Tuesday, February 10, 2015


चट्टानी जीवन का संगीत 

जैज़ संगीत पर एक लम्बे आलेख की सातवीं कड़ी

7.

नीग्रो मज़दूरों के गीतों और खेतिहर मजूरों के टिटकारीदार टप्पों से हो कर ब्लूज़ तक का सफ़र जैज़-संगीत के उन रेशों को खोलता है, जो मूल रूप से अफ्रीकी हैं, जिन्हें अपनी दुनिया से उखाड़ कर एक दूसरे मुल्क में ग़ुलाम बना कर ले जाये जाने वाले लोगों ने अपनी जातीय स्मृति में सँजोये रखा और अपने ख़ून और पसीने से, अपनी पीड़ा और श्रम से सींच कर मज़बूत किया। दूसरी ओर जैज़-संगीत के बहुत-से रेशे यूरोपीय संगीत के हैं। ईसाई भजनों और नाच-गाने की महफ़िलों तथा फ़ौजी धुनों से मिल कर बने हैं। जैज़ की ऐसी ही एक प्रारम्भिक मंज़िल है -- रैगटाइम।

http://youtu.be/A44QDL-K-bY?list=PL8DF504CDE7860A2C  ( रैगटाइम)

ब्लूज़ की तरह रैगटाइम के स्रोत भी 19वीं सदी के अमरीकी गृह-युद्ध के बाद की उथल-पुथल में खोये हुए हैं, लेकिन इतना तय है कि जैज़ में पियानों तथा बैंजो और गिटार जैसे तार वाले वाद्यों का समावेश रैगटाइम के ही माध्यम से हुआ। रैगटाइम उन्नीसवीं सदी की आख़िरी चौथाई में उभर कर सामने आया था और उसके पहले-पहले नमूने १८९० के आस-पास मिलने लगे थे और उसकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा दौर १८९५ से ले कर १९१५-१६ तक रहा जब धीरे-धीरे जैज़ ने ब्लूज़ के साथ रैगटाइम को भी अपने अन्दर समा लिया. बाक़ायदा प्रकाशित संगीत के रूप में सामने आने से पहले रैगटाइम की शुरुआत सेंट लूइज़ और न्यू और्लीन्ज़ जैसे शहरों के अफ़्रीकी-अमरीकी वेश्यालयों और रूप के बाज़ारों में हुई थी जहां न केवल ग्राहकों का मनोरंजन दरकार था, बल्कि नाचने-गाने के लिए संगीत की संगत भी. 
रैगटाइम के विकास में उन संगीत-सभाओं का बड़ा योगदान रहा, जो 19वीं सदी में अमरीका के गाँव-देहात और कस्बों में हुआ करती थीं। ये संगीत-सभाएँ, जिन्हें ‘मिंस्ट्रेल शो’ कहा जाता था, ऐसे अजीबो-ग़रीब सांस्कृतिक उत्सव थे, जिनमें गोरे संगीतकार अपने चेहरों पर काला रंग मल कर नीग्रो संगीतकारों की नकल करने की कोशिश किया करते। बाद में नीग्रो संगीतकारों ने इस तरह की अपनी मण्डलियाँ भी बना ली थीं। ब्लूज़ और रैगटाइम के बीच का फ़ासला सिर्फ़ अफ्रीकी अथवा यूरोपीय संगीत-शैलियों की वजह से नहीं था, बल्कि दोनों शैलियों के उद्देश्यों में भी अन्तर था। ब्लूज़ अगर अभिव्यक्ति-प्रधान थे, तो रैगटाइम का सारा उद्देश्य था -- मनोरंजन। ब्लूज़ की प्रेरणा और उत्स किसी हद तक अन्तर्मुखी था तो रैगटाइम बहिर्मुखी संगीत था। एक मानवीय पीड़ा की सहज अभिव्यक्ति था तो दूसरा स्वाँग और नकलचियों की जटिलता से युक्त। ब्लूज़ में शब्दों का महत्व था तो रैगटाइम में धुनों का।
‘मिन्स्ट्रेल शो’ में पेश की जाने वाली धुनों को परखने पर उनमें और रैगटाइम में काफ़ी साम्य दिखायी देता है। इसके अलावा रैगटाइम के विकास में उन फ़ौजी बैण्डों का भी एक अपना ही योगदान रहा, जो अमरीका के जर्मन, इतालवी और फ्रांसीसी आप्रवासियों ने बनाये थे। इस तरह जो संगीत गाँव-देहात की नाच-गानों की महफ़िलों में पैदा हुआ था और बैंजो तथा गिटार पर बजाया जाता था, उसमें इन फ़ौजी बैण्डों तक आते-आते पियानो और ट्रम्पेट -- दो और वाद्य जुड़ गये। रैगटाइम की कुछ धुनों के सिलसिले में तो पियानो वादक को साफ़ हिदायत दी गयी रहती थी कि धुन को फ़ौजी कवायद की लय पर बजाया जाय।
कुछ जानकारों ने रैगटाइम की धुनों में भी अफ्रीकी प्रभाव खोजने की कोशिश की है, लेकिन ऐसा शायद तभी हुआ होगा, जब ब्लूज़ की परम्परा से पुष्ट नीग्रो संगीतकारों ने रैगटाइम बजाना शुरू किया होगा। लेकिन बुनियादी तौर पर संरचना और स्वर-दोनों ही पहलुओं से रैगटाइम पर यूरोपीय प्रभाव ज़्यादा गहरे थे।
रैगटाइम उस तरह तालबद्ध नहीं है जैसे फ़ौजी क़वायद और नाच की धुनें तालबद्ध होती हैं -- २/४ या ३/४ की ताल पर, नल्कि रैगटाइम में धुन कुछ इस तरह बजायी जाती है कि वह किसी भी ताल पर सही बैठ जाये. उसकी सबसे बड़ी निशानी होती है एक  ख़ास क़िस्म का स्वर-लोप जिसमें लय का चढ़ाव-उतार ताल के बीच-बीच में होता है. नतीजा यह होता है कि कुछ सुर प्रमुख हो कर उभरते हैं जो लगता है कि ताल की अगवानी कर रहे हैं या उसके पीछे-पीछे चल रहे हैं. लय और ताल का यह अनोखा मेल ताल को कुछ इस तरह तेज़ कर देता है कि सुनने वाले धुन के साथ-साथ अनायास हरकत करने लगते हैं और इसी ख़ूबी ने रैगटाइम को नाच के लिए इतना मुफ़ीद बना दिया था.
ब्लूज़ की सबसे बढि़या मिसाल अगर ‘सेंट लूइज़ ब्लूज़’ है तो रैगटाइम का सबसे उम्दा नमूना है ‘मेपल लीफ़ रैग।’ ‘मेपल लीफ़ रैग’ रैगटाइम की उन मशहूर धुनों में से एक है, जो पिछली सदी के आख़िरी दशक में, रैगटाइम के उत्कर्ष काल में उभर कर सामने आयीं। इसके रचयिता थे रैगटाइम के सबसे मशहूर संगीतकार और पियानोवादक -- स्कॉट जॉपलिन।

http://youtu.be/reI43yUCaUI  (मेपल लीफ़ रैग)

अमरीका के मिसूरी राज्य में सेंट लूइज़ नगर के पास सिडेलिया नामक स्थान में जा बसने से पहले स्कॉट जॉपलिन (1868-1917) बरसों तक पियानोवादक के रूप में अमरीका के दक्षिणी प्रान्तों के छोटे-छोटे घटिया किस्म के कस्बों का दौरा करते रहे थे। लेकिन स्कॉट जॉपलिन के सिडेलिया पहुँचने के बाद जल्द ही यह कस्बा रैगटाइम का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया।
स्कॉट जॉपलिन ने अनेक धुनें बनायीं, जिनमें रैगटाइम की एक शुद्ध-सी शैली अपनायी गयी है, जहाँ चार अलग-अलग थीमों को उठा कर उन्हें दोहराया जाता है। यही नहीं, बल्कि पश्चिमी परम्परा के आधार पर स्वर-लिपि को भी इस प्रकार तैयार किया जाता है कि धुन ठीक वैसे ही पेश की जाय, जैसे कि वह ‘लिखी’ गयी है; उसमें हेर-फेर की या अपनी तरफ़ से जोड़ने-घटाने की कोई गुंजाइश नहीं रहती थी। जौपलिन ने, जिन्हें लोग "रैगटाइम का सम्राट" कहने लगे थे, रैगटाइम के प्रभाव को "अजीब और नशीला" कहा था. उन्हीं ने संगीत के सिलसिले में "स्विंग" शब्द का प्रयोग भी किया था कि रैगटाइम को कैसे बजाया जाये. "धीरे-धीरे बजाओ जब तक कि तुम पेंग न पकड़ लो" यानी झूमने न लगो. यही वजह है कि यह शब्द "स्विंग" आगे चल कर जैज़ के एक आरम्भिक रूप पर लागू भी किया गया जो रैगटाइम से विकसित हुआ था. बहुत बारीक़ी में न भी जायें तो भी इतना कहा जा सकता है कि किसी ग़ैर-रैगटाइम संगीत को रैगटाइम में बदलने के लिए उसके सुरों की लय को बदल दिया जाता है जिस से मूल धुन की ताल में भी फ़र्क़ आ जाता है. सबसे लोकप्रिय बिनावट थी चार-चार मात्राओं के टुकड़ों की जिन्हें दोहराया जाता या हल्का-सा व्यवधान दे कर फिर से शुरू किया जाता. ख़ास-ख़ास बिनावटें थीं -- अअबबअससस, अअबबअससदद और अबबससअ. लेकिन चार-चार मात्राओं की ये बिनावटें चार से ले कर चौबीस मात्राओं के बीच किसी भी लम्बाई की हो सकती थीं. रैगटाइम का ज़माना साउण्ड-रिकौर्डिंग से पहले के युग में आ चुका था, मगर उसकी आरम्भिक धुनें बची रह गयी हैं तो इसलिए कि ब्लूज़ और दूसरे अफ़्रीकी-अमरीकी संगीत के विपरीत, जिसमें सुन कर नक़ल करने या सीधे-सीधे आशु-रचना करने का चलन था, रैगटाइम पूरी तरह पियानो-आधारित था और उसकी स्वर-लिपि "लिख" कर तैयार की जाती थी. इसी ने रैगटाइम को उसकी शास्त्रीय संगीत जैसी ख़ासियत दी थी.
रैगटाइम के विकास में उसके नज़दीकी रिश्तेदार "केकवौक डान्स" का बड़ा हाथ था. यह नाच, जो अमरीका के दक्षिणी राज्यों में बगानों पर काम करने वाले दासों के बीच उपजा था, "केकवौक डान्स" दरअसल गोरों के नाचने के तरीकों की नकल था और दास-प्रथा के उन्मूलन के बाद सामने आया. इसमें काले ग़ुलाम भाग लेते थे और अक्सर बगान के मालिक दर्शकों के तौर पर मौजूद रहते. चूंकि यह यूरोपीय नाचों की नक़ल में उभरा था इसलिए हरकतों में लयात्मकता होते हुए भी कुछ अजीब-सा मखौलियापन घुला-मिला रहता. इसका मूल नाम तो "चौकलाइन वौक" था, मगर चूंकि इस नाच के अन्त में भाग लेने वाले ग़ुलाम जोड़े बना कर अदा और अन्दाज़ के साथ लय-ताल पर तीन बार नाच के पूरे दायरे में "चलते" हुए उसका चक्कर लगाते और सबसे अच्छे जोड़े को बतौर इनाम केक दिया जाता, इसलिए इसे "केक वौक" कहा जाने लगा. ज़ाहिर है, इस नाच की अपनी धुनें भी बनने लगीं और रैगटाइम में इन धुनों की ख़ास भूमिका रही. ग़ुलामी के दिनों को याद करते हुए बहुत-से लोगों ने अपने संस्मरणों में "केकवौक नाच" के दिलचस्प ब्योरे दिये हैं.
एक ज़माने में रैगटाइम बजाने वाले शेपर्ड एड्मण्ड्स ने 1950 में कुछ यादें दर्ज करायी थीं जो उन्होंने टेनेसी में रहने वाले अपने माता-पिता से सुनी थीं. शेपर्ड ने बताया था कि "केकवौक मूल रूप से बगानों का नाच था, महज़ एक हरकत जो लोग खुशी-खुशी बैन्जो के संगीत के साथ किया करते थे क्योंकि उनके लिए बिना हिले, थिर खड़े रहना मुश्किल था. यह इतवार को हुआ करता जब ज़्यादा काम न होता और ग़ुलाम -- जवान और बूढ़े, दोनों -- मालिकों की अच्छी उतरनें पहन कर बैन्जो की धुनों पर टांगें ऊंची-ऊंची उछालते और इठलाते हुए एक घेरे में चला करते. दरअसल वे यह सारी कूद-फांद "बड़े घर" में रहने वाले गोरे मालिकों की नकल में किया करते थे, लेकिन मालिक लोग जो इन सारे करतबों को देखने के लिए इकट्ठा होते, इन लोगों का असली मकसद पकडअ न पाते और उलटे उस जोड़ी को इनाम में एक केक देते जो सबसे अच्छी नकल करती." इस तरह हालांकि यह सारा नाच-गाना गोरों पर व्यंग्य करने के लिए होता, गोरे मालिक इसे एक सीधा-सादा शगल मान कर खारिज कर देते जो ग़ुलामों ने उनकी दिलजोई के लिए पेश किया होता. लेकिन यह भी सही है कि गोरों के खिल्ली उड़ाने के लिए किये जाने वाले इस नाच को वक्त के साथ ग़ुलामों ने अपना लिया और इसकी धुनें अफ़्रीकी धुनों के साथ घुल-मिल कर रैगटाइम के लिए खाद बन गयीं.


http://youtu.be/s8qpMcrEtTg (Judy Garland performs a cakewalk in the 1944 MGM musical, Meet Me In St. Louis.)



बहरहाल. १८९९ में "मेपल लीफ़ रैग" और उसके बाद "द एण्टरटेनर" जैसे लोकप्रिय नमूनों के प्रकाशन के साथ ही स्कौट जौपलिन मशहूर हो गये और बरसों तक संगीतकारों के लिए लय, ताल और मात्राओं की बिनावट और उनके आरोह-अवरोह के लिहाज़ से प्रेरणा-स्रोत बने रहे. हालांकि जैज़ के उभरने के साथ ही उन्हें और सच पूछिये तो रैगटाइम संगीत शैली को भुला दिया गया, लेकिन बीच-बीच में रैगटाइम को नयी ज़िन्दगी भी मिलती रही मिसाल के लिए १९४० के दशक में जब बहुत-से बैण्डों ने रैगटाइम की रिकौर्डिंग 78 आर.पी.एम. के पुराने तवों पर करके उन्हें बाज़ार में जारी किया. मगर सब से महत्वपूर्ण पुनुरुद्धार 1950 के बाद हुआ जब रैगटाइम के विविध नमूनों के रिकौर्ड सामने आये. और 1971 में जोशुआ रिफ़्किन ने स्कौट जौपलिन की धुनों का एक संकलन तैयार किया जिसे ग्रमी पुरस्कारों के लिए नामांकित भी किया गया.  1973 में अमरीका की न्यू इंग्लैण्ड रैगटाइम संरक्षण मण्डली ने "द रेड बैक बुक" के नाम से स्कौट जौपलिन की धुनों को उन्हीं के समय के संगीत-संयोजन के साथ प्रस्तुत किया. इस ऐल्बम ने "चेम्बर संगीत" की श्रेणी में उसी वर्ष का ग्रैमी पुरस्कार जीता. 
रैगटाइम को (स्कौट जौपलिन के काम को सामने रखते हुए) मोत्सार्त, शोपां और ब्राह्म्स जैसे पश्चिमी शास्त्रीय संगीतकारों द्वारा मिनुएट, माज़ुर्का और वौल्ट्ज़ जैसे नृत्यों के लिए रचे गये संगीत का अमरीकी प्रारूप कहा गया है और उसने क्लौद देबुसी और इगोर स्त्राविंस्की जैसे बहुत-से शास्त्रीय संगीतकारों पर अपना असर भी छोड़ा.
रैगटाइम के पीछे जो असर थे, उनमें एक दिलचस्प असर उन धारणाओं का भी था जो गोरों ने काले ग़ुलामों के बारे में बना रखी थीं और जिन्हें कुछ काले लोगों ने भी अपना लिया था. मसलन १८९५ में मनोरंजन के क्षेत्र में एक जाने-माने काले संगीतकार अर्नेस्ट होगन ने एकदम शुरुआती रैगटाइम धुनों में से दो प्रकाशित कीं, जिनमें से एक का शीर्षक था "औल कून्ज़ लूक अलाइक टू मी" याने "सारे कल्लू मुझे एक-से लगते हैं." 

कल्लू की मुश्किलों की बात कर रहे हो
मुझसे पूछो क्या गुज़री है मेरे साथ

मेरी जानू है लूसी जेनी स्टबल्स
जिसने छोड़ दिया है आखिर मेरा हाथ
वर्जिनिया से आया एक और कल्लू नाई
तबियत उसी पे मेरी लूसी की आयी
कहती है  कल्लू दिखें  एक जैसे
ज़रूरत मुझे अब रहे तेरी कैसे

मिला है मुझे अब इक और दिलबर जानी
तू छोड़ मेरा पीछा ये दुनिया है फ़ानी
ज़रूरत मुझे अब रहे तेरी कैसे
 कल्लू मुझे सब दिखें  एक जैसे 


http://youtu.be/AvfaNKBpIgk (औल कून्ज़ लूक अलाइक टू मी)

(Talk about a coon a having trouble, I think I have enough of ma own. Its all about ma Lucy Janey Stubbles, and she has caused my heart to mourn. Thar s another coon barber from Virginia. In society he is the leader of the day. And now ma honey gal is gwine to quit me, yes she s gone and drove this coon away. She had no excuse, to turn me loose. I have been abused, I am all confused. Cause these words she did say....CHORUS - All coons look alike to me, I have got another beau you see. And he is just as good to me as you ever tried to be. He spends his money free, I know we cant agree. SO, I DONT LIKE YOU NO HOW, ALL COONS LOOK ALIKE TO ME.)

कून बिज्जू को कहते हैं और यह शब्द काले ग़ुलामों के लिए हिकारत और व्यंग से इस्तेमाल होता था. जहां इस गीत और उसकी धुन ने रैगटाइम को पूरे अमरीका भर में लोकप्रिय बनाने में मदद दी, वहीं इसमें जो नस्लवादी छींटाकशी का इस्तेमाल था, भले ही व्यंग के तौर पर, उसकी वजह से बहुत-से लोगों ने इसकी नक़ल में इसी क़िस्म के और भी कई गीत और धुनें बनायीं जिनमें न सिर्फ़ बेहद नस्लवादी भावनाएं व्यक्त की गयी थीं, बल्कि काले लोगों की पिटी-पिटाई हिकारत-भरी छवियां अंकित की गयी थीं. आगे चल कर होगन ने रैगटाइम को बड़े पैमाने पर लोकप्रिय बनाने और एक विशाल श्रोता समुदाय के सामने लाने के लिए गर्व प्रकट किया तो साथ ही बड़े अफ़सोस के साथ अपने पहले गीत पर शर्म का इज़हार भी किया और कहा कि समझ के विकसित होने के साथ उन्हें शिद्दत से यह एहसास हुआ था कि उन्होंने वह गीत लिख कर जैसे अपनी नस्ल और जाति के साथ ग़द्दारी की थी. 
समय के साथ रैगटाइम की अनेक शाखाएं-प्रशाखाएं फैलती चली गयीं और १९१५ के बाद हालांकि जैज़ ने अफ़्रीकी अमरीकी संगीत के अखाड़े में अपनी ज़ोरदार हाज़िरी दर्ज करा दी थी, रैगटाइम के कलाकार नयी-नयी दिशाओं में प्रयोग करते रहे. केकवौक का ज़िक्र किया ही गया है, उसके साथ-साथ फ़ोक रैगटाइम, स्लो ड्रैग, टू स्टेप, क्लासिक रैग, नौवल्टी पियानो और स्ट्राइड पियानो जैसे अनेक रूप विकसित होते चले गये.
जैसा कि मैंने कहा, परिपक्व रैगटाइम 1897 में उभर कर सामने आया जब कई जाने-माने गीत और धुनें प्रकाशित हुईं. उस समय जहां कुछ संगीतकार पूरी तरह रैगटाइम को समर्पित थे, वहीं जेली रोल मौर्टन जैसे वादक भी मौजूद थे जो रैगटाइम के साथ-साथ जैज़ संगीत की शुरुआती रचनाएं भी पेश कर रहे थे. जेली रोल मौर्टन ने, जिनका ज़िक्र आगे किया जायेगा, इस दौर में बहुत-से प्रयोग किये और अपनी प्रस्तुतियों में स्पेनी असर भी समोया, जिससे उनके संगीत में हाबानेरा या कहा जाये कि ख़ास टैंगो लय भी सुनायी देने लगी. हुआ यह कि कैरिब्बियाई क्षेत्र के समुद्र-तट के शहरों जैसे हवाना  और न्यू और्लीन्ज़ और अमरीका की दक्षिणी बन्दरगाहों के बीच नियमित आवा-जाही थी और संगीत और संगीतकार इस आवा-जाही में शामिल थे. नतीजे के तौर पर अफ़्रीकी-अमरीकी संगीत में अफ़्रीकी-क्यूबाई प्रभावों का समावेश उन्नीसवीं सदी से ही होने लगा था जब हाबानेरा की लय-ताल लोकप्रिय होने लगी. हाबानेरा अफ़्रीकी आधार पर "लिखी" जाने वाली पहली लय थी. इसमें ऊंचे सुरों और निचले सुरों का इस्तेमाल एक साथ होता था जिन्हें त्रेसियो और बैकबीट कहते थे. त्रेसियो के साथ-साथ उसके एक और रूप सिन्क्वियो का समावेश भी हुआ. लय-ताल की इन सारी बिनावटों की जड़ें अफ़्रीकी थीं, जिन्हें अमरीकी, स्पेनी और फ़्रान्सीसी मूल की अलग-अलग शैलियों ने अपना लिया था.

http://youtu.be/Lw033a5Nozw?list=PLgM3h2uWLn7LMfdDltkL1jPPrFyw9hDEh (हाबानेरा)

(जारी)

Monday, February 9, 2015

चट्टानी जीवन का संगीत

जैज़ पर एक लम्बे आलेख की छठी कड़ी


6.

अमरीकी विस्थापितों की स्थिति में जो सबसे बड़ा परिवर्तन घटित हुआ वह था 1864 में दास प्रथा का उन्मूलन. वैसे तो अमरीकी गोरों में बहुत-से लोग दास-प्रथा और मनुष्य को मनुष्य से एक दर्जा नीचे रखने के विरोधी थे, लेकिन एक बहुत बड़ा समुदाय कई कारणों से दास-प्रथा के पक्ष में था. एक कारण तो था नस्लवादी सोच. सदियों से यूरोपीय और अमरीकी गोरे यह मानते आये थे कि अफ़्रीकी लोग गोरी जातियों से हीनतर हैं. दूसरा कारण आर्थिक था. अमरीका के दक्षिणी हिस्से की अर्थ-व्यवस्था काले ग़ुलामों पर टिकी हुई थी जो तम्बाकू, कपास, मक्का, केला और दूसरी फ़सलों की खेती के काम में सबसे अनिवार्य तत्व --  श्रम -- उपलब्ध कराते थे और साथ ही घरेलू कामगरों की एक फ़ौज भी. यह सस्ता श्रम अमरीका के दक्षिणी क्षेत्र की अर्थ-व्यवस्था का आधार था. लेकिन इस बीच अमरीका के उत्तरी क्षेत्र में कल-कारख़ानों और उद्योग-धन्धों के विकास ने औद्योगिक मज़दूरों की एक अच्छी-ख़ासी मांग पैदा कर दी थी. इसी का नतीजा था 1862-63 का अमरीकी गृह-युद्ध, जिसने पूरे देश को दो विरोधी ख़ेमों में बांट कर रख दिया था. हालांकि गृह-युद्ध में जीत का सेहरा अमरीका के उत्तरी हिस्से के सिर बंधा और क़ानूनी तौर पर दास-प्रथा रद्द कर दी गयी, मगर नीग्रो समुदाय की स्थिति बहुत करके पहले जैसे ही रही. जो उत्पीड़न खुल्लम-खुल्ला होता था, वह अब छिपे तौर पर होने लगा.

आम तौर पर अनुमान है कि अमरीकी नीग्रो संगीत अमरीकी गृहयुद्ध (1861-64) के बाद के अर्से में अमरीका के दक्षिणी हिस्से के अन्दरूनी इलाक़े में, उसके मुफ़स्सिल में ब्लूज़ के रूप में उभर कर सामने आया और इसकी जड़ें खेत-मजूरों की टिटकारियों, गुहार और जवाब, काम के समय गाये जाने वाले गीतों, तुकबन्दियों और सरल आख्यानपरक छन्दों में खोजी जा सकती हैं। ये गीत अक्सर जीवन की कठोरता अथवा विरह-विछोह और खोये हुए प्यार के इर्द-गिर्द बुने जाते थे। थे गायक-गायिकाएं अक्सर कड़वी हक़ीक़तों वाली दुनिया में अपने निजी दुखों को  व्यक्त करते थे -- प्रेम में निराशा, ज़िन्दगी की मुसीबतें और उसकी कठोरता, पुलिस के सिपाहियों की क्रूरता, गोरों का बेरहम सुलूक़ और बदक़िस्मती के थपेड़े . लेकिन ऐसा नहीं है कि उनमें हमेशा उदासी और विषाद ही व्यक्त होता था। सीधी, सरल और अकृत्रिम -- यहाँ तक कि भोलेपन को छूती हुई -- अभिव्यक्तियों से ले कर जटिल और संश्लिष्ट भावनाओं तक -- ब्लूज़ के गीत एक व्यापक दायरे में फैले हुए हैं। लोक-गायकों की प्रस्तुतियों में उनकी लम्बाई भी छोटी-बड़ी हो सकती थी, मगर विशुद्ध ब्लूज़ की एक अपनी ख़ास बिनावट है और इसी के आधार पर आज ब्लूज़ को पहचाना जाता है।

जैज़ की बुनियादी विशेषता -- गुहार और जवाब -- ब्लूज़ में भी अनिवार्य रूप से मौजूद थी और इसमें मात्राएं ख़ास तरह से आगे को बढ़ती थीं. साथ ही एक अजीब-सी समाधि वाला असर भी मौजूद रहता था जो अक्सर पैरों की हरकत में भी नज़र आता था, जहां शरीर बड़े धीमे-धीमे, लय-भरे अन्दाज़ में लहराते हुए आगे-पीछे सरकता रहता था. विशुद्ध ब्लूज़ में बारह मात्राओं की बिनावट होती है और उसके गीतों में तीन-तीन पंक्तियों के टुकड़े होते हैं। पहली पंक्ति गाने के बाद उसी पंक्ति को दोहराया जाता है और फिर तीसरी पंक्ति गायी जाती है। मिसाल के तौर पर प्रसिद्ध ‘सेंट लूइज़ ब्लूज़’ जिसे वैसे तो शायद हर बड़े जैज़-फ़नकार ने गाया और बजाया, मगर जिसकी सर्वोत्तम प्रस्तुतियों में से एक बेसी स्मिथ (1894-1937) ने पेश की। ब्लूज़ की गायिकाओं में बेसी स्मिथ की एक अपनी ही जगह थी, जिसे उन्होंने अपनी शानदार आवाज़ और तपी हुई अदाकारी के बल पर हासिल किया था। बोल थे -- ‘आई हेट यू सी द ईवनिंग सन गो डाउन।’ इस पंक्ति को दोहराया जाता था और फिर अगली पंक्ति -- ‘इट मेक्स मी थिंक ऑफ़ लास्ट गो राउण्ड’ -- गायी जाती थी।

http://youtu.be/jNWs0LsimFs?list=PL28D01AC6950859CA (बेसी स्मिथ)

जैसा कि हमने कहा है, जैज़ की ऐसी बहुत-सी धुनें और गीत हैं जिन्हें उनके रचने वालों के अलावा भी बहुत-से गयकों और वादकों ने पेश किया है. ’सेंट लूइज़ ब्लूज़’ ऐसी ही रचनाओं में शुमार किया जा सकता है. बेसी स्मिथ के बहुत बाद सुप्रसिद्ध अभिनेत्री और गयिका अर्था किट ने भी इसकी एक अदायगी अपने ख़ास अन्दाज़ में पेश की :

http://youtu.be/GPYVlUV_xk4 (अर्था किट-- आई हेट यू सी द ईवनिंग सन गो डाउन)

ब्लूज़ में बारह मात्राओं की यह बिनावट कैसे विकसित हुई, यह तो बताना मुश्किल है, लेकिन इसमें निश्चय ही नीग्रो संगीत-विशेषज्ञ डब्ल्यू. सी. हैंडी की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी, जिन्होंने बड़ी संख्या में ब्लूज़ इकट्ठे करके उन्हें प्रकाशित कराया था। यह बात पहले महायुद्ध से कुछ पहले की है. 
विलियम क्रिस्टोफ़र हैंडी (1873-1958) अमरीका के ठेठ दक्षिणी इलाक़े में फ़्लोरेन्स (ऐलाबामा) के रहने वाले थे. रोज़ी-रोटी कमाने के लिए उन्होंने बढ़ई, मोची और राज-मिस्त्री का काम सीख रखा था ताकि जब वे संगीत से अपना ख़र्च न चला पायें तो इन पेशों में से किसी को अपना सकें. संगीत का शौक़ हैंडी को लड़कपन ही से था जब वे गिरजे में जा कर भजन गाया करते या और्गन बजाया करते. बाद में उन्होंने बताया था कि उन्हें अपने चारों तरफ़ फैली प्रकृति से भी संगीत की बहुत-सी प्रेरणा मिली थी,"पक्षियों, चमगादड़ों और उल्लुओं की पुकारों और उनकी अजीबो-ग़रीब आवाज़ों से."

हैंडी की पहली नौकरी इस्पात के कारख़ाने में भट्ठी में कोयला झोंकने वाले मज़दूर की थी. यहां उन्होंने पाया कि भट्ठी में कोयला या कच्चा लोहा झोंकने वाले मज़दूर अपने बेलचों से तरह-तरह की आवाज़ें निकालते और "जब दस-बारह लोग ऐसा कर रहे होते तो असर अद्भुत होता. किसी फ़ौजी बैण्ड में बजाये जा रहे ढोल-नगाड़ों से बेहतर." उन्होंने यह भी देखा कि दक्षिणी अमरीका के नीग्रो मज़दूरों में किसी भी चीज़ से लय-ताल पैदा करने की कुदरती कूवत थी.

1900 के आस-पास जब हैंडी सत्ताईस साल के थे, तब नीग्रो लोगों के लिए बने ऐलाबामा के कृषि विश्वविद्यालय ने उन्हें संगीत शिक्षक नियुक्त कर दिया., लेकिन हैंडी की दिलचस्पी पश्चिमी शास्त्रीय संगीत से ज़्यादा अपने अनोखे अफ़्रीकी अमरीकी संगीत में थी. लिहाज़ा वेसंगीत शिक्षक की नौकरी छोड़ कर एक घुमन्तू बैण्ड  में शामिल हो गये और जल्दी ही अश्वेत संगीतकारों की एक मण्डली के निर्देशक बन गये. इस बीच अलग-अलग जगहों पर घूमते हुए धीरे-धीरे हैंडी को उस नीग्रो संगीत को सुनने के ढेरों मौके मिले जो अमरीका के दक्षिणी हिस्से के गांव-देहात में और कारख़ानों में गाया-बजाया जाता था. ये सभी लोग गुमनाम संगीतकार थे और अपनी फ़ुर्सत की घड़ियों में दिल बहलाने के लिए गाया-बजाया करते थे. इनमें से बहुत-से लोग ऐसे भी थे जो आम कस्बों और गांवों के चौराहों या नुक्कड़ों पर खड़े हो कर अपने गीत गाते और इसी से खर्चा चलाते. इनमें से बहुत-से लोग घुमन्तू गायक होते जो गांव-गांव, शहर-शहर घूम कर अपनी अपनी फ़नकारी से पैसे कमाते. यह सारा अनुभव विलियम हैंडी के अन्दर दर्ज होता जा रहा था और जब वे 1909 में टेनेसी प्रान्त के मेम्फ़िस शहर आ बसे तो पहली बार उनकी अपनी रचना "मेम्फ़िस ब्लूज़" के रूप में व्यक्त हुआ. नीचे हैंडी वाले प्रारूप के लिंक के साथ साथ दो और लिंक दिये जा रहे हैं :

http://youtu.be/ZGqBmlZR3dc   (मेम्फ़िस ब्लूज़  -- विलियम क्रिस्टोफ़र हैंडी)
http://youtu.be/PEHLK0TKln0     (          "        ड्यूक एलिंग्टन)
http://youtu.be/3ZkdRjAWR6g   ( " जिम हेसियन)

"मेम्फ़िस ब्लूज़" दरअसल मेम्फ़िस के नगर प्रमुख पद के लिए खड़े होने वाले उम्मीदवार एड्वर्ड क्रम्प के चुनाव अभियान के लिए लिखा गया था. बाद में हैंडी ने इस धुन को संवार-सुधार कर इसका नाम "मिस्टर क्रम्प" की बजाय "मेम्फ़िस ब्लूज़" रख दिया. 1912 में इस धुन के प्रकाशित होते ही ब्लूज़ की 12 मात्राओं वाली शैली मानो तय हो गयी और उनकी इस पहली कामयाबी ने आगे के गीतों और धुनों के रास्ते खोल दिये. हैंडी ने "मेम्फ़िस ब्लूज़" के दो साल बाद "सेंट लुइज़ ब्लूज़" की रचना की और ब्लूज़ की बुनियाद पक्की कर दी. 

http://youtu.be/dmFUXYaZIMk  ( सेंट लुइज़ ब्लूज़  W C Handy)

अब तक वे संगीत को ही रोज़ी-रोटी के साधन के रूप में अपना चुके थे और न सिर्फ़ संगीत रचने तक सीमित थे, बल्कि इस ख़ास क़िस्म के अफ़्रीकी अमरीकी संगीत के नमूने खोजने, उनकी स्वर-लिपि तैयार करने और इन स्वर-लिपियों को बाज़ार में अन्य गायकों वादकों को उपलब्ध कराने में भी जुट गये थे, जो काम कि वे अपने जीवन के अन्त तक करते रहे.

1917 में हैंडी न्यू यौर्क आ गये और वहां सुप्रसिद्ध गेइटी थिएटर में एक दफ़्तर खोल कर अपने रचे संगीत की स्वर-लिपोइयों के प्रकाशन का काम करने लगे. न्यू यौर्क में ज़्यादा गुंजाइशें थीं और यहां हैंडी के जौहर सही तौर पर उजागर हुए. उन्होंने ब्लूज़ की 53 रचनाओं की स्वर-लिपियों के साथ उनके बोल भी एक संकलन की शक्ल में प्रकाशित किये और अफ़्रीकी अमरीकी संगीत को लोगों के बीच फैलाने के लिए एक बेहद ज़रूरी भूमिका अदा की. यह शायद पहली पुस्तक थी जो ब्लूज़ को अमरीका के दक्षिणी इलाक़े की संस्कृति और उसके इतिहास के अखण्ड हिस्से के रूप में स्थापित करती है.  लेकिन यह दिलचस्प है कि उन्होंने पाया कि उस समय के ज़्यादातर नीग्रो बैण्ड और गायक-वादक अपनी जड़ों की तरफ़ जाने की बजाय पश्चिमी शैली के प्रचलित गीतों को ही गाते-बजाते. शायद वे डरते थे कि अगर वे "कालों का संगीत" गायेंगे-बजायेंगे तो आम सुनने वाले उनकी तरफ़ तवज्जो नहीं देंगे. मगर यह भी एक मज़ेदार बात थी कि गोरे लोगों के बैण्ड और उनके फ़नकार नयी-नयी शैलियों की तलाश में रहते थे और वे विलियम हैंडी की रची धुनों और गीतों को पेश करने के लिए हमेशा तैयार रहते. इसके साथ-साथ जो नीग्रो फ़नकार मंचीय कार्यक्रम पेश करते हुए अभिनय के साथ-साथ गाने भी गाते थे उन्होंने भी हैंडी के गीत इस्तेमाल करने शुरू कर दिये थे ताकि गोरे फ़नकारों के प्रदर्शन में कोई अड़ंगा न पैदा हो. फिर जैसे इतना ही काफ़ी न हो, हैंडी ने फ़िल्मों में भी दिलचस्पी लेनी शुरू की और दूसरे रचनाकारों की रचनाओं को भी पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया. अपने समय से बहुत पहले हैंडी ने ऐसे गोरे गायकों को प्रोत्साहित किया जिनके स्वर अफ़्रीकी-अमरीकी संगीत की इस ख़ास शैली के अनुकूल पड़ते थे. 1958 में जब 85 साल की उमर में विलियम हैंडी का निधन हुआ तो वे अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर न केवल "ब्लूज़ के जनक" माने जा चुके थे, बल्कि संगीत की इस विधा को अमरीकी समाज और संस्कृति के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार भी करा चुके थे.

शुरू-शुरू के ब्लूज़ में चार-चार पंक्तियां होती थीं जिन्हें दोहराया जाता था, लेकिन डब्ल्यू. सी. हैंडी के संकलन करने तक नमूना बदल चुका था और तीन-तीन पंक्तियों की बिनावट सामने आयी थी. इन गीतों में से जो सबसे ज़्यादा मशहूर हुए -- जैसे ‘सेंट लूइज़ ब्लूज़’ --उनमें बारह मात्राओं की यही बिनावट थी। फिर शायद इन्हीं नमूनों को सामने रख कर अन्य ब्लूज़ की रचना हुई होगी।

बेसी स्मिथ की रिकॉर्डिंग में कॉर्नेट पर उनकी संगत की थी जैज़ के महान संगीतकार लुई आर्मस्ट्रौंग ने, जिन्होंने बीसवीं सदी में जैज़ को दुनिया के कोने-कोने में फैलाने के सिलसिले में इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी कि उन्हें ‘जैज़ का राजदूत’ कहा जाने लगा। ‘सेंट लूइज़ ब्लूज़’ के इस रिकॉर्ड की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसमें लुई आर्मस्ट्रौंग द्वारा कॉर्नेट पर की गयी संगत बड़ी ख़ूबी के साथ गायिका के स्वरों की प्रतिगूँज पैदा करती है। 

http://youtu.be/hpu14BRmvGA?list=PL28D01AC6950859CA (बेसी स्मिथ और लूई आर्मस्ट्रौंग) http://youtu.be/3rd9IaA_uJI (बेसी स्मिथ और लूई आर्मस्ट्रौंग) 
http://youtu.be/D2TUlUwa3_o (लूई आर्मस्ट्रौंग और वेल्मा मिडलटन -- सेंट लूइज़ ब्लूज़)

वाद्य-यन्त्रों द्वारा मानवीय स्वरों का यह अनुकरण जैज़ संगीत की एक और ख़ासियत है और जिन संगीत-प्रेमियों ने उस्ताद विलायत खाँ का सितार-वादन सुना है -- ख़ास तौर पर ‘बाट चलत नयी चुनरी रंग डारी’ वाली सिन्धी भैरवी -- वे सहज ही जैज़-संगीत की इस विशेषता को समझ सकते हैं।

ब्लूज़ गायकी और उसके वादन के बहुत-से तत्व अफ़्रीकी संगीत से आये थे, जिनमें लगातार यूरोपीय तत्वों की मिलावट होती रही थी. इस गायकी का नाम ब्लूज़ कैसे पड़ा, इसके बारे में कई विचार प्रकट किये गये हैं. एक ख़याल यह है कि इस का ताल्लुक़ नील और उससे जुड़े रहस्यवाद से है. बहुत-से अफ़्रीकी समुदायों में मृत्यु और शोक के साथ नील का गहरा सम्बन्ध था जहां मातम करने वालों के सारे कपड़े नील से रंगे होते थे और इस तरह नीला रंग दुख और पीड़ा को व्यक्त करने लगा. चूंकि नील की खेती अमरीका के दक्षिणी हिस्से के बहुत से इलाक़ों में होती थी और उसका इस्तेमाल कपास को रंगने के लिए होता था, ख़ास तौर पर इन विस्थापित लोगों के बीच शोक के अवसरों पर, चुनांचे उनकी पीड़ा को व्यक्त करने वाले गीतों को भी ब्लूज़ कहा जाने लगा. वैसे यह नाम "नीले प्रेत" से भी आया हो सकता है जो जौर्ज कोलमैन के एकांकी प्रहसन "ब्लू डेविल्स" (१७९८) का शीर्षक है और अवसाद और उदासी के अर्थों में इस्तेमाल हुआ है.  ब्लूज़ का नाम चाहे जैसे पड़ा हो, इसमें किसी को शक नहीं है कि उसके स्रोत जितने अमरीका में ग़ुलाम बना कर लाये गये अफ़्रीकियों के दुख और दुर्दशा में थे, उतने ही इग्बो, योरुबा और पश्चिमी अफ़्रीका के स्थानीय समुदायों के रीति-रिवाजों, कर्म-काण्डों और अभिव्यक्ति के तरीक़ों में.

समय के साथ ब्लूज़ के बोल ही नहीं बदले, उनकी अदायगी भी बदली. हालांकि ब्लूज़ का बुनियादी स्वर पीड़ा और उत्पीड़न का ही रहा, उसके बोल कई बार हास्य, व्यंग्य और छेड़-छाड़ वाले भी होते. मसलन बिग जो टरनर की रचना "रिबेका" को लीजिये -- 

http://youtu.be/Bx937X08iO8  ( रिबेका - बिग जो टर्नर)

जैसे-जैसे ब्लूज़ की लोकप्रियता बढ़ी, उनके विषयों का दायरा भी फैलता गया. कई बार अश्लीलता को छूने वाले और दो अर्थों वाले शब्द भी इस्तेमाल होने लगे, हालांकि इन "गन्दे ब्लूज़" को अपवाद ही कहा जा सकता है, क्योंकि 1908 में पहले-पहले ब्लूज़ गीतों के प्रकाशन के बाद जो ब्लूज़ प्रमुखता से सामने आये उनमें पुरानी परम्परागत भावनाएं ही व्यक्त हुई थीं और यही ब्लूज़ का आधार बना रहा. इसी तरह हालांकि ब्लूज़ की मात्राओं की गिनती 12 ही रही लेकिन प्रयोग के तौर पर 16 मात्राओं का प्रयोग भी हुआ जैसे रे चार्ल्स के "स्वीट सिक्स्टीन बार्ज़" में --

http://youtu.be/Y3_vM6GNrY8 (रे चार्ल्स -- स्वीट सिक्स्टीन बार्ज़)

या  हर्बी हैनकौक के "वौटरमेलन मैन" में --

http://youtu.be/RzPZvKSdN7g (हर्बी हैनकौक -- "वौटरमेलन मैन")

इसी तरह 8 मात्राओं में भी कई रचनाएं मिलती हैं, जैसे "ट्रबल इन माइण्ड" और बिग बिल ब्रून्ज़ी के "की टू द हाइवे" में --

http://youtu.be/KN_f0WVsHuw (बिग बिल ब्रून्ज़ी -- टू द हाइवे)

कभी-कभार विषम मात्राओं वाली रचनाएं भी देखने को मिल जाती हैं जैसे वौल्टर विन्सन की रचना "सिटिंग औन टौप औफ़ द वर्ल्ड" में -- 
http://youtu.be/RqeW7-tmVU4  (वौल्टर विन्सन -- सिटिंग औन टौप औफ़ द वर्ल्ड )

(जारी)

Sunday, February 8, 2015


चट्टानी जीवन का संगीत 

जैज़ पर एक लम्बे आलेख की पांचवीं कड़ी


4.
ग़ुलाम सबसे ज़्यादा तब गाते हैं जब वे दुखी और ग़मज़दा होते हैं 
- फ़्रेड्रिक डगलस


गोरों के क़ानूनों ने भले ही ग़ुलामों के नगाड़ों पर पाबन्दी लगा दी हो, उनको दसियों तरीक़ों से ज़लालत भुगतने पर मजबूर किया हो, उन्हें उनके वतनों से जबरन एक पराये देश में ला कर ग़ुलामी की ज़ंजीरों से बांध दिया हो, मगर वे न तो वे इन अफ़्रीकी लोगों की जिजीविषा को ख़त्म कर पाये, न उनके जीवट को और न उनके अन्दर ज़िन्दगी की तड़प को. वाद्यों की कमी को इन लोगों ने कुर्सी-मेज़ पर या फिर टीन के डिब्बों और कनस्तरों और ख़ाली बोतलों पर  थपकी या ताल दे कर पूरा कर लिया था.

जहां तक दूसरे वाद्यों का सवाल था, ग़ुलाम बना कर लाये गये इन लोगों ने धीरे-धीरे पश्चिमी वाद्यों को अपनाना शुरू कर दिया था. उन्नीसवीं सदी के शुरू से ही पश्चिमी वाद्यों के इस्तेमाल के सबूत मिलने लगते हैं और जो सबसे पहला वाद्य ग़ुलामों ने अपनाया, वह था वायोलिन, जिसे आम तौर पर फ़िडल भी कहा जाता था. फिर जैसे-जैसे समय बीता उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक आते-आते दूसरे वाद्य जैसे बिगुल, तुरही और कैरिनेट भी शामिल कर लिये गये. अलावा इसके, जहां नगाड़ों पर पाबन्दी नहीं लगी थी या जल्दी ही हटा ली गयी थी, जैसे अमरीका के दक्षिणी भाग न्यू और्लीन्ज़ में, वहां चमड़े से मढ़े घरेलू ढोल-नगाड़े सार्वजनिक-सामूहिक गीत-संगीत और नाच के आयोजनों में इस्तेमाल किये जाते थे. 

जहां एक ओर इसमें कोई शक नहीं है कि इन विस्थापित और उत्पीड़ित लोगों का जीवन आम तौर पर अकथनीय कष्टों से भरा था, वहीं दूसरी ओर यह भी एक सच्चाई है कि इन सभी मज़लूम लोगों ने अपने दारुण जीवन और उसके नीरस, निरानन्द, निराशा-भरे माहौल का सामना करने के लिए राहत के अपने शाद्वल बना लिये थे. कला के अन्य रूपों का रास्ता अवरुद्ध पाने पर उन्होंने संगीत में राहें खोज निकालीं. उन्नीसवीं सदी के मध्य तक आते-आते जब खेतों और फ़सलों की सालाना कटाई हो चुकती तो कुछ दिन मौज-मस्ती के लिए अलग कर दिये जाते. कई इलाक़ों में इन अवसरों पर जो उत्सव मनाये जाते, उनमें नर्तक सिर पर सींगों वाले पहरावे और ऐसे लोक-परिधान पहन कर नाचते जिनमें गाय-बैलों की दुमें लगी होतीं. वाद्यों में घरेलू नगाड़े, लोहे के तिकोन और मवेशियों के जबड़ों की हड्डियां इस्तेमाल की जातीं. वक़्त के साथ अफ़्रीकी धुनों और रागों में यूरोपीय धुनों की मिलावट भी होने लगी.

एक और असर जो इस विस्थापित अफ़्रीकी समुदाय पर पड़ा, वह ईसाई भजनों का था. बहुत-से ग़ुलामों ने ईसाई गिरजे में गाये और बजाये जाने वाले धार्मिक संगीत के स्वर-संयोजन को सीख लिया था और उसे अपने मूल अफ़्रीकी संगीत में घुला-मिला कर एक नया रूप तैयार कर लिया था जिसे वे "स्पिरिचुअल" कहते थे -- आध्यात्मिक संगीत.

चूंकि उस दौर में आस-पास के इलाक़े से बहुत-से व्यापारिक जहाज़ अमरीका के दक्षिणी हिस्से में आते, इसलिए कैरिब्बियाई क्षेत्र के अफ़्रीकी विस्थापितों का संगीत भी मल्लाहों और मज़दूरों के माध्यम से आता. इन कैरिब्बियाई इलाक़ों में फ़्रान्सीसी और स्पेनी असर लिये हुए अफ़्रीकी संगीत विकसित हुआ था. धीरे-धीरे यह भी उस धारा में आ कर शामिल होने लगा जो अमरीका में लाये गये ग़ुलामों ने विकसित किया था.
यहीं यह बात ख़ास तौर पर ध्यान देने की है कि अफ़्रीका से ग़ुलाम बना कर अमरीका लाये गये लोगों के संगीत की चर्चा जब की जाती है तो अक्सर उस अवधि पर ध्यान नहीं दिया जाता जब वह संगीत उभर कर सामने आया. गीत-संगीत के जमावड़ों, फ़सलों की कटाई के बाद मौज-मस्ती के पलों या फिर संगीत मण्डलियों का विकास बहुत करके १८६२-६४ के अमरीकी गृह-युद्ध और अमरीका में दास-प्रथा के उन्मूलन के बाद के दौर में हुआ और इसे भी किसी ढब का बनते-बनते चार-पांच दशक लग गये. जिन लोगों को ग़ुलामी और उस भयंकर नस्लवादी भेद-भाव का तजरुबा नहीं है, जो अमरीका में अफ़्रीकी मूल के लोगों को भुगतना पड़ा (और यह शायद आज तक पूरी तरह दूर नहीं हुआ है), वे अपनी सादालौही में मान लेते हैं कि इन ग़ुलामों का संगीत उनके सुख-सन्तोष का इज़हार है. ग़ुलामी से भागने में सफल होने के बाद एक भूतपूर्व दास फ़्रेड्रिक डगलस(१८१८-१८९५) ने, जो आगे चल कर दास-प्रथा के उन्मूलन और नीग्रो समुदाय के हक़ों के जाने-माने आन्दोलनकारी और सुप्रसिद्ध वक्ता बने, अपनी आत्म-कथा में लिखा :

"...मैंने कभी-कभी सोचा है कि ग़ुलामी के बारे में फलसफ़े की पूरी-पूरी किताबों को पढ़ने की बनिस्बत महज़ इन गीतों को सुनना कुछ लोगों के दिमागों पर ग़ुलामी की भयानक फ़ितरत के बारे में एक गहरी छाप डाल सकता है....जब मैं ग़ुलाम था तब मैं इन रूखे, बीहड़ और प्रकट रूप से अबूझ गीतों के गहरे अभिप्रायों को नहीं समझता था. मैं ख़ुद दायरे के भीतर था; लिहाज़ा न तो मैं उस तरह देखता था न सुनता था जैसे वे लोग देख-सुन सकते थे जो बाहर थे. ये गीत दुख की ऐसी कथा बयान करते थे जो मेरी कमज़ोर समझ के बिलकुल परे थे; ये ऊंचे, लम्बे और गहरे सुर थे; उनमें उन आत्माओं की प्रार्थनाएं और शिकायतें बसी हुई थीं जो अत्यन्त कड़वी व्यथा से छलक रही थीं. हर सुर ग़ुलामी के ख़िलाफ़ एक गवाही था और ज़ंजीरों से छुटकारे के लिए ईश्वर से एक प्रार्थना...अगर किसी को ग़ुलामी के अमानुषिक और आत्मा का हनन करने वाले प्रभाव के बारे में जानना हो तो उसे कर्नल लौयेड के बगान पर जाना चाहिए और दिहाड़ी वाले दिन चुपके से चीड़ के सघन वन  में छिप कर ख़ामोशी से उन ध्वनियों को जांचना-परखना चाहिए जो उसके कानों और आत्मा के गलियारों से गुज़रती हैं और तब अगर वह अविचलित रह जाये तो ऐसा तभी हो सकता है जब ’उसके निष्ठुर हृदय में ज़रा भी मांस न हो’....अमरीका के उत्तरी हिस्से में आने के बाद मुझे ऐसे लोगों से मिल कर अक्सर बेइन्तहा हैरत हुई जो ग़ुलामों के बीच गीत-संगीत को उनके सन्तोष और ख़ुशी का सबूत मानते हैं. इससे ज़्यादा बड़ी भूल मुमकिन नहीं है. ग़ुलाम सबसे ज़्यादा तब गाते हैं जब वे दुखी और ग़मज़दा होते हैं. ग़ुलामों के गीत उनकी व्यथाओं और पीड़ा की निशानियां हैं; उसे उनसे राहत मिलती है, वैसे ही जैसे दर्द-भरे दिल को आंसुओं से मिलती है. कम-से-कम मेरा तो यही अनुभव है. मैंने अपने दुख को व्यक्त करने के लिए अक्सर गीत गाये हैं, बिरले ही अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करने के लिए. जब तक मैं ग़ुलामी के जबड़ों में जकड़ा हुआ था, ख़ुशी में रोना और ख़ुशी में गाना मेरी कल्पना से परे था. किसी ग़ुलाम का गाना उसी हद तक सन्तोष और ख़ुशी का सबूत माना जा सकता है जिस हद तक किसी निर्जन टापू पर ले जा कर छोड़ दिये गये आदमी का गाना; दोनों के गीत उसी सम्वेदना से उपजते हैं."
--फ़्रेड्रिक डगलस का जीवन-वृत्तान्त 

5.


अमरीका में दास-प्रथा लगभग तीन सौ साल तक रही और ये ग़ुलाम चूँकि अफ्रीका के अलग-अलग हिस्सों से लाये गये थे, इसलिए उनके संगीत-रूपों में भी विविधता थी। जहाँ तक यूरोपीय संगीत का सवाल है तो उसका अधिकांश ब्रिटेन से आया था, लेकिन अमरीका के लूज़ियाना राज्य पर बीच-बीच में फ्रांस और स्पेन का भी क़ब्ज़ा रहा, इसलिए फ्रान्सीसी और स्पेनी संगीत भी वहाँ की फ़िज़ा में रचा-बसा था। यूरोपीय संगीत में भजन और फ़ौजी धुनें तो थीं ही, साथ ही नाच के समय बजाया जाने वाला संगीत भी था।

क्रिस्टोफ़र कॉडवेल ने कविता के स्रोतों पर विचार करते हुए कविता को गीत से और गीतों को श्रम से, काम की लय से, जोड़ा था। जैज़-संगीत के स्रोत भी अमरीकी नीग्रो दासों की इसी काम की लय में खोजे जा सकते हैं। मज़दूरों के गीत, जैसा कि नाम से ज़ाहिर है, ऐसे गीत थे, जिन्हें लोग काम करते समय गाते थे। हमारे यहाँ भी धान की बोआई या गेहूँ की कटाई करने वाले किसान, गंगा पर बजरे खींचने वाले मल्लाह और मकान बनाने वाले मजूर इसी किस्म के गीत गाते हैं। इन गीतों की ताल और सुर, तुक और धुन काम की लय से जुड़ी होती है और इस तरह इन गीतों में गुहार और जवाब की एक बिनावट नज़र आती है। एक आदमी गुहार लगाता है और बाकी लोग जवाब में गीत की कडि़याँ दोहराते हैं और यह तान बराबर चलती रहती है। मैंने एक बार किसी इमारत के निर्माण के दौरान मज़दूरों की एक टोली को लोहे के बड़े-बड़े गर्डर उठाते समय ऐसी ही गुहार-जवाब लगाते सुना था। टोली का नायक गुहार लगाता-‘शाबाश ज्वान,’ ‘खींच के तान,’ आदि और हर गुहार के बाद टोली रस्सा खींचती हुई जवाब में ‘हेइस्सा’ कहती और लोहे का गर्डर इंच-इंच कर ऊपर चढ़ता जाता।

अमरीकी नीग्रो ग़ुलामों के ये मजूर-गीत भी इसी प्रकार के थे, जीवन और श्रम से जुड़े हुए, जो अपने आप में एक अफ्रीकी विशेषता थी। दिलचस्प बात है कि गुहार और जवाब की यह ‘जुगलबन्दी’ वहाँ भी बरकरार रही, जहाँ एक ही अकेला कामगार होता था। उस स्थिति में वह गीत की कडि़याँ बारी-बारी से मोटे और पतले सुरों में गाता -- बेस (भारी) सुर में एक कड़ी और फिर ‘फ़ौल्सेटो’ (स्त्रैण, पतले) सुर में दूसरी। आज जैज़-संगीत के परिष्कृत, शुद्ध सुरों को सुनते हुए भले ही यह कल्पना करना कठिन हो कि वह मज़दूरों के इन्हीं गीतों और उनकी गुहार-जवाब से विकसित हुआ होगा, लेकिन ध्यान से सुनने पर यह ‘जुगलबन्दी’ बराबर जैज़-संगीत में मौजूद मिलती है।

अमरीका के ग़ुलामी के दौर में और भी बहुत से संगीत-रूप निकल कर सामने आये और आज भी अमरीका के सुदूर ग्रामीण इलाकों में सुने जा सकते हैं, हालाँकि जब वे धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। ऐसी ही एक मिसाल है खेतिहरों के टिटकारी गीत, जिन्हें खेतों पर काम करने वाले मजूर, कहा जाय कि ख़ुद अपने आप से या अपने मवेशियों से बात करने के लिए, गाया करते थे। इन गीतों की टिटकारियाँ और भारी तथा पतले सुरों की जुगलबन्दी काफ़ी हद तक मज़दूरों के गीतों की ही तरह की थी और इन्हीं से हो कर जैज़ संगीत का सफ़र अपनी अगली मंज़िल -- ब्लूज़ -- तक पहुँचा।

आज जब ब्लूज़ की बात की जाती है तो यह ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि ब्लूज़ के शुरुआती दौर की कोई रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं है। मौजूदा रूप में जो ब्लूज़ उपलब्ध है, वह भी जैज़-संगीत की तरह अपनी जड़ों से इतनी दूर चला आया है कि उसके स्रोत अँधेरे में खोये हुए हैं। तो भी बुनियादी तौर पर ब्लूज़ की जड़ें मज़दूरों के गीतों और खेत-मजूरों के टिटकारी गीतों में ही खोजी जा सकती हैं। खेत के किसी अकेले कोने में काम करने वाला अमरीकी ग़ुलाम अपनी जातीय स्मृति में कैद बिम्बों को एक नयी सीखी भाषा में ढालते समय ज़ाहिरा तौर पर बेहद निजी गीतों का ही माध्यम अपना सकता था। इसीलिए ब्लूज़ मुख्य रूप से उदासी के, अवसाद के, विषाद के गीत हैं -- निजी और ज़्यादातर एकालाप में निबद्ध। अपने आप से की गयी संगीत-भरी बातचीत। शुरू के ब्लूज़ गाये ही जाते थे, पर आगे चल कर ब्लूज़ की धुनें बजायी भी जाने लगीं।

यहां एक ही धुन के दो रूप दिये जा रहे हैं. पहला, मशहूर गायिका बिली हौलिडे के स्वर में ब्लूज़ का प्रसिद्ध गीत "सेंट लूइज़ ब्लूज़" है और दूसरा, जाने-माने जैज़ वादक लूइज़ आर्मस्ट्रौंग द्वारा बजायी गयी वही धुन है जिसमें उनके साथ संगत वेल्मा मिडलटन कर रही हैं.

http://youtu.be/TmbQVx6SGao (बिली हौलिडे -- सेंट लूइज़ ब्लूज़)

http://youtu.be/D2TUlUwa3_o (लूइज़ आर्मस्ट्रौंग-- सेंट लूइज़ ब्लूज़)

(जारी)





Saturday, February 7, 2015

चट्टानी जीवन का संगीत 

जैज़ पर एक लम्बे आलेख की चौथी कड़ी


३.
...जैज़ हमारी जीवन शैली की देन है और चूंकि वह हमारा राष्ट्रीय कला-रूप है,
 वह हमे यह जानने में मदद करता है कि हम कौन हैं क्या हैं. 
--विण्टन मार्सेलिस

जैज़ की शुरुआत गायकी से हुई है। उसके स्रोत उस नीग्रो लोक गायकी में डूबे हुए हैं, जो किसी ज़माने में अमरीका के दक्षिणी देहातों में ख़ूब फली-फूली थी। उस समय नीग्रो लोगों के लिए -- जिनके पास किसी तरह के साज़ नहीं थे और गाने के साथ देने के लिए बस डिब्बे या पीपे ही थे -- आवाज़ ही संगीत की अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा साधन था। इसीलिए काम और आराम, आशा और निराशा की अभिव्यक्ति लगभग हर वर्ग के नीग्रो समुदाय से उभर कर आती -- खोंचे उठाये, घूम-घूम कर सामान बेचने वालों से ले कर रेल की पटरियाँ बिछाते मज़दूरों की टोलियों तक और खेत पर काम करते बँधुआ किसान से ले कर शाम को अपनी-अपनी झुग्गियों के सामने बैठे, गा-बजा कर थकान मिटाते नीग्रो परिवारों तक -- संगीत ही वह सूत्र था, जो उन्हें बाँधे रखता। इसमें पहली सुविधा यह थी कि बहुत थोड़े साज़ों से काम चल जाता. एक गिटार या माउथ ऑर्गन ही काफ़ी होता -और दूसरी सुविधा यह थी कि ये गीत नीग्रो समुदाय की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से वाबस्ता थे, उसके सुख-दुख, कष्ट और कठिनाई, सपनों और आकांक्षाओं को उसी की भाषा में व्यक्त करते थे। इसीलिए नीग्रो समुदाय इन गीतों के साथ सहज रूप से तादात्म्य स्थापित कर सकता था और गहरे सन्तोष के साथ उसे महसूस कर सकता था। अवसाद और उदासी, श्रम और श्रम से होने वाली थकान को व्यक्त करने वाले इन गीतों को मोटे तौर पर नाम दिया गया -- ब्लूज़ यानी उदासी के गीत। कारण शायद यह है कि अंग्रेज़ी में नीला रंग उदासी के साथ जुड़ गया है और बोल-चाल में भी ‘ब्लूज़’ का मतलब है उदासी।
मगर ब्लूज़ से भी पहले अक्सर ये अफ़्रीकी मूल के अमरीकी लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए संगीत का सहारा लेते और काम के वक्त लगायी जाने वाली पुकारों को लय ताल में बांध कर उस हाड़-तोड़ श्रम को हलका करने की कोशिश करते जो उन्हें खेत-खलिहानों में या सड़कें बनाते या लकड़ी काटते समय करना पड़ता.

http://youtu.be/Oms6o8m4axg?list=PL9z1NWJyyII1cpOzleTV5v-jlBFHW9IVC (टेक्सास की जेल में कैदी-मज़दूरों का गीत)
http://youtu.be/fjv0MYIFYsg (श्रम-शिविर का गीत)
http://youtu.be/4G5KtQynWvc (कैदियों का गीत)
http://youtu.be/9ch5IWTavUc (Work Song)

अफ़्रीका से ग़ुलाम बना कर लाये गये लोगों के साथ उनकी लय-ताल भी आयी. इनमें तीन तरह की तालें ज़्यादा प्रचलित थीं -- ट्रेसियो, सिन्क्वियो और हाबानेरा -- 

http://youtu.be/YyyYW3bzzbQ (ट्रेसियो, सिन्क्वियो और हाबानेरा )

ग़ुलामी की तकलीफ़ें और आत्मा तक को निचोड़ लेने वाली मेहनत और ऊपर से बदसलूकी -- अमरीका के हब्शी ग़ुलाम के पास इस सब से पार पाने का एक ही रास्ता उस वक़्त था और वह था संगीत, जिसके लिए वह अपने अन्दर युगों-युगों से रची-बसी लय-ताल का सहारा लेता. इसी सब से जैज़ की पहली-पहली आहट उन गीतों में सुनायी दी जिन्हें ब्लूज़ का नाम दिया गया.
ब्लूज़, दरअसल गायक की भावनाओं से सीधे उपजने वाला संगीतात्मक बयान था, जो इन भावनाओं को पूरे खुलेपन के साथ व्यक्त करता। उसमें ज़िन्दगी की वास्तविकता को उघाड़ने की अद्भुत क्षमता थी। लिहाज़ा ब्लूज़ के माध्यम से अपने दुख-सुख को व्यक्त करना और जीवन और प्रेम के बारे में अपने सामान्य रवैये को वाणी देना नीग्रो समुदाय की ज़िन्दगी का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया। और अधिक विकसित होने पर ब्लूज़ का स्वर बुनियादी तौर पर उल्लास और बड़बोलेपन से रंजित रहा, बहुत बार उसमें भावुकता भी नज़र आती है। मगर पीड़ा का एक तार हमेशा उसमें दौड़ता रहता है. संगीत के इसी रूप, इसी विधा ने उस ज़माने में नीग्रो समुदाय के लोक-गीत और लोक-संगीत की भूमिका अदा की। मगर ब्लूज़ की सूरत अख़्तियार करने से पहले जैज़ ने कई मंज़िलें तय की थीं.
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अमरीका में ग़ुलामी की शुरुआत उसके विशाल दक्षिणी हिस्से के खेतों के लिए सस्ते मज़दूरों की फ़ौज तैयार करने के मकसद से हुई थी.  बात यह थी कि "नयी दुनिया" की खोज ने यूरोप को आलू के साथ-साथ तम्बाकू से भी परिचित कराया था और अट्ठारहवीं सदी के आरम्भ तक अमरीका में बहुत बड़े-बड़े इलाक़े जोत में लिये जा चुके थे. अमरीका के दक्षिणी हिस्से में बड़े पैमाने पर तम्बाकू की खेती होने लगी थी, जिसे निर्यात किया जाता था. ज़ाहिर था कि इतने बड़े पैमाने पर खेती के लिए खेत मजूरों की ज़रूरत थी और ग़ुलामों से अधिक सस्ता और पूरी तरह काबू में रहने वाला खेत-मज़दूर और कहां मिलता. सो तम्बाकू की खेती ग़ुलाम व्यापार की नींव थी. आगे चल कर जब ज़रूरत से ज़्यादा तम्बाकू पैदा करने से खेतों की ताकत कम होने लगी तो डर पैदा हुआ कि इतनी बड़ी श्रम शक्ति का क्या होगा. लेकिन तभी उत्तरी अमरीका में रहने वाले एलाइ विटनी ने १७९२ में एक मशीन ईजाद करके कपास से बिनौले अलग करने का आसान तरीक़ा खोज निकाला. पहले हाथ से काम करने पर एक नीग्रो मज़दूर को आधा सेर रुई तैयार करने में दस घण्टे लगते थे. "कौटन जिन" की मदद से  वही मज़दूर एक म्दिन में ५०० सेर रुई तैयार कर लेता. साल भर में अमरीका लगभग दस लाख टन रुई इंग्लैण्ड और यूरोप की कपड़ा मिलों को भेजने लगा. कपास की बादशाहत ने थमते हुए ग़ुलामों के व्यापार में नये प्राण फूंक दिये.  
सन १८०८ तक यानी उन्नीसवीं सदी के शुरू होते-होते अतलान्तिक महासागर के आर-पार होने वाले ग़ुलामों के व्यापार के चलते लगभग पांच लाख अफ़्रीकी अमरीका लाये जा चुके थे. ये ग़ुलाम मुख्य रूप से अफ़्रीका के पश्चिमी हिस्से और कौंगो नदी की घाटी के इलाक़े से लाये गये थे. वे अपने साथ अपने प्राणों के साथ सिर्फ़ अपना जातीय ज्ञान, रीति-रिवाज और परम्पराएं ही ला सके थे जिनमें गीत और संगीत की परम्पराएं भी शामिल थीं. ज़ाहिर है कि अपने साथ अपने वाद्य-यन्त्र लाना उनके लिए सम्भव नहीं था. लेकिन लय-ताल और सुरों का जो ख़ास अफ़्रीकी ढंग था -- और यह भी कोई एक-सा न हो कर, अलग-अलग इलाक़ों से आने वाले लोगों के सिलसिले में अलग-अलग था -- उसे वे अपने साथ ले आये थे और यह यूरोपीय संगीत से बिलकुल भिन्न था. लय-ताल और सुरों का यह तरीक़ा बहुत हद तक अफ़्रीकी बोलने के तरीक़े पर आधारित था लय का छन्द-विधान यूरोपीय छन्द-विधान से अलग था. अफ़्रीकी परम्परागत संगीत एक पंक्ति की स्वर-संरचना का इस्तेमाल करती थी और इसमें पुकार और जवाब के एक सिलसिले पर संगीत आगे बढ़ता था, मगर स्वर-सामंजस्य की यूरोपीय अवधारणा के बिना और उससे बिलकुल अलग. अफ़्रीकी संगीत मोटे तौर पर काम-काजी था और रोज़मर्रा के काम या कर्म-काण्ड से जुड़ा था. उसकी लयकारी पूरे पश्चिमी जगत की संगीत परम्परा से भिन्न थी. मिसाल के लिए नीचे दिये गये लिंक को देखिए कि किस तरह रोज़्मर्रा के काम एक ख़ास तरह की लय और ताल के साथ किये जाते हैं. 

http://youtu.be/lVPLIuBy9CY (लय ताल के बिना हरकत सम्भव नहीं है)

इस सिलसिले में एक और महत्वपूर्ण बात यह थी कि काले लोगों, ख़ास कर दासों, से जुड़े कानूनों में उन पर बहुत-से प्रतिबन्ध भी लगा दिये गये थे. मिसाल के लिए ग़ुलामों को नगाड़े, ढोल, मंजीरे, झांझ या ऐसे ही ताल और थाप आधारित वाद्य बजाना मना था. नतीजा यह हुआ कि अफ़्रीकी थाप आधारित परम्पराएं अमरीका में उस तरह बचा कर संजोयी नहीं जा सकीं, जैसा कि क्यूबा, हाइती और कैरिब्बियाई क्षेत्र के अन्य स्थानों में देखने को मिलता है. ऐसे में वाद्यों की जगह "शारीरिक लय-ताल" से काम चलाया जाने लगा. इसमें ताली बजाना, थाप लगाना, पैर पटकना और थपकी देना शामिल था. १८५३ में एक भूतपूर्व ग़ुलाम ने बताया कि थपकी देना महज़ हथेली को शरीर के किसी हिस्से पर मारना नहीं था, बल्कि इसके भी कई नमूने और ढंग थे. संगीत के साथ गाते हुए एक हाथ से कन्धे पर थपकी दे जाती थी और उसी क्रम में ताली बजाते हुए हथेली को शरीर के दूसरे हिस्सों पर लयकारी के साथ थपका जाता था और इस बीच उसी लय पर पैर भी ज़मीन पर पटके जाते थे. कहने की बात नहीं है कि हरकतों के ख़याल से यह एक काफ़ी जटिल विधान था, जिसमें लय, ताल और हरकत का अपना ही ताल-मेल बनता था. ऐसे कुछ नमूने नीचे दिये जा रहे हैं.

http://youtu.be/FskPKXT_ciE?list=PLSxcGaTlwqVRzWrLHvyGHEqupmVHqoNOT (जूबा)

http://youtu.be/RgBLLcgePNo?list=PLSxcGaTlwqVRzWrLHvyGHEqupmVHqoNOT (जूबा)

http://youtu.be/rqtY7QLbUds?list=PLSxcGaTlwqVRzWrLHvyGHEqupmVHqoNOT (थपकी) 

http://youtu.be/FskPKXT_ciE?list=PLSxcGaTlwqVRzWrLHvyGHEqupmVHqoNOT (हरकत)

(जारी)

Friday, February 6, 2015


चट्टानी जीवन का संगीत 

जैज़ पर एक लम्बे आलेख की तीसरी कड़ी


2

जैज़ में बेक़रारी है, वह बेचैन है, थिर नहीं रहता 
और कभी रहेगा भी नहीं 
-- जे.जे.जौनसन, ट्रौम्बोन वादक


जैज़ के स्रोत भले ही तीन-चार सौ साल पहले अफ़्रीका से ग़ुलाम बना कर लाये गये लोगों के गाने-बजाने में खोये हुए हों, उसे अपना रूप लिये भी सौ साल से ज़्यादा हो चले हैं और किसी विशाल बरगद की तरह उसकी डालें और टहनियां और जड़ें इतनी अलग-अलग सूरतें अख़्तियार कर चुकी हैं कि उसकी परिभाषा देना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है. मज़े की बात तो यह है कि आज अपनी एक ख़ास जगह हासिल करने और कई मानी में लगभग शास्त्र के दर्जे तक पहुंचने के बावजूद इस बात पर भारी-भरकम बहसें चलती रही हैं कि यह शब्द आया कहां से और संगीत की इस शैली पर लागू कैसे हुआ. शुरू-शुरू में इसे जैज़ कहा भी नहीं जाता था. बल्कि अमरीका के पश्चिमी तट के इलाक़ों में इस शब्द का इस्तेमाल बहुत करके खेलों के सिलसिले में होता था और इसके बहुत-से अर्थों में संगीत की तो कोई जगह भी नहीं थी. यह तो १९१५ के आस-पास हुआ कि संगीत समीक्षकों ने इसे "जैज़" कहना शुरू किया. जानकारों ने इसके ढेरों स्रोत खोज निकाले हैं, पर सब इस बात पर सहमत हैं कि जड़ इस शब्द की कहीं उतरी हुई हो, इस संगीत में चुस्ती-फुर्ती और दम-ख़म लामुहाला तौर पर मौजूद रहता है. ऐसी सिफ़त जो सुनने वाले को थिरकने पर मजबूर कर दे और जोश से भर दे.
जैज़ के सिलसिले में बहस सिर्फ़ उसके नाम को ले कर ही नहीं चली, बल्कि इस बात को भी ले कर चली कि इस संगीत की परिभाषा क्या होगी. तमाम तरह की कोशिशें की गयी हैं. कभी उसे पश्चिमी संगीत-परम्परा के सन्दर्भ में परिभाषित करने का प्रयास हुआ है तो कभी अफ़्रीकी परम्परा के सन्दर्भ में. मगर सभी समीक्षकों को ये कोशिशें सन्तोषजनक नहीं लगीं. ऐसी हालत में इस समस्या को एक अलग नज़रिये से सुलझाने की कोशिश की गयी, कहा गया कि यह संगीत का ऐसा कला-रूप है जो अमरीका में अफ़्रीकी मूल के लोगों और यूरोपीय संगीत के सम्पर्क और टकराव से पैदा हुआ. इस टकराव के नतीजे के तौर पर संगीत के सारे तत्वों में तब्दीली आयी और इन दोनों समृद्ध परम्पराओं के मेल से तीसरी और उतनी ही समृद्ध परम्परा पैदा हुई और परवान चढ़ी. महज़ लय, ताल और सुरों की अदायगी ही नहीं बदली, बल्कि संगीत की इस नयी शैली में स्वत:स्फूर्त प्रयास, आशु रचना, तात्कालिक प्रेरणा, जोश और गायक-वादक की व्यक्तिगत प्रकृति का योगदान महत्वपूर्ण हो उठा; साथ ही महत्वपूर्ण हो उठी हर संगीतकार-विशेष की अपनी ख़ास अदा और उस अदा के चलते धुन या राग में प्रयोगशीलता.
पश्चिमी शास्त्रीय संगीत "लिखा जाता" है. संगीत की रचना के बाद उसकी स्वर-लिपि तैयार की जाती है और रचनाकार के अलावा आगे आने आने वाले गायक और वादक उसे उसकी तैयार-शुदा स्वर-लिपि के अनुसार ही गाते-बजाते हैं. जैसा कि ड्यूक एलिंग्टन के मित्र पियानोवादक अर्ल हाइन्स ने एक बार बताया था -- "...जब मैं शास्त्रीय संगीत बजा रहा था, मैं जो पढ़ रहा था, उस से अलग हटने की हिम्मत नहीं कर सकता था. अगर आपने ध्यान दिया हो सिम्फ़नी बजाने वाले वे सारे संगीतकार उन शास्त्रीय धुनों को बरसों से बजाते आ रहे हैं, लेकिन वे एक सुर की भी तब्दीली नहीं करेंगे, हर बार उन्हें लिखा हुआ संगीत, यानी उसकी स्वर-लिपि दरकार होती है. यही वजह है कि कुछ शास्त्रीय संगीतकारों के लिए जैज़ की अदायगी इतनी मुश्किल होती है." 
अर्ल हाइन्स जिस बात की तरफ़ इशारा कर रहे थे, उसका ताल्लुक़ किसी समूची रचना की अदायगी से था. जैज़ का दक्ष कलाकार किसी धुन या राग को बिलकुल अपने निजी तरीक़े से अदा करेगा, ज़्यादा सम्भावना इसी बात की है कि वह उसी रचना को दूसरी या तीसरी बार बजाते हुए हू-ब-हू पहली बार की तरह न बजाये. सब कुछ कलाकार की अपनी क्षमता, मूड, व्यक्तिगत अनुभव, साथी संगीतकारों की यहां तक कि श्रोताओं की संगत पर निर्भर करता है. और इसका ताल्लुक सिर्फ़ कौशल से नहीं है -- कि उस रोज़ कलाकार अपने "फ़ार्म" पर था या नहीं. कलाकार धुनों, स्वरों के क्रम या लय-ताल को मनमर्ज़ी से बदल सकता है. यूरोपीय शास्त्रीय संगीत बहुत हद तक रचनाकार का माध्यम कहा जाता है, जबकि दूसरी तरफ़ जैज़ की विशेषता ही यह है कि वह सहयोगी सामूहिक प्रयास है -- संगीतकारों की सामूहिक रचनात्मकता, आपसी क्रिया-प्रतिक्रिया और सहयोग पर टिका रहता है. यह प्रयास रचनाकार -- यानी धुन या राग का रचयिता (अगर कोई है ) -- और गायक-वादक के योगदान को बराबर से महत्व देता है. मिसाल के लिए यूरोपीय शास्त्रीय संगीत की कोई रचना, बीठोफ़न की नवीं सिम्फ़नी ही लीजिए, जब किसी वादक द्वारा पेश की जायेगी तो वह उसे ठीक-ठीक वैसे ही पेश करेगा, जैसे बीठोफ़न ने उसे "लिखा है" यानी रचा है; वह उसके एक भी सुर को इधर-उधर नहीं कर सकता. मगर जैज़ में ऐसी बन्दिश नहीं है. वही धुन अलग-अलग गायकों और वादकों की अदायगी में एक नया ही रूप ले सकती है. अब तो रिकौर्डिंग की सुविधा के चलते दो अलग-अलग अदायगियों के अन्तर को लक्षित करना सम्भव हो गया है भले ही वे एक ही कलाकार ने पेश की हों या भिन्न कलाकारों ने; मगर जब यह सुविधा नहीं थी तो अभिनय की तरह जैज़ भी कलात्मक अभिव्यक्ति का बेहद लचीला माध्यम था. अब यही देखिये कि ड्यूक एलिंग्टन की एक रचना "इन अ सेण्टिमेण्ट्ल मूड" को अलग-अलग गायकों और वादकों ने अपने-अपने ख़ास तरीक़े से पेश किया है, जो सिर्फ़ सुन कर ही जाना जा सकता है. 
http://youtu.be/sCQfTNOC5aE (ड्यूक एलिंग्टन और जौन कोल्ट्रेन)

http://youtu.be/1gOij0El_IY(एला फ़िट्ज़जेरल्ड)

http://youtu.be/E_sshOaBqnM (जैंगो राइनहार्ट)

http://youtu.be/qtfLmj-fgsA (सारा वौहन)

http://youtu.be/i2qJuQuDMf8 (जेसिका विलियम्स)

"इन अ सेण्टिमेण्ट्ल मूड" को ड्यूक एलिंग्टन ने १९३५ में डरहम (उत्तरी कैरोलाइना) में रचा था और इसके बोल जैसा कि उन दिनों का रिवाज था, मैनी कुर्ट्ज़ ने तैयार किये थे. जैज़ की कोई रचना कितनी आशु-रचित हो सकती है, "इन अ सेण्टिमेण्ट्ल मूड" इसका बहुत ही मुनासिब उदाहरण है और ख़ुद ड्यूक एलिंग्टन ने इसकी रचना का दिलचस्प क़िस्सा बयान किया है -- "हम ने तम्बाकू के एक बड़े-से गोदाम में आयोजित नृत्य कार्यक्रम में अपने बैण्ड के साथ संगत की थी और कार्यक्रम के बाद उत्तरी कैरोलाइना म्युचुअल इन्श्योरेन्स कम्पनी के एक बड़े अधिकारी ने जो मेरे मित्र भी थे, एक जलसे का बन्दोबस्त किया. मैं वहां पियानो बजा रहा था जब पार्टी में मौजूद दो लड़कियों के साथ हमारे एक और दोस्त का कुछ झगड़ा-सा हो गया. उन्हें शान्त करने के लिए मैंने दोनों लड़कियों को पियानो के दो सिरों पर खड़े रहने के लिए कह कर यह धुन उसी वक़्त वहीं-के-वहीं तैयार की."
"इन अ सेण्टिमेण्ट्ल मूड" को न सिर्फ़ ढेरों जैज़ वादकों ने अपनी-अपनी निजी शैली में पेश किया है, बल्कि कई फ़िल्मों में इस्तेमाल भी किया गया है.
ज़ाहिर है, जो कला-रूप, या हालिया शब्दावली में कहा जाये तो जो रूपंकर-कला, इतनी लचीली हो, उसे ले कर विवाद तो उठेंगे ही और जैज़ शुरू ही से विवादों का अखाड़ा बना रहा है. क्या जैज़ है, क्या नहीं -- इसके बारे में संगीतकारों से ले कर समीक्षकों के बीच गरमा-गरम बहसें चलती रही हैं और अब भी जारी हैं. अब यही देखिये कि कुछ समीक्षक ड्यूक एलिंग्टन की रचनाओं को ही ख़ारिज करते रहे हैं कि ये कुछ भी हों, जैज़ नहीं हैं, और इसके पीछे वे अपने-अपने कारण और तर्क देते रहे हैं; जबकि ड्यूक के साथी अर्ल हाइन्स ने ड्यूक की संगीत रचनाओं की जो बीस एकल प्रस्तुतियां पियानो पर पेश कीं उन्हें कई समीक्षकों ने जैज़ की बेहतरीन मिसालें क़रार दिया. मसला दर असल यह है कि बहुत-से लोग यह नज़रन्दाज़ कर देते हैं कि जैज़ में दूसरे संगीत रूपों और शैलियों से प्रभाव लेने और उन प्रभावों को अपनी प्रकृति में ढाल लेने की अद्भुत क्षमता है और यही जैज़ की ख़ूबी है, यानी जिसका लुब्बे-लुआब ड्यूक एलिंग्टन यह कह कर पेश करते हैं कि "वह सारा संगीतही तो है." 
इसीलिए जैज़ के सिलसिले में एक बात पर शायद सभी विशेषज्ञ सहमत हैं कि वह आज भी ‘शास्त्र’ की बजाय ‘करत विद्या’ है। इसी वजह से उसका रूप गायकों और वादकों के बीच विचारों के रचनात्मक लेन-देन से निर्मित हुआ है। किसी धुन को बजाते समय जैज़ मण्डली के किसी सदस्य के मन में कोई ख़याल आयेगा -- हो सकता है कि यह ख़याल पूरा ख़याल भी न हो, बल्कि वह एक ख़ाका  भर हो सकता है और दूसरा सदस्य उसे उठा कर विस्तार देते हुए अगले वादक के हवाले कर देगा और यूँ मूल धुन की बुनियाद पर पच्चीकारी होती चली जायेगी। इसी तरह किसी मण्डली या रिकॉर्ड को सुनते समय, हो सकता है, किसी संगीतकार को कोई विचार सूझे और वह अपने दल के साथ मिल कर उस विचार को विस्तार देने की कोशिश करे। जैज़ के विचार इसी तरह अक्सर संगीतकारों और मण्डलियों के बीच फैलते चले जाते हैं और जैज़ को एक निरन्तर बहती नदी का रूप दे देते हैं। इस सदी के शुरू से ले कर अब तक के अर्से में जैज़ का विकास इतनी तेज़ी से हुआ है कि जो लोग उसके बहुत नज़दीक हैं, उन्हें भी वह एक रहस्य-भरा संगीत जान पड़ता है। ऐसा संगीत, जिसे बजाना शुरू करते समय कोई नहीं कह सकता -- उसके वादक भी नहीं -- कि उसका तैयार रूप, उसकी अन्तिम अदायगी, क्या होगी। इस लिहाज़ से जैज़ बहुत हद तक शुरू से आख़िर तक ’इम्प्रोवाइज़ेशन’ की, ’आशु रचना’ की कला है।

(जारी)

Thursday, February 5, 2015

चट्टानी जीवन का संगीत 


जैज़ पर एक लम्बे आलेख की दूसरी कड़ी


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जैज़ संगीत अनुद्विग्नता की तीव्र अनुभूति है 
- फ़्रान्स्वा सागां, लेखिका


अर्सा पहले कुमार गन्धर्व की विशेषताओं के सन्दर्भ में रघुवीर सहाय ने दो तत्वों की चर्चा ख़ास तौर पर की थी -- तल्लीनता और द्वन्द्व। जैज़ संगीत को सुनते हुए, बड़ी शिद्दत के साथ इन दोनों ही तत्वों की अनुभूति होती है। जैज़ संगीत की सफल संरचना में तो ये विद्यमान हैं ही, उसकी मूल प्रकृति भी ऐसी है, जिसमें लौकिकता के साथ उदात्तता का अपूर्व मेल है। ऐसी लौकिकता, जो धरती के सुखों की भरपूर अनुभूति से उपजती है और ऐसी उदात्तता, जो दुख और उत्पीड़न के बावजूद ज़िन्दगी को "जानने" के बाद आती है। ये दोनों विशेषताएँ अमरीकी नीग्रो समाज में मौजूद हैं और उसके जैज़ संगीत में भी। कई बार ये दोनों तत्व -- तल्लीनता और द्वन्द्व, लौकिकता और उदात्तता -- किसी एक ही कलाकार में बराबर की मिकदार में मौजूद रहे हैं, जैसा कि लूई आर्मस्ट्रौंग, बेसी स्मिथ, ड्यूक एलिंग्टन, बिली हौलिडे, चार्ली पार्कर, माइल्स डेविस, थेलोनिअस मंक, चार्ल्स मिंगस और और्नेट कोलमैन के सिलसिले में देखा गया है। तब निश्चय ही जैज़ संगीत एक "अनुभव" बन गया है। लेकिन मौजूद ये तत्व कम-ओ-बेश सारे-के-सारे जैज़ संगीत में रहते हैं, भले ही कलाकार नीग्रो न हो कर, गोरा या एशियाई हो, जैसा कि अमरीकी क्लैरिनेट वादक बेनी गुडमैन या जिप्सी मूल के गिटार वादक जैंगो राइनहार्ट या निस्बतन हाल के अर्से में जापानी-अमरीकी पियानो वादक तोशियो आकियोशी के सिलसिले में देखने को मिलता है.  
इसमें कोई शक नहीं कि जैज़ अमरीकी संगीत है, मगर उसकी बुनियादी लय-ताल यूरोपीय नहीं, अफ्रीकी है। तो भी अपने मौजूदा रूप में जैज़ की लयात्मक प्रकृति, उसकी ख़ास किस्म की गति, उसका "स्विंग" या उसकी "पल्स" (जैसा कि किसी बेहतर शब्द के अभाव में उसे कहा जाता है) अपनी अफ्रीकी जड़ों से दूर चला आया है। अब वह जैज़ संगीत की अपनी विशेषता है। इस लिहाज़ से जैज़ संगीत का इतिहास उसकी लय और ताल के उद्भव और विकास के सन्दर्भ में ज़्यादा सच्चाई के साथ बयान किया जा सकता है। पहले महायुद्ध के बाद जेली रोल मॉर्टन ने और उसके बाद लूई आर्मस्ट्रौंग, ड्यूक एलिंग्टन, चार्ली पार्कर और थिलोनियस मंक जैसे संगीतकारों ने बीस, तीस, चालीस और पचास के दशकों में जैज़ संगीत के क्षेत्र में जो भी योगदान किया, वह बुनियादी तौर पर लय और ताल से ही सम्बन्धित है -- यानी संगीत को नये ढंग से अदा करना या फिर नये ढंग से सुरों का क्रम तय करना -- वह, जिसे संगीत-विशेषज्ञ ‘लयात्मक ताल’ या ‘राग’ निर्मित करना कहते हैं।
मगर यह सब तो बहुत बाद की बात है।
उन्नीसवी सदी के अन्तिम चरण और बीसवीं सदी के आरम्भ में जैज़ अमरीका के दक्षिणी हिस्से में नदी के किनारे बसे बड़े-बड़े शहरों की गलियों में या फिर रेल की पटरियाँ बिछाने वाले मज़दूरों की बस्तियों में या फिर अमरीका के दक्षिणी राज्यों के हरे-भरे देहातों से गुज़रती कच्ची सड़कों पर या कारागारों में सज़ा काट रहे ज़ंजीरों से बंधे क़तारबन्द नीग्रो मज़दूरों -- चेन गैंग -- में अक्सर सुनाई देता था। यही उसका इलाका था और यही उसका मंच और उसके शुरू के कलाकार थे गिटार या माउथ ऑर्गन बजाने वाले मामूली मज़दूर या छन्दोबद्ध किस्से-कहानियाँ सुनाने वाले गायक या अपने दुख और उदासी को लय-ताल-शब्दों में व्यक्त करने वाले वे सारे-के-सारे अनाम नीग्रो संगीतकार, जिन्होंने अपनी उस कठिन चट्टानी ज़िन्दगी का सामना करते हुए, उस कठिन, चट्टानी ज़िन्दगी के अन्दर से इस संगीत को बाहर निकाला था जैसे किसी खान से कोई धातु या खनिज निकाला जाता है, जैसे किसी गहरे कुएं से पानी निकाला जाता है और फिर उसे गढ़ कर, मुनासिब पात्र में रख कर उन तमाम लोगों के बीच बाँटा-बिखेरा था, जो उसके लयात्मक कड़वे-मीठे स्वाद में अपनी ख़ुद की रची सुन्दरता की आन्तरिक दबी हुई ज़रूरत पूरी होती महसूस करते। यही लोग थे, जिन्होंने उसे जन्म दिया, पाला-पोसा और एक रूप प्रदान किया।

सन् 1914 में, जब पहला विश्वयुद्ध शुरू हुआ, जैज़ संगीत अपने प्रारम्भिक रूप में कमोबेश लोक-संगीत की तरह था। अमरीका के एक छोटे-से हिस्से में सीमित। अनुमान है कि उस समय जैज़ संगीतकारों की संख्या सौ-सवा सौ के आस-पास रही होगी और सुनने वालों की तादाद लगभग पचास हज़ार। लेकिन आज जैज़ संगीत दुनिया के कोने-कोने में फैल चुका है उसका एक ‘कायदा,’ कहा जाय कि एक ‘पद्धति,’ बन चुकी है; और हालांकि यह बात हमेशा याद रखने की है कि जैज़ अन्य शास्त्रीय संगीत और कला-रूपों से बिलकुल अलग है, उसका एक ‘शास्त्र’ विकसित हो चुका है और अमरीका के एक छोटे-से हिस्से के सीमित दायरे से बाहर आ कर वह दुनिया के अन्य संगीत-रूपों की पाँत में शामिल हो गया है।
लोक जीवन से शुरू हो कर शास्त्र या लगभग शास्त्र बनने तक की यह यात्रा लगभग ढाई सौ वर्षों के अर्से में फैली हुई है और इसे ले कर अनेक मत-मतान्तर हैं, अनेक विवाद हैं। मगर इतना सभी मानते हैं कि जैज़-संगीत की जड़ें एक ओर तो उस अफ्रीकी संगीत में खोजी जा सकती हैं, जो नीग्रो ग़ुलामों के साथ अमरीका आया था और दूसरी ओर विभिन्न प्रकार के उस यूरोपीय संगीत में, जो अमरीका के दक्षिणी राज्यों में गाया-बजाया जाता था। 
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आज का जैज़ संगीत बहुत जटिल हो गया है। ग़ुलामी और उसके दौर के ज़ख़्म हालांकि बीती हुई बात बन चुके हैं, पर वे पूरी तरह मिटे नहीं और अफ़्रीकी मूल के अमरीकी संगीतकारों की जातीय स्मृति की गहराइयों में मौजूद हैं और जैसा कि लुई आर्मस्ट्रौंग ने कहा है "जैज़ संगीतकार के लिए बीते समय की स्मृतियां बहुत महत्वपूर्ण होती हैं।" तो भी आज जैज़ के साज़ कहीं अधिक संश्लिष्ट हैं और बड़ी ख़ूबी से परम्परा से चली आ रही नियमबद्धता और शुद्धता को उन्मुक्त प्रयोगशीलता के साथ पेश करते हैं। शायद यही वजह है कि जैज़ किसी संगीत सम्मेलन के मंच पर भी उतने ही सहज भाव से पेश किया जा सकता है, जितना गली-कूचे के चायख़ानों या होटलों या शराबख़ानों में। 
ज़ाहिर है कि इस संगीत के साथ वही हुआ है, जो काफ़ी हद तक पश्चिमी या भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ -- यानी विकास, मगर फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इन दोनों शास्त्रीय संगीत परम्पराओं ने जो फ़ासला सैकड़ों वर्षों में तय किया, उसे जैज़ संगीत ने कुछ दशकों में तय कर लिया है और इस लिहाज़ से जैज़ संगीत विकास नहीं, बल्कि विस्फोट जैसा जान पड़ता है। दूसरा महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि जैज़ संगीत ने ‘शास्त्रीयता’ के स्तर तक पहुँचने के बाद भी लोक-परम्परा में डूबी अपनी जड़ों से कभी नाता नहीं तोड़ा। यही कारण है कि वह एक साथ मंच और मैदान, बड़े आयोजन या छोटे चायघर -- सभी जगह समान रूप से लोकप्रिय रह सका है जो बात कि पश्चिमी या भारतीय शास्त्रीय संगीत में नहीं देखी जाती। रविशंकर और विलायत ख़ां, किशोरी अमोनकर और भीमसेन जोशी या ज़ुबिन मेहता और आन्द्रे प्रेविन को किसी छोटे चायघर में गाते-बजाते देखने की बात तो दूर, उन्हें वहाँ सुनने की भी कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन जैज़ संगीत अकसर ऐसी छोटी-छोटी जगहों में भी सुना जाता रहा है और अब भी सुना जा सकता है।

Wednesday, February 4, 2015

चट्टानी जीवन का संगीत

चट्टानी जीवन का संगीत

जैज़ के बारे में बातें करने में हमेशा बहुत मज़ा आता है 
- क्लिण्ट ईस्टवुड, प्रसिद्ध अभिनेता 


(मैं जैज़ संगीत का जानकार नहीं, प्रशंसक हूँ और इस नाते जब-जब मौका मिला है, मैंने इस अनोखे संगीत का आनन्द लिया है। मगर उसके आँकड़े नहीं इकट्ठा किये, उसकी चीर-फाड़ नहीं की। बचपन में स्कूल के ज़माने में ही जैज़ से परिचय हुआ था। बड़े सरसरी ढंग से। तो भी लुई आर्मस्ट्रौंग और ड्यूक एलिंग्टन जैसे संगीतकारों के नाम याददाश्त में टँके रह गये। फिर और बड़े होने पर कुछ और नाम इस सूची में जुड़ते चले गये। लेकिन जैज़ से अपेक्षाकृत गहरा परिचय हुआ सन 1980-84 के दौरान, जब बी.बी.सी. में नौकरी का सिलसिला मुझे लन्दन ले गया।
बी.बी.सी. में सबसे ज़्यादा ज़ोर तो ख़बरों और ताज़ातरीन घटनाओं के विश्लेषण पर था, लेकिन इसे श्रोताओं के लिए कई तरह के कार्यक्रमों की सजावट के साथ पेश किया जाता था। सभी जानते थे -- बी.बी.सी. के आक़ा भी और हम पत्रकार-प्रसारक भी -- कि मुहावरे की ज़बान में कहें तो असली मुआमला ख़बरों और समाचार-विश्लेषणों के ज़रिये ब्रितानी नज़रिये का प्रचार-प्रसार था और इसीलिए तटस्थता और निष्पक्षता की ख़ूब डौंडी भी पीटी जाती थी जबकि "निष्पक्षता" जैसी चीज़ तो कहीं होती नहीं, न कला के संसार में, न ख़बरों की दुनिया में; चुनांचे, समाचारों और समाचार-विश्लेषण के दो कार्यक्रमों -- "आजकल" और "विश्व भारती" -- को छोड़ कर (जो रोज़ाना प्रसारित होते, बाक़ी कार्यक्रम हफ़्ते में एक बार प्रस्तुत होते और उनकी हैसियत खाने की थाली में अचार-चटनी-सलाद की-सी थी। चूंकि खबरें और तबसिरे रोज़ाना प्रसारित होते, इसलिए उन्हें प्रस्तुत करने वालों की पारी रोज़ाना बदलती रहती; बाक़ी कार्यक्रम, जैसे "इन्द्रधनुष," "झंकार," "आपका पत्र मिला," "सांस्कृतिक चर्चा," "खेल और खिलाड़ी," "बाल जगत," "हमसे पूछिए," वग़ैरा जो साप्ताहिक कार्यक्रम थे, अलग-अलग लोगों को अलग-अलग अवधियों के लिए सौंपे जाते। और जब ये लोग अपने कार्यक्रम या खबरें या समाचार विश्लेषण के कार्यक्रम -- "आजकल" और "विश्व भारती" -- प्रस्तुत न कर रहे होते तो "आजकल" और "विश्व भारती" में बतौर "मुण्डू" तैनात रहते।  
ज़ाहिर है, ऐसे में एक अजीब क़िस्म का भेद-भाव भी पैदा हो गया था। पुराने लोगों को "आजकल" और "विश्व भारती" ही सौंपे जाते, जबकि नये लोगों को ख़ास तौर पर ये अचार-चटनी वाले कार्यक्रमों की क़वायद करायी जाती। इनमें भी "झंकार" और "बाल जगत" जैसे कार्यक्रमों को "फटीक" का दर्जा मिला हुआ था। कारण यह कि कौन श्रोता विदेश से हिन्दी फ़िल्म संगीत सुनने का इच्छुक होता; और "बाल जगत" बिना बच्चों की शिरकत के, ख़ासा सिरदर्द साबित हो सकता था। ये दोनों कार्यक्रम इस बात के भी सूचक थे कि कौन उस समय हिन्दी सेवा के प्रमुख की बेरुख़ी और नाराज़गी का शिकार था। जिन दिनों मैं वहां था, बी.बी,सी. हिन्दी सेवा और उसके प्रमुख की यह अदा थी कि सीधे-सीधे नाख़ुशी नहीं ज़ाहिर की जाती थी। यही नहीं, ऐसे काम को भी, जिसमें ख़ासी ज़हमत का सामना होता, आपको यों सौंपा जाता मानो आपको फटीक की बजाय सम्मान दिया जा रहा है। एक आम तकिया-कलाम था "रस लो," अब यह आप पर था कि उस काम को करते हुए आप नौ रसों में से किस "रस" का स्वाद चख रहे होते। 
बहरहाल, मेरी मुंहफट फ़ितरत के चलते चार वर्षों के दौरान मुझे ये दोनों कार्यक्रम -- "झंकार" और "बाल जगत" -- मुसलसल छै-छै महीने तक करने पड़े थे। ख़ैर, इस सब की तो एक अलग ही कहानी है. जो किसी और समय बयान की जायेगी। यहां इतना ही कहना है कि जब मुझे "झंकार" सौंपा गया तो मुझे इस कार्यक्रम का नाक-नक़्शा और ख़ाका बनाने में कुछ वक़्त लगा। लेकिन मैंने सोचा कि भई, फ़िल्मी गाने तो हिन्दुस्तान में हर जगह सुने जा सकते हैं, लिहाज़ा एक और भोंपू लगा कर शोर में इज़ाफ़ा करने की क्या ज़रूरत है; और शास्त्रीय संगीत की भी लम्बी बन्दिशें इस बीस मिनट के कार्यक्रम में कामयाब न होंगी; न हर ख़ासो-आम को पश्चिमी शास्त्रीय संगीत पसन्द आयेगा। सो, कुछ अलग क़िस्म से कार्यक्रम पेश करना चाहिए। इसी क्रम में मैंने पहले तो अमीर ख़ुसरो के कलाम और लोकप्रिय, लेकिन स्तरीय, ग़ज़लों के कार्यक्रम पेश किये। फिर जब मुहावरे के मुताबिक़ हाथ "जम गया" तो मैंने वहां के लोकप्रिय संगीत के साथ-साथ अफ़्रीकी-अमरीकी और वेस्ट इण्डियन संगीतकारों और गायकों से अपने श्रोताओं को रूशनास कराना शुरू किया और रेग्गे और दूसरे अफ़्रीकी मूल के पश्चिमी गायकों-वादकों का परिचय अपने श्रोताओं को दिया। ध्यान रखा कि इस सब को, जहां तक मुमकिन हो और गुंजाइश नज़र आये, अपने यहां के संगीत से जोड़ कर पेश करूं। प्रतिक्रिया हौसला बढ़ाने वाली साबित हुई। तब अपने हिन्दुस्तानी श्रोताओं के लिए मैंने एक लम्बी श्रृंखला जैज़ संगीत पर तैयार की। यह श्रृंखला कुल मिला कर परिचयात्मक थी। एक बिलकुल ही अलग किस्म की परिस्थितियों में पैदा हुए निराले संगीत से अपने श्रोताओं को परिचित कराने के लिए तैयार की गयी थी। उसी श्रृंखला के नोट्स बुनियादी तौर पर इस आलेख का आधार हैं, हालाँकि कुछ आवश्यक ब्योरे और सूचनाएँ मैंने ‘एवरग्रीन रिव्यू’ (न्यूयॉर्क) के जैज़ समीक्षक मार्टिन विलियम्स की टिप्पणियों से प्राप्त की है और पहले विश्व युद्ध से पहले के परिदृश्य का जायज़ा देने के लिए ड्यूक बॉटली और जॉन रशिंग के संस्मरणों का भी सहारा लिया है। इन सब का आभार मैं व्यक्त करता हूँ।
जैज़ अफ़्रीका से ग़ुलाम बना कर अमरीका लाये गये लोगों का संगीत है, श्रम और उदासी और पीड़ा से उपजा। मेरी श्रृंखला भी "फटीक" से उपजी थी। इस नाते इस आलेख से मेरा एक अलग ही क़िस्म का लगाव है।
इसके अलावा, रेडियो पर तो संगीत के नमूने पेश करना सम्भव था और मैंने किये भी थे, लेकिन सिर्फ़ छपे शब्दों तक ख़ुद को सीमित रख कर वह बात पैदा नहीं हो सकती थी । सो, हालांकि मित्र-कवि मंगलेश डबराल ने "जनसत्ता" में इसे दो हिस्सों में प्रकाशित किया था, मैं बहुत सन्तुष्ट नहीं हुआ। उस ज़माने में न तो इण्टरनेट था, न यूट्यूब। अब जब यह सुविधा उपलब्ध है तो इसे मैं आप के लिए पेश कर रहा हूं।
यों, जैज़ हो या भारतीय शास्त्रीय संगीत -- उस पर ‘बात करना’ सम्भव नहीं। जैसा कि सुप्रसिद्ध जैज़ संगीतकार थिलोनिअस मंक ने कहा है "संगीत के बारे में लिखना वास्तुकला के बारे में नाचने की तरह है।" चित्रकला जिस तरह " देखने" से ताल्लुक रखती है, उसी तरह संगीत "सुनने" की चीज़ है, "बताने" की नहीं। तिस पर एक नितान्त विदेशी संगीत की चर्चा! वह तो और भी कठिन है। विशेष रूप से मेरी अपनी कमज़ोरियों को मद्दे-नज़र रखते हुए। लिहाज़ा इस टिप्पणी में मैंने प्रमुख रूप से जैज़ के सामाजिक और ऐतिहासिक स्रोतों की चर्चा की है और प्रमुख संगीतकारों का और समय-समय पर जैज़ संगीत में आये परिवर्तनों का परिचय भर दिया है। जैज़ के बारीक समीक्षापरक विश्लेषण की यहाँ गुंजाइश नहीं, न ही मेरे भीतर उस तरह की क़ाबिलियत या सलाहियत ही है। लेकिन अगर इस टिप्पणी के बाद पाठकों में इस विलक्षण संगीत के प्रति रुचि उपजे, वे ख़ुद इस संगीत के करीब जायें, उसे सुनें और परखें तो मैं समझूँगा मेरी मेहनत बेकार नहीं गयी।
एक बात और। ऐन सम्भव है कि इस चर्चा में कई नाम छूट गये हों। जिस संगीत को रूप ग्रहण करने की प्रक्रिया में तीन सौ वर्ष लगे हों, उसकी परिचयात्मक टिप्पणी में नामों का छूट जाना स्वाभाविक है। इसलिए भी कि ऐसी टिप्पणी में महत्व नाम गिनाने का नहीं, बल्कि जैज़ की शुरूआत और उसके विकास को और उसके साथ-साथ उसकी प्रमुख धाराओं को पाठकों के सामने किसी हद तक बोधगम्य बनाने का है।)

(जारी)