Friday, September 24, 2010

रिसती हुई क्रान्ति

रिसती हुई क्रान्ति

जो चुराता है बत्तख पंचायती ज़मीन से,
क़ानून रियायत नहीं करता उस अभागे कमीन से;
पर छुट्टा छोड़ देता है बड्डे कमीन को,
जो छीनता है बत्तख से पंचायती ज़मीन को.
--अज्ञात, इंग्लैण्ड, १८२१


२ जुलाई २०१० की भोर के समय, सुदूर आदिलाबाद के जंगलों में, आन्ध्र प्रदेश राज्य पुलिस ने चेरुकुरि राजकुमार नाम के एक आदमी के सीने में गोली मार दी जो अपने साथियों के बीच आज़ाद के नाम से जाना जाता था. आज़ाद भारत सरकार द्वारा प्रतिबन्धित भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी) का सदस्य था और उसे उसकी पार्टी ने भारत सरकार के साथ प्रस्तावित शान्ति-वार्ताओं में अपने प्रमुख वार्ताकार की भूमिका निभाने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी. पुलिस ने बिलकुल क़रीब से गोली दाग़ कर इसकी चुग़ली खाने वाले जलने के निशान क्यों छोड़े, जबकि वह बहुत आसानी से अपने किये की लीपा-पोती कर सकती थी ? क्या यह एक भूल थी या एक सन्देश ?

पुलिस ने उस सुबह एक और आदमी को भी मारा -- हेमचन्द्र पाण्डेय -- एक युवा पत्रकार जो आज़ाद के साथ यात्रा कर रहा था जब आज़ाद को गिरफ़्तार किया गया. पुलिस ने उसे क्यों मारा ? क्या इस बात को पक्का करने के लिए कि क़िस्से को बयान करने के लिए कोई गवाह ज़िन्दा न बचे ? या यह महज़ पुलिस की सनक थी ?

किसी युद्ध के दौरान अगर शान्ति-वार्ताओं के आरम्भिक चरण में एक पक्ष दूसरे पक्ष के दूत को मार देता है तो यह मानना तर्कसंगत है कि जिस पक्ष ने हत्या की है वह शान्ति नहीं चाहता. बहुत हद तक यह लगता है किम आज़ाद की हत्या इसलिए की गयी क्योंकि किसी ने फ़ैसला किया कि दांव इतने बड़े थे कि उसे ज़िन्दा नहीं रहने दिया जा सकता था. यह फ़ैसला स्थितियों के मूल्यांकन में एक गम्भीर भूल साबित हो सकता है. न सिर्फ़ इसलिए कि आज़ाद कौन था, बल्कि आज हिन्दुस्तान की जो राजनैतिक फ़िज़ा है उसकी वजह से भी.


कामरेडों से विदा लेने और दण्डकारण्य के जंगल से बाहर आने के कई दिन बाद मैंने ख़ुद को नयी दिल्ली के संसद मार्ग पर जन्तर मन्तर की तरफ़ एक थकाऊ और चिर-परिचित रास्ते को तय करते हुए पाया. जन्तर मन्तर एक पुरानी वेधशाला है जिसे जयपुर के महराजा सवाई जय सिंह ने १७१० में बनवाया था. उस ज़माने में यह विज्ञान का एक करिश्मा था जो समय बताने, मौसम की अग्रिम जानकारी देने और ग्रह-नक्षत्रों की गति और स्थिति का पता लगाने के काम आता था. आज यह एक औसत पर्यटकीय आकर्षण है जिसका दूसरा मक़सद है दिल्ली मे लोकतन्त्र के छोटे-से शो-रूम की भूमिका अदा करना.

इधर कुछ बरसों से विरोध-प्रदर्शनों पर -- अगर वे राजनैतिक दलों या धार्मिक संगठनों की सरपरस्ती में न हो रहे हों तो -- दिल्ली में पाबन्दी लगा दी गयी है. राजपथ पर बोट क्लब, जो गुज़रे हुए दिनों में कई-कई रोज़ तक चलने वाली विशाल, ऐतिहासिक रैलियों का साक्षी रहा है, अब राजनैतिक गतिविधि के लिए निषिद्ध क्षेत्र है और सिर्फ़ सैर-तफ़रीह, ग़ुब्बारे बेचने वालों और नौका विहारियों के लिए उपलब्ध है. रहा इण्डिया गेट तो वहां मोमबत्ती जुलूसों और मध्यमवर्गीय उद्देश्यों से किये गये नुमायशी विरोध-प्रदर्शनों की इजाज़त है -- मिसाल के लिए "जस्टिस फ़ौर जेसिका" (जेसिका के लिए इन्साफ़) जो उस मौडल के लिए किया गया जिसकी हत्या दिल्ली के एक शराबख़ाने में राजनैतिक सम्पर्क-सूत्रों वाले एक ठग ने कर दी थी -- मगर इससे ज़्यादा और कुछ नहीं. शहर पर धारा १४४ लगा दी गयी है, वह पुराने उन्नीसवीं सदी के क़ानून की धारा सार्वजनिक स्थल पर पांच से ज़्यादा लोगों के इकट्ठे होने पर पाबन्दी लगाती है जिनका "कोई समान उद्देश्य हो जो ग़ैर-क़ानूनी हो." यह क़ानून अंग्रेज़ों ने १८५७ के विद्रोह के दोहराये जाने को रोकने के इरादे से १८६१ में पारित किया था. उसे आपातकालीन क़दम के तौर पर लागू किया जाना था, पर अब यह हिन्दुस्तान के कई हिस्सों में स्थाई रूप से लागू कर दिया गया है.शायद ऐसे ही क़ानूनों के लिए अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए हमारे प्रधान मन्त्री ने औक्सफ़ोर्ड से मानद उपाधि ग्रहण करते हुए अंग्रेज़ों का शुक्रिया अदा किया कि उन्होंने हमारे लिए इतनी समृद्ध विरासत छोड़ी : "हमारी न्यायपालिका, हमारी क़ानून व्यवस्था, हमारी नौकरशाही और हमारी पुलिस -- सभी महान संस्थाएं हैं जो हमें बर्तानवी-हिन्दुस्तानी प्रशासन से प्राप्त हुई हैं और वे हमारे अच्छे काम आयी हैं."

.............जारी...........अगले अंक में देखें -- कल

Tuesday, September 14, 2010

क्रांति और भ्रान्ति -- सितम के जहान और भी हैं...

क्रांति और भ्रान्ति -- सितम के जहान और भी हैं...

मृणाल वल्लरी के सात साल पहले लिखे गये लेख को माओवादियों के खिलाफ़ उनके भ्रान्त धारणाओं से भरे लेख को छापने, माफ़ कीजिए ब्लौग पर प्रसारित करने, के बाद एक भावुकता भरी टिप्पणी के साथ पेश करने का क्या उद्देश्य है, यह समझ में नहीं आया सिवा इसके कि उन्हें और मोहल्ला ब्लौग को अपने रुझान का औचित्य ठहराने की ज़रूरत महसूस हुई होगी, विश्वस्नीयता को भी साबित करने की. वजह यह कि ब्लौग पर प्रसारित सामग्री को पढ़ने और उस पर त्वरित टिप्पणी करने वाले अधिकांश लोग स्वभावत: भावुक होते हैं और अर्चना पर लिखी मृणाल वल्लरी की टिप्पणी के एकांगी दृष्टिकोण से बहुत जल्दी प्रभावित भी हो जाते हैं. इस सिलसिले में दो तीन बातें कहनी हैं.

पहली यह कि यह मान कर भी कि हमारे समाज में पुरुष अब भी स्त्रियों पर ज़ोर-ज़ुल्म करते हैं, इस समस्या को एक "केस स्टडी" बना कर सिर्फ़ पुरुषों को अपार भोलेपन और नक़ली सात्विक आक्रोश से "दोग़ले" कहना एक सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्या को नितान्त व्यक्तिवादी ढंग से देखना है, साथ ही पुरुषों को एक ऐसी गाली देना है जो नि:सृत ही पुरुष-प्रधान मानसिकता से हुई है. मृणाल जी युवा जुझारू पत्रकार हैं, गांव से भी उनका जुड़ाव बरक़रार है, ज़रा भागलपुर में ही "दोग़ला" का अर्थ दरयाफ़्त करें. मूल अर्थ है -- फ़ारसी पुल्लिंग : अवैध, वर्णसंकर, बदनस्ल. और देसी लोगों से पूछने पर उन्हें पता चलेगा कि इसी को उनके गांववाले "हरामी, नाजायज़, जारज, पापज, ग़ैरक़ानूनी," वग़ैरा कहते हैं जो न केवल इस गाली को स्त्री-विरोधी बना देता है, बल्कि वर्णवादी, जातिवादी और नस्लवादी भी. ब्लौग के पाठक चूंकि इस जानकारी से अपरिचित हैं इसलिए उन्हें मृणाल का सतही आक्रोश इस गाली से मण्डित हो कर और भी मनमोहक लगता है वैसे ही जैसे किसी औरत का मां और बहन की गाली देना कि भई वाह, क्या मर्दानगी दिखायी है. यों हमारे समाज में कौन है जो दोग़ला नहीं है ? शुद्ध रक्त का दावा कौन कर सकता है ? इसी से दूसरी बात निकलती है.

दूसरी बात यह है कि हमारा समाज पिछले चार पांच हज़ार वर्षों के अर्स में इतनी पुरपेच गलियों से हो कर आया है कि स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की जटिलताएं कई तरह के परस्पर विरोधी विचार-आचार सरणियों, संस्कारों और दबावों का शिकार हो गयी हैं और स्त्रियों को उनकी वाजिब जगह हासिल कराने के लिए -- चाहे वह सामाजिक धरातल पर हो या स्त्री-पुरुष के नितान्त निजी दायरे में ( मृणाल जी और उनके प्रशंसक ग़ौर करेंगे कि मैं जान बूझ कर "वैवाहिक दायरे" जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर रहा) -- एक लम्बी लड़ाई लड़नी है, लड़ी भी जा रही है और इसमें सिर्फ़ स्त्रियां ही नहीं, मर्द भी शरीक हैं और होंगे. वर्ना क्या मृणाल जी बता पायेंगी कि पुरुष तो स्त्रियों पर अत्याचार करते ही हैं, औरतें क्यों औरतों पर ज़ुल्म ढाती हैं ? परम्परागत सास-बहू, ननद-भौजाई और देवरानी-जेठानी की दुश्मनी के अलावा कई बार सहोदरा बहनों में भी कैसी कट्टम-जुज्झ मचती है उससे क्या मृणाल जी नावाक़िफ़ हैं. पर अपने ऐंचेपन की वजह से वे इस सब को नज़रन्दाज़ कर गयी हैं, क्योंकि जैसा कि मैं ने उनके पिछले लेख के सिलसिले में भी कहा था, वे आज की सनसनीख़ेज़, भावुकता भरी पत्रकारिता की प्रतिनिधि हैं, परिवर्तनकामी पत्रकारिता करने का दम भरना तो एक छलावा है जो आज के मीडिया मालिकों को बहुत पसन्द आता है.

तीसरी बात भी हमारे समाज में विवाह की संस्था से सम्बन्धित है. विवाह की प्रथा का आरम्भ मातृसत्ता की पराजय के बाद और व्यक्तिगत सम्पत्ति के उदय के बाद ही हुआ था. अगर मृणाल जी को मार्क्स-एंगेल्स-माओ से बहुत एलर्जी है तो अपने ही वेद-पुराणों में श्वेतकेतु की कथा पढ़ने की ज़हमत उठाएं. शुरू से आज तक विवाह एक पौरुष प्रधान समाज की अभिव्यक्ति रहा है और समय के साथ वह इतना पेचीदा हो गया है कि विवाह का टूटना या उसमें विकृतियों का पैदा होना केवल एक पक्ष ही की ज़िम्मेदारी नहीं होता. भिन्न-भिन्न मात्राओं में स्त्री-पुरुष और उनके साथ-साथ उनके इर्द-गिर्द का समाज भी ज़िम्मेदार होता है. इसलिए एक तो इस सिलसिले में कोई सरलीकरण करना ग़लत है. अनेक दलित स्त्रियां सवर्ण या या ब्राह्मण स्त्रियां दलित पुरुषों के साथ सुखी वैवाहिक जीवन बिताती रही हैं, बिता रही हैं, यहां तक कि अलग अलग धर्मॊं के दम्पति भी निर्विघ्न जीवन जीते रहे हैं, जी रहे हैं जबकि चारों ओर खुले दिमाग़ से नज़र दौड़ाने पर अनेक सगोत्रीय, सजातीय समान धर्मी विवाह -- बल्कि ९५ प्रतिशत सगोत्रीय, सजातीय समान धर्मी विवाह -- किसी न किसी व्यथा और रुग्णता का शिकार पाये जायेंगे.

दूसरे उनके विचारों से ही उत्तेजित हो कर किन्हीं महाशय ने सन्दर्भ-च्युत ढंग से कवि आलोकधन्वा को और क्रान्ति भट्ट से उनके वैवाहिक सम्बन्धों पर अनाप-शनाप टिप्पणी कर मारी है. दो व्यक्तियों का सम्बन्ध और फिर सम्बन्ध-विच्छेद कोई सार्वजनिक विश्लेषण और निष्कर्ष प्रतिपादन का मामला नहीं होता. चूंकि मैं इस दम्पति विशेष के काफ़ी क़रीब रहा हूं इसलिए मैं अधिकारपूर्वक कह सकता हूं कि आलोकधन्वा और क्रान्ति ( अब असीमा ) भट्ट का अलग होना सिर्फ़ एक पक्ष के चलते नहीं हुआ. यों कोई भी ब्लौग पर कुछ भी कहने के लिए स्वतन्त्र है, चाहे वह दूसरे पर कीचड़ उछालने से ले कर उसका चरित्र हनन करने तक क्यों न चला जाये.

मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि अगर मृणाल की मुहिम से एक भी अर्चना की जान बचती है, और सिर्फ़ जान ही नहीं बचती, बल्कि वह अपने बल पर जीवन जीने में समर्थ भी होती है तो मैं मृणाल के प्रयत्नों का स्वागत करूंगा लेकिन मृणाल केवल पढ़ी-लिखी साधन-सम्पन्न अर्चनाओं पर ही नज़र न टिकाये रखें, न अपने दायरे को वर्ण या धर्म के बन्धनों तक ही सीमित रखें. वे ज़रा वहां भी नज़र दौड़ायें जहां औरतें सत्ता और सत्ता के गुर्गों -- पुलिसवालों, नेताओं आदि का शिकार बनती हैं. जहां दलितों से बदला लेने या उन्हें उनकी औक़ात बताने के लिए उनकी औरतों के साथ बलात्कार किया जाता है. कौन नहीं जानता है कि एक सवर्ण पढ़ी-लिखी लड़्की के पास आत्महत्या के अलावा सौ रास्ते होते हैं जो समाज की दलित ८० फ़ीसदी औरतों को उपलब्ध नहीं होते. उच्छ्वास बहुत अच्छा लगता है, पर कैरियर की सीढ़ियां चढ़ने में सहायक होने के अलावा बहुत दूर नहीं ले जाता. फिर इससे आगे बढ़ कर वे स्त्रियां हैं जो यह जानती हैं कि शोषण पर टिके इस समाज में सिर्फ़ स्त्रियां ही परतन्त्र नहीं हैं बल्कि पुरुष भी उतनी ही मात्रा में परतन्त्र हैं और स्त्रियों की मुक्ति की लड़ाई लामुहाला पुरुषों की मुक्ति की भी लड़ाई है. मृणाल अगर अपने कर्म को वाक़ई सार्थक करना चाहती हैं तो उन्हें यह सत्य समझना चाहिए.

अन्त में यह कि हाल के सर्वेक्षणों ने यह भी बताया है कि जहां स्त्रियों ने आर्थिक वर्चस्व हासिल कर लिया है वहां थोड़ी मगर बढ़ती मात्रा में पुरुष भी यौन अथवा अन्य उत्पीड़नों का शिकार बने हैं, बन रहे हैं. मृणाल चाहें तो किसी भी समाज शास्त्री से पूछ सकती हैं. इसलिए उन्हें चाहिए कि ज़रा गहरे उतरें. फ़िलहाल तो यही लगता है कि -- भले ही सात साल पुराना लेख दोबारा पेश करते हुए उन्होंने यह कहा है कि आज वे इसे दूसरी तरह लिखतीं -- वे इस लेख से बहुत दूर नहीं हटी हैं वरना इसे दोबारा पेश करने के लालच में न पड़तीं.

Tuesday, September 7, 2010

राजकीय हिंसा हिंसा न भवति

जनज्वार ब्लौग पर हाल में बिहार की घटनाओं पर टिप्पणियां और साई बाबा का जवाब और फिर स्वामी अग्निवेश के स्वघोषित शान्ति दूत की भूमिका में उतरने के बारे में लिखी गयी टिप्पणी देखी. इन में कई बातें गड्ड-मड्ड हो गयी हैं. हालांकि इन टिप्पणियों पर एक मुकम्मल, सुविचारित टिप्पणी की अपेक्षा है, मैं इस वक़्त अपने को तैयार नहीं पा रहा हूं, तो भी कुछ विचारणीय बिन्दुओं का ज़िक्र कर रहा हूं.

हां, मुझे भी माओवादियों द्वारा लुकास टेटे की हत्या पर ऐतराज़ है. मेरे खयाल में यह न केवल रणनीति की दृष्टि से भूल है, बल्कि अपहृत व्यक्ति को मार डालना उन तमाम लोगों को अस्वस्ति और असुविधा की स्थिति में ला खड़ा करता है, जो नागरिक और सार्वजनिक मंचों पर माओवादियों की सही मांगों की पुरज़ोर हिमायत करते आये हैं, और वह भी एक ऐसे समय जब माओवादियों के साथ-साथ उन्हें भी लानत-मलामत का निशाना बनाया जा रहा है. दूसरी तरफ़ बिहार, दिल्ली और अन्य प्रान्तों में अनेक ऐसे परिवर्तनकामी साथी जेल में ठूंस दिये गये हैं जिनके नाम कोई नहीं लेता.

सात महीनों से इलाहाबाद की नैनी जेल में "दस्तक" पत्रिका की सम्पादक और उनके पति विश्वविजय रिमांड पर क़ैद चल रहे हैं. इतना ही अर्सा दिल्ली की ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता अनु और उन के पति को तिहार में रिमांड पर क़ैद भुगतते हो गया. क्या किसी ने इनका भी नाम लिया ? या इन्हें छुड़ाने के सिलसिले में कुछ किया ? मैं ने अपनी मित्र अरुन्धती राय और अनेक लोगों को इसकी सूचना दे कर क़दम उठाने की अपील की थी, पर शायद वे छोटे कम नामी लोगों की पक्षधरता में यक़ीन नहीं रखते. आज तक सार्वजनिक रूप से क्या किसी ने "आम लोगों की पार्टी" के आम कार्यकर्ताओं के हक़ में आवाज़ उठाई है ? क्या यह भी उसी प्रक्रिया के तहत हो रहा है जिसके तहत १९४७ से पहले तथाकथित आज़ादी के हिमायतियों ने अनाम लोगों को अक्सर विस्मृति के अंधेरों के हवाले किया था ? दूर नहीं, सफ़दर हाशिमी के साथ जो राम बहादुर नाम का मज़दूर १९८९ में कांग्रेसियों द्वारा मारा गया था, उसका कोई स्मारक बना ? उसे कोई याद भी रखता है ?

तीसरी बात यह कि लुकस टेटे की हत्या पर हाय-तोबा मचाने वालों से, ख़ास तौर पर मीडिया वालों से यह ज़रूर पूछा जाना चाहिए कि झूठी मुठ्भेड़ में आज़ाद और हेमचन्द्र पाण्डे की हत्या पर खामोशी क्यों रही ? सारे सरकारी और निजी मीडिया तन्त्र ने उस पर ऐसा सात्विक रोष क्यों प्रकट नहीं किया ? मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि लुकस टेटे को मार डालना उचित था. पर बात यहीं ख़त्म नहीं की जा सकती. कारण यह कि पिछले साठ बरसों से हमारे हुक्मरानों और उनके तन्त्र की हिंसा का कोई हिसाब-किताब और जवाब-तलबी नहीं की गयी है. मैं जेसिका लाल और नितीश कटारा या शिवानी भटनागर की हत्याओं सरीखे मामलों से आगे बढ़ कर पुलिस हिरासतों और फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मारे गये हज़ारों लोगों का ज़िक्र कर रहा हुं. मैं ज़िक्र कर रहा हूं कश्मीर में बरसों से चल रहे दमन और उत्पीड़न का, मैं ज़िक्र कर रहा हूं छत्तीसगढ़, ऊड़ीसा, झारखण्ड, आन्ध्र, महाराष्ट्र और बंगाल में बेरहमी से मारे गये आदिवासियों और उनकी ओर से आवाज़ उठाने और लड़ने वाले लोगों की गिरफ़्तारियों और हत्याओं की.

क्या लुकस टेटे की नावाजिब हत्या पर शोर मचाने वालों -- सरकारी और विपक्षी नेताओं, चन्दन मित्रा और अर्णब गोस्वामी और बरखा दत्त जैसे पत्रकारों, सभी मीडिया चैनलों, के.पी.एस. गिल जैसे हिंसक पुलिस अफ़सरों और स्वामी अग्निवेश जैसे स्वार्थ साधकों -- ने कभी इतनी ही सात्विक दु:ख और आक्रोश भरे स्वर ऊपर उल्लिखित हिंसा के अनगिनत मामलों में व्यक्त किये हैं ?

निश्चय ही अरुन्धती राय और मेधा पाटकर और गौतम नौलखा को मैं स्वामी अग्निवेश की कोटि में नहीं रखना चाहता, गो उनकी सारी बातों से मैं सहमत नहीं हूं, पर स्वामी अग्निवेश जैसे मध्यस्थ सत्ता को बहुत भाते हैं क्योंकि इनकी आड़ में सरकारी हिंसा को अंजाम देना आसान होता जिसके बाद सरकार और मध्यस्थ, दोनों की राजनीति के चमकने के रास्ते खुल जाते हैं जैसा हम सभी ममता बनर्जी के मामले में देख आये हैं और अब स्वामी अग्निवेश के मामले में देख रहे हैं. याद कीजिये स्वामी अग्निवेश बाल मज़दूरी के सवाल पर भी काफ़ी आन्दोलन कर चुके हैं और बाल मज़दूरी के विरोध के लाभ भी उठा चुके हैं जब कि बाल मज़दूरी के आंकड़े लगातार बढ़ते गये हैं.

अहिंसा का राग अलापने पर ही अपने कर्तव्य की भरपाई करने वालों को याद रखना चाहिए कि छत्तीसगढ़ में १९७५ में बाबा आम्टे जैसे अहिंसावादी वहां बाक़ायदा आश्रम खोलने के बाद और अपनी सारी सद्भावना के बावजूद आदिवासियों को न्याय नहीं दिला पाये. स्वामी अग्निवेश तो अभी उन इलाकों में गये भी नहीं हैं जहां हर बाशिन्दे के दिलो-दिमाग़ पर ज़ुल्मो-सितम के गहरे और कभी न मिटने वाले निशान हैं.

यही नहीं, पानी पी-पी कर माओवादियों को कोसने वालों को यह भी याद रखना चाहिए कि इस पूरे इलाके में दमन और उत्पीड़न के प्रतिरोध का इतिहास माओ से तो बहुत पुराना है ही वह बिर्सा मुण्डा से भी बहुत पुराना है. उसके सूत्र उन जातीय संघर्षों में छिपे हुए हैं जिनकी परिणति जन्मेजय के नाग यग्य जैसे नरसंहार में हुई थी.

चुनांचे दोस्तो, मामला जैसा कि मैं ने कहा काफ़ी पेचीदा है. अपराध और हिंसा को किसी भी युग में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक स्थितियों से और सत्ताधारियों के शोषण से अलग कर के नहीं देखा जा सकता. फ़्रांस के महान लेखक विक्टर ह्यूगो ने अपनी अमर कृति "अभागे लोग" में इसी समस्या को उठाया है.

अन्त में इतना ही कि जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा है वैसे-वैसे यह साफ़ होता चल रहा है कि १९४७ में इतने ख़ून-ख़राबे और इतनी मानवीय पीड़ा के बाद हमने जो हासिल की थी वह आज़ादी नहीं, बल्कि गोरे लुटेरों के बदले काले लुटेरों की सल्तनत थी जिसकी आशंका सरदार भगत सिंह ने खुले शब्दों में व्यक्त की थी. अंग्रेज़ हिन्दुस्तानी सिपाहियों से हिन्दुस्तानी लोगों पर क़हर नाज़िल करते थे, जलियांवाला बाग़ के हत्या काण्ड को अंजाम देते थे, अब पी. चिदम्बरम जैसे हुक्काम महेन्द्र करमा जैसे स्थानीय गुर्गों की मदद से छत्तीसगढ़ में सल्वा जुडुम सरीखी घृणित कार्रवाई करते हैं. उद्देश्य लूट-पाट ही है चाहे मैनचेस्टर और बकिंघम पैलेस के लिये हो या फिर वेदान्त, टाटा और पौस्को के लिए हो.

जब तक इस सारी जद्दो-जेहद को उसकी जड़ों तक जा कर नहीं देखा जायेगा और इसका समतामूलक हल नहीं निकाला जायेगा तब तक हिंसा को रोकने के सभी ऊपरी उपाय विफल होते रहेंगे. अच्छी बात यही है कि धीरे-धीरे आम जनता इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ हो चली है.

Wednesday, July 28, 2010

डायर की वक़ालत

लेकिन ये प्रदूषित वर्ष हैं, हमारे;
दूर मारे गये आदमियों का ख़ून उछलता है लहरों में,
लहरें रंग देती हैं हमें, छींटे पड़ते हैं चांद पर.
दूर के ये अज़ाब हमारे हैं और उत्पीड़ितों के लिए संघर्ष
मेरे स्वभाव की एक कठोर शिरा है.


शायद यह लड़ाई गुज़र जायेगी दूसरी लड़ाइयों की तरह
जिन्हों ने हमें बांटे रखा, हमें मरा हुआ हुई,
हत्यारों के साथ हमारी हत्या करती हुई,
लेकिन इस समय की शर्मिन्दगी छूती है
अपनी जलती हुई उंगलियों से हमारे चेहरे,
कौन मिटायेगा निर्दोषों की हत्या में छुपी क्रूरता ?

--पाब्लो नेरुदा

आख़िरकार जैसा कि अंग्रेज़ी में कहते हैं बिल्ली बैग से बाहर आ ही गयी. हंस के सालाना जलसे पर सम्पादक राजेन्द्र जी ने ख़ामोशी तोड़ कर अपनी ओर से एक स्पष्टीकरण दे ही डाला. ऐसा लगता है कि बहस का राग अलापने वाले राजेन्द्र जी ख़ुद बहस में तभी उतरते हैं जब उन्हें यक़ीन हो जाता है कि उनकी ओर से मोर्चा संभालने वाले सिपहसालार नाकाम साबित हुए हैं या फिर उन्हें लगता है कि आख़िरी वार करने का अवसर अब उन्हीं के हाथ में है. वरना हंस के सालाना जलसे पर जिन्हें ऐतराज़ था वे तो अपनी बात कभी के कह चुके थे. लेकिन सम्भव है राजेन्द्र जी को लगा हो कि मोहल्ला ब्लौग के महारथी हमारे प्यारे साथी अविनाश जी और राजेन्द्र जी के बग़लबच्चे समरेन्द्र बहादुर शायद सफल नहीं हुए, लिहाज़ा हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के भीष्म पितामह को अन्तत: मैदान में उतरना ही पड़ा है.

लेकिन अपने पक्ष को किसी भी तरह सही साबित करने की फ़िक्र में अपने सम्पाद्कीय में राजेन्द्र जी ने दो बुनियादी चूकें की हैं. पहली चूक सैद्धान्तिक है. वे लिखते हैं -- "हंस हमेशा एक लोकतांत्रिक विमर्श में विश्‍वास करता रहा है। हमारा मानना है कि एकतरफा बौद्धिक बहस का कोई अर्थ नहीं है। वह प्रवचन होता है। जब तक प्रतिपक्ष न हो, उसे बहस का नाम देना भी गलत है। हमने अपनी गोष्ठियों में प्रतिपक्ष को बराबरी की हिस्‍सेदारी दी है। जब भारतीयता की अवधारणा पर गोष्‍ठी हुई, तो हमने बीजेपी के सिद्धांतकार शेषाद्रिचारी को भी आमंत्रित किया था। अब इस बार सोचा था कि क्‍यों न प्रतिपक्ष के लिए छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्‍व रंजन को आमंत्रित किया जाए।"

ठीक बात है, बहस तो दो अलग-अलग विचारों वाले लोगों में ही होती है. लेकिन ऐसा लगता है कि राजेन्द्र जी बहस को भी उसी कोटि में रखते हैं जिस कोटि में साहित्य को "काव्य शास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धी मताम" वाले लोग रखते थे. यानी उमस से बेहाल मौसम में कुछ चपकलश हो जाये. वरना ये विश्वरन्जन कहां के सिद्धान्तकार ठहरे ? वे सरकार के पुलिसिआ तन्त्र का एक पुर्ज़ा हैं, जिन्हें पूरी मुस्तैदी से अपना फ़र्ज़ निभाना है, कोई सिद्धान्त नहीं बघारना. अलबत्ता बहस सही मानी में बहस तब होती जब मौजूदा सरकार के नीति-निर्धारकों या उनके प्रवक्ताओं-पैरोकारों में से किसी को राजेन्द्र जी बुलाते. पर उनका इरादा तो सनसनी पैदा करना था, मौजूदा रक्तपात में किसी सक्रिय हस्तक्षेप की सम्भावनाएं तलाश करना नहीं. क्या राजेन्द्र जी का ख़याल था कि हंस की गोष्ठी के बाद विश्वरंजन शस्त्र समर्पण करके रक्तपात से उपराम हो जाते ? या अरुन्धती यह मान लेती कि छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में लड़ रहे लोगों का रास्ता ग़लत है ? इस तरह की अपेक्षाओं के साथ जिन बहसों की योजना बनती है वह बौद्धिक विलास नहीं है तो और क्या है ?
रही बात शास्त्रार्थ की पुरानी परम्परा की दुहाई देने की, तो राजेन्द्र जी यह कैसे भूल गये कि शास्त्रार्थ शास्त्रियों में होता है. हमारी नज़र में तो ऐसा कोई शस्त्रार्थ नहीं आया जिसमें एक ओर शास्त्री हो, दूसरी ओर बधिक, ख़्वाह वह कविता ही क्यों न लिखता हो. हां, एक उदाहरण ज़रूर है जब शास्त्री पराजित होने के कगार पर पहुंच कर बधिक बनने पर उतारू हो गया था और जिस शास्त्रार्थ ने शास्त्रार्थ नामक इस सत्ता विमर्श की सारी पोल पट्टी खोल कर रख दी थी. पाठक गण याग्यवल्क्य-गार्गी सम्वाद को याद करें जिस में गार्गी द्वारा अपने सारे तर्कों के खण्डन के बाद याग्यवल्क्य ने गार्गी को सीधे-सीधे धमकी दी थी कि इस से आगे प्रश्न करने पर तुम्हारा सिर टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा. तो यह तो है शास्त्रार्थ की वो पुरानी परम्परा.
अब राजेन्द्र जी का झूठ ! क्षमा कीजिये इसे और कोई नाम देना सम्भव नहीं है. राजेन्द्र जी कहते हैं और मैं उन्हीं को उद्धृत कर रहा हूं -- "हंस का दफ्तर सब तरह की बहसों, नाराजगियों, शिकायतों या अन्‍य भड़ासों का खुला मंच है। वक्‍ताओं के नाम पर विचार ही हो रहा था कि यार लोग ले उड़े और पंकज विष्‍ट ने अपने समयांतर में लगभग धिक्‍कारते हुए कि हम बस्‍तर क्षेत्र के हत्‍यारे पुलिस डीजी और अरुंधती को एक ही मंच पर लाने की हिमाकत करने जा रहे हैं।"
झूठ इस में यह है कि नामों पर विचार ही नहीं हो रहा था, बल्कि वे फ़ाइनल हो चुके थे. अगर ऐसा न होता तो पंकज बिष्ट अपने समयान्तर में ऐसा लेख क्यों लिखते भला. यही नहीं, जब मैं ने राजेन्द्र जी से पूछा था कि यह आप क्या कर रहे हैं तो उन्हों ने एक बार भी यह नहीं कहा कि अभी कुछ भी अन्तिम रूप से तय नहीं हुआ है. बल्कि वे तो सारा समय मुझसे वैसी ही कजबहसी करते रहे जैसी उन्हों ने अपने सम्पाद्कीय में की है. लेकिन इसका मलाल क्या. यह उनका पुराना वतीरा है. यह तो अरुन्धती ने भंड़ेर कर दिया और राजेन्द्र जी - मुहावरे की ज़बान में कहें तो - डिफ़ेन्सिव में चले गये वरना वे भी नामवर जी, खगेन्द्र ठाकुर, आलोकधन्वा और अरुण कमल की तरह विश्वरंजन की बग़ल में सुशोभित हो कर धन्य-धन्य हो रहे होते और बहस का पुण्य लाभ कर रहे होते. सो वे यह न कहें कि अभी नामों पर विचार ही हो रहा था.
राजेन्द्र जी ने मुझसे सीधे सवाल पूछा है कि क्या मैं उनका पक्ष नहीं जानता. वे लिखते हैं - "दिल्‍ली में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने को आतुर नीलाभ ने भी "वंदना के इन सुरों में एक सुरा मेरा मिला लो" के भाव से एक लेख पेल डाला। इसमें उन्‍होंने पूछा कि मैं किधर हूं, यह मैंने कभी साफ नहीं किया। जो कुछ पढ़ते-सुनते न हों, उन्‍हें क्‍या जवाब दिया जाए? चाहे तो वे इस बार जुलाई 2010 के संपादकीय पर नजर डाल लें।"
हंस का जुलाई अंक मैं ने अभी नहीं देखा, वह तो इस विवाद के बाद आया है लिहाज़ा सम्भव है राजेन्द्र जी ने कुछ डैमेज कण्ट्रोल एक्सरसाइज़ की हो या हो सकता है हम सिरफिरों की बातों का कुछ असर हुआ हो चाहे वे हमें गालियां ही दें . लेकिन मैं राजेन्द्र जी का पक्ष बख़ूबी जानता हूं. इसीलिए यह भी जानता हूं कि माओवादियों की ओर से शान्ति प्रक्रिया को संचालित करने वाले कौमरेड आज़ाद और तीस वर्षीय युवा पत्रकार हेम चन्द्र पाण्देय की जो निर्मम हत्या फ़र्ज़ी मुठ्भेड़ में पुलिस ने की है उस पर पिछ्ले एक महीने के दौरान जो बैठकें हुई हैं उनमें राजेन्द्र जी क्यों नज़र नहीं आये. हम उनसे यह नहीं कहते कि वे बहस न करें, ज़रूर करें पर अगर वह बहस हमें सम्वेदनहीन कर रही हो या ज़रूरी कामों से भटका रही हो तब हमें ऐसी बहस पर लानत भेजने का साहस होना चाहिए भले ही ऐसा करने पर हंस सम्पादक हमें फ़ासिस्ट ही क्यों न कहें. हम अच्छी तरह जानते हैं कि वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति वाले विमर्श में राजेन्द्र जी का पक्ष क्या है.
चलते चलाते एक बात और. राजेन्द्र जी ने ब्लौग वालों को गालियां देते हुए इस बात पर चुप्पी साध ली है कि ख़ुद उन्होंने इस विवाद को बढ़ाने में एक नहीं दो ब्लौगों की मदद ली है. पर क्या करें जब पाठकों ने इन ब्लौग वालों को ही राजेन्द्र जी का दलाल कहना शुरू कर दिया.
अन्त में यह कि हंस की परम्परा का ज़िक्र करते हुए राजेन्द्र जी उसके संस्थापक प्रेमचन्द का उल्लेख ज़रूर करते हैं. अगर प्रेमचन्द ऐसेरे गोष्ठी करते तो क्या वे एक ओर क्रान्तिकारियों के समर्थक गणेश शंकर विद्यार्थी और दूसरी ओर जनरल डायर को बुलाते ?

Sunday, July 25, 2010

बोलना हो तो तुम्हारे हाथ की दो चोट बोले

प्रिय अजय और अन्य साथियो,
जनज्वार पर कई दिनों से राहुल फ़ाउण्डेशन, परिकल्पना प्रकाशन और सी एल आई की एक शाख से जुड़े शशि प्रकाश, कात्यायनी, सत्यम और उनके कुछ और साथियों के ख़िलाफ़ उनके ही अनेक पुराने साथियों के आरोप पढ़ता आ रहा हुं. किसी हद तक हतप्रभ हुं और किसी क़दर उदास भी. कारण पहला यह है कि मैं सांगठनिक तौर पर तो नहीं लेकिन लिखाड़ियों के नाते से शशि प्रकाश, कात्यायनी, सत्यम को जानता रहा हुं. शशि प्रकाश को बहुत दूर से, लेकिन बाक़ी दोनों को नज़दीक से.परिकल्पना प्रकाशन से मेरा ताज़ा कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ है. मैं उनकी राजनीति क कभी समर्थक नहीं रहा और राहुल फ़ाउण्डेशन को ले कर भी मेरे मन म्रं सवाल रहे हैं. कारण यह कि न्यास वग़ैरा बनाना रजनैतिक दलों का काम नहीं होता और पुस्तकों का प्रकाशन भी राजनैतिक काम काज को बढ़ाने का साधन होता है, जब वह साध्य बन जाये या राजनैतिक काम काज की तुलना में प्राथमिकता ग्रहण कर ले तो समझ लेना चाहिए कि दल अब क़दम ताल ही कर रहा है. लेकिन चूंकि मैं सी एल आई से नहीं जुड़ा था, इसलिये यह मेरा सिर दर्द नहीं था.
मैं १९७० से ही भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मा.ले. (लिबरेशन) से जुड़ा था -- बतौर सदस्य नहीं, पर उससे कम भी नहीं. अपने दिवंगत साथी गोरख पांडेय की तरह पार्टी का सदस्य न होते हुए भी मैं लगभग सात साल तक पार्टी के सांस्कृतिक संगठन जन संस्कृति मंच का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहा और पार्टी और जसम के साथ अनेक सैद्धांतिक और व्यवहार सम्बन्धी अनसुलझे मतभेदों के चलते मैं अन्ततः जसम से और पार्टी की गतिविधियों से अलग हो गया. पर इसका ज़िक्र आगे या फिर कभी.
इस समय मैं यह कहना चाहता हुं कि इस सारे मुद्दे को सिर्फ़ एक ही संगठन की आलोचनात्मक चीड़-फाड़ के सहारे समझ्ने-समझाने की मुहिम अन्त में व्यक्ति केन्द्रित हो कर असली विषय से भटक जायेगी और यह विषय है वामपन्थी राजनैतिक दलों में भटकाव की समस्या -- उसके कारण और उपचार. ज़ाहिर है सी एल आई का यह भटकाव बहुत पुराना है और पार्टी तथा उसके तहत काम करने वाले संगठनों को टूटने, बंटने, विपथगामी होने की ओर ले गया है. जब विचारधारा में खोट होती है तो वह राजनैतिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी प्रकट होती है. उस दल और संगठन से जुड़े व्यक्तियों का व्यवहार भी पूर्वाग्रहों, नफ़रतों, अमानवीयता और अतार्किकता का शिकार हो जाता है. दल में कौकस बन जाते हैं, सम्विधानेतर शक्ति केन्द्र विकसित हो जाते हैं (यह परिघटना सिर्फ़ कांग्रेस तक सीमित नहीं है, वामपन्थी दल भी इस संक्रमण से अछूते नहीं रह पाये हैं).
पुराने मार्क्सवादी सिद्धांत में दो लाइनों के संघर्ष का बड़ा महत्व रहा है. जब-जब इस सिद्धांत को ताक पर रख कर काम किया गया है, विकृतियां पैदा हुई हैं. इन विकृतियों की क़िस्म अलग-अलग हो सकती है -- सी एल आई में एक क़िस्म की तो माले में दूसरे क़िस्म की -- लेकिन इनका उत्स विचारधारात्मक भटकाव में ही है और इस भटकाव का सबसे पहला लक्षण पार्टियों और उनके संगठनों के सांस्कृतिक व्यवहार में लक्षित होता है. अनेक वामपन्थी राजनैतिक दलों के सांस्कृतिक संगठन तो दूर रहे, उनकी कोई स्पष्ट सांस्कृतिक नीति भी नहीं है. जिन वामपन्थी दलों के सांस्कृतिक संगठन हैं भी, ज़रा उनका मुलाहिज़ा फ़र्माइए. क्या उनमें आज के राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संकट का सामना करने का माद्दा है ? मत भूलिए कि राजनीति का एक अंश नीति भी है जिस से नैतिक शब्द बना है. नैतिकता के बिना न राजनीति सफल होगी, न नीति और न ही सांस्कृतिक पहलक़दमी.
अगर सचमुच साथी लोग कात्यायनी, शशिप्रकाश और सी एल आई से इतने ही नालां थे और हैं तो उन पर और भी दायित्व बनता है कि इस मुद्दे तो सिर्फ़ कुछ व्यक्तियों तक सीमित न करके व्यापक बनायें. इसका यह मतलब नहीं है कि अगर शशिप्रकाश और उनके साथी दोषी हैं तो उनासे जवाब न मांगा जाये या उन्हें कटघरे में न खड़ा किया जाये. लेकिन अन्त में सही विचारधारा, सही काम काज और सही राजनैतिक-सांस्कृतिक दिशा और पहलक़दमी ही आपका जवाब होना चाहिए. कम्यूनिस्ट जब पतित होता है तो वह उतना ही पतित होता है जितना कोई और पर चूंकि वह सबसे ज़्यादा नैतिकता का राग अलापता है इसलिये हमें आघात पहुंचता है. क्या कम्यूनिस्टों के पतन की भर्त्सना करते हुए हम औरों के पतन का औचित्य ठहरा सकते हैं ? हम बच्चन जी को तो हम भुला चुके हैं पर उनकी दो पंक्तियां मुझे अच्छी लगती हैं -- बोलना हो तो
तुम्हारे हाथ की दो चोट बोले

फ़िलहाल इतना ही लिख रहा हुं. आगे फिर......

नीलाभ

Thursday, July 15, 2010

डायर से बात करने की वकालत
आज अविनाश ने अपने मोहल्ला ब्लोग पर हंस की ओर से जवाब देने क ज़िम्मा उठाया है और वही तर्क दिया है जिसके बारे में मैंने अपनी टिप्पणी में शंका प्रकट की थी. जिस तरह के कार्यक्रम की झांकी अविनश ने अपनी टिप्पणी में दी है वह हम सब जानते हैं कि कपोल कल्पना के सिवा और कुछ नहीं है.
हंस के सम्पादक राजेंद्र यादव ने भले ही गोष्ठी का शीर्षक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटक वैदिक हिंसा हिंसा न भवति के शीर्षक से ले कर दिया हो और भले ही उनकी मंशा सत्ता की हिंसा पर बहस चलाने की हो लेकिन इस बहस के लिये सत्ता पक्ष की ओर से क्या विश्वरंजन ही रह गये थे जो न तो नीति निर्धारकों मॆं हैं न मौजूदा सरकार के प्रवक्ताओं में. वे सत्ता के एक ऐसे अधिकारी हैं जिनका काम सत्ता के फ़ैसलों को लागू करना है और उन्हें सही साबित करना है जो वे अख़बारों के माध्यम से कर रहे हैं. लेकिन चूंकि मीडिया अब अपनी विश्वसनीयता खो चुका है इसलिये हंस जैसी पत्रिका ज़्यादा कारगर साबित हो सकती है, इसलिये बहस चलाने की तो कोई सम्भावना ही नहीं थी. यह भ्रम पैदा करने की कोशिश की गयी थी कि हंस की गोष्ठी के माध्यम से एक संवाद की भूमि तैयार करने की कोशिश की जा रही है,
अरुन्धती के साथ तीन चार माओवाद समर्थकों को मंच पर लाने और विश्वरंजन को घेरने और नारे लगाती भीड़ द्वारा उनका पर्दा फ़ाश करने का जो सिनैरियो अविनाश ने तैयार किया है वह हमारी फ़िल्मों जैसा है और सच्चाई आम तौर पर इससे बहुत अलग होती है.
रहा सवाल राजेंद्र जी की उदास मुख मुद्रा का जिसका उल्लेख अविनाश ने किया है और उनका हवाला देते हुए उनका स्पष्टीकरण पेश किया है तो क्या वे बतायेंगे कि यही सब राजेंद्र जी ने मुझसे क्यों नहीं कहा था. उन से जो बात हुई थी उससे यह साफ़ था कि सब तै हो चुका है. बल्कि वे मुतमईन थे कि सब फ़ाइनल है. दूसरी बात मेरी टिप्पणी से पहले जनज्वार और हाशिया पर दो टिप्पणियां आ चुकी थीं -- अजय प्रकाश और विश्वदीपक की. राजेन्द्र जी का स्पष्टीकरण आने में इतनी देर क्यों लगी. क्या इसलिये कि अब तुरुप क पत्ता ही पिट गया.
अभी अभी अविनाश ने किन्हीं समरेंद्र सिंह की टिप्पणी मुझे भेजी है जिसमें मेरी खूब ख़बर ली गयी है. ख़ैर, मुझे जो कहना था मैं ने खुल्लम खुल्ला कहा है, अगर हंस को या राजेंद्र यादव को कटघरे में खड़ा करने से मेरी दुकान चलती है तो समरेंद्र को मेरी तरफ़ से छूट है कि वे मुझे गरिया कर अपनी दुकान जमा लें.
चूंकि हंस के साथ प्रेमचन्द का नाम भी जुड़ा है इसलिये एक प्रश्न उन सब से पूछ्ना चाहता हूं जो संवाद संवाद की गुहार लगाये हुए हैं -- क्या प्रेमचन्द अगर अंग्रेज़ी राज और उसकी हिंसा पर कोई गोष्ठी करते तो क्या वे डायर को मंच पर बुलाते ?

--नीलाभ

Tuesday, July 13, 2010

मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम

मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम

(अजय प्रकाश और विश्वदीपक की टिप्पणियों पर एक प्रतिक्रिया)

प्रिय अजय प्रकाश और विश्वदीपक,
दोस्तो या तो तुम लोग बहुत भोले हो या फिर सब कुछ जानते-बूझते हुए मामले को व्यर्थ ही उलझा रहे हो. हंस ने अगर इस बार की सालाना गोष्ठी में विश्वरंजन और अरुन्धती राय दोनों को एक ही मंच पर लाने की योजना बनायी है तो इसके निहितार्थ साफ़ हैं. पहली बात तो यह है कि इस बार की गोष्ठी को "वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति" जैसा शीर्षक दे कर राजेन्द्र जी यह भ्रम देना चाहते हैं कि वे एक गम्भीर बहस का सरंजाम कर रहे हैं. वे यह भ्रम भी पैदा करना चाहते हैं कि हम एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में रह रहे हैं और इसमें सबको अपनी बात कहने क अधिकार है.
दर असल, सत्ता की तरफ़ झुके लोगों का यह पुराना वतीरा है. ख़ून ख़्रराबा भी क्करते रहो और बहस भी चलाते रहो. अब तक राजेन्द्र जी ने झारखण्ड और छत्तीसगढ़ और उड़ीसा या फिर आन्ध्र और महाराष्ट्र में सरकार द्वारा की जा रही लूट-मार और ख़ून ख़्रराबे और आदिवासियों की हत्या पर कोई स्पष्ट स्टैण्ड नहीं लिया है, लेकिन बड़ी होशियारी से वे अण्डर डौग्ज़ के पक्षधर होने की छवि बनाये हुए हैं. इसके अलावा वे यह भी जानते हैं कि जब सभी कुछ ढह रहा हो, जब सभी लोग नंगे हो रहे हों तो एक चटपटा विवाद उन्हें कम से कम चर्चा में बनाये रखेगा और इतना हंस की दुकानदारी चलाने के लिए काफ़ी है, गम्भीर चर्चा से उन्हें क्या लड्डू मिलेंगे ! अब यही देखिये कि बी जमालो तो भुस में तीली डाल कर काला चश्मा लगाये किनारे जा खड़ी हुई हैं और आप सब चीख़-पुकार मचाये हुए हैं.
उधर, हंस के मंच पर और वह भी अरुन्धती राय के साथ आने पर विश्व रंजन को जो विश्वसनीयता हासिल होगी वह नामवर सिंह, आलोक धन्वा, अरुण कमल और खगेन्द्र ठाकुर जैसे महारथियों से अपनी किताब का विमोचन कराने से कहीं ज़्यादा बैठेगी. साथ ही एक जन विरोधी पुलिस अफ़सर की काली छवि को कुछ ऊजर करने का कम भी करेगी. आख़िर हंस "प्रगतिशील चेतना का वाहक" जो ठहरा.
असली मुश्किल अरुन्धती की है. अगर वह शामिल होती है तो राजेन्द्र जी की चाल कामयाब हो जाती है और विश्व रंजन के भी पौ बारह हो जाते हैं. नहीं शामिल होती तो राजेन्द्र जी, विश्व रंजन और उनके होते-सोते हल्ला करेंगे कि देखिये, कितने खेद की बात है, इन लोगों में तो जवाब देने की भी हिम्मत नहीं, भाग गये, भाग गये, हो, हो, हो, हो !
इसलिए प्यारे भाइयो, इस सारे खेल को समझो. यह पूरा आयोजन कुल मिला कर सत्ताधारी वर्ग के हाथ मज़बूत करने की ही कोशिश है.
अब रहा सवाल हिन्दी साहित्य का -- तो दोस्तो विश्व रंजन के कविता संग्रह के विमोचन में जो चेहरे दिख रहे हैं, उनसे हिन्दी साहित्य के गटर की, उसकी ग़लाज़त की, सड़ांध की सारी असलियत खुल कर सामने आ जाती है. वैसे इसकी शुरुआत मौजूदा दौर में करने का सेहरा भी आदरणीय राजेन्द्र जी के सिर बंधा था जब उन्होंने बथानी टोला हत्याकाण्ड के बाद बिहार के सारे लेखकों की बिनती ठुकरा कर लालू प्रसाद यादव से एक लाख का पुरस्कार ले लिया था. उनका पक्ष बिलकुल साफ़ है. यही वजह है कि वे किसी ऐसे स्थान पर नहीं नज़र आते जहां सत्ता के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा बनने की आशंका हो. वे किसी पत्रकार के बेटे की शादी की दावत में आई आई सी में " खाने-पीने" का न्योता नहीं ठुकराएंगे, लेकिन फ़र्ज़ी मुठ्भेड़ में जिसे कहते हैं "इन कोल्ड ब्लड" मार दिये गये युवा पत्रकार हेम चन्द्र पाण्डे की अन्त्येष्टि में शामिल होने का ख़तरा कभी नहीं मोल लेंगे. कहां जाना है कहां नहीं जाना इसे ये सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं जिन्हें आप हिन्दी के पुरोधा और सामाजिक परिवर्तन के सूत्रधार बनाये हुए, कातर भाव से उनके कर्तव्यों की याद दिला रहे हैं.
इनमें से कौन नहीं जानता कि बड़े पूंजीपति घरानों के इशारे पर हमारी मौजूदा सरकार झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आन्ध्र और महाराष्ट्र में कैसा ख़ूनी और बेशर्म खेल खेल रही है. लेकिन ये अपने अपने सुरक्षा के घेरे में सुकून से "साहित्य चर्या" में लीन हैं, इसी ख़ूनी सरकार के लोहे के पंजे के कविता संग्रह के क़सीदे पढ़ रहे हैं. क्या इन्हें माफ़ किया जा सकता है ? मत भूलिए कि जो समाज की बड़ी बड़ी बातें करते हैं उनका उतना ही पतन होता है. यह हमारे ही वक़्त की बदनसीबी है कि "गोली दागो पोस्टर" का रचनाकार उसी दारोग़ा के साथ है जिसके उत्पीड़न पर उसने सवाल उठाया था. ये वही अरुण कमल हैं जिन्हों ने लिखा था : " जिनके मुंह मॆं कौर मांस का उनको मगही पान". बाक़ियों की तो बात ही छोड़िए.
तो भी, मैं तुम दोनों को इस बात पर ज़रूर बधाई देना चाहता हूं कि इस चौतरफ़ा ख़ामोशी और गिरावट के माहौल में तुम दोनों ने इस ज़रूरी मुद्दे को उठाया है हालांकि चोट हलकी है साथियो, बहरों को सुनाने के लिए ज़ोरदार धमाका चाहिये.
अन्त में अपने एक प्रिय कवि का कवितांश जिसे हम अब धीरे-धीरे भूल रहे हैं :

ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,
अब तक क्या किया ?
जीवन क्या जिया !!

उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
भूतों की शादी में कनात से तन गये,
किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,

दु:खों के दाग़ों को तमग़े सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,

अब तक क्य किया,
जीवन क्या जिया!!

................

भावना के कर्तव्य त्याग दिये,
हॄदय के मन्तव्य मर डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ ही उखाड़ दिये,
जम गये, जाम हुए फंस गये,
अपने ही कीचड़ में धंस गये !!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में,
आदर्श खा गये.

अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया !!
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम !

--नीलाभ