्ग और पेशे की एकता भी मिटा नहीं पा रही है. ऐसी ही तीखी चोट पूनम की कविता "वह आती थी" में की गयी है. एक स्त्री जो झाड़ू-पोंछा बर्तन-सफ़ाई का काम करती थी, अपने घर के पास बसे भंगियों को बर्दाश्त नहीं कर पाती और कहती है - "उनकी हमसे क्या बराबरी है ? वे जन्मना नीच हैं हमारी ऊंची बिरादरी है." और पूनम की कविताओं में दलित-उत्पीड़ित समाज की अनेकानेक छवियां अंकित की गयी हैं, कभी मोटी रेखाओं में तो कभी वक्रता और व्यंग से लेकिन प्रतिरोध और संघर्ष का स्वर बराबर मौजूद है, वे साफ़-साफ़ ऐलान करती हैं

मुझे नहीं चाहिये मुट्ठी भर आसमां
मुझे चाहिये मेरे हिस्से की पूरी ज़मीं
जिस पर सदी-दर-सदी
पसीना बहाया मैंने
और फ़सल रही तुम्हारी

इस प्रयत्न में अगर ये कविताएं पारम्परिक साहित्यिक प्रतिमानों पर खरी न भी उतरें तो पूनम को इसकी चिन्ता नहीं है.
रजनी अनुरागी की अनेक कविताओं का उत्स भी दलितों की स्थिति है, लेकिन वे वहीं नहीं रुकती, बल्कि मुकेश मानस की तरह उनकी निगाह उन संघर्षों की ओर भी जाती है जो सिर्फ़ जाति के दायरे तक ही महदूद नहीं हैं. "जब भी योग्यता की बात हुई" या "नाम में क्या रखा है" जैसी कविताओं में अगर वे हिन्दुस्तानी समाज की वर्ण-व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं तो "जनज्वार," "मज़दूरों की बस्ती" और "नये ज़माने का बाज़ार" जैसी कविताओं में उन परिवर्तनों की छवियां दर्ज करती हैं जो मिस्र और मध्य पूर्व में जनता को एक कर रहे हैं या फिर हमारे यहां नयी आर्थिक सोच और नीतियों के तहत विषमता बढ़ा रहे हैं. मिस्र के जन सैलाब को दर्जन करते हुए भी रजनी अनुरागी को पूरा एहसास है कि -

कितने ही हुस्नी मुबारक बैठे हैं
अल्जीरिया, सीरिया और लीबिया में
और हमारे आस-पास भी
हमारे दिलो-दिमाग़ पर क़ब्ज़ा किये
हमारे सब्र का इम्तहान लेते

इन्हीं परिवर्तनों के बीच रजनी ने स्त्रियों की स्थिति को भी उकेरा है और उनकी प्रेम की आकांक्षा को भी. "हमारी कविता" में बहुत मार्मिक ढंग से वे कहती हैं -

तुम कल्पना के घोड़े पर सवार
लिखते हो कविता और हमारी कविता
रोटी बनाते समय जल जाती है अक्सर
कपड़े धोते हुए पानी में बह जाती कितनी ही बार

यहां से शुरू हो कर यह कविता आम कवि-पत्नियों के अन्दर-बाहर को सूक्ष्मता से चित्रित करते हुए अन्त में एक सीधी-सी मांग करती है -

अगर पढ़ सको तो पढ़ो हमको ही
हमारी कविता की तरह
हम औरतें भी एक कविता ही तो हैं

मुकेश मानस इन सभी युवा कवियों में निस्बतन तपे हुए हैं और उनकी कविताएं कुछ ज़्यादा अवकाश तलब करती हैं. यह चिह्नित करने की बात है कि मुकेश की कविता का दायरा पहले दौर में दलितों की स्थिति के अक्स उतारने से ले कर उससे टकराने के बाद अगले दौर में और फैल कर समस्त उत्पीड़ित जनों को अपने में समेट लेता है. वे सिर्फ़ वर्ण की विषमता पर बस नहीं करते, बल्कि उसे वर्गों की विषमता से भी जोड़ कर देखते हैं और यहां यक़ीनन उनकी सोच का दख़ल है जो सिर्फ़ अम्बेडकर और फुले के विचारों ही से नहीं, बल्कि मार्क्सवाद से भी पुष्ट हुई है. जब मैं उनकी "पतंग और चरखड़ी" शृंखला की कविताएं पढ़ रहा था तो अनायास ही मुझे आलोकधन्वा की कविता "पतंग" की याद हो आयी. इसमें कोई शक नहीं है कि आलोक की कविता में "पतंग" का एक अपना स्थान है और वे उन बच्चों का चित्रण करते हुए "जिनके रक्त से ही फूटते हैं पतंग के धागे," आगे बढ़ कर उस दुनिया पर भी चोट करते हैं जिस में तानाशाह लगातार जनता के ख़िलाफ़ साज़िशें करते रहते हैं, लेकिन जहां आलोक की कविता में उन बच्चों का ज़िक्र है जिनके पास पतंग और धागा तो है और पतंग उड़ाने के लिए जिन्हें एक अदद छत भी मुयस्सर है, वहीं मुकेश ने उन बच्चों के चित्र उकेरे हैं जिन के पास कभी पतंग होती है तो चरखड़ी नहीं होती, कभी चरखड़ी होती है तो पतंग नहीं होती और अकसरहा इनमें से एक भी चीज़ नहीं होती. उस हालत में ये बच्चे कभी तो ख़ुद चरखड़ी बन जाते हैं कभी कवि की कविता मे आ कर अपनी हसरतें पूरी कर लेते हैं.
जैसे-जैसे मुकेश मानस की कविता में प्रौढ़ता आयी है, उनकी कविताओं में विषमता के स्वरों के बीच से प्रतिरोध के स्वर भी सुने जा सकते हैं. मसलन, "नये युग के स्पार्टाकस," "हमारा इनकार," "हत्यारा," "वर्तमान हैं हम" और "आने वाले वक़्त में." "नये युग के स्पार्टाकस" में मनुवाद को जातीय और वर्गीय उत्पीड़न से जोड़ते हुए कहते हैं -

लो, हम फिर से जी उठे हैं
अब हम हैं सर्व-व्यापी
अब हम हैं हवा में, सुगन्ध में, उजाले में, पानी में,
किताबों में, विचारों में, सांसों की रवानी में
संघर्ष की कहानी में अब हम हैं ज़िन्दगानी में
हम हैं नये युग के स्पार्टाकस
अब कैसे चढ़ा पाओगे हम को किसी भी सूली पर

मुकेश मानस की यह समझ इतिहास की समझ से पैदा हुई है और यह समझ उन्हें इस घोषणा की ओर ले जाती है कि -

जहां वेदों और स्मृतियों की भेड़िया धसान है
जहां जात ही इन्सान की एकमात्र पहचान है
और ऊंची जात का हैवान भी महान है
हम ऐसे देश के वारिस नहीं हैं.

इस कविता के अगले बन्द पूंजी के नंगे नाच और अन्याय के एक हिंसक साम्राज्य के साथ लोकतन्त्र के भेड़ियों का ज़िक्र करते हुए ऐसे देश के वारिस होने से इनकार की टेक बरक़रार रखते हैं. इनमें सबसे सुथरी कविताएं हैं - "वर्तमान हैं हम" और "आने वाले वक़्त में." "वर्तमान हैं हम" में कविता अतीत में झांकते हुए आग्रह करती है कि -

इतिहास वहां से शुरू करो
जहां हम थे अपने समूचे जिस्म और पूरे व्यक्तित्व के साथ
जिन्हें हर लिया था तुमने अपनी कुटिलताओं से

और इस आग्रह से शुरू करके वह इस इतिहास का जायज़ा लेती है जहां गर्दनों से सिर उतारे गये थे, "काट लिये गये थे हाथ उंगलियां और अंगूठे." और फिर साफ़-साफ़ कहती है कि "हम इस इतिहास से निकाले गये नायक हैं, मगर हम भुला चुके इतिहास, बीत गये इतिहास से कब कुछ नहीं हासिल" और अन्त में घोषित करती है - "अब वर्तमान हैं हम, इतिहास नहीं / शक्तिमान हैं हम, उपहास नहीं."

यह सिर्फ़ दलित-उत्पीड़ित जनों का दुखद लेखा-जोखा ही नहीं है, उनकी आकांक्षाओं का चिट्ठा भी है जिन्हें हासिल करने के लिए वे सन्नद्ध हैं. लेकिन कविता सिर्फ़ संघर्ष का अह्वान नहीं होती, वह स्वप्नों की भूमि भी होती है. यही वजह है कि "आने वाले वक़्त में’ शीर्षक कविता में भय से रहित लेकिन वाहनों से भरी सड़क, तोड़े जाने के दर से मुक्त फूलों से भरे बाग़, अध्यापक-विहीन मगर बच्चों से भरे स्कूल और अधिकारियों से नहीं सेवकों से चलने वाली सरकार की कामना करते हुए मुकेश मानस ऐसी दुनिया का स्वप्न देखते हैं "जिसमें सिर्फ़ नागरिक हों और राष्ट्र कोई न हो."
जातिवाद पर चोट करने वाली कविताओं का ज़िक्र करते हुए जहां यह निशानदही करने की ज़रूरत है कि जिस तरह हिन्दी कविता का यह पहलू हाल की युवा कविता का एक केन्द्रीय स्वर बना है और ऐसे रूप में बना है जैसा वह पिछले दौर की कविता में नज़र नहीं आता, वहीं उस ख़तरे की तरफ़ इशारा करना ज़रूरी है जहां कविता अपनी कविताई छोड़ कर प्रचार की तरफ़ बढ़ने लगती है. कबीर से ज़्यादा मुखर होने का दावा कम ही लोग कर सकते हैं, लेकिन अपने मुखरतम रूप में भी कबीर की कविता अपनी कविताई से किनाराकशी नहीं करती. वे सामाजिक प्रतिरोध के अलमबरदार तो हैं पर कविता को हाथ से छूटने नहीं देते. इस सिलसिले में जब मैं युवा कवि राज वाल्मीकि की कविताएं पढ़ रहा था तो मुझे बार-बार एहसास हुआ कि वे कविता की हदों को लांघ कर प्रचार की हदें छू रही हैं. चाहे वह "मैं इसलिए आता हूं" जैसी कविता हो या "कब होगा" जैसी कविता या फिर "युद्धरत हूं मैं" जैसी कविता -- राज वाल्मीकि बेज़रूरत ही अम्बेडकर, फुले, बुद्ध और कबीर के नामों का उल्लेख करते हैं. दलित चेतना को व्यक्त करने या फिर उसे जगाने के लिए इस तरह की प्रचारपरक अभिव्यक्तियां कविता की शक्ति को कम करती हैं. इस में कोई शक नहीं है कि सारी कला प्रचार होती है लेकिन जैसा कि सुप्रसिद्ध जर्मन फ़िल्मकार फ़ासबिण्डर ने कहा था कि उनकी सबसे बड़ी कोशिश यह है कि उनका प्रचार कला बन जाये. इस सन्दर्भ में मैं पूनम तुषामड़ की कविता "यह नीला रंग" का ज़िक्र करना चाहता हूं. कविता पाठक को यह एहसास तो कराती है कि जिस आदमक़द मूर्ति का उल्लेख कविता में हो रहा है, वह अम्बेडकर की है, मगर वह कविता स्थूल व्यक्ति-चित्रण नहीं है. इसके विपरीत वह उस व्यक्ति के मुक्तिदायक विचारों के असर को रेखांकित करती है और यह भी कि कैसे विचार चेतना में जज़्ब हो कर उसके दायरे को विस्तृत करते हैं.
इसके साथ ही मेरा एक ज़रूरी सवाल यह भी है कि क्या जातिवाद पर अन्य कवि भी कुछ कह रहे हैं या यह पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की तरह सिर्फ़ दलित कविता की झोली ही में डाल दिया गया है ?

जातिवाद के अलावा जिस सवाल से हाल के वर्षों में कवियों का सरोकार रहा है, वह साम्प्रदायिकता है. ख़ास तौर पर जैसे-जैसे हमारे समाज में कट्टरपन्थी ताक़तों ने लोगों को बांटने की मुहिम तेज़ की है. एक पीढ़ी पहले के कवि एकान्त श्रीवास्तव ने अपनी शुरुआती कविता "नागरिक व्यथा" में स्पष्ट शब्दों में इसे चिह्नित किया था -- "मैं किस कोख से जन्म लूं कि हिन्दू, न मुसलमान कहाऊं." एक तरीक़े से इस कविता ने, जो साम्प्रदायिकता के साथ-साथ पर्यावरण, जातिगत भेद-भाव और सामान्य विषमता पर सवाल खड़े करती थी, पिछली सदी के आख़िरी दशक की कविता का एजेण्डा तय कर दिया था. लेकिन कुछेक उदाहरणों को छोड़ दें तो यह मुद्दा इधर की कविता में क्षीण हुआ है. अगर सईद अयूब या फ़रीद ख़ान की कविताओं में वह नज़र आता है तो उसके कारण स्पष्ट हैं, उनके विस्तार में जाने की ज़रूरत नहीं. ऐसे में यह तहक़ीक़ात ज़रूरी है कि साम्प्रदायिकता -- चाहे वह सीधे-सीधे हिन्दुत्ववादी एजेन्डे के रूप में आ रही हो या फिर सत्ताधारी वर्ग के दूसरे धड़े द्वारा "आतंकवाद" के बिल्ले से एक धर्म के अनुयायियों को कटघरे में खड़ा करके उनमें असुरक्षा का बोध पैदा करके उन्हें अपने धर्म के कट्टरपन्थियों की कठ्पुतलियां बनने पर मजबूर कर रही हो -- क्यों हमारे युवा कवियों के एजेण्डे में या तो शामिल नहीं है या फिर उनकी प्रमुख चिन्ता नहीं बन पा रही. या जहां वह है भी वहां वे उसे किस नज़रिये से देख कर चित्रित कर रहे हैं ?

९.

यहां यह कहना ज़रूरी जान पड़ता है कि हाल के वर्षों में समूची दुनिया में जो परिवर्तन हुए हैं -- सोवियत संघ के प्रत्याशित पतन से ले कर दुनिया के बराबर एक-ध्रुवीय होते जाने तक, एक तरफ़ पूंजी और पूंजीवाद के संकट और दूसरी तरफ़ आवारा पूंजी के नंगे नाच तक, सारी दुनिया को एक गांव बनाने की मुहिम से ले कर सारे गांवों को एक-दूसरे से अलग-अलग कर देने की साज़िश तक, देश के भीतर दमन और शोषण और भ्रष्टाचार के साथ-साथ बढ़ते हुए जातिवाद और साम्प्रदायिकता की प्रवृत्तियों तक और आदिवासी और दलित-शोषित समाज के ख़िलाफ़ सत्ताधारी वर्ग के खुले युद्ध तक -- इस सब का एहसास युवा कवियों में कभी मुखर तो कभी खामोशी से व्यंजित होता रहता है और जहां यह सब वाचाल तरीक़े से गुरेज़ करते हुए व्यक्त होता है वहीं कविताओं की ताक़त का एहसास हमें होता है.

आज से लगभग चालीस-पैंतालीस वर्ष पहले, जब नयी कविता के घटाटोप और अकविता की विचारशून्य अराजकता से बाहर आ कर हिन्दी कविता ने अपनी पुरानी प्रतिज्ञाओं को नये सिरे से परिभाषित किया था तब से वह वादों और दायरों की गिरोहबन्दियों से निकल कर इन्हीं प्रतिज्ञाओं के बल पर अपनी परख कराती आयी है. ये प्रतिज्ञाएं क्या थीं ? दमन और उत्पीड़न के खिलाफ़ मनुष्य के अथक संघर्ष में साझेदारी, यथास्थिति से कभी समझौता न करने का संकल्प, सत्ता और उसके प्रलोभनों से किनाराकशी और वास्तविकता को पहचानने और उसे व्यक्त करने का आत्मसंघर्ष. चूंकि हिन्दी का जन्म और विकास ही वंचितों की वाणी और दीन-दलितों की आवाज़ के तौर पर हुआ है, इसलिए हिन्दी कविता की जिन प्रतिज्ञाओं का ज़िक्र ऊपर किया गया, वे अपने आप में एक कसौटी बन जाती हैं.
यह ठीक है कि जैसे-जैसे हमारे देश में और विशेष रूप से हिन्दी पट्टी में सांस्कृतिक संकट बढ़ा है, साहित्यकार सनद, पुरस्कार और सत्ता के दूसरे ताम-झाम की तरफ़ आकर्षित हो कर इन प्रतिज्ञाऒं से दूर गये हैं या इन प्रतिज्ञाओं को ही निरर्थक बता कर किन्हीं ’शाश्वत’ मूल्यों की तलाश करने लगे हैं, हिन्दी कवियों का एक बड़ा तबक़ा विपथगामी हुआ है. ऐसे में मुकुल सरल जैसे कवि हमें ढाढ़स बंधाते हैं कि साठ के दशक के अन्त में और नक्सलबाड़ी की महान उभार से जो चेतना जन्मी थी, जिसने हमें अपनी पुरानी जुझारू परम्परा से जोड़ कर हमें ऊपर बतायी गयी प्रतिज्ञाओं को फिर से अपने घोषणा-पत्र के रूप में सामने रखने की सलाहियत दी थी, वह ग़लत नहीं थी. इसलिए अन्त में यह भी कहना ज़रूरी जान पड़ता है कि इधर की कविता में दो चीज़ों का अभाव खटकता है. पहली तो है कविता से कवितापन का कम होना. बाज़ वक़्त कविता ख़राब गद्य के निकट जा पहुंचती सी लगती है. हमेशा ऐसा होता हो, या सभी कवियों के साथ ऐसा होता हो, ऐसी बात नहीं है, मगर यह ख़तरा आज के नये कवियों के सामने मौजूद है, और मेरा ख़याल है कि उन्हें निराला की हिदायत याद कराने की ज़रूरत है कि कविता की मुक्ति छन्दों के शासन से मुक्त होने में है, छन्दों से मुक्त होने में नहीं और छन्द कविता की साधना के लिए आवश्यक क़वायद यू अभ्यास है. साथ ही यह भी याद रखने की ज़रूरत है कि जब मुक्तिबोध कहते हैं -

"कविता में कहने की आदत नहीं पर कह दूं
वर्तमान समाज में चल नहीं सकता
पूंजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता
स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी छल नहीं सकता
मुक्ति के मन को, जन को.

या
फिलहाल तस्वीरें इस समय हम नहीं बना पायेंगे
अल्बत्ता पोस्टर हम लगा जायेंगे. हम धधकायेंगे.
मानो या मत मानो
इस नाज़ुक घड़ी में
चन्द्र है सविता है
पोस्टर ही कविता है.

तब वे अपने विचारों का प्रचार करते हुए कविता को कहीं भी हाथ से छूटने नहीं देते. इसीलिए वे भरोसे के साथ कह सकते हैं - "नहीं होती, कहीं भी ख़तम कविता नहीं होती कि वह आवेग त्वरित काल यात्री है......गहन-गम्भीर छाया आगमिष्यत की लिये, वह जन चरित्री है......तुम्हारे कारणों से जगमगाती है व मेरे कारणों से सकुच जाती है." कवि के कारणों से सकुच जाने वाली कविता और जनता के कारणों से जगमगाने वाली कविता - इन दोनों ही के उदाहरण आज की कविता में मौजूद हैं. सवाल तो वही है जो मुक्तिबोध ने "मानव-पुण्य धारा" यानी जनता की ओर से सामने रखा था - "बशर्ते तय करो किस ओर हो तुम अब / सुनहले ऊर्ध्व-आसन के निपीड़क पक्ष में अथवा कहीं उससे लुटी-टूटी अंधेरी निम्न-कक्षा में तुम्हारा मन."

इसी से जुड़ी दूसरी कमी जो खटकती है, वह है इर्द-गिर्द की दुनिया के चित्र उकेरते हुए महज़ उन्हें दर्ज भर कर लेने पर सन्तुष्ट हो जाना जबकि कविता से यह उम्मीद भी है कि वह सामाजिक परिवर्तन की कार्रवाई का एक औज़ार भी बने. उसका राजनैतिक तेवर कुछ और धारदार हो. इस नज़र से देखने पर यह सवाल बार-बार उठता है कि वे कौन-सी वजहें हैं जिन से युवा कविता में राजनैतिक स्वर क्षीण हुआ है ? क्या कारण है कि अशोक पाण्डेय जैसे समर्थ कवि की कविताएं अक्सर फ़िकरेबाज़ी की हदों को छूने लगती हैं ? या फिर गिरिराज किराडू में कला इतनी है कि कई बार असली सामाजिक परिदृश्य ही आंख से ओझल हो जाता है और कविता सिर्फ़ खिलवाड़ बन जाती है और कौतूहल उपजाने लगती है ? महज़ कुछ राजनैतिक घटनाओं या सामाजिक-आर्थिक प्रवृत्तियों का नामोल्लेख कविता को राजनैतिक नहीं बनाता. राजनीति का सवाल पक्षधरता से जुड़ा है, यह तय करने के सवाल से जुड़ा है कि किस ओर हो तुम. युवा कविता में यह उभय-सम्भव की स्थिति क्यों है. ऐसा मृत्युंजय या मुकुल सरल या मुकेश मानस या फिर निर्मला पुतुल और अनुज लुगुन की कविताओं में इसलिए नहीं है कि उनकी पक्षधरता साफ़ है.
१०.
इसी सिलसिले में थोड़ा सा विषयान्तर करते हुए मैं उन्नीसवीं सदी के दो अंग्रेज़ व्यक्तित्वों का ज़िक्र करना चाहता हूं जो दोनों के दोनों सामाजिक परिवर्तन की भावना के तहत काम कर रहे थे मगर दो भिन्न निष्कर्षों पर पहुंचे थे. पहले थे चार्ल्स बैबेज, जिन्हें कम्पयूटर का जनक कहा जाता है, हालांकि वे अपने जीवन में एक अत्यन्त कच्ची गिनती की मशीन से आगे नहीं बढ़ पाये थे. बैबेज की मूल प्रेरणा तत्कालीन सामाजिक विषमता और आम दुर्दशा से उपजी थी. मूलत: विचारक होने के नाते वे इस नतीजे पर पहुंचे कि अगर ग़रीबी और आर्थिक विपन्नता के आंकड़े क्रमबद्ध रूप में इकट्ठे किये जायं तो उनके प्रचार-प्रसार से सामाजिक परिस्थितियों में तब्दीली सम्भव हो जायेगी. जैसा कि बैबेज के एक समर्थक ने कहा, "मनुष्य की जीवन-स्थितियों की पूरी और सही जानकारी का मतलब है उन परिस्थितियों को जन्म देना जिनमें इन स्थितियों को बदला जा सकेगा." लेकिन बैबेज के ही समकालीन उपन्यासकार जार्ज गिसिंग, जो १८७१ में बैबेज की मृत्यु के समय महज़ चौदह बरस के थे, आगे चल कर बैबेज के विचारों की समीक्षा करने वाले थे एक बिलकुल ही अलग निष्कर्ष पर पहुंचे थे. उनका मानना था कि महज़ आंकड़ों के सबूत के बल पर प्राप्त जानकारी न तो जानकार बना सकती है न बोध ही पैदा कर सकती है.यह एक मध्यवर्ती अवस्था है जिसमें जानकारी हासिल करने वाला यथार्थ से एक दूरी पर रहता है और परिवर्तन का औज़ार नहीं बन सकता. उसके लिए उसे आगे बढ़ कर वास्तविकता से सीधा सम्पर्क करना होगा. गिसिंग ने भविष्य के एक ऐसे समाज की भी कल्पना की जिसमें सारी आबादी बैबेज के संगणकों यानी कम्प्यूटरों की अभ्यस्त तो होगी, मगर परिवर्तन से दूर हो जायेगी. क्या आज जब हम सूचना और जानकारी से घिरे हुए हैं कुछ वैसी ही आशंका हमें नहीं होती ? कविता में महज़ छवियां अंकित करना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि उससे एक क़दम और आगे बढ़ कर इन छवियों को उत्प्रेरकों में तब्दील करने का काम भी करना होगा. और इसके लिए जैसा कि प्रेमचन्द ने कहा था, हुस्न का एक नया मेयार -- एक नया सौन्दर्य-बोध भी विकसित करना होगा.
११.
जैसा कि मैंने शुरू ही में कहा था कि युवा कविता की हरी-भरी वसुन्धरा का पूरा जायज़ा एक लेख में सम्भव नहीं है, न एक व्यक्ति के बस की बात है. ज़ाहिर इस में कई नाम छूट गये हैं जिनकी मैं चर्चा करना चाहता थ. मसलन आस्तीक वाजपेयी की कविता ओं "ऐसा ही होता है" और "तथास्तु" की जिनमें हमारे पौराणिक प्रतीकों का इस्तेमाल ख़ूबी के साथ किया गया है. उन्की कविताओं में एक छटपटाहट है, प्रश्नाकुलता है, मगर अवसाद भी है, जो शायद दूर होने की ख़ातिर एक सही राजनीति की मांग कर रहा है. मैं अरुण आदित्य की कविता "इण्टर्व्यू" का भी उल्लेख करना चाहता था जिसमें इण्टर्व्यू में पूछा गया सवाल "आपकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा स्वप्न क्या है ?" इस सच्चाई के तरफ़ ले जाता है कि --

इस देश में हैं ऐसे मार तमाम लोग
दूसरों के सपनों को चमकाते हुए
जिन्हें मौका ही नहीं मिलता
कि सोच सकें अपने लिए कोई सपना

इसी तरह मैं और भी बहुत से युवा कवियों का ज़िक्र करना चाहता था जिनमें अपार सम्भावनाएं हैं जैसे मंजरी श्रीवास्तव, ओमलता शाक्य, मनोज कुमार झा, हरप्रीत, सन्दीप गौड़ या विपिन चौधरी, पर इस लेख की एक सीमा है और मेरी क़ूवत की भी. उम्मीद करता हूं कि आगे चल कर इसकी भरपाई करने का मौक़ा मुझे मिलेगा. बतौर नमूना भरपाई मैं यहां चित्रकार-कवि शिवकुमार गांधी की एक कविता पूरी-की-पूरी उद्धृत कर रहा हूं, गो उनकी निस्बतन लम्बी कविता "महाविद्यालय" में उनकी चाक्षुष ख़ूबियां ज़्यादा उजागर हुई हैं. इस कविता का कोई शीर्षक नहीं है --

उसने कहा मुझसे ले चलो अपने शहर
जो कहोगे वही करूगां
फिर पकडायी चाय जो गैस के
चूल्हे पर बनी थी
मैंने कहा मजाक में-
जगह बदल लेते हैं हम
और फिर वैसे भी शहर खुद ही तो आ रहा है
तुम तक

उसने कहा वहां छत पर बैठना शाम में
अच्छा लगता है रोशनियों के बीच और फिर हवा तो आती ही है
एक कारखाने में काम करता था उसका भतीजा
जिसके साथ किसी छत पर बैठा था वह एक दिन
इस शहर में रोशनियों के बीच
और उस दिन भी हवा तो आयी ही थी

तालाब किनारे चांद को देखता लेटा हुआ
शाम में मैं खुद कितने दिन काट लूगां यहां
तालाब अभी भरा है फिर खाली होगा
और फिर भरेगा व खाली होगा
अगली बार
पता नहीं भरे कि नहीं

और मैं कहूंगा किसी से ले चलो अब तो मुझे
अपने साथ
जो कहोगे वह कर ही लूंगा.

अन्त में इतना ज़रूर कहना चाहता हूं कि युवा कविता में अभी कुछ अनगढ़ता भी नज़र आ सकती है. इतना ही नहीं, सभी नये लिखने वालों की तरह हमारे युवा कवि भी अभी कई तरह के सुरों को आज़मा कर अपना ख़ास अन्दाज़ हासिल करने की कोशिश में जुटे हुए हैं. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि वे अपनी ’करत’ से इस सुर को साधने में सफल होंगे और उनकी पहली-पहली कविताओं से जो आशाएं बंधती हैं उन्हें अगले मुक़ाम तक पहुंचायेंगे. अन्त में प्रसिद्ध लातीनी अमरीकी कवि निकानोर पार्रा की एक कविता उद्धृत कर रहा हूं जो उन्होंने युवा कवियों को सम्बोधित की है --

चाहे जैसा लिखो,
जो भी शैली तुम्हें पसन्द हो, अपना लो
बहुत ज़्यादा ख़ून बह चुका है
पुल के नीचे से
यह मानते रहने के लिए
कि सिर्फ़ एक ही रास्ता सही है
कविता में हर बात की इजाज़त है
शर्त बस यही है
तुम्हें बेहतर बनाना है कोरे पन्ने को
हम उम्मीद करते हैं कि युवा कवि ऐसा ही करेंगे

आमीन.

२९ अक्तूबर२०११ - १० जनवरी २०१२