Tuesday, January 18, 2011

देशान्तर



नीलाभ के लम्बे संस्मरण की पहली किस्त
पिछले 50 बरसों की साहित्यिक हलचलों का एक जायज़ा
और एक लम्बी मैत्री की दास्तान


ज्ञानरंजन के बहाने - 1





”लेट अस - सिन्स ऑल पासेस - पास
आई शैल लुक बैक ओनली टू ऑफ़्टेन
मेमोरीज़ आर हण्टिंग हॉर्न्स
हूज़ साउण्ड डाइज़ अमंग द विण्ड"
--अपॉलिनेयर

ज्ञानरंजन की याद मेरे मन में जीवन में उस पहले प्यार-सरीखी बसी हुई है, जो विफल हो गया हो। अनेक लोगों के जीवन में प्रेम वसन्त के ऊष्ण, मादक, और आम्र-मंजरियों की मस्त कर देने वाली महक से भरे झँकोरे की तरह आता है, और विफल हो जाने के बाद, वर्षा अथवा शरद में पुरवाई के बहने पर टीसती चोट की तरह टीसता रहता है। ज्ञानरंजन की स्मृति इसी प्रेम की तरह मेरे हृदय में बसी हुई है। (हालाँकि मैं जानता हूँ, ज्ञान के मन में स्मृतियों को ले कर एक सन्देह जैसा भाव है। वह भरसक उनसे अलग-थलग रहने की कोशिश करता है। मुमकिन है, उसके मन में एक डर सरीखा कुछ हो कि स्मृतियों को छूट दी नहीं कि वे अपना जाल-बट्टा, अपना प्रपंच रचना शुरू कर देंगी, आपको अपनी गिरफ़्त में ले लेंगी, शिकंजे में जकड़ लेंगी, यूलिसीज़ की यूनानी पुरा-कथा की उन मायाविनी सुन्दरियों की तरह जो एक टापू पर बैठीं, अपने मधुर गीतों से नाविकों को लुभा कर बुलाती थीं और उनके जहाज़ तट की चट्टानों से टकरा कर चूर-चूर हो जाते थे। या फिर, सम्भव है, ज्ञान इसलिए स्मृतियों से घबराता हो क्योंकि उनसे कई बार अनावश्यक रूप से भावुक करने का काम लिया जाता है जो उचित ही ऊब और खीझ पैदा करता है। ज्ञान के अपने दो समकालीन-मित्रों ने कुछ वर्ष पहले अच्छा-ख़ासा स्मृति-प्रपंच रचा था, जिसमें उनके अपने-अपने स्वभावों के अनुरूप काफ़ी कुछ ट्रैजी-कॉमिक, स्वाँग-विद्रूप का लुत्फ़ था, अगर उससे आप लुत्फ़ ले सकते तो, हद तक कि ज्ञान को गज-ग्राह की इस खींचा-तानी में हस्तक्षेप करना पड़ा था, जैसा कि इनमें से एक को लिखे गये पत्र से प्रकट होता है। यह भी स्मृतियों के प्रति उसकी शंका का कारण हो सकता है।)
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वैसे, स्मृतियों का संसार बड़ा विचित्र और रहस्यमय है। उनसे बड़ा बहुरूपिया और कोई नहीं होता। स्मृतियों का लोक एक हलचल-भरा, उद्विग्न, व्याकुल, अस्थिर, एकाकी लोक होता है। स्वप्नों ही की तरह मन के जाने किन कोटरों में अपना साम्राज्य फैलाये, किसी विशाल वृक्ष की तरह शाखाएँ-प्रशाखाएँ पसारे। घटनाएँ निरन्तर वहाँ अपना बसेरा ढूँढती रहती हैं और ज़रा-सी ठौर मिल जाने पर अपना एक अलग कुनबा, एक अलग संसार रचने लगती हैं। एक अपना ही जीवन जीने लगती हैं। (स्मृतियों के संसार का यह विलक्षण पहलू है कि साथ बिताये गये समय की स्मृति भी दो लोगों में एक-सी नहीं होती। स्मृतियाँ फ़ोटो ऐल्बम नहीं होतीं, स्थिर, निर्जीव, ठहरी हुईं। वे नदी के प्रवाह की तरह गतिशील और चंचल होती हैं, नदी के प्रवाह की तरह जीवन को शस्य-श्यामल बनाती हुईं - और कई बार काफ़ी उजाड़ और तबाही भी पैदा करती हुईं। और, एक दार्शनिक प्रपत्ति के अनुसार उसी नदी में स्नान करना असम्भव है। इसीलिए शायद सारे संस्मरण अन्ततः अपने बारे में होते हैं। और, चाहे सब कुछ वैसे-का-वैसा बयान करने की कितनी ही कोशिश की जाय, या इसका कितना ही दम भरा जाय, अन्ततः स्मृतियों पर बहुत निर्भर नहीं किया जा सकता, उनका बहुत भरोसा नहीं किया जा सकता।) एक बार अस्तित्व में आते ही वे आपकी पकड़ से बाहर हो जाती हैं। कम्प्यूटर की स्मृति की तरह उन्हें ‘ईरेज़’ करना, मिटा देना, साफ़ कर देना सम्भव नहीं। मन-मस्तिष्क पर उनका साम्राज्य सतत, अविचल और निरंकुश है। कौन-सी घटना, कौन-सा व्यक्ति, कौन-सा प्रसंग कहाँ टँका हुआ है, कोई नहीं जानता। कोई नहीं जानता कि क्या वक्त के साथ धुँधला होता चला गया है, दीवार पर लगी पुरखों की तस्वीर की तरह, और क्या दिनों-दिन चमकीला, पहँटे हुए चाकू की तरह। क्या कब उभर आयेगा, इसे भी बताना बहुत मुश्किल है।
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ज्ञान से पहली-पहली मुलाकात कब हुई, यह कहना कठिन है। एक क्षीण-सी स्मृति वक्त के धुँधलके को चीर कर उतराती है। शायद 1963-64 की बात है, या उससे भी एकाध वर्ष पहले की, हमारे घर से चार मकान आगे लीडर प्रेस के बड़े-से मैदान में बनी छोटी-सी बँगलिया को एक दफ़्तर में तब्दील कर दिया गया था। ‘कादम्बिनी’ वहाँ से नयी-नयी निकलने लगी थी, बालकृष्ण राव उसके सम्पादक थे और बहुत ही सुरुचिपूर्ण ढंग से पत्रिका का सम्पादन करते थे। बाद में, जब राव साहब हिन्दी साहित्य सम्मेलन से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘माध्यम’ के सम्पादक हो कर चले गये तो उसी बँगलिया में राव साहब की जगह कार्यकारी, फिर पूरी तरह, सम्पादक बन कर रामानन्द दोषी आये।

साठ के दशक के इलाहाबाद को याद करें तो लगता है कि उस समय यहाँ वसन्त का स्थायी डेरा था। शहर तो उन दिनों वैसे भी बेहद ख़ूबसूरत था, लेकिन इसकी इमारतों, सड़कों से भी बढ़ कर इसका आकर्षण यहाँ के सांस्कृतिक-राजनैतिक माहौल का था। शहर एक ज़िन्दा धड़कती हुई उपस्थिति थी और एक अर्से तक बनी रही। तेवर चूँकि यहाँ का न तो बनारस जैसा था - अपनी फक्कड़ई और पिछड़ेपन में मगन - और न लखनऊ जैसा - पुराने ठाठ और जी-हुज़ूरी में खोया हुआ - बल्कि सचेत बौद्धिक विरोध का, इसलिए गहमा-गहमी भी इलाहाबाद में ज़्यादा थी। आज के बड़े-बड़े अखाड़िये और नामवर पहलवान इलाहाबाद के अखाड़ों की मिट्टी ही देह में लगवा कर लड़ैया बने। इलाहाबाद की इन्हीं सिफ़तों की वजह से स्थायी-अस्थायी रूप से लोगों का खिंच कर इलाहाबाद आना बना हुआ था। ख़ूब गोष्ठियाँ होतीं। ‘परिमल’ और ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की पैंतरेबाज़ी तो अब इतिहास में दर्ज हो चुकी है। काफ़ी हाउस, मलानी कैफ़े, जगाती का रेस्तराँ, बी.एन.रामा के बाहर तिकोना लॉन - साहित्यकारों की महफ़िलें कई ठिकानों पर जगती-जमती थीं।

हमारे घर पर भी बराबर साहित्यकारों का जमावड़ा रहता था। आज तो ख़ैर कोई साहित्यकार बिना पैसे लिये अपने मुहल्ले के बाहर भी नहीं जाता, मगर उन दिनों लेखक अकेले या अन्य लेखकों के साथ अपने पैसे ख़र्च करके यात्राएँ करते थे और मित्र-परिचितों के यहाँ ही टिकते थे, होटलों में नहीं। मित्रों का आना घर भर को अस्वस्ति नहीं, हर्ष से भर देता था। इलाहाबाद तो यों भी एक साहित्यिक तीर्थस्थली बना हुआ था, सो बहुत-से लोग मत्था टेकने ही चले आते थे और उनका आना एक और गोष्ठी का सबब बन जाता था। बीच-बीच में बड़ी जम्बूरियाँ भी होती थीं। 1957 के लेखक सम्मेलन की बहसें जब ठण्डी पड़ने लगीं तो फिर एक नये समागम का समाँ बँधने लगा। उन दिनों बड़े सम्मेलन या गोष्ठियाँ भले ही ऐनी बेसेण्ट हॉल या इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विजयानगरम हॉल में होती रही हों, नियमित गोष्ठियाँ लेखकों के घरों पर ही होती थीं। ग़ालिबन 1964 के कहानी सम्मेलन की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं। इसी सिलसिले में अलग-अलग साहित्यकारों के घर पर बैठकें भी हो रही थीं। ऐसी ही एक बैठक में पहली बार मैंने ज्ञान को अपने यहाँ देखा था। वह गोष्ठी में पीछे की तरफ़ ख़ामोश बैठा रहा था और गोष्ठी ख़त्म होने पर वैसे ही चुपचाप निकल जाने के फेर में था कि मेरे पिता ने (जिन्हें मैं और मेरे सभी मित्र ‘पापा जी’ कहते थे) उसे रोक कर कुछ देर उससे बातें की थीं। इतने वर्षों बाद इससे ज़्यादा और कुछ याद नहीं कि बैठक के दरवाज़े के पास ज्ञान की साँवली, छरहरी आकृति की उपस्थिति उसके चले जाने के बाद भी बहुत देर तक बनी रही थी।

(जारी)

Monday, January 17, 2011

देशान्तर





जल्द आ रही है

नीलाभ के लम्बे संस्मरण की पहली किस्त

ज्ञानरंजन के बहाने



पिछले 50 बरसों की साहित्यिक हलचलों का एक जायज़ा
और एक लम्बी मैत्री की दास्तान


ज्ञान के मन में स्मृतियों को ले कर एक सन्देह जैसा भाव है। वह भरसक उनसे अलग-थलग रहने की कोशिश करता है। मुमकिन है, उसके मन में एक डर सरीखा कुछ हो कि स्मृतियों को छूट दी नहीं कि वे अपना जाल-बट्टा, अपना प्रपंच रचना शुरू कर देंगी, आपको अपनी गिरफ़्त में ले लेंगी, शिकंजे में जकड़ लेंगी, यूलिसीज़ की यूनानी पुरा-कथा की उन मायाविनी सुन्दरियों की तरह जो एक टापू पर बैठी, अपने मधुर गीतों से नाविकों को लुभा कर बुलाती थीं और उनके जहाज़ तट की चट्टानों से टकरा कर चूर-चूर हो जाते थे। या फिर, सम्भव है, ज्ञान इसलिए स्मृतियों से घबराता हो क्योंकि उनसे कई बार अनावश्यक रूप से भावुक करने का काम लिया जाता है जो उचित ही ऊब और खीझ पैदा करता है। ज्ञान के अपने दो समकालीन-मित्रों ने कुछ वर्ष पहले अच्छा-ख़ासा स्मृति-प्रपंच रचा था, जिसमें उनके अपने-अपने स्वभावों के अनुरूप काफ़ी कुछ ट्रैजी-कॉमिक, स्वाँग-विद्रूप का लुत्फ़ था, अगर उससे आप लुत्फ़ ले सकते तो, हद तक कि ज्ञान को गज-ग्राह की इस खींचा-तानी में हस्तक्षेप करना पड़ा था, जैसा कि इनमें से एक को लिखे गये पत्र से प्रकट होता है। यह भी स्मृतियों के प्रति उसकी शंका का कारण हो सकता है।

(एक अंश)

Wednesday, January 12, 2011

देशान्तर
में शमशेर
१९११-९३

१३ जनवरी शमशेर जी का जन्मदिन है। आज अगर वे होते तो पूरे १०० साल के हो गये होते। वैसे तो किसी कवि को याद करने के लिए जन्मदिनों या शतवार्षिकियों की ज़रूरत नहीं होती, लेकिन ये कुछ ऐसे अवसर होते हैं जब हम थोड़ा ठहर कर अपने पुरखों को याद करते हैं ताकि हममें वह अनिवार्य विनम्रता और विनय बरक़रार रहे जिसकी मदद से हम भटकें नहीं, अपनी रचनात्मकता के नशे में मख़मूर न हो जायें। इस मौक़े पर आज देशान्तर में हम शमशेर जी के निधन के फ़ौरन बाद १९९३ में लिखी नीलाभ की एक संस्मरणात्मक टिप्पणी दे रहे हैं।

सघन तम की आँख बन मेरे लिए

१.

शमशेर जी से आख़िरी मुलाक़ात बरसों पहले हुई थी। इमरजेंसी का ज़माना था शायद या शायद इमरजेंसी हटी-हटी ही थी। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के किसी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आये हुए थे और मेरे मित्र और साथी अजय सिंह भी उनके साथ थे। याद पड़ता है कि मैं अपनी मोटर साइकिल पर शमशेर जी को बैठा कर कटरा के बाज़ार से होता हुआ वहाँ पहुँचाने गया था, जहाँ वे ठहरे हुए थे। संक्षिप्त-सी मुलाकात थी - कुछ घण्टों की - मगर ढेरों बातें हुई थीं- माओ त्से तुंग के निधन के बाद चीन के बदलते स्वरूप से ले कर अजय के हठी स्वभाव और एज़रा पाउण्ड तक जो शमशेर जी के भी पसन्दीदा कवियों में थे - दुनिया-जहान की बातें। ऐसी बातें, जिन्हें आप बाद में शब्द-शब्द जोड़ कर पुनर्निमित नहीं कर सकते, मगर जो आपकी चेतना और एहसास में जज़्ब हो कर उन्हें समृद्ध कर जाती हैं। यही शमशेर जी का ख़ास अन्दाज़ था।
अपनी एक कविता में शमशेर जी ने लिखा है -
कबूतरों ने एक ग़ज़ल गुनगुनायी.....
मैं समझ न सका रदीफ़-काफ़िये क्या थे
इतना ख़फ़ीफ़, इतना हल्का, इतना मीठा उनका दर्द था।
शमशेर जी के बारे में सोचते हुए मुझे हमेशा ही ये पंक्तियाँ याद आ जाती है। उनकी ज़िन्दगी और उनकी कविता के भी रेशे, उसके ताने-बाने, ऐसे ही ख़फ़ीफ़, हल्के मीठे दर्द से रचे गये थे।

२.

शमशेर जी के साथ मेरी बहुत घनिष्ठता नहीं थी। यानी ऐसी घनिष्ठता, जो संग-साथ पर निर्भर हो। मुलाक़ातें भी ज़्यादा नहीं कही जा सकतीं। लेकिन आज से लगभग तीस साल पहले जब मैंने कविता लिखना शुरू किया तो मेरे लिए और मेरी पीढ़ी के और बहुत-से कवियों के लिए शमशेर जी एक अनिवार्य कवि थे। आज हालाँकि यह बात बड़ी अजीब लग सकती है, लेकिन उस ज़माने को पीछे मुड़ कर देखें तो आप समझ पायेंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ। वह ज़माना नयी कविता के बिखराव और अ-कविता के क्षणिक उबाल का था। मुक्तिबोध का पहला संग्रह ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ अभी आया नहीं था। त्रिलोचन, नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल फ़िर से खोजे जाने का इन्तज़ार कर रहे थे। कविता की हिम-मण्डित चोटियों पर अज्ञेय आसीन थे। ऐसी हालत में तराई और मैदानों के वर्षातप को झेल रहे नये कवियों को शमशेर जी में सहजता और अपनापन मिला हो तो आश्चर्य की बात नहीं।
सच यही है कि शमशेर जी के व्यक्तित्व की तरह उनकी कविता में भी गर्माहट और शीतलता एक साथ हासिल होती थी। सर्दियों की धूप की गुनगुनी गर्माहट और गर्मियों की बहार में घने बरगद की छाँह की शीतलता। तब तक शमशेर जी के दो ही संग्रह प्रकाशित हुए थे- ‘कुछ कविताएँ’ और ‘कुछ और कविताएँ,’ लेकिन एक कवि के तौर पर शमशेर जी कभी संग्रहों के मुहताज नहीं रहे। न पहले और न बाद में। न वे इस बात के मुहताज थे कि वे दूसरे सप्तक के कवि हैं। सच तो यह है कि मुक्तिबोध की तरह शमशेर जी भी सप्तकों की सीमित प्रभा के बहुत बाहर तक फैले हुए कवि थे। और रहेंगे। बल्कि मुझे तो कभी-कभी यह भी लगता है कि दूसरा सप्तक में शामिल होना शमशेर जी को कहीं-न-कहीं सीमित भी कर गया। इसकी वजह शायद यह हो कि अपने साथी मुक्तिबोध की तरह शमशेर जी का मिज़ाज भी अज्ञेय के सम्पादकत्व में निकलने वाले सप्तकों से मेल नहीं खाता था। वे ऐसी ताक़तवर धातु के बने हुए थे जो अक्सर सतह पर नहीं दिखती। इसी चीज़ ने सन उन्नीस सौ साठ के दशक में नये कवियों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा।
हर पीढ़ी अपने से पहले की पीढ़ी को इस लिहाज़ से भी जाँचती है कि पहले की पीढ़ी ने अपने पूर्वजों के बारे में क्या लिखा है, उन्हें किस तरह याद किया है। शमशेर जी के पहले कविता संग्रह की पहली ही कविता ‘निराला के प्रति’ - उनके दृष्टिकोण को स्पष्ट कर देती है -
भूल कर जब राह जब-जब राह.......भटका मैं
तुम्हीं झलके, हे महाकवि,
सघन तम की आँख बन मेरे लिए
ज़ाहिर है, हम नये कवियों को, जिनकी सबसे बड़ी कोशिश अकविता के भटकाव से बाहर आने की थी, शमशेर जी की इन पंक्तियों से बहुत बल मिला। न सिर्फ़ इस कविता की अनूठी बिम्ब-योजना के कारण, बल्कि इस कारण भी कि भटकाव और भटकाव से सही राह पर वापसी ऐसे अनुभव नहीं है जिन्हें हम ही झेल रहे हों। यह ढाढ़स बँधाने वाली बात थी कि हमसे पहले भी लोग भटके हैं और उनके लिए कुछ लोगों ने ‘सघनतम की आँख’ बनने का काम किया है। ऐसी ही ‘सघनतम की आँखें’ हमें भी हासिल होंगी, जो हमें फ़िर सही रास्ते पर लायेंगी। और अगर मैं कहूँ कि मेरे तईं अकविता के घटाटोप के बीच शमशेर जी की कविता ऐसी ही आँख का काम करती रही तो बहुत ग़लत न होगा। ये पंक्तियाँ लिखते हुए मुझे अचानक रब्बी की कविता - ‘शमशेर’- याद हो आयी है -
मैं नंगे पाँव धूप में चल रहा था
काँटों भरी डगर पर
एक विशाल वट-वृक्ष के नीचे बैठ गया
हम में से बहुत-से लोगों को शमशेर जी ऐसे ही वट-वृक्ष की तरह लगे हैं। कड़ी धूप में, कंकड़-काँटों से भरी राह पर चलते हुए, शमशेर जी की कविता एक घने, पत्तेदार वट-वृक्ष जैसी ही लगती है। यह अलग बात है कि शमशेर जी की कविता पर अभी तक क़ायदे से, मुक़म्मल तौर पर, विचार नहीं हो पाया है। और यह तथ्य आज के साहित्यिक जगत पर दुखद टिप्पणी भी है। या तो कुछ लोग शमशेर जी को पीर-औलिया बना कर भुनाते रहे हैं, या उन्हें ‘चुका हुआ’ मान कर विस्मृत कर चुके हैं। या फ़िर अपने-अपने ढंग से उन्हें अज्ञेयवादी, नयी कवितावादी, प्रयोगवादी या प्रगतिवादी या ‘कवियों के कवि’ या ‘कवियों में चित्रकार और चित्रकारों में कवि’ कह कर स्वीकारते-नकारते रहते हैं। जबकि शमशेर जी महज़ कवि हैं। न कम, न ज़्यादा। न तो वे ‘कवियों के कवि’ हैं, जैसा कि अक्सर हिन्दी के प्राध्यापकीय आलोचक अपनी अक्षमता के कारण कह दिया करते हैं, और न वे उस तरह के ‘जन कवि’ हैं, जिनकी कविताएँ अख़बार का काम करती हैं। यह टिप्पणी शमशेर जी की कविता की विशद व्याख्या करने का अवसर नहीं है, लेकिन उन्हें याद करते हुए जो सबसे बड़ी बात देखने की है - और यह सिर्फ़ पाठकों के लिए नहीं, बल्कि अन्य कवियों के लिए भी देखने की है - कि जीवन किस तरह कवि के व्यक्तित्व से छन कर उसकी कविता में उतरता है। शमशेर जी ने लिखा है -
जो मैं हूँ -
मैं कि जिसमें सब कुछ है.....
क्रान्तियाँ कम्यून,
कम्युनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवन्त वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैं।
शमशेर जी की कविता इसी व्यक्ति की दस्तावेज़ है, जो अपने समय की हलचलों से निर्मित हुआ है और सतत होता जा रहा है।


३.

यही वे ख़ूबियाँ हैं, जिन्होंने शमशेर जी की कविता के प्रति लोगों में बराबर दिलचस्पी जगाये रखी है। हर नयी पीढ़ी जब पीछे मुड़ कर अपनी परम्परा का जायज़ा लेती रही है तो राह के विशाल वट-वृक्ष की तरह शमशेर जी को हमेशा पत्ते डोलाते पाती रही है। लेकिन उस सुकून के बावजूद, जो इस विशाल वट-वृक्ष की छाँह-तले बैठ कर मिलता है, शमशेर की कविता के बारे में सरे-राहे कुछ भी कहना सम्भव नहीं है। इस लिहाज़ से शमशेर ‘मुश्किल’ कवि हैं। लेकिन इसका यह अर्थ न लगाया जाय - जैसा कि अक्सर लोग लगाते हैं - कि वे कठिनाई से समझ में आने वाले कवि हैं। अबूझ कवि हैं। ऐसा बिलकुल नहीं है। वे उतना ही कठिन या सरल हैं, जितना कि कोई औसत मनुष्य होता है। उनकी कविता को पढ़ते हुए हमें बराबर इस बात का एहसास होता है कि शमशेर नाम का व्यक्ति जीवन को जिस तरह देखता है - उनकी कविता इसका लेखा-जोखा पेश करती है। इसीलिए अगर उनकी कुछ कविताएँ हमें समझ में नहीं आतीं तो हैरत नहीं, क्योंकि मनुष्य भी तो बहुत बार हमें समझ में नहीं आता है। ख़ुद अपना आप हमारे लिए कई बार एक अबूझ पहेली बन जाता है। लेकिन तब तो हमें चिन्ता नहीं होती। फ़िर क्या कारण है कि शमशेर या मुक्तिबोध पर हम ‘दुरूहता’ का लेबल चिपका कर उन्हें ख़ारिज करने को उतारू हो जाते हैं। इसकी वजह शायद यह है कि साहित्य और कला के प्रति हम एक सही नज़रिया नहीं विकसित कर पाये हैं। शायद हमने साहित्य को ज़िन्दगी के सवालों की एक बनी-बनायी कुंजी समझ लिया है, जो हर ताले को एक-सी सहजता से खोलती चली जायेगी। जबकि अक्सर ऐसा नहीं होता।
बहरहाल, शमशेर की कविता की यह एक ख़ूबी ही कही जायेगी कि वह आपको उस अनुभव में शिरकत करने के लिए आमन्त्रित करती है, जिसे शमशेर ने प्राप्त किया है और अपनी कविता में व्यक्त किया है। इसीलिए शमशेर की कविता में हमें 1947 के पहले का संघर्ष-भरा आशावादी स्वर भी मिलता है और 1947 के बाद के मोह-भंग की उदासी भी। हमें जन-जीवन के चित्र भी मिलते हैं और व्यक्ति की निजी उलझनों के अँधेरे-उजाले कोने-अँतरे भी।
शमशेर की कविता को आज जब हम समग्रता में देखते हैं तो हम पाते हैं कि अपने ढंग से उन्होंने उन तमाम चिन्ताओं के इर्द-गिर्द अपनी कविता को रचा है, जिन्हें आज हम अपने समय की प्रमुख चिन्ताओं में शुमार करते हैं - मिसाल के तौर पर हिन्दी-उर्दू की मिली-जुली परम्परा का मसला, साम्प्रदायिकता की समस्या, श¨षण और उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ाई जारी रखने का सवाल और व्यक्ति और समाज, पार्टी और व्यक्ति के बीच एक बेहतर तालमेल स्थापित करने की जद्दो-जेहद और यह काम शमशेर जी ने एक ऐसे समय में किया, जब इन सवालों को नज़रन्दाज़ किया जा रहा था। इसीलिए शायद हमारे लिए शमशेर जी की कविताएँ इस तेज़ी से बदलते दौर में महत्वपूर्ण बनी रही हैं। फ़िर वह चाहे काव्य-चेतना के सन्दर्भ में हो या निजी व्यवहार के सन्दर्भ में।


४.

शमशेर जी ने ‘अज्ञेय से’ शीर्षक कविता में लिखा है -
जो नहीं है
जैसे कि सुरुचि
उसका ग़म क्या
वह नहीं है
सुरुचि का मामला भी शमशेर जी के लिए एक अहम मामला था। उनके लिए सुरुचि सजी-बजी बैठकों और तथाकथित सांस्कृतिक ताम-झाम में नहीं, बल्कि इस बात में थी कि आप अपने इर्द-गिर्द के लोगों से किस तरह पेश आते हैं। नर्म लबो-लहजा, दूसरों की भावनाओं का आदर करना, उन पर नाहक ही चोट न करना- यह सब शमशेर जी के व्यक्तिव का हिस्सा था। और इसके साथ-साथ थी एक मुहब्बत - अपने साथियों के प्रति ही नहीं, बल्कि अपने से उमर में छोटे लोगों के लिए भी।
मुझे याद आता है सन 1974 की गर्मियों में मैं अपनी पत्नी और चार साल के बेटे के साथ दिल्ली गया हुआ था। शमशेर जी उन दिनों अजय और शोभा के साथ अमर कालोनी के एक छोटे-से फ़्लैट में रहते थे और मीलों की मंज़िल मार कर उर्दू शब्दकोष पर काम करने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय जाया करते थे। एक दिन हम शाम के समय अजय के यहाँ पहुँचे। थोड़ी देर में शमशेर जी भी आ गये। गप-शप होने लगी। शोभा चाय का इन्तज़ाम करने लगी। मैं शमशेर जी के साथ अपने बचपन की बातें करने लगा और शमशेर जी मेरी पत्नी सुलक्षणा को मेरे बचपन के कुछ प्रसंग बताने लगे। बातों-बातों में बिस्कुटों का ज़िक्र छिड़ा और मैंने कहा कि मुझे बचपन में ब्रिटैनिया के ‘नाइस’ बिस्कुट बहुत पसन्द थे - जिनमें बिस्कुटों पर चीनी के दाने लगे होते हैं। शमशेर जी ने कहा कि उन्हें भी वे बिस्कुट बहुत अच्छे लगते हैं। तभी सुलक्षणा ने उन्हें बताया कि हमारे बेटे को भी वे बिस्कुट बहुत अच्छे लगते हैं। इसी बीच चाय आ गयी और बातों का सिलसिला दूसरी तरफ़ मुड़ गया। अभी हमने चाय शुरू ही की थी कि शमशेर जी ग़ायब। ख़याल आया कि शायद हाथ-वाथ धोने गये होंगे। पाँच मिनट बाद शमशेर जी सीढ़ियाँ चढ़ कर आते दिखायी दिये। कमरे में आ कर उन्होंने अपने मख़सूस शर्मीले अन्दाज़ में मुस्कुराते हुए ब्रिटैनिया के उन्हीं नाइस बिस्कुटों का डिब्बा मेज़ पर रखा और उसे खोल कर मेरे बेटे को बिस्कुट खिलाने लगे। प्रसंग बहुत छोटा-सा है, किसी हद तक मामूली भी, लेकिन मेरे लिए यह शमशेर जी के पूरे व्यक्तित्व को - प्रदर्शन से परे रहने वाली उनकी मुहब्बत और गर्मजोशी को - साकार कर देता है।


५.

एक लम्बे अर्से से शमशेर जी कभी मध्य प्रदेश तो कभी गुजरात रहे। मुलाक़ातें पहले ही गाहे-बगाहे होती थीं। अब बिलकुल ख़त्म-सी हो गयीं। कभी-कभार अजय के ज़रिये शमशेर जी का हाल-चाल मिल जाता था। इस दौरान शमशेर जी बहुत बीमार भी रहे। तो भी दिल को तसल्ली थी कि हमारे परिवार के एक बुज़ुर्गवार अब भी हमारे बीच हैं। जैसा कि मैंने कहा शमशेर जी के साथ निकटता का पैमाना उनके साथ होने वाली मेल-मुलाक़ात से तय नहीं होता था। वे एक ऐसे ज़माने के आदमी थे, जब लेखकों की बिरादरी में कहीं अधिक अपनापा और घनिष्ठता थी। वर्षों न मिलने के बाद भी जब मुलाक़ात होती तो ऐसा लगता कि बीच में कोई व्यवधान ही नहीं पड़ा। इसीलिए जब अचानक यह ख़बर मिली कि शमशेर जी नहीं रहे तो यह ख़याल नहीं आया कि हिन्दी के एक बड़े कवि का देहान्त हो गया है, बल्कि यही लगा कि जैसे अपने परिवार के किसी बड़े-बुज़ुर्ग का निधन हो गया है।

Monday, January 10, 2011

देशान्तर



आज के कवि : सुकान्त भट्टाचार्य




पारपत्र

जिस बच्चे ने जन्म लिया है आज रात
उसी के मुँह से मिली है ख़बर,
उसे मिला है एक पारपत्र
नये विश्व के द्वार पर।
इसीलिए जताती है अधिकार
जन्म लेते ही उसकी चीख़-पुकार।
नन्हीं-सी देह, असहाय फिर भी उसके हाथों की बँधी हुई मुट्ठियाँ
तनी हुई हैं जाने कौन-सी दुर्बोध प्रतिज्ञा में।

उस भाषा को कोई नहीं समझता
कोई हँसता है, कोई देता है मीठी झिड़की।
मैं लेकिन मन-ही-मन समझ रहा हूँ उसकी भाषा।
पायी है उसने आने वाले युग की नयी चिट्ठी -
पढ़ता हूँ नये जन्मे बच्चे का परिचय-पत्र,
उसकी अस्पष्ट धुन्ध-भरी आँखों में।

आया है नया मेहमान
जिसके लिए छोड़ना होगा स्थान।
चले जाना होगा हमें
पुरानी पृथ्वी के व्यर्थ, मरे हुए और नष्ट ढेर पर। चला जाऊँगा -
फिर भी जब तक हैं देह में प्राण
जी-जान से हटाता रहूँगा पृथ्वी का जंजाल
बना जाऊँगा दुनिया को इस बच्चे के रहने योग्य
नये जन्मे के प्रति यह है मेरी दृढ़ प्रतिज्ञा
अन्त में सब काम निपटा कर
अपनी देह के रक्त से नये शिशु को
दे जाऊँगा आशीर्वाद।

तब बनूँगा इतिहास

हे महाजीवन

हे महाजीवन, अब और यह कविता नहीं।
इस बार कठिन, कठोर गद्य लाओ।
मिट जाये पद्य-लालित्य की झंकार।
गद्य के कठोर हथौड़े से आज करो चोट।
चाहिए नहीं आज कविता की स्निग्धता।

कविता आज तुझे छुट्टी दी।

भूख के राज्य में पृथ्वी गद्यमय है।
पूर्णिमा का चाँद जैसे झुलसी हुई रोटी है।

गान

जिस तरह खींचता है जल को ताप
उसी तरह खींचता हूँ तुम्हें
लगातार रोज़-रोज़।
तुम मुझे पहचान लो
छोड़ कर अपना तमाम छल।

जानता हूँ तुम्हें कुछ कहना व्यर्थ है।
तुम मेरी और मैं तुम्हारा हूँ मित्र।
बन्द द्वार खोल कर
आओगी न कभी तुम भूल कर।
रुकेगा न कभी मेरा आना-जाना।


आगामी

जड़ नहीं, मृत नहीं, नहीं हूँ अन्धकार का खनिज,
मैं हूँ जीवन्त प्राण, हूँ एक अंकुरित बीज :
मिट्टी में पला हुआ, भीरु,
जिसने खोली हैं अपनी शंकाकुल आँखें आज।

आकाश के बुलावे पर,
सपनों ने घेर रखा है मुझ को।

हालाँकि नगण्य हूँ मैं, तुच्छ हूँ वट-वृक्षों के समाज में
तो भी मेरी इस नन्हीं-सी देह में बजती है छुपी हुई मर्मर ध्वनि
चीरी है मिट्टी मैंने, देखा है उजाले का आना-जाना,
इसीलिए मेरी जड़ों में है जंगल की विशाल चेतना।

आज सिर्फ़ फूटे हैं अंकुर,
लेकिन मुझे पता है,
कल नन्हे-नन्हे पत्ते
उद्दाम हवा की ताल पर सिर हिलायेंगे।
उसके बाद फैला दूँगा सबके सामने
अपनी मज़बूत डालियाँ,
प्रस्फुटित कर दूँगा विस्मित फूल
पड़ोसी पेड़ों के मुँह पर।
तेज़ तूफ़ान में भी दृढ़ता से जमी हुई है प्रत्येक जड़ :
हर डाल कर रही प्रतिरोध,
जानता हूँ पराजित होगा अन्तत: तूफ़ान :
जितने भी मेरे नये-नये साथी हैं माथे पर ले कर मेरा आह्वान
जानता हूँ मुखरित होंगे जंगल के नये गीत सरीखे।
अगले वसन्त में लेकिन मैं मिल जाऊँगा बड़ों की क़तार में,
कोंपलों की जयध्वनि में सब स्वागत करेंगे मेरा।
नन्हा हूँ मैं, पर तुच्छ नहीं हूँ मैं, जानता हूँ मैं भावी वनस्पति हूँ
वर्षा और मिट्टी के रस में पाता हूँ मैं इसी की स्वीकृति।
उस दिन मेरी छाया में आना,
फिर अगर तुम वार भी करोगे मुझ पर तेज़ कुल्हाड़ी से
तो भी मैं तुम्हें बुलाऊँगा बार-बार हाथ हिला कर
फल दूँगा, फूल दूँगा, दूँगा मैं पंछियों का कलरव
एक ही मिट्टी पर पला हुआ तुम्हारा अपना साथी।

ख़बर

ख़बर आती है
दिशा-दिशा से, विद्युतवाहिनी ख़बर ।
युद्ध, विप्लव, बाढ़, अकाल, आँधी -
यहाँ पत्रकारिता की रात का सन्नाटा।
रात गहरी होती है यन्त्रों के बजते हुए छन्द में - प्रकाश की व्यग्रता में;
जब तुम्हारे जीवन में निद्रा-डूबी मध्य रात्रि,
आँखों में स्वप्न और घर में अन्धकार होता है।
अतुल अदृष्य बातों के समुद्र से नि:शब्द उठ आते हैं शब्द
अभ्यस्त हाथों से ख़बरें सजाता हूँ -
अनुवाद करते-करते कभी-कभी चौंक उठता हूँ
देखता हूँ युग को बदलते हुए।
कभी हाथ काँप उठते हैं ख़बर लिखते हुए
श्रावण की बाईसवीं या जून की बाईसवीं तिथि को।
तुम्हारी नींद के अँधेरे रास्ते को पार कर
ख़बरों की परियाँ यहाँ आती हैं तुम लोगों से पहले
उन्हें पा कर कभी कण्ठ में उभरता है दर्द और कभी उभरता है गान
सुबह के उजाले में जब वे तुम्हारे पास पहुँचती हैं
तब तक हमारी आँखों में झर गये होते हैं उनके पंख।
तुम लोग ख़बर पाते हो,
सिर्फ़ ख़बर नहीं रखते किसी की उनिद्र आँखों और चौकन्ने कानों की
वह कम्पोज़िटर क्या कभी चौंक उठता है त्रुटिहीन यान्त्रिकता के
किसी अवसर पर ?
पुराने टूटे हुए चश्मे से धुँधली ऩजर आती है दुनिया -
नौ अगस्त को असम सीमान्त के हमले पर ?
क्या कभी वह जल उठता है
स्टालिनग्राद के गतिरोध में, महात्मा जी की मुक्ति में,
पेरिस के अभ्युत्थान पर ?
बुरी ख़बर नहीं लगती क्या
काले अक्षरों के लिबास में किसी की शवयात्रा ?
जो ख़बरें प्राणों के पक्षपात की आभिषिक्त हैं
वे क्या बड़े हरफ़ों में ख़ुद को प्रकाशित नहीं करतीं सम्मान से ?
यह सवाल अव्यक्त, अनुच्चरित रहता है
सुबह के अख़बार की सा़फ़-सुथरी तहों में।
केवल हम लोग लिखते हैं दैनन्दिन इतिहास
तब भी इतिहास नहीं रखेगा हमें याद
कौन याद रखेगा नवान्न के दिन काटे गये धान के गुच्छों को
लेकिन याद रखना तुम लोगों से पहले ही
हम लोग पाते हैं ख़बर - मध्य रात्रि के अँधेरे में
तुम्हारी तन्द्रा के जाने बिना भी
इसलिए तुम लोगों से पहले ही ख़बर-परियाँ आती हैं
हमारी चेतना के पथ को पार करते हुए
मेरी हृत्तन्त्री पर चोट लग कर बज उठती हैं कई एक बातें -
पृथ्वी मुक्त हुई - जनता की विजय हुई अन्तिम संघर्ष में।
तुम्हारे घर में आज भी अँधेरा, आँखों में स्वप्न,
लेकिन जानता हूँ, एक दिन वह सुबह ज़रूर आयेगी
जब यह ख़बर पाओगे, तुम हर एक के चेहरे पर
सुबह की रोशनी में, घास-घास में, पत्तों-पत्तों में।

फ़िलहाल तो तुम लोग नींद में हो।

यूरोप के प्रति

वहाँ अभी मई का महीना है, बर्फ़ के गलने के दिन,
यहाँ आग बरसाता वैशाख है, निद्राहीन।
शायद वहाँ शुरू हो गयी है मन्थर दक्खिनी हवा,
यहाँ वैशाखी लू के थपेड़े धावा बोलते हैं।
यहाँ-वहाँ फूल उगते हैं आज तुम्हारे देश में,
कैसे-कैसे रंग, कितनी विचित्र रातें देखने को मिलती हैं,
सड़कों पर निकल पड़े हैं कितने लड़के-लड़कियाँ घर छोड़ कर
इस वसन्त में, कितने उत्सव हैं, कितने गीत गाये जा रहे।
यहाँ तो सूख गये हैं फूल, मटमैली धूल में;
चीख़-पुकार करता है सारा देश, चैन ख़त्म हो चुका है,
कड़ी धूप के डर से लड़के-लड़कियाँ बन्द हैं घरों में,
सब ख़ामोश : शायद जागेंगे वैसाखी तूफ़ान में,
बहुत मेहनत, बहुत लड़ाई करने के बाद।
चारों ओर क़तार-दर-क़तार हैं तुम्हारे देश में फूलों के बा़ग़,
इस देश में युद्ध, महामारी, दुर्भिक्ष जलता है हड्डी-हड्डी में,
इसीलिए आग बरसाते ग्रीष्म के मैदान में छीन लेती है नींद
बेपरवाह प्राणों को; आज दिशा-दिशा में लाखों-लाख लोग होते हैं इकट्ठा --
तुम्हारे मुल्क में मई का महीना है, यहाँ तूफ़ानी वैशाख।

प्रस्तुत

काली मौतों ने आज बुलाया है स्वयंवर में
कई दिशाओं में कई हाथों को हिलते देखता हूँ इस बड़ी-सी दुनिया में
डरा हुआ मन खोजता है आसान रास्ता, निष्ठुर नेत्र;
इसलिए ज़हरीले स्वाद से भरी इस दुनिया में
सिर्फ़ मन के द्वन्द्व निरन्तर फैलाते हैं आग।

अन्त में टूटे हैं भ्रम, आया है ज्वार मन के कोने में
तेज़ भौहें तनी हैं कुटिल फूलों के वन में
अभिशापग्रस्त वे सभी आत्माएँ आज भी हैं बेचैन
उनके सम्मुख लगाया है प्राणों का मज़बूत शिविर
ख़ुद को मुक्त किया है आत्म-समर्पण में।

चाँद के सपने में धुल गया है मन जिस समय के दौरान
उसे आज दुश्मन जान कर लिया है पहचान
धूर्तों की तरह शक्तिशाली नीच स्पर्द्धाएं
मौक़ा पाने पर आज भी मुझे झपट सकती हैं
इसीलिए सतर्क हूँ, मन को गिरवी नहीं रखा मैंने।

बीते हैं असंख्य दिन प्राणों के व्यर्थ रुदन में
नर्म सोफ़े पर बैठ कर क्रान्तिकारी चेतना के उद्बोधन में
आज लेकिन जनता के ज्वार में आयी है बाढ़
प्यासे मन में रक्तिम पथ के अनुसरण की कामना,
कर रही है पृथ्वी पहले की राह का संशोधन।

उठाया है हथियार अब सामने दुश्मन चाहिए
क्योंकि महामारण का निर्दयी व्रत लिया है हमने आज
जटिल है संसार, जटिल है मन का सम्भाषण
उनके प्रभाव में रखा नहीं मन में कोई आसन,
आज उन्हें याद करना भूल होगी यह जानता हूँ मैं।

प्रार्थी

ओ सूरज! सर्दियों के सूरज!
हम बर्फ़-सी ठण्डी रात के दौरान
तुम्हारी ही प्रतीक्षा करते रहते हैं।
जैसे प्रतीक्षा करती रहती हैं किसानों की चंचल आँखें
धान की कटाई के रोमांचकारी दिनों की।

ओ सूरज! तुम्हें तो पता है
हमारे पास गरम कपड़ों का कितना अभाव है
कितनी दिक़्क़त से हम सर्दी को रोकते हैं
सारी रात घास-फूस जला कर
कपड़े के एक टुकड़े से अपने कान ढँकते हुए

सुबह की धूप का एक टुकड़ा
सोने के एक टुकड़े से भी ज़्यादा क़ीमती लगता है
धूप के एक टुकड़े की प्यास में
हम घर छोड़ इधर-उधर भागते-फिरते हैं

ओ सूरज!
तुम हमारी सीली नम कोठरियों को
गर्मी और रोशनी देना
और गर्मी देना
रास्ता-किनारे के उस नंगे लड़के को।

ओ सूरज! तुम हम लोगों को गर्मी देना
सुना है तुम एक जलते हुए अग्नि-पिण्ड हो,
तुम से गर्मी पा कर
शायद हम सब एक दिन एक-एक जलते हुए
अग्नि-पिंड में बदल जायें।
उसके बाद उस गर्मी में जल जाये हमारी जड़ता
तब शायद गरम कपड़े से ढँक सकेंगे हम
रास्ता किनारे के उस नंगे लड़के को
आज मगर हम प्रार्थी हैं तुम्हारे अकृपण उत्ताप के।

इस नवान्न में

इस हेमन्त में धान की कटाई होगी
फिर ख़ाली खलिहान से फ़सल की बाढ़ आयेगी
पौष के उत्सव में प्राणों के कोलाहल से भरेगा श्मशान-सा नीरव गाँव
फिर भी इस हाथ से हंसिया उठाते रुलाई छूटती है
हलकी हवा में बीती हुई यादों को भूलना कठिन है
पिछले हेमन्त में मर गया है भाई, छोड़ गयी है बहन,
राहों-मैदानों में, मड़ई में मरे हैं इतने परिजन,
अपने हाथों से खेत में धान बोना,
व्यर्थ ही धूल में लुटाया है सोना,
किसी के भी घर धान उठाने का शुभ क्षण नहीं आया -
फ़सल के अत्यन्त घनिष्ठ हैं मेरे-तुम्हारे खेत।
इस बार तेज़ नयी हवा में
जययात्रा की ध्वनि तैरती हुई आती है,
पीछे मृत्यु की क्षति का ख़ामोश बयान -
इस हेमन्त में फ़सलें पूछती हैं : कहाँ हैं अपने जन ?
वे क्या सिर्फ़ छिपे रहेंगे,
अक्षमता की गलानि को ढँकेंगे,
प्राणों के बदले किया है जिन्होंने विरोध का उच्चारण ?

इस नवान्न में क्या वंचितों को नहीं मिलेगा निमन्त्रण?

बयान

अन्त में हमारे सोने के देश में उतरता है अकाल,
जुटती है भीड़ उजड़े हुए नगर और गाँव में
अकाल का ज़िन्दा जुलूस
हर भूखा जीव ढो कर ले आता है अनिवार्य समता।

आहार के अन्वेषण में हर प्राणी के मन में है आदिम आग्रह
हर रास्ते पर होता है हर रोज़ नंगा समारोह
भूख ने डाला है घेरा रास्ते के दोनों ओर,
विषाक्त होती है हवा यहाँ-वहाँ व्यर्थ की लम्बी साँसों से
मध्यवर्ग का धूर्त सुख धीरे-धीरे होता है आवरणविहीन
बुरे दिनों की घोषणा करता है नि:शब्द।
सड़कों पर झुण्ड-दर-झुण्ड डोलती हुई चलती है कंगालों की शोभा-यात्रा
आतंकित अन्त:पुरों से उठती है दुर्भिक्ष की गूँज।
हर दरवाज़े पर बेचैन उपवासी प्रत्याशियों के दल,
निष्फल प्रार्थना-क्लान्त, भूख ही है अन्तिम सम्बल;
राजपथ पर देख कर लाशों को भरी दोपहरी में
विस्मय होता है अनभ्यस्त अँखों को।
लेकिन इस देश में आज हमला करता है ख़ूँख़ार दुश्मन,
असंख्य मौतों का स्रोत खींचता है प्राणों को जड़ से
हर रोज़ अन्यायी आघात करता है जराग्रस्त विदेशी शासन,
क्षीणायु कुण्डली में नहीं है ध्वंस-गर्भ के संकट का नाश।
सहसा देर गयी रात में देशद्रोही हत्यारे के हाथों में
देशप्रेम से दीप्त प्राण ढालते हैं अपना रक्त, जिसका साक्षी है सूरज;
फिर भी प्रतिज्ञा तैरती है हवा में अकेले,
यहाँ चालीस करोड़ अब भी जीवित हैं,
भारत भूमि पर गला हुआ सूरज झरता है आज -
दिग-दिगन्त में उठ रही है आवाज़,
रक्त में सु़र्ख टटकी हुई लाली भर दो,
रात की गहरी टहनी से तोड़ लाओ खिली हुई सुबह
उद्धत प्राणों के वेग से मुखर है आज मेरा यह देश,
मेरे उध्वस्त प्राणों में आया है आज दृढ़ता का निर्देश।
आज मज़दूर भाई देश भर में जान हथेली पर लिये
कारख़ाने-कारख़ाने में उठा रहे तान।
भूखा किसान आज हल के नुकीले फाल से
निर्भय हो रचना करता है जंगी कविताएँ इस माटी के वक्ष पर।
आज दूर से ही आसन्न मुक्ति की ताक में है शिकारी,
इस देश का भण्डार जानता हूँ भर देगा नया यूक्रेन।
इसीलिए मेरे निरन्न देश में है आज उद्धत जिहाद,
टलमल हो रहे दुर्दिन थरथराती है जर्जर बुनियाद।
इसीलिए सुनता हूँ रक्त के स्रोतत में आहट
विक्षुब्ध टाइ़फून-मत्त चंचल धमनी की।
सुनता हूँ बार-बार विपन्न पृथ्वी की पुकार,
हमारी मज़बूत मुट्ठियाँ उत्तर दें उसे आज।
वापस हों मौत के परवाने द्वार से,
व्यर्थ हों दुरभिसन्धियाँ लगातार जवाबी मार से।

शत्रु एक है

आज यह देश विपन्न है; निरन्न है जीवन आज,
मौत का निरन्तर साथ है, रोज़-रोज़ दुश्मनों के हमले
रक्त की अल्पना आँकते हैं, कानों में गूँजता है आर्तनाद;
फिर भी मज़बूत हूँ मैं, मैं एक भूखा मज़दूर।
हमारे सामने आज एक शत्रु है : एक लाल पथ है,
शत्रु की चोट और भूख से उद्दीप्त शपथ है।
कठिन प्रतिज्ञा से स्तब्ध हमारे जोशीले कारख़ाने में
हर गूँगी मशीन प्रतिरोध का संकल्प बताती है।
मेरे हाथ के स्पर्श से हर रोज़ यन्त्र का गर्जन
याद दिलाता है प्रण की, धो डालता है अवसाद,
विक्षुब्ध यन्त्र के सीने में हर रोज़ युद्ध की जो घोषणा है
वह लड़ाई मेरी लड़ाई है, उसी की राह में रुक कर गिनने हैं दिन।
निकट के क्षितिज में आता है दौड़ता हुआ दिन, जयोन्मत्त पंखों पर -
हमारी निगाह में लाल प्रतिबिम्ब है मुक्ति की पताका का
अन्धी रफ़्तार से हरकतज़दा मेरा हाथ लगातार यन्त्र का प्रसव
प्रचुर-प्रचुर उत्पादन, अन्तिम वज्र की सृष्टि का उत्सव।।

हरकारा

हरकारा दौड़ चला, दौड़ चला,
बजती है रात में इसीलिए घण्टी की रुनझुन!
हरकारा चल दिया बोझ लिये ख़बरों का हाथ में।
हरकारा चल दिया है, हरकारा,
रात की राहों में चलता है हरकारा, मानता नहीं वह निषेध कोई मन में,
दिग से दिगन्त तक दौड़ चला हरकारा,
नयी ख़बर लाने का ज़िम्मा है उस पर।

हरकारा! हरकारा!
जाने-अनजाने का
बोझ आज काँधे पर
चल रहा है हरकारा चिट्ठी और ख़बरों से लदा हुआ जहाज़ एक,
हरकारा चल रहा है, शायद हो जाय भोर।
और भी तेज़ी से, और भी तेज़ी से, यह हरकारा दुर्जय दुर्वार आज,
उसके जीवन के सपने सरीखा सरकता है वन, पीछे छूटता।
बाक़ी है, शेष है राह अभी - होता है लाल शायद पूरब का वह कोना।
नि:स्तब्ध रात के सितारे झमकते हैं नभ में,
कितनी तेज़ी से भागता है यह हरकारा हिरन की तरह।
कितने गाँव, कितने रास्ते छूट-छूट जाते हैं
हरकारा भोर में पहुँच ही जायेगा शहर।
हाथ की लालटेन करती है टुन-टुन-टुन जुगनू देते हैं आकाश,
डरो मत हरकारे! रात की कालिमा से अब भी भरा है आकाश!

इसी तरह जीवन के बहुत-से वर्षों को पीछे छोड़ कर,
पृथ्वी का बोझ भूखे हरकारे ने पहुँचा दिया "मेल" पर,
थकी हुई साँस से छुआ है आकाश, भीगी है मिट्टी पसीने से,
जीवन की सारी रातें ख़रीदीं हैं उन्होंने बहुत सस्ते में।
बड़े दुख में, वेदना में, अभिमान और अनुराग से
घर में उसकी प्रिया जागती है अकेली उनींदे बिस्तर पर।
रानार! रानार!
कब होंगे शेष ये बोझ ढोने के दिन
कब बीतेगी रात, उदित होगा सूरज?
घर में है अभाव, इसीलिए पृथ्वी लगती है काला धुआं
पीठ पर रुपयों का बोझ, फिर भी यह धन कभी नहीं जायेगा छुआ,
निर्जन है रात, रास्ते में हैं कितनी ही आशंकाएँ, फिर भी दौड़ता है हरकारा।
डाकू का डर है, उससे भी ज़्यादा डर जाने कब सूरज उग आये
कितनी चिट्ठियाँ लिखते हैं लोग -
कितनी सुख में, प्रेम में, आवेग में, स्मृति में, कितने दुख और शोक में,
मगर इसके दुख की चिट्ठी मैं जानता हूँ कोई कभी नहीं पढ़ पायेगा,
इसके जीवन का दुख जानेगी सिर्फ़ रास्ते की घास,
इसके दुख की कथा नहीं जानेगा कोई शहर और गाँव में,
इसकी कथा ढँकी रह जायेगी रात के काले लिफ़ाफ़े में।
हमदर्दी से तारों की आँखें टिमटिमाती हैं -
यह कौन है जिसे भोर का आकाश भेजेगा सहानुभूति की चिट्ठी -
रानार! रानार! क्या होगा यह बोझा ढो कर ?
क्या होगा भूख की थकान में क्षय हो -हो कर ?
रानार! रानार! भोर तो हुई है - आकाश हो गया है लाल,
उजाले के स्पर्श से कब कट जायेगा यह दुख का काल ?

हरकारे! गाँव के हरकारे!
समय हुआ है नयी ख़बर लाने का।
शपथ की चिट्ठी ले चलो आज,
कायरता को पीछे छोड़,
पहुँचा दो यह नयी ख़बर
प्रगति की ’मेल‘ में।
दिखेगा शायद अभी-अभी प्रभात
नहीं, देर मत करो और,
दौड़ चलो, दौड़ चलो और तेज़ी से
ओ दुर्दम हरकारे!
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सुकान्त भट्टाचार्य ( 15 अगस्त 1926 - 13 मई 1947) की गिनती बांग्ला भाषा के अत्यन्त सम्मानित कवियों में होती है. हालांकि सुकान्त का अकाल निधन 21 वर्ष की छोटी-सी उमर में हुआ, लेकिन उनकी उर्वर रचनाशीलता और तीखे प्रगतिशील स्वर के कारण पाठक और आलोचक उन्हें बांग्ला के एक और क्रान्तिकारी कवि नज़रुल इस्लाम से जोड़ कर "किशोर विद्रोही कवि" और "युवा नज़रुल" कहने लगे थे। अंग्रेज़ी राज की निरंकुशता और पूंजीवादियों के शोषण के खिलाफ़ सुकान्त ने सदा मुखर और निर्भीक आवाज़ उठायी। यह एक विडम्बना ही है कि बंगाल के मौजूदा मुख्य मन्त्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, जिनके कार्यकाल में और जिनकी सत्ताधारी मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी द्वारा नन्दीग्राम, सिंगुर और लालगढ़ में जनविरोधी हिंसा देखने में आयी है, बांग्ला के इसी जनवादी कवि के भतीजे हैं।

सुकान्त का पैत्रिक निवास कोटालीपाड़ा, गोपालगंज (अब बांग्लादेश ) में उन्शिया नामक गांव में था, लेकिन उनक जन्म कलकत्ता में अपने चाचा के घर में हुआ। उनके पिता निवारण चन्द्र भट्टाचार्य पुस्तकों का प्रकाशन और वितरण करने वाली संस्था -- सरस्वती लाइब्रेरी -- के मालिक थे। सुकान्त 1944 में कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गये और उसी वर्ष उन्होंने एक कविता संकलन "अकाल" का सम्पादन किया। 1945 में वे बेलेघाटा देशबन्धु हाई स्कूल से प्रवेश परीक्षा के लिए बैठे लेकिन विफल रहे. पार्टी के दैनिक समाचार-पत्र "दैनिक स्वाधीनता" के शुरू होने के समय, 1946 ही से वे उसके युवा विभाग "किशोर सभा" के सम्पादक बने। 1947 में तपेदिक से जादवपुर टी.बी. हस्पताल में सुकान्त का निधन हुआ।

सुकान्त की उर्वर रचनात्मकता उनकी ज़िन्दगी ही में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामने आयी, मगर "छाड़पत्र" को छोड़ कर उनके बाक़ी सभी कविता संग्रह -- "घूम नेई," (1954) "पूर्वाभास" (1950) और "मीठे-कौड़ो" (1951) और नाटक "अभियान" (1953) -- उनके निधन के बाद ही प्रकाशित हुए.

अपनी अकाल मृत्यु के अन्तिम क्षणों तक सुकान्त का यही मानना था कि "कवि से बड़ी बात है कि मैं कम्यूनिस्ट हूं।" इस निष्ठा को उन्होंने पूरी तरह अपनी कविता में ही व्यक्त किया और यों आने वाले कवियों के लिए एक आलोक स्तम्भ निर्मित कर गये जो उनका दिशानिर्देश करता रहेगा.





see these poems on http://neelabhkamorcha.blogspot.com/

Wednesday, January 5, 2011

देशान्तर


आज एक कहानी : नाडीन गोर्डिमर की

लूट



हमारे समय में एक बार भूचाल आया : लेकिन जब से रिक्टर स्केल की ईजाद ने हमारे लिए प्राकृतिक चेतावनियों को नापना मुमकिन बना दिया, यह भूचाल रिकॉर्ड किये गये भूचालों में सबसे शक्तिशाली था.

उसने एक महाद्वीप के कगार को झुका दिया. ऐसे कम्पन से अक्सर बाढ़ें आ जाती हैं; लेकिन इस भयानक भूचाल ने इसका उलट किया, लम्बी साँस लेने की तरह सागर को पीछे खींच लिया. हमारी दुनिया का सबसे गोपनीय हिस्सा उघड़ गया - समुद्र तल में डूबे ध्वस्त जहाज़, मकानों के मुहारे, नाच-घर के फ़ानूस, शौचालय की चिलमची, समुद्री डाकुओं का बक्सा, टी0वी0, डाक-गाड़ी, हवाई जहाज़ का ढाँचा, तोप, संगमरमर की मूर्ति का धड़, कलाश्निकॉव, पर्यटकों से भरी बस की धातु का खोल, बपतिस्मे का कुण्ड, बर्तन धोने की ऑटोमैटिक मशीन, कम्प्यूटर, समुद्री कीड़ों में लिपटी तलवारें, पत्थर बन गये सिक्के. चकित निगाह इन चीज़ों पर दौड़ती चली गयी; जो आबादी अपने ढहते मकानों से सागर-तट के पहाड़ों पर भाग गयी थी, दौड़ती हुई नीचे आयी. जहाँ भूचाल की घन-गरज और शोर ने उन्हें आतंकित कर दिया था, वहाँ निपट सन्नाटा था. सागर की लार इन चीज़ों पर चमक रही थी; यह मानी हुई बात थी कि यहाँ नीचे, जहाँ अतीत और वर्तमान की सामग्री ऐसे पड़ी हुई है, बिना किसी कालक्रम के, समय का कोई अस्तित्व नहीं होता, न कभी था, सब एक-सा है, सब कुछ नहीं है - या सब कुछ तत्काल हथियाया जा सकता है.

लोग भागे लेने, लेने, लेने के लिए. यह क़ीमती था - कब, हरदम, कभी-न-कभी; वह उपयोगी हो सकता था, यह क्या था, ख़ैर किसी-न-किसी को पता होगा, यह ज़रुर अमीरों का रहा होगा, अब मेरा है, जो भी वहाँ है अगर तुम उसे झपट न लोगे तो कोई और झपट लेगा, पैर समुद्री सिवार पर फिसले, सरके, और दलदली रेत में धँस गये, हाँफती हुई समुद्री वनस्पति उनके सामने मुंह बाये थी, किसी ने ज़िक्र नहीं किया कि मछलियाँ थीं ही नहीं, इस अ-पृथ्वी के जीवित निवासी पानी के साथ बहा ले जाये गये थे. राजनैतिक उथल-पुथल के दौरान दुकानों को लूटने का जो मामूली-सा मौक़ा लोगों के ढर्रे में शामिल था, उसकी तुलना इससे नहीं की जा सकती थी. आदमियों, औरतों और उनके बच्चों को उन्मत्त उत्साह ने लेस-भरे कीचड़ और रेत से वह सब खींच निकालने की ताक़त दे दी थी जो वे नहीं जानते थे कि उन्हें चाहिए था, यहाँ से वहाँ निरखने-परखने के दौरान उसने उसकी लड़खड़ाती चाल को तेज़ कर दिया था, और यह संयोग से लाभ उठाने से कहीं ज़्यादा था, यह कुदरत की उस ताक़त को लूटने की तरह था जिसके आगे वे असहाय भाग खड़े हुए थे. लो, उठा लो; झपटते हुए वे अपने ध्वस्त मकानों और वहाँ रखे अर्सा पुराने साज-सामान के नुक़सान को भूलने में सफल हो गये. उन्होंने एक-दूसरे को चीख़-चिल्ला कर पुकारते हुए ख़ामोशी को तार-तार कर दिया था और अनुपस्थित सागर-पाखियों की पुकारों जैसी इन पुकारों में उन्होंने तेज़ हवा की तरह बढ़ते शोर का दूर से आना नहीं सुना. और फिर सागर ने आ कर उन्हें अपने ख़ज़ाने में शामिल करने के लिए घेर लिया.

यही है जिसकी जानकारी है; टेलिविजन समाचारों में जिनके पास दरअसल गहराइयों की जस्ते जैसी चमड़ी के सिवा दिखाने को और कुछ नहीं था - उन थोड़े-से भीरु, दुर्बल या होशियार लोगों से रेडियो पर की गयी भेंट-वार्ताओं में जो पहाड़ों से नीचे नहीं आये थे, और उन लाशों के बारे में समाचार-पत्रों की टिप्पणियों में, जिन्हें किसी कारण से समुद्र ने ठुकरा दिया था, तट पर कहीं आगे लहरों के साथ ला कर पटक दिया था.

लेकिन लेखक को कुछ ऐसा मालूम है, जिसका पता किसी को नहीं है; कल्पना का रुपान्तरण.

अब सुनिए, एक आदमी है जो एक ख़ास चीज़ (क्या) के लिए सारी ज़िन्दगी ललकता रहा है. उस के पास ढेर सारी-चीज़ें-हैं, जिनमें से कुछ पर उसकी निगाह अक्सर पड़ती रहती है, लिहाज़ा उसे पसन्द होंगी, कुछ पर उसका ध्यान नहीं जाता, जान-बूझ कर, जिन्हें शायद उसे हासिल नहीं करना चाहिए था, लेकिन जिन्हें वह फेंक नहीं पाता, एक नयी चाल का लैम्प है जिसकी रोशनी में वह पढ़ता है, और उसके पलँग के सिरहाने के ऊपर, दीवार पर, एक जापानी छापा है, एक होकूसाई, ‘महा तरंग,’ वह दरअसल पूर्वी माल का संग्रह नहीं करता, हालाँकि अगर वह सामने की दीवार पर होता तो शायद वह कमरे के साज-सामान का हिस्सा होने से अधिक होता, वह बरसों से वह उसके सिर के पीछे ओझल रहा है. ये सारी-चीज़ें-मगर वह एक नहीं.
वह अवकाश-प्राप्त आदमी है, अर्से से तलाक़-शुदा, जिसने उस जगह के तौर पर समुद्र-तट के पहाड़ों में एक पुरानी, लेकिन सुसज्जित कोठी चुनी जहाँ से वह शहर के हमले की तरफ़ पीठ फेर सके. गाँव से एक औरत आ कर खाना पकाती और साफ़-सफ़ाई करती है और किसी और बातचीत से तंग नहीं करती. ज़िन्दगी किसी वरदान की तरह उत्तेजना से रहित है, वह उस तरह की हलचल, सुखद हो या नहीं, से अघा चुका है, लेकिन उसके निरीक्षण स्थल से वह दृश्य, जो कभी घटित नहीं हो सकता था, यहाँ तक कि कभी सोचा भी नहीं जा सकता था, हुक्म-सरीखा है. वह उनमें है जो दौड़ते हुए चमकते समुद्र-तल की तरफ़ जा रहे हैं, उघाड़ कर नंगे कर दिये अतीत की तरफ़, मलबा-ख़ज़ाना, एक ही चीज़ है.

दूसरे लुटेरों की तरह, जिनमें वह घुलता-मिलता नहीं, जिनसे उसका कोई साम्य नहीं है, वह एक चीज़ से दूसरी चीज़ की तरफ़ भागता है, रंगीन चीनी मिट्टी की चीज़ों के ठीकरे, विनाश, परित्याग और ज़ंग से गढ़े गये मूर्ति-शिल्प, खारे पानी से पुराने बने मदिरा के पीपे, डूबी हुई रेसिंग मोटर-साइकिल, दन्दानसाज़ की कुर्सी उलटता-पलटता; उसके क़दम इन्सानी पसलियों और पैरों की हड्डियों को कचरते हुए जिन्हें वह पहचान नहीं पाता. लेकिन दूसरों के विपरीत वह कुछ नहीं लेता - जब तक कि : वहाँ, समुद्री सिवार की नारंगी-भूरी अलकों से अलंकृत, सीपियों और लाल प्रवाल के दँतीले किनारों में मज़बूती से जकड़ी वह चीज़ है. (एक आईना?) मानो असम्भव सच हो गया है; वह जानता था वह कहाँ थी, सागर के नीचे, इसीलिए उसे मालूम नहीं था कि वह क्या थी, पहले कभी खोज नहीं पाया था. वह सिर्फ़ उसी चीज़ से उजागर हो सकती थी जो पहले कभी नहीं हुई थी, रिक्टर स्केल पर दर्ज किये गये हमारी पृथ्वी के सबसे ज़बर्दस्त आवेग से.

वह उठा लेता है, उस चीज़ को, उस आईने को, रेत उससे सरक जाती है, पानी जो उस आईने के पास बची अन्तिम चमकदार निगाह है, उससे बह जाता है, वह उसे अपने साथ ले जा रहा है, आख़िरकार उस पर क़ब्ज़ा करता हुआ.

और उसके पलँग के सिरहाने से वह विशाल तरंग आती है और उसे ले जाती है.

पिछले निज़ाम के हलकों में जाना-माना उसका नाम बचने वालों में नहीं है. ताज़ा शिकारों के कंकालों के बीच उसके साथ, पुराने समुद्री-डाकुओं और मछुआरों समेत, वे भी हैं जो तानाशाही के दौर में हवाई जहाज़ों से नीचे फेंके गये थे ताकि सागर की साँठ-गाँठ से वे कभी खोजे नहीं जायेंगे. उस रोज़ किसने उन्हें पहचाना, जहाँ वे पड़े हैं?

कोई लाल फूल या गुलाबों की तैरती हुई माला नहीं.
पूरे बीस हाथ नीचे.

अनुवाद : नीलाभ



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नाडीन गौर्डिमर
20 नवम्बर 1923, दक्षिण अफ्रीका

लेखिका और राजनीतिक कार्यकर्ता
नस्लवाद, रंगभेद, निरंकुश शासन तंत्र के विरोध में अपने महाकाव्यात्मक लेखन के कारण जानी जाती हैं.
बुकर और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित




nadine gordimer :

उपन्यास-
The Lying Days (1953)
A World of Strangers (1958)
Occasion for Loving (1963)
The Late Bourgeois World (1966)
A Guest of Honour (1970)
The Conservationist (1974) - Joint winner of the Booker prize in 1974
Burger's Daughter (1979)
July's People (1981)
A Sport of Nature (1987)
My Son's Story (1990)
None to Accompany Me (1994)
The House Gun (1998)
The Pickup (2001)
Get a Life (2005)
कहानी संग्रह-
Face to Face (1949)
Town and Country Lovers
The Soft Voice of the Serpent (1952)
Six Feet of the Country (1956)
Friday's Footprint (1960)
Not for Publication (1965)
Livingstone's Companions (1970)
Selected Stories (1975)
No Place Like: Selected Stories (1978)
A Soldier's Embrace (1980)
Something Out There (1984)
Correspondence Course and other Stories (1984)
The Moment Before the Gun Went Off (1988)
Once Upon a Time (1989)
Jump: And Other Stories (1991)
Why Haven't You Written: Selected Stories 1950-1972 (1992)
Something for the Time Being 1950-1972 (1992)
Loot: And Other Stories (2003)
Beethoven Was One-Sixteenth Black (2007)

निबन्ध संग्रह –
The Essential Gesture: Writing, Politics and Places (1988)
The Black Interpreters (1973)
Writing and Being: The Charles Eliot Norton Lectures (1995)
नाटक –
The First Circle (1949) pub. in Six One-Act Plays
सम्मान-
W. H. Smith Commonwealth Literary Award (England) (1961)
James Tait Black Memorial Prize (Scotland) (1972)
Booker Prize for The Conservationist (1974)
CNA Prize (Central News Agency Literary Award), South Africa (1974, 1975, 1980, 1991)
Grand Aigle d'Or (France) (1975)
Orange Prize shortlisting; she rejected
Scottish Arts Council Neil M. Gunn Fellowship (1981)
Modern Language Association Award (United States) (1982)
Bennett Award (United States) (1987)
Premio Malaparte (Italy) (1985)
Nelly Sachs Prize (Germany) (1986)
Anisfield-Wolf Book Award (1988, A Sport of Nature)
Nobel Prize for Literature (1991)
Laureate of the International Botev Prize (1996)
Commonwealth Writers' Prize for the Best Book from Africa (2002; for The Pickup)
Booker Prize longlist (2001; for The Pickup)
Legion of Honour (France) (2007)[35]
Hon. Member, American Academy of Arts and Sciences
Hon. Member, American Academy and Institute of Arts and Letters
Fellow, Royal Society of Literature (Britain)
Patron, Congress of South African Writers
Commandeur de l'Ordre des Arts et des Lettres (France)


नीलाभ
(१६-८-१९४५), मुंबई
एम. ए. इलाहबाद से, 1980 में चार वर्ष बी.बी.सी. की विदेश प्रसारण सेवा में प्रोड्यूसर
काव्य
संस्मरणारम्भ, अपने आप से लम्बी बातचीत, जंगल खामोश है, उत्तराधिकार, चीजें उपस्थित हैं, शब्दों से नाता अटूट है,शोक का सुख, खतरा अगले मोड़ की उस तरफ है और ईश्वर को मोक्ष
गद्य
प्रतिमानों की पुरोहिती और पूरा घर है कविता
शेक्सपियर, ब्रेष्ट तथा लोर्का के नाटकों के रूपान्तर इनके अलावा,मृच्छकटिक’ का रूपान्तर सत्ता का खेल के नाम से.
जीवनानन्द दास, सुकान्त, भट्टाचार्य, एजरा पाउण्ड, ब्रेष्ट, ताद्युश रोजश्विच, नाजिम हिकमत, अरनेस्तो कादेनाल, निकानोर पार्रा और पाब्लो नेरूदा की कविताओं के अलावा अरुन्धती राय के उपन्यास के गॉड आफ स्माल थिंग्स और लेर्मोन्तोव के उपन्यास हमारे युग का एक नायक का अनुवाद

रंगमंच के अलावा टेलीविजन, रेडियो, पत्रकारिता, फि्ल्म, ध्वनि-प्रकाश कार्यक्रमों तथा नृत्य-नाटिकाओं के लिए पटकथाएँ और आलेख
फि्ल्म, चित्रकला, जैज तथा भारतीय संगीत में ख़ास दिलचस्पी
ई-पता : neelabh1945@gmail.com

Sunday, January 2, 2011

देशान्तर



आज के कवि : अरनेस्तो कार्देनाल

कुछ उक्तियां

हमारी कविताएं अभी प्रकाशित नहीं हो सकतीं.

हमारी कविताएं अभी प्रकाशित नहीं हो सकतीं.
वे हाथ-दर-हाथ बढ़ायी जाती हैं, लिख कर
या साइक्लोस्टाइल हो कर. लेकिन एक दिन आयेगा, बहरहाल,
जब उस तानाशाह का नाम जिस पर वे चोट करती हैं
भुला दिया जायेगा,
और वे उसके बाद भी पढ़ी जाती रहेंगी.


क्या तुमने पढ़ा नहीं है

क्या तुमने पढ़ा नहीं है नोवेदादेज़ में :

शान्ति का पहरुआ, मज़दूरों का मसीहा
अमरीकी लोकतन्त्र का अलमबरदार
अमरीकी कैथोलिकवाद का रक्षक
जनता का मुहाफ़िज़
दयानिधान ?

वे जनता की भाषा को तहस-नहस करते हैं,
अवमूल्यन करते हैं जनता के शब्दों का.
(ठीक जनता की मुद्रा सरीखा.)
इसीलिए हम कवि प्रकाशित करते हैं कविताएं बड़ी सावधानी से.
इसीलिए मेरी प्रेम-कविताएं महत्वपूर्ण हैं.

सोमोज़ा
सोमोज़ा स्टेडियम में
सोमोज़ा की प्रतिमा का अनावरण करता है

ऐसा नहीं है कि मैं यक़ीन करता हूं कि लोगों ने
यह प्रतिमा मेरे सम्मान में बनायी है,
तुम्हारी तरह
मुझे भी मालूम है कि मैंने इसे बनाने का आदेश दिया .
न मैं इससे अमरता की उम्मीद करता हूं :
मैं जानता हूं कि लोग एक दिन इसे नष्ट कर देंगे.
न मैंने जीते-जी अपना वह स्मारक बनाने की कोशिश की
जो तुम मेरे मरने के बाद नहीं बनाओगे :
बल्कि मैंने इसे बनवाया यह जानते हुए कि तुम इससे नफ़रत करते हो.

जब तुम मेरे साथ रहो

जब तुम मेरे साथ रहो, क्लौडिया, तो ध्यान रखो
तुम कैसे व्यवहार करती हो :
तुम्हारी हल्की-सी हरकत, शब्द या सांस--
हां, क्लौडिया की छोटी-सी भूल--
हो सकता है
एक दिन ज्ञानी लोगों की नुक़्ताचीनी का
निशाना बने,
और यह नृत्य, क्लौडिया,
सदियों तक याद किया जाता रहे.
क्लौडिया : तुम्हें होशियार कर दिया गया है!

प्रोपर्टियस की नक़ल में

मैं स्टालिनग्राड कई रक्षा के गीत नहीं गाता
न रेगिस्तान में लड़े गये युद्ध के
न सिसली में फ़ौजों के जा उतरने के
न आइज़नहावर द्वारा राइन नदी को पार करने के ही.

मैं गीत गाता हूं एक लड़की को जीत लेने के.

जोयेरिया मोरलौक के क़ीमती नगीनों से नहीं
न ड्रेफ़स के इत्रों से
न प्लास्टिक के ख़ोल में रखे गुलाबों से ही
न कैडिलैक मोटरकार से
बल्कि महज़ अपनी कविताओं से जीत लिया मैंने उसे.

और वह मुझ ग़रीब को चाहती है
सोमोज़ा के लाखों की बनिस्बत

कुछ गोलियां कल रात

कुछ गोलियां सुनायी दीं कल रात.
क़ब्रिस्तान की तरफ़.
कोई नहीं जानता किन्हें मारा उन्होंने--
या कितने मारे गये.
कोई कुछ नहीं जानता.
कुछ गोलियां सुनायी दीं कल रात.
बस इतना ही.

गाड़ीवान गाते हैं

कोस्टा रीका में गाड़ीवान गाते हैं.
रास्तों पर मैंडोलिन लिये आदमी.
और तोतों की तरह चमकती बैल-गाड़ियां.
और रंगीन फ़ीतों, घण्टियों और सींगों में फूलों से सजे बैल.

कोस्टा रीका में कॉफ़ी की फ़सल के समय.
जब सारी गाड़ियां कॉफ़ी की फलियों से लदी होती हैं.

और गांवों के चौक में बैण्ड-बाजे बजते हैं.
और सान होज़े के छज्जे और झरोखे
लड़कियों और फूलों से भरे होते हैं.
और लड़कियां बाग़ों में सैर के लिए जाती हैं.
और सान होज़े में राष्ट्रपति भी पैदल निकल सकता है.

अदोल्फ़ो बाएज़ बोने के लिए
समाधि-लेख

उन्होंने तुम्हें मार दिया. कभी नहीं बताया
तुम्हें कहां दफ़्न किया उन्होंने.
तब से ख़ुद हमारा देश तुम्हारी क़ब्र है. या, कहा जाये,
जहां भी तुम्हें दफ़्न नहीं किया गया,
तुम फिर से उठ खड़े होते हो.

उनकी ख़याल था उन्होंने तुम्हें "फ़ायर" के आदेश पर मार दिया था!
उनका ख़याल था कि उन्होंने तुम्हें दफ़्न कर दिया था. जबकि :
जो उन्होंने दफ़्नाया था वह दरअसल एक बीज था.



मैरिलिन मनरो के लिए प्रार्थना

प्रभु इस कन्या को शरण दो
जिसे पूरी दुनिया मैरिलिन मनरो के नाम से जानती है
हालाँकि यह इसका नाम नहीं था
(पर तुम तो इसका असली नाम जानते हो,
इस अनाथ लड़की का नाम
जिसके साथ नौ साल की उम्र में बलात्कार किया गया,
जो सोलह की थे और सेल्स-गर्ल थी एक दुकान में
जब इसने आत्म हत्या करने की कोशिश की)
जो अब तुम्हारे सम्मुख जा रही है मेकप के बिना
बिना अपने प्रेस-एजेंट के
न अपने चित्रों के साथ
न अपने चाहने वालों को हस्ताक्षर बाँटती दाँये-बाँयें
बिल्कुल अकेली
जैसे सुदूर अनन्त के अँधियारे का रुख़ करता अन्तरिक्ष-यात्री
जब यह लड़की थी, इसने सपना देखा था कि
यह नंगी खड़ी है गिरजे में
(‘टाइम’ मैगज़ीन के मुताबिक़)
और इसके सामने बिछी हुई है अपार भीड़
सिर धरती पर नवाये,
जो इसे पंजों के बल बढ़ना है उन तमाम सिरों को बचाते हुए
तुम हमारे सपनों को
किसी भी मनोचिकित्सक से बेहतर जानते हो, प्रभु
गिरजा, घर या गुफा --
ये सब गर्भ की निरापद सुरक्षा के प्रतीक हैं
मगर इससे भी कुछ ज़्यादा ...
झुके हुए सिर तो प्रशंसक हैं, इतना तो साफ़ है
(स्क्रीन पर केन्द्रित रोशनी के शहतीर के नीचे
हाल के अँधेरे में दर्शकों के सिरों का हुजूम)
लेकिन वह मन्दिर ट्वेंटिएथ सेंचुरी फ़ाक्स का स्टूडियो नहीं
वह मन्दिर -- संगमरमर और सोने से बना मन्दिर --
उसकी देह का है
जिसमें आदमी का बेटा हाथ में कोड़ा लिये खड़ा है
ट्वेंटिएथ सेंचुरी फ़ाक्स के सूदख़ोरों को खदेड़ता हुआ
जिन्होंने तुम्हारे उपासना-गृह को चोरों का अड्डा बना दिया था।
प्रभु, इस दुनिया में
जो रेडियो--धर्मिता और पाप,
दोनों से समान रूप में दूषित है
निश्चय ही तुम इस सेल्स-गर्ल को दोषी नहीं ठहराओगे
जो (आम बिक्री-सहायिकाओं की तरह)
फ़िल्मी सितारा बनने का सपना लेती थी।
और इसका सपना ‘सच्चाई’ बन गया (टेक्निकलर सच्चाई)
इसने बस यही किया है कि हमारी दी हुई पटकथा पर चलती रही
जो दरअसल हमारी अपनी ज़िन्दगियों की थी, लेकिन अर्थहीन थी,
इसे क्षमा करो प्रभु, और साथ-साथ हमें भी,
हमारी इस बीसवीं सदी के लिए,
और इस विराट सुपर-प्रोडक्शन के लिए
जिसके निर्माण में हम सब ने योग दिया।
यह प्यार की भूखी थी और हमने इसे
नसों को शान्त करने वाली दवाइयाँ पेश कीं।
हम सन्त नहीं हैं -- इस ज्ञान से उपजी उदासी के लिए
उन्होंने इसे मनोचिकित्सा का सुझाव दिया।
याद करो, प्रभु, कैमरे के प्रति इसका बढ़ता हुआ आतंक
और मेकप के प्रति इसकी नफ़रत (फिर भी हर दृश्य के लिए
नये सिरे से मेकप करवाने पर इसका आग्रह।)
और किस तरह यह आतंक बढ़ता गया
और किस तरह बढ़ता गया स्टूडियो पहुँचने में इसका विलम्ब।
दुकान में काम करने वाली आम सेल्स-गर्ल की तरह
यह फ़िल्मी सितारा बनने का सपना देखती थी
और इसकी ज़िन्दगी उस सपने जितनी ही अवास्तविक थी
जिसे मनोचिकित्सक एक नज़र देख कर
फ़ाइल-बन्द कर देता है।
इसके प्रेम-सम्बन्ध आँखें मूँद कर दिये गये चुम्बन थे
जो आँखें खुलने पर
फ़िल्मी बत्तियों के नीचे खेले गये नाटक सरीखे जान पड़ते हैं।
लेकिन बत्तियाँ तो बुझ चुकी हैं
और कमरे की दो दीवारें (वह एक सेट था)
हटायी जा रही हैं
और इस बीच निर्देशक हाथ में नोट-बुक लिये
दृश्य को सही--सलामत फ़िल्माने के बाद
जा रहा है किसी दूसरी तरफ़।
या फिर इसके प्रेम-सम्बन्ध नौका-विहार जैसे थे,
एक चुम्बन सिंगापुर में,
एक नाच रियो में, एक जश्न विंडसर के
राजा--रानी के प्रासाद में --
जो देखा जा रहा हो किसी सस्ते-से फ़्लैट की मनहूस तड़क-भड़क में।
आख़िरी चुम्बन से पहले ही ख़त्म हो गयी फ़िल्म।
उन्होंने इसे बिस्तर पर मृत पाया फ़ोन पर हाथ रखे।
और जासूसों की रत्ती-भर इमकान नहीं था
कि यह किसे फ़ोन करने को थी।
मानो किसी ने एकमात्र मित्रता-भरी आवाज़ को फ़ोन मिलाया था
और सुनी थी उत्तर में
पहले से टेप की गयी एक आवाज़ -- ‘ग़लत नम्बर,’
या जैसे गुण्डों के हाथों घायल हो कर कोई व्यक्ति
बढ़ाता हो हाथ उस फ़ोन की तरफ़
जिसकी तार पहले की काट दी गयी हो।
प्रभु, जो भी वह रहा हो
जिसे यह फ़ोन करने जा रही थी
मगर कर नहीं पायी (शायद कोई था भी नहीं
या शायद कोई ऐसा नाम
जो लास ऐंजिलीज़ की फ़ोन-निर्देशिका में नहीं है)
प्रभु, तुम दे दो इस फ़ोन का जवाब।

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एर्नेस्टो कार्डिनाल मार्टीनेज़ (20 जनवरी 1925) लातीनी अमरीका के जाने-माने क्रान्तिकारी कवियों में शुमार किये जाते हैं. मानागुआ, मेक्सिको और न्यू यार्क में शिक्षा पाने के बाद वे निकारागुआ लौटे और उन्होंने 1954 में अनास्तासियो सोमोज़ा गार्सिया के ख़िलाफ़ "अप्रैल क्रान्ति" में हिस्सा लिया. क्रान्ति के विफल होने और बहुत-से साथियों के मारे जाने के बाद कार्डिनाल अमरीका जा कर कवि-पादरी टौमस मर्टन के मार्ग दर्शन में खुद भी पादरी बन गये और 1965 में उन्हें विधिवत पादरी बना कर निकारागुआ भेज दिया गया जहां उन्होंने सोलेन्तिनामे द्वीप समूह में लगभग एक मठ सरीखी बस्ती वहां के आदिवासियों और किसानों के बीच बनायी. बाद मे उन्होंने वहीं एक आदिवासी सांस्कृतिक समुदाय भी गठित किया. लेकिन सोलेन्तिनामे के बहुत-से किसान अनास्तासियो सोमोज़ा देबएल की तानाशाही के ख़िलाफ़ मार्क्सवादी हथियारबन्द सान्दीनीस्ता राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चे के सदस्य थे और 1977 में एक समय ऐसा भी आया जब तानाशाह सोमोज़ा के नैशनल गार्ड ने सोलेन्तिनामे की बस्ती को जला कर ख़ाक कर दिया और कार्देनाल को भाग कर कोस्ता रीका में पनाह लेनी पड़ी. इस बीच वैटिकन में बैठे ईसाई महन्त और पोप यह नहीं समझ पा रहे थे कि अगर सचमुच अर्नेस्तो कार्देनाल अपना धर्म निभायें तो लामुहाला उन्हें तानाशाह सोमोज़ा और उसके अमरीकी धनाधीशों का विरोध करना ही पड़ेगा जो आम ईसाई जनता के हर अधिकार को कुचलने पर आमादा थे. नौबत यहां तक आयी कि कैथोलिक चर्च नें कार्देनाल को पादरी पद से बहिष्कृत कर दिया. यों भी कार्देनाल ने अपने मार्क्सवादी रुझान को कभी गुप्त नहीं रखा था.सोमोज़ा के पतन और सान्दीनीस्ता दल के सत्ता संभालने के बाद वे 1979 से 1987 तक निकारागुआ के पहले संस्कृति मन्त्री भी रहे. हालांकि दानियल ओर्तेगा के नेतृत्व संभालने पर कार्देनाल 1994 में सान्दीनीस्ता राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चे से अलग हो गये लेकिन उन्होंने अपनी मार्क्सवादी प्रतिबद्धता बरक़रार रखी है.

Saturday, January 1, 2011

देशान्तर



आज के कवि : चे गुएवारा


फ़िदेल के लिए एक गीत

आओ चलें,
भोर के उमंग-भरे द्रष्टा,
बेतार से जुड़े उन अमानचित्रित रास्तों पर
उस हरे घड़ियाल को आज़ाद कराने
जिसे तुम इतना प्यार करते हो।

आओ चलें,
अपने माथों से
--जिन पर छिटके हैं दुर्दम बाग़ी नक्षत्र--
अपमानों को तहस--नहस करते हुए।

वचन देते हैं
हम विजयी होंगे या मौत का सामना करेंगे।
जब पहले ही धमाके की गूंज से
जाग उठेगा सारा जंगल
एक क्वाँरे, दहशत-भरे, विस्मय में
तब हम होंगे वहाँ,
सौम्य अविचलित योद्धाओ,
तुम्हारे बराबर मुस्तैदी से डटे हुए।

जब चारों दिशाओं में फैल जायेगी
तुम्हारी आवाज़ :
कृषि-सुधार, न्याय, रोटी, स्वाधीनता,
तब वहीं होंगे हम, तुम्हारी बग़ल में,
उसी स्वर में बोलते।

और जब दिन ख़त्म होने पर
निरंकुश तानाशाह के विरुद्ध फ़ौजी कार्रवाई
पहुंचेगी अपने अन्तिम छोर तक,
तब वहाँ तुम्हारे साथ-साथ,
आख़िरी भिड़न्त की प्रतीक्षा में
हम होंगे, तैयार।

जिस दिन वह हिंस्र पशु
क्यूबाई जनता के बरछों से आहत हो कर
अपनी ज़ख़्मी पसलियाँ चाट रहा होगा,
हम वहाँ तुम्हारी बग़ल में होंगे,
गर्व-भरे दिलों के साथ।

यह कभी मत सोचना कि
उपहारों से लदे और
शाही शान-शौकत से लैस वे पिस्सू
हमारी एकता और सच्चाई को चूस पायेंगे।
हम उनकी बन्दूकें, उनकी गोलियाँ और
एक चट्टान चाहते हैं। बस,
और कुछ नहीं।

और अगर हमारी राह में बाधक हो ईस्पात
तो हमें क्यूबाई आँसुओं का सिर्फ़ एक
कफ़न चाहिए
जिससे ढँक सकें हम अपनी छापामार हड्डियाँ,
अमरीकी इतिहास के इस मुक़ाम पर।
और कुछ नहीं।